बड़े बावरे हिन्दी के मुहावरे
हिंदी के मुहावरे, बड़े ही बावरे है,
खाने पीने की चीजों से भरे है...
कहीं पर फल है तो कहीं आटा-दालें है,
कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले है ,
फलों की ही बात ले लो...
आम के आम और गुठलियों के भी दाम मिलते हैं,
कभी अंगूर खट्टे हैं,
कभी खरबूजे, खरबूजे को देख कर रंग बदलते हैं,
कहीं दाल में काला है,
तो कहीं किसी की दाल ही नहीं गलती,
कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है,
तो कोई लोहे के चने चबाता है,
कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है,
मुफलिसी में जब आटा गीला होता है,
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है,
सफलता के लिए बेलने पड़ते है कई पापड़,
आटे में नमक तो जाता है चल,
पर गेंहू के साथ, घुन भी पिस जाता है,
अपना हाल तो बेहाल है, ये मुंह और मसूर की दाल है,
गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं,
और कभी गुड़ का गोबर कर बैठते हैं,
कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड़ बनता है,
कभी ऊँट के मुंह में जीरा है,
कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है,
किसी के दांत दूध के हैं,
तो कई दूध के धुले हैं,
कोई जामुन के रंग सी चमड़ी पा के रोई है,
तो किसी की चमड़ी जैसे मैदे की लोई है,
किसी को छटी का दूध याद आ जाता है,
दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक पीता है,
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है,
शादी बूरे के लड्डू हैं, जिसने खाए वो भी पछताए,
और जिसने नहीं खाए, वो भी पछताते हैं,
पर शादी की बात सुन, मन में लड्डू फूटते है,
और शादी के बाद, दोनों हाथों में लड्डू आते हैं,
कोई जलेबी की तरह सीधा है, कोई टेढ़ी खीर है,
किसी के मुंह में घी शक्कर है, सबकी अपनी अपनी तकदीर है...
कभी कोई चाय-पानी करवाता है,
कोई मख्खन लगाता है
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है,
तो सभी के मुंह में पानी आता है,
भाई साहब अब कुछ भी हो,
घी तो खिचड़ी में ही जाता है,
जितने मुंह है, उतनी बातें हैं,
सब अपनी-अपनी बीन बजाते है,
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है,
सभी बहरे है, बावरें है
ये सब हिंदी के मुहावरें हैं...
ये गज़ब मुहावरे नहीं बुजुर्गों के अनुभवों की खान हैं...
सच पूछो तो हिन्दी भाषा की जान हैं...🔹😊
राकेश पुरी : 'हिन्दी व्याकरण एवं साहित्येतिहास'
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[3/17, 9:30 PM] +91 86995 00517: वर्ष साहित्यकार कृति(साहित्य अकादमी)
1955 माखनलाल चतुर्वेदी हिम तरंगिणी (काव्य)
1956 वासुदेव शरण अग्रवाल पद्मावत संजीवनी व्याख्या (व्याख्या)
1957 आचार्य नरेन्द्र देव बौध धर्म दर्शन (दर्शन)
1958 राहुल सांकृत्यायन मध्य एशिया का इतिहास (इतिहास)
1958 रामधारी सिंह 'दिनकर' संस्कृति के चार अध्याय (भारतीय संस्कृति)
1960 सुमित्रानंदन पंत काला और बूढ़ा चाँद (काव्य)
1961 भगवतीचरण वर्मा भूले बिसरे चित्र (उपन्यास)
1962 पुरस्कार नहीं दिया गया
1963 अमृत राय प्रेमचंद: कलम का सिपाही (जीवनी)
1964 अज्ञेय आँगन के पार द्वार (काव्य)
1965 डॉ॰ नगेन्द्र रस सिद्धांत (विवेचना)
1966 जैनेन्द्र कुमार मुक्तिबोध (उपन्यास)
