28/05/2019
सूरत में जो हुआ वो शायद चुनाव की चकाचौंध में घुम जाएगा ।
शायद जो मरे हें या सही शब्दों में मार दिए गए उनकी जिम्मेदारी कोई भी नहीं लेगा।
अब बस माता पिताओ के पास लाश और फोटो बचेंगी और सब मानेंगे यह एक दुखद हादसा था।
पर यह हादसा नहीं था। यह कत्ल था।
इस कत्ल की प्लैनिंग 1947 में शुरू होगई थी। गरीब लाचार भोले लोगों के शोषण व आत्मदाह की प्लैनिंग।
एक जगह प्लौट कटे वहा आपके और हमारे पुरखों के चुने नेताजी शुषाशन और समृद्धि लाने वाले थे।
और बदले में मिली मौत।
जहां भूकंप से सुरक्षा जरूरी थी वहा नियम लागू किए गए या नहीं कोई नहीं था देखने वाला, तब भूकंप आने पर हम मरे।
जहां मेटल डिटेक्टर अनिवार्य होना था, वहा कोई नहीं था देखने वाला तब हम हमलों बम धमाकों में मरे।
कहीं बीच रोड एक्सीडेंट बाद एंबुलेंस ना होने पर लोग मरे।
कहीं बिजली के झूलते तार, जिनको देखने वाला कोई नहीं था ,उनसे झटके खाकर मरे।
कहीं रोड पर बने गहरे गढ्ढे में छोटे छोटे मासूम मरे जिन गढ़ों को देखना किसी का काम था।
कहीं ब्रिज गिरे कही बस ने मारा कही आग लगी कहीं गैस हमारे छाती में ठूंस दी गई और हम तड़प तड़प के मरे।
ज़्यादा तो छोड़िए जनाब कभी कभी तो हमारी मलहम पट्टी करवाने गए अस्पताल में डाक्टर नहीं दिया गया हम में से अधिकांश मरे।
जो बचे वो बचे कोर्ट के चक्कर काटने और भत्ता लेने हमारे मासूम बच्चों की लाश के बदले।
70 सालों में कितने ही कत्ल हुए पर हम इस व्यवस्था नाम के कातिल को पकड़ ही नहीं पाए। इस कातिल ने हमारे बच्चे बूढ़े जवान किसी को नहीं छोड़ा। शायद पुलिस की मिली भगत थी।
आज का दिन कल का दिन व आने वाले हर दिन याद रखिए आपको और हमको मारने वाला हमारी व्यवस्था है, इस व्यवस्था के मालिकाना हक जिनके ऊपर है उन्हें जिम्मेदारी लेनी होगी जो कभी नहीं ली गई।
भोपाल गैस काण्ड सब भूल गए, भूकंप,तूफान में आवश्यक कदम ना उठाए गए वो सब भूल गए। दंगों में पुलिस समर्थक बनी सब भूल गए। हमारे भाइयों को धर्म के नाम पर सड़कों पर जलाकर मारा सब भूल ही तो गए। हमारी चूक के कारण दुश्मन घुसकर हमको बम से उड़ा गए भूल ही तो गए साहब।
घाव सूखने नहीं चाहिए तभी नए घाव नहीं होंगे मलहम लगाने। व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाएं। भारत यदि सत्य ही युवाओं का देश है तो व्यवस्था परिवर्तन अच्छे के लिए करना हमारा धर्म है ।
कत्ल रोकिए और हां याद राखिए कुछ भूलिएगा मत
जय भारत।