1967 अमृतलाल नागर अमृत और विष (उपन्यास)
1968 हरिवंशराय बच्चन दो चट्टाने (काव्य)
1969 श्रीलाल शुक्ल राग दरबारी (उपन्यास)
1970 राम विलास शर्मा निराला की साहित्य साधना (जीवनी)
1971 नामवर सिंह कविता के नये प्रतिमान (साहित्यिक आलोचना)
1972 भवानीप्रसाद मिश्र बुनी हुई रस्सी (काव्य)
1973 हजारीप्रसाद द्विवेदी आलोक पर्व (निबंध)
1974 शिवमंगल सिंह सुमन मिट्टी की बारात (काव्य)
1975 भीष्म साहनी तमस (उपन्यास)
1976 यशपाल मेरी तेरी उसकी बात (उपन्यास)
1977 शमशेर बहादुर सिंह चुका भी हूँ मैं नहीं (काव्य)
1978 भारतभूषण अग्रवाल उतना वह सूरज है (काव्य)
1979 धूमिल कल सुनना मुझे (काव्य)
1980 कृष्णा सोबती ज़िन्दगीनामा - ज़िन्दा रुख़ (उपन्यास)
1981 त्रिलोचन ताप के ताये हुए दिन (काव्य)
1982 हरिशंकर परसाईं विकलांग श्रद्धा का दौर (व्यंग)
1983 सर्वेश्वरदयाल सक्सेना खूँटियों पर टँगे लोग (काव्य)
1984 रघुवीर सहाय लोग भूल गये हैं (काव्य)
1985 निर्मल वर्मा कव्वे और काला पानी (कहानी संग्रह)
1986 केदारनाथ अग्रवाल अपूर्वा (काव्य)
1987 श्रीकांत वर्मा मगध (काव्य)
1988 नरेश मेहता अरण्या (काव्य)
1989 केदारनाथ सिंह अकाल में सारस (काव्य)
1990 शिव प्रसाद सिंह नीला चाँद (उपन्यास)
1991 गिरिजाकुमार माथुर मैं वक्त के हूँ सामने (क�
[3/17, 9:31 PM] +91 86995 00517: 1992 गिरिराज किशोर ढाई घर (उपन्यास)
1993 विष्णु प्रभाकर अर्धनारीश्वर (उपन्यास)
1994 अशोक वाजपेयी कहीं नहीं वहीं (काव्य)
1995 कुंवर नारायण कोई दूसरा नहीं (काव्य)
1996 सुरेन्द्र वर्मा मुझे चाँद चाहिये (उपन्यास)
1997 लीलाधर जगूड़ी अनुभव
अज्ञेय के अनुसार नयी कविता में नया क्या है ?
(अ) अनुभूति की साधारणता
(ब) अनुभूति की विशिष्टता
(स) पर्सनल सिचुएशन
(द) इनमें से कोई नहीं
मित्रो!
तारसप्तक दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक में कितनी कवयित्रियाँ सम्मिलित थीं ?
(अ) दो
(ब) तीन
(स) चार
(द) एक भी नहीं
हिंदी की 'प्रथम कहानी' 'किशोरीलाल गोस्वामी' कृत 'इंदुमती' 1900ई. मानी जाती है जिसका प्रकाशन 'सरस्वती' में हुआ था।
'शिवदान सिंह चौहान' के अनुसार यह कहानी 'शेक्सपीयर' की 'टेम्पेस्ट' का अनुवाद है, मौलिक नहीं।
1901 में 'छत्तीसगढ़ मित्र' में प्रकाशित 'माधवराव सप्रे' की 'एक टोकरी भर मिट्टी' को हिंदी की 'पहली मौलिक कहानी' माना जाता है।
http://www.twitter.com/Chaand_Daijari
हिंदी की प्रथम मौलिक कहानी किसे मानते हैं?
(अ) इंदुमती
(ब) राजा भोज का सपना
(स) एक टोकरी भर मिट्टी
(द) ग्यारह वर्ष का समय
हिंदी की प्रथम कहानी कौनसी है?
(अ) इंदुमती
(ब) राजा भोज का सपना
(स) एक टोकरी भर मिट्टी
(द) ग्यारह वर्ष का समय
१.जो दिखाई न दे - अदृश्य
२.जिसका जन्म न हो - अजन्मा
३.जिसका कोई शत्रु न हो - अजातशत्रु
४.जो बूढ़ा न हो - अजर
५.जो कभी न मरे - अमर
६.जो पढ़ा -लिखा न हो - अपढ़ ,अनपढ़
७.जिसके कोई संतान न हो - निसंतान
८.जो उदार न हो - अनुदार
९. जिसमे धैर्य न हो - अधीर
१०.जिसमे सहन शक्ति हो - सहिष्णु
११.जिसके समान दूसरा न हो - अनुपम
१२.जिस पर विश्वास न किया जा सके - अविश्वनीय
१३.जिसकी थाह न हो - अथाह
१४.दूर की सोचने वाला - दूरदर्शी
१५.जो दूसरों पर अत्याचार करें - अत्याचारी
१६.जिसके पास कुछ भी न हो - अकिंचन
१७.दुसरे देश से अपने देश में समान आना - आयात
१८.अपने देश से दुसरे देश में समान जाना - निर्यात
१९.जो कभी नष्ट न हो - अनश्वर
२०.जिसे कोई जीत न सके - अजेय
२१.अपनी हत्या स्वयं करना - आत्महत्या
२२.जिसे दंड का भय न हो - उदंड
२३.जिस भूमि पर कुछ न उग सके - ऊसर
२४.जनता में प्रचलित सुनी -सुनाई बात - किंवदंती
२५.जो उच्च कुल में उत्पन्न हुआ हो - कुलीन
२६.जिसकी सब जगह बदनामी -कुख्यात
२७.जो क्षमा के योग्य हो - क्षम्य
२८.शीघ्र नष्ट होने वाला - क्षणभंगुर
२९.कुछ दिनों तक बने रहना वाला - टिकाऊ
३०.पति-पत्नी का जोड़ा - दम्पति
३१.जो कम बोलता हो -मितभाषी
३२.जो अधिक बोलता हो - वाचाल
३३.जिसका पति जीवित हो - सधवा
३४.जिसमे रस हो - सरस
३५.जिसमे रस न हो - नीरस
३६.भलाई चाहने वाला - हितैषी
३७.दूसरों की बातों में दखल देना - हस्तक्षेपby. Jai sagar
३८.दिल से होने वाला - हार्दिक
३९.जिसमे दया न हो - निर्दय
४०.जो सब जगह व्याप्त हो -सर्वव्यापक
४१.जानने की इच्छा रखने वाला - जिज्ञासु
४२.सप्ताह में एक बार होने वाला - साप्ताहिक
४३.साहित्य से सम्बन्ध रखने वाला - साहित्यिक
४४.मांस खाने वाला - मांसाहारी
४५.जिसके आने की तिथि न हो - अतिथि
४६.जिसके ह्रदय में दया हो - दयावान
४७.जो चित्र बनाता हो - चित्रकार
४८.विद्या की चाह रखने वाला - विद्यार्थी
४९.हमेशा सत्य बोलने वाला - सत्यवादी
५०.जो देखने योग्य हो - दर्शनीय
५१ . जो धन का दुरुपयोग करता है - अपव्ययी
५२. जहाँ पहुँचा न जा सके - अगम्य
५३ . जिसे जीता न जा सके - अजेय
५४. जिसका अंत न हो - अनन्त
५५. जिसका जन्म न हो सके - अजन्मा .
५६. अवसर के अनुसार बदल जाने वाला - अवसरवादी
५७ . जो कानून के विरुद्ध हो - अवैध
५८ .दूसरे के पीछे चलने वाला - अनुचर
५९ . जिसका कोई स्वामी न हो - अनाथ
६० .जिसे क्षमा न किया जा सके - अक्षम्य .
६१. जिसका इलाज न हो सके - असाध्य
६२ . जिसका विश्वास न किया जा सके - अविश्वसनीय
६३. जिस पर अभियोग लगाया गया हो - अभियुक्त
६४. जिसमे शक्ति न हो - अशक्त
६५. जो पहले न पढ़ा हो - अपठित
६६. जिसकी कोई उपमा न हो - अनुपम .
६७ . कम जानने वाला - अल्पज्ञ .
६८ . जो कुछ न करता हो - अकर्मण्य
६९. जो दिखाई न दे - अदृश्य
७० . जिसका मूल्य न आँका जा सके - अमूल्य
७१ . जो नष्ट न होने वाला हो - अविनाशी .
७२ . जो आँखों के सामने न हो - अप्रत्यक्ष
७३ . जिसका पार न पाया जाए - अपार .
७४ . जो परिचित न हो - अपरिचित
७५ . जहाँ जाना संभव न हो - अगम .
७६ . चार मुखों वाला - चतुरानन
७७ . दूसरों के दोष को खोजने वाला - छिद्रान्वेसीby. Jai sagar
७८ . छात्रों के रहने का स्थान - छात्रवास
७९ . जनता द्वारा चलाया जाने वाला राज - जनतंत्र .
८० . जल में रहने वाला - जलचर .
८१ . जो जन्म से अँधा हो - जन्मांध .
८२ . जीने की इच्छा - जिजीविषा .
८३. वह पहाड़ जिससे आग निकलती हो - ज्वालामुखी .
८४ . जो किसी का पक्ष न ले - तटस्थ
८५ . जिसकी तीन भुजाएँ हो - त्रिभुज .
८६ . तीनों लोकों का स्वामी - त्रिलोकी .
८७ . जो पुत्र गोद लिया हो - दत्तक .
८८. बुरे आचरण वाला - दुराचारी .
८९ . जो दो भाषाएँ जानता हो - दुभाषिया .
९० . जिसकी आयु बड़ी लम्बी हो - दीर्घायु
९१ . प्रतिदिन होने वाला - प्रतिदिन .
९२ . बुरे चरित्र वाला - दुश्चरित्र .
९३. जिसमे दया हो - दयालु .
९४. जो कठिनाई से प्राप्त हो - दुर्लभ .
९५. जहाँ पहुँचना कठिन हो - दुर्गम .
९६ . दर्द से भरा हुआ - दर्दनाक .
९७ . जो धर्म का काम करे - धर्मात्मा .
९८ . जिसका कोई अर्थ न हो - निरर्थक .
९९ . जिसके मन में कोई कपट न हो - निष्कपट .
१००. जो अभी - अभी पैदा हुआ हो - नवजात
अलंकार - " काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्व अलंकार कहे जाते हैं ! "
अलंकार के तीन भेद हैं -
1. शब्दालंकार - ये शब्द पर आधारित होते हैं ! प्रमुख शब्दालंकार हैं - अनुप्रास , यमक , शलेष , पुनरुक्ति , वक्रोक्ति आदि !
2. अर्थालंकार - ये अर्थ पर आधारित होते हैं ! प्रमुख अर्थालंकार हैं - उपमा , रूपक , उत्प्रेक्षा, प्रतीप , व्यतिरेक , विभावना , विशेषोक्ति ,अर्थान्तरन्यास , उल्लेख , दृष्टान्त, विरोधाभास , भ्रांतिमान आदि !
3.उभयालंकार- उभयालंकार शब्द और अर्थ दोनों पर आश्रित रहकर दोनों को चमत्कृत करते हैं!
1- उपमा - जहाँ गुण , धर्म या क्रिया के आधार पर उपमेय की तुलना उपमान से की जाती है
जैसे -
हरिपद कोमल कमल से ।
हरिपद ( उपमेय )की तुलना कमल ( उपमान ) से कोमलता के कारण की गई ! अत: उपमा अलंकार है !
2- रूपक - जहाँ उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप किया जाता है ! जैसे -
अम्बर पनघट में डुबो रही ताराघट उषा नागरी ।
आकाश रूपी पनघट में उषा रूपी स्त्री तारा रूपी घड़े डुबो रही है ! यहाँ आकाश पर पनघट का , उषा पर स्त्री का और तारा पर घड़े का आरोप होने से रूपक अलंकार है !
3- उत्प्रेक्षा - उपमेय में उपमान की कल्पना या सम्भावना होने पर उत्प्रेक्षा अलंकार होता है !
जैसे -
मुख मानो चन्द्रमा है ।
यहाँ मुख ( उपमेय ) को चन्द्रमा ( उपमान ) मान लिया गया है ! यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है !
इस अलंकार की पहचान मनु , मानो , जनु , जानो शब्दों से होती है !
4- यमक - जहाँ कोई शब्द एक से अधिक बार प्रयुक्त हो और उसके अर्थ अलग -अलग हों वहाँ यमक अलंकार होता है ! जैसे -
सजना है मुझे सजना के लिए ।
यहाँ पहले सजना का अर्थ है - श्रृंगार करना और दूसरे सजना का अर्थ - नायक शब्द दो बार प्रयुक्त है ,अर्थ अलग -अलग हैं ! अत: यमक अलंकार है !
5- शलेष - जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो , किन्तु प्रसंग भेद में उसके अर्थ एक से अधिक हों , वहां शलेष अलंकार है ! जैसे -
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून ।
पानी गए न ऊबरै मोती मानस चून ।।
यहाँ पानी के तीन अर्थ हैं - कान्ति , आत्म - सम्मान और जल ! अत: शलेष अलंकार है , क्योंकि पानी शब्द एक ही बार प्रयुक्त है तथा उसके अर्थ तीन हैं !
6- विभावना - जहां कारण के अभाव में भी कार्य हो रहा हो , वहां विभावना अलंकार है !जैसे -
बिनु पग चलै सुनै बिनु काना ।
वह ( भगवान ) बिना पैरों के चलता है और बिना कानों के सुनता है ! कारण के अभाव में कार्य होने से यहां विभावना अलंकार है !
7- अनुप्रास - जहां किसी वर्ण की अनेक बार क्रम से आवृत्ति हो वहां अनुप्रास अलंकार होता है ! जैसे -
भूरी -भूरी भेदभाव भूमि से भगा दिया ।
' भ ' की आवृत्ति अनेक बार होने से यहां अनुप्रास अलंकार है !
8- भ्रान्तिमान - उपमेय में उपमान की भ्रान्ति होने से और तदनुरूप क्रिया होने से भ्रान्तिमान अलंकार होता है ! जैसे -
नाक का मोती अधर की कान्ति से , बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से,
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है ?
यहां नाक में तोते का और दन्त पंक्ति में अनार के दाने का भ्रम हुआ है , यहां भ्रान्तिमान अलंकार है !
9- सन्देह - जहां उपमेय के लिए दिए गए उपमानों में सन्देह बना रहे तथा निशचय न हो सके, वहां सन्देह अलंकार होता है !जैसे -
सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है ।
सारी ही की नारी है कि नारी की ही सारी है ।
10- व्यतिरेक - जहां कारण बताते हुए उपमेय की श्रेष्ठता उपमान से बताई गई हो , वहां व्यतिरेक अलंकार होता है !जैसे -
का सरवरि तेहिं देउं मयंकू । चांद कलंकी वह निकलंकू ।।
मुख की समानता चन्द्रमा से कैसे दूं ? चन्द्रमा में तो कलंक है , जबकि मुख निष्कलंक है !
11- असंगति - कारण और कार्य में संगति न होने पर असंगति अलंकार होता है ! जैसे -
हृदय घाव मेरे पीर रघुवीरै ।
घाव तो लक्ष्मण के हृदय में हैं , पर पीड़ा राम को है , अत: असंगति अलंकार है !
12- प्रतीप - प्रतीप का अर्थ है उल्टा या विपरीत । यह उपमा अलंकार के विपरीत होता है । क्योंकि इस अलंकार में उपमान को लज्जित , पराजित या हीन दिखाकर उपमेय की श्रेष्टता बताई जाती है ! जैसे -
सिय मुख समता किमि करै चन्द वापुरो रंक ।
सीताजी के मुख ( उपमेय )की तुलना बेचारा चन्द्रमा ( उपमान )नहीं कर सकता । उपमेय की श्रेष्टता प्रतिपादित होने से यहां प्रतीप अलंकार है !
13- दृष्टान्त - जहां उपमेय , उपमान और साधारण धर्म का बिम्ब -प्रतिबिम्ब भाव होता है,जैसे-
बसै बुराई जासु तन ,ताही को सन्मान ।
भलो भलो कहि छोड़िए ,खोटे ग्रह जप दान ।।
यहां पूर्वार्द्ध में उपमेय वाक्य और उत्तरार्द्ध में उपमान वाक्य है ।इनमें ' सन्मान होना ' और ' जपदान करना ' ये दो भिन्न -भिन्न धर्म कहे गए हैं । इन दोनों में बिम्ब -प्रतिबिम्ब भाव है । अत: दृष्टान्त अलंकार है !
14- अर्थान्तरन्यास - जहां सामान्य कथन का विशेष से या विशेष कथन का सामान्य से समर्थन किया जाए , वहां अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है ! जैसे -
जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग ।
चन्दन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग ।।
15- विरोधाभास - जहां वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास मालूम पड़े , वहां विरोधाभास अलंकार होता है ! जैसे -
या अनुरागी चित्त की गति समझें नहीं कोइ ।
ज्यों -ज्यों बूडै स्याम रंग त्यों -त्यों उज्ज्वल होइ ।।
यहां स्याम रंग में डूबने पर भी उज्ज्वल होने में विरोध आभासित होता है , परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । अत: विरोधाभास अलंकार है !
16- मानवीकरण - जहां जड़ वस्तुओं या प्रकृति पर मानवीय चेष्टाओं का आरोप किया जाता है , वहां मानवीकरण अलंकार है ! जैसे -
फूल हंसे कलियां मुसकाई ।
यहां फूलों का हंसना , कलियों का मुस्कराना मानवीय चेष्टाएं हैं , अत: मानवीकरण अलंकार है!
17- अतिशयोक्ति - अतिशयोक्ति का अर्थ है - किसी बात को बढ़ा -चढ़ाकर कहना । जब काव्य में कोई बात बहुत बढ़ा -चढ़ाकर कही जाती है तो वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है !जैसे -
लहरें व्योम चूमती उठतीं ।
यहां लहरों को आकाश चूमता हुआ दिखाकर अतिशयोक्ति का विधान किया गया है !
18- वक्रोक्ति - जहां किसी वाक्य में वक्ता के आशय से भिन्न अर्थ की कल्पना की जाती है , वहां वक्रोक्ति अलंकार होता है !
- इसके दो भेद होते हैं - (1 ) काकु वक्रोक्ति (2) शलेष वक्रोक्ति ।
1- काकु वक्रोक्ति - वहां होता है जहां वक्ता के कथन का कण्ठ ध्वनि के कारण श्रोता भिन्न अर्थ लगाता है । जैसे -
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू ।
2- शलेष वक्रोक्ति - जहां शलेष के द्वारा वक्ता के कथन का भिन्न अर्थ लिया जाता है ! जैसे -
को तुम हौ इत आये कहां घनस्याम हौ तौ कितहूं बरसो ।
चितचोर कहावत हैं हम तौ तहां जाहुं जहां धन है सरसों ।।
19- अन्योक्ति - अन्योक्ति का अर्थ है अन्य के प्रति कही गई उक्ति । इस अलंकार में अप्रस्तुत के माध्यम से प्रस्तुत का वर्णन किया जाता है ! जैसे -
नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहि काल ।
अली कली ही सौं बिध्यौं आगे कौन हवाल ।।
यहां भ्रमर और कली का प्रसंग अप्रस्तुत विधान के रूप में है जिसके माध्यम से राजा जयसिंह को सचेत किया गया है , अत: अन्योक्ति अलंकार है !
[8:12PM, 25/10/2015] +91 97854 75960: छंद (Chhand)
छंद - अक्षरों की संख्या एवं क्रम ,मात्रा गणना तथा यति -गति के सम्बद्ध विशिष्ट नियमों से नियोजित पघरचना ' छंद ' कहलाती है !
छंद के अंग इस प्रकार है -
1 . चरण - छंद में प्राय: चार चरण होते हैं ! पहले और तीसरे चरण को विषम चरण तथा दूसरे और चौथे चरण को सम चरण कहा जाता है !
2 . मात्रा और वर्ण - मात्रिक छंद में मात्राओं को गिना जाता है ! और वार्णिक छंद में वर्णों को ! दीर्घ स्वरों के उच्चारण में ह्वस्व स्वर की तुलना में दुगुना समय लगता है ! ह्वस्व स्वर की एक मात्रा एवं दीर्घ स्वर की दो मात्राएँ गिनी जाती हैं ! वार्णिक छंदों में वर्णों की गिनती की जाती है !
3 . लघु एवं गुरु - छंद शास्त्र में ये दोनों वर्णों के भेद हैं ! ह्वस्व को लघु वर्ण एवं दीर्घ को गुरु वर्ण कहा जाता है ! ह्वस्व अक्षर का चिन्ह ' । ' है ! जबकि दीर्घ का चिन्ह ' s ' है !
= लघु - अ ,इ ,उ एवं चन्द्र बिंदु वाले वर्ण लघु गिने जाते हैं !
= गुरु - आ ,ई ,ऊ ,ऋ ,ए ,ऐ ,ओ ,औ ,अनुस्वार ,विसर्ग युक्त वर्ण गुरु होते हैं ! संयुक्त वर्ण के पूर्व का लघु वर्ण भी गुरु गिना जाता है !
4 . संख्या और क्रम - मात्राओं एवं वर्णों की गणना को संख्या कहते हैं तथा लघु -गुरु के स्थान निर्धारण को क्रम कहते हैं !
5 . गण - तीन वर्णों का एक गण होता है ! वार्णिक छंदों में गणों की गणना की जाती है ! गणों की संख्या आठ है ! इनका एक सूत्र है -
' यमाताराजभानसलगा '
इसके आधार पर गण ,उसकी वर्ण योजना ,लघु -दीर्घ आदि की जानकारी आसानी से हो जाती है !
गण का नाम उदाहरण चिन्ह
1 . यगण यमाता ISS
2 मगण मातारा SSS
3 . तगण ताराज SSI
4 . रगण राजभा SIS
5 . जगण जभान ISI
6 . भगण भानस SII
7 . नगण नसल III
8 . सगण सलगा IIS
6. यति -गति -तुक - यति का अर्थ विराम है , गति का अर्थ लय है ,और तुक का अर्थ अंतिम वर्णों की आवृत्ति है ! चरण के अंत में तुकबन्दी के लिए समानोच्चारित शब्दों का प्रयोग होता है ! जैसे - कन्त ,अन्त ,वन्त ,दिगन्त ,आदि तुकबन्दी वाले शब्द हैं , जिनका प्रयोग करके छंद की रचना की जा सकती है ! यदि छंद में वर्णों एवं मात्राओं का सही ढंग से प्रयोग प्रत्येक चरण से हुआ हो तो उसमें स्वत: ही ' गति ' आ जाती है !
- छंद के दो भेद है -
1 . वार्णिक छंद - वर्णगणना के आधार पर रचा गया छंद वार्णिक छंद कहलाता है ! ये दो प्रकार के होते हैं -
क . साधारण - वे वार्णिक छंद जिनमें 26 वर्ण तक के चरण होते हैं !
ख . दण्डक - 26 से अधिक वर्णों वाले चरण जिस वार्णिक छंद में होते हैं उसे दण्डक कहा जाता है ! घनाक्षरी में 31 वर्ण होते हैं अत: यह दण्डक छंद का उदाहरण है !
2 . मात्रिक छंद - मात्राओं की गणना पर आधारित छंद मात्रिक छंद कहलाते हैं ! यह गणबद्ध नहीं होता । दोहा और चौपाई मात्रिक छंद हैं !
प्रमुख छंदों का परिचय:
1 . चौपाई - यह मात्रिक सम छंद है। इसमें चार चरण होते हैं . प्रत्येक चरण में सोलह मात्राएँ होती हैं . पहले चरण की तुक दुसरे चरण से तथा तीसरे चरण की तुक चौथे चरण से मिलती है . प्रत्येक चरण के अंत में यति होती है। चरण के अंत में जगण (ISI) एवं तगण (SSI) नहीं होने चाहिए। जैसे :
I I I I S I S I I I S I I I I I S I I I S I I S I I
जय हनुमान ग्यान गुन सागर । जय कपीस तिहु लोक उजागर।।
राम दूत अतुलित बलधामा । अंजनि पुत्र पवन सुत नामा।।
S I SI I I I I I I S S S I I SI I I I I I S S
2. दोहा - यह मात्रिक अर्द्ध सम छंद है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में 13 मात्राएँ और द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 11 मात्राएँ होती हैं . यति चरण में अंत में होती है . विषम चरणों के अंत में जगण (ISI) नहीं होना चाहिए तथा सम चरणों के अंत में लघु होना चाहिए। सम चरणों में तुक भी होनी चाहिए। जैसे -
S I I I I I I S I I I I I I I I I I I S I
श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि ।
बरनउं रघुवर विमल जस, जो दायक फल चारि ।।
I I I I I I I I I I I I I S S I I I I S I
3. सोरठा - यह मात्रिक अर्द्धसम छंद है !इसके विषम चरणों में 11मात्राएँ एवं सम चरणों में 13 मात्राएँ होती हैं ! तुक प्रथम एवं तृतीय चरण में होती है ! इस प्रकार यह दोहे का उल्टा छंद है !
जैसे -
SI SI I I SI I S I I I I I S I I I
कुंद इंदु सम देह , उमा रमन करुनायतन ।
जाहि दीन पर नेह , करहु कृपा मर्दन मयन ॥
S I S I I I S I I I I I S S I I I I I
4. कवित्त - वार्णिक समवृत्त छंद जिसमें 31 वर्ण होते हैं ! 16 - 15 पर यति तथा अंतिम वर्ण गुरु होता है ! जैसे -
सहज विलास हास पियकी हुलास तजि , = 16 मात्राएँ
दुख के निवास प्रेम पास पारियत है ! = 15 मात्राएँ
कवित्त को घनाक्षरी भी कहा जाता है ! कुछ लोग इसे मनहरण भी कहते हैं !
5 . गीतिका - मात्रिक सम छंद है जिसमें 26 मात्राएँ होती हैं ! 14 और 12 पर यति होती है तथा अंत में लघु -गुरु का प्रयोग है ! जैसे -
मातृ भू सी मातृ भू है , अन्य से तुलना नहीं ।
6 . द्रुत बिलम्बित - वार्णिक समवृत्त छंद में कुल 12 वर्ण होते हैं ! नगण , भगण , भगण,रगण का क्रम रखा जाता है ! जैसे -
न जिसमें कुछ पौरुष हो यहां
सफलता वह पा सकता कहां ?
7 . इन्द्रवज्रा - वार्णिक समवृत्त , वर्णों की संख्या 11 प्रत्येक चरण में दो तगण ,एक जगण और दो गुरु वर्ण । जैसे -
होता उन्हें केवल धर्म प्यारा ,सत्कर्म ही जीवन का सहारा ।
8 . उपेन्द्रवज्रा - वार्णिक समवृत्त छंद है ! इसमें वर्णों की संख्या प्रत्येक चरण में 11 होती है । गणों का क्रम है - जगण , तगण ,जगण और दो गुरु । जैसे -
बिना विचारे जब काम होगा ,कभी न अच्छा परिणाम होगा ।
9 . मालिनी - वार्णिक समवृत्त है , जिसमें 15 वर्ण होते हैं ! 7 और 8 वर्णों के बाद यति होती है।
गणों का क्रम नगण ,नगण, भगण ,यगण ,यगण । जैसे -
पल -पल जिसके मैं पन्थ को देखती थी ।
निशिदिन जिसके ही ध्यान में थी बिताती ॥
10 . मन्दाक्रान्ता - वार्णिक समवृत्त छंद में 17 वर्ण भगण, भगण, नगण ,तगण ,तगण और दो गुरु वर्ण के क्रम में होते हैं । यति 10 एवं 7 वर्णों पर होती है ! जैसे -
कोई पत्ता नवल तरु का पीत जो हो रहा हो ।
तो प्यारे के दृग युगल के सामने ला उसे ही ।
धीरे -धीरे सम्भल रखना औ उन्हें यों बताना ।
पीला होना प्रबल दुःख से प्रेषिता सा हमारा ॥
11 . रोला - मात्रिक सम छंद है , जिसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं तथा 11 और 13 पर यति होती है ! प्रत्येक चरण के अंत में दो गुरु या दो लघु वर्ण होते हैं ! दो -दो चरणों में तुक आवश्यक है ! जैसे -
I I I I SS I I I S I S S I I I I S
नित नव लीला ललित ठानि गोलोक अजिर में ।
रमत राधिका संग रास रस रंग रुचिर में ॥
I I I S I S SI SI I I SI I I I S
12 . बरवै - यह मात्रिक अर्द्धसम छंद है जिसके विषम चरणों में 12 और सम चरणों में 7 मात्राएँ होती हैं ! यति प्रत्येक चरण के अन्त में होती है ! सम चरणों के अन्त में जगण या तगण होने से बरवै की मिठास बढ़ जाती है ! जैसे -
S I SI I I S I I I S I S I
वाम अंग शिव शोभित , शिवा उदार ।
सरद सुवारिद में जनु , तड़ित बिहार ॥
I I I I S I I S I I I I I I S I
13 . हरिगीतिका - यह मात्रिक सम छंद हैं ! प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं ! यति 16 और 12 पर होती है तथा अंत में लघु और गुरु का प्रयोग होता है ! जैसे -
कहते हुए यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए ।
हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए ॥
I I S IS S SI S S S IS S I I IS
14. छप्पय - यह मात्रिक विषम छंद है ! इसमें छ: चरण होते हैं - प्रथम चार चरण रोला के अंतिम दो चरण उल्लाला के ! छप्पय में उल्लाला के सम -विषम चरणों का यह योग 15 + 13 = 28 मात्राओं वाला अधिक प्रचलित है ! जैसे -
I S I S I I S I I I I S I I S I I S
रोला की पंक्ति (ऐसे चार चरण ) - जहां स्वतन्त्र विचार न बदलें मन में मुख में उल्लाला की पंक्ति (ऐसे दो चरण ) - सब भांति सुशासित हों जहां , समता के सुखकर नियम ।
I I S I I S I I S I S I I S S I I I I I I I
15. सवैया - वार्णिक समवृत्त छंद है ! एक चरण में 22 से लेकर 26 तक वर्ण होते हैं ! इसके कई भेद हैं ! जैसे -
(1) मत्तगयंद (2) सुन्दरी सवैया (3) मदिरा सवैया (4) दुर्मिल सवैया (5) सुमुखि सवैया (6)किरीट सवैया (7) गंगोदक सवैया (8) मानिनी सवैया (9) मुक्तहरा सवैया (10) बाम सवैया (11) सुखी सवैया (12) महाभुजंग प्रयात
यहाँ मत्तगयंद सवैये का उदाहरण प्रस्तुत है -
सीख पगा न झगा तन में प्रभु जाने को आहि बसै केहि ग्रामा ।
धोती फटी सी लटी दुपटी अरु पांव उपानह की नहिं सामा ॥
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक रहयो चकिसो वसुधा अभिरामा ।
पूछत दीन दयाल को धाम बतावत आपन नाम सुदामा ॥
यहाँ ' को ' शब्द को ह्वस्व पढ़ा जाएगा तथा उसकी मात्रा भी एक ही गिनी जाती है ! मत्तगयंद सवैये में 23 अक्षर होते हैं ! प्रत्येक चरण में सात भगण ( SII ) और अंत में दो गुरु वर्ण होते हैं तथा चारों चरण तुकान्त होते हैं !
16. कुण्डलिया - मात्रिक विषम संयुक्त छंद है जिसमें छ: चरण होते हैं! इसमें एक दोहा और एक रोला होता है ! दोहे का चौथा चरण रोला के प्रथम चरण में दुहराया जाता है तथा दोहे का प्रथम शब्द ही रोला के अंत में आता है ! इस प्रकार कुण्डलिया का प्रारम्भ जिस शब्द से होता है उसी से इसका अंत भी होता है ! जैसे -
SS I I S S I S I I S I SS S I
सांई अपने भ्रात को ,कबहुं न दीजै त्रास ।
पलक दूरि नहिं कीजिए , सदा राखिए पास ॥
सदा राखिए पास , त्रास कबहुं नहिं दीजै ।
त्रास दियौ लंकेश ताहि की गति सुनि लीजै ॥
कह गिरिधर कविराय राम सौं मिलिगौ जाई ।
पाय विभीषण राज लंकपति बाज्यौ सांई ॥
S I I S I I S I S I I I S S S S
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