Prithviraj Singh Bhati Beru- RES

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भरिया सो छळकै नहीं, छळकै सो आधाह।
मरदां पारख जाणिये, बोल्या सो लाधाह।।

21/11/2025

धिन धिन बेरू री धरा,थित छत्राळां थाट।
संत सती अर सूरमा, मुरधर री इण माट ।। मारवाड़ के इतिहास में बेरू का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जोधपुर दुर्ग की स्थापना के साथ ही राव जोधाजी ने बेरू की जागीर अपने भाई सांडा को दी थी । बेरू वि.सं. 1727 तक सांडावतों का ठिकाना रहा। उसके बाद वि. सं. 1765 में जोधपुर महाराजा अभयसिंह जी ने ताल्हणपुर ठा. सूरजमल जी भाटी को बेरू जागीर में दिया। ठा. सूरजमल जी और उनके पाटवी कुं. पदमसिंह जी महाराजा अभयसिंह द्वारा सरबुलंद खां के विरुद्ध लड़े गए युद्ध में महाराजा की सेना के हरावल दस्ते में लड़े थे। इन्हीं ठा. पदमसिंह जी के छोटे पुत्र नृसिंह दास जी धोरीमन्ना के पास सिराईयों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। ठा.पदमसिंह जी के पड़पौत्र ठा. केसरी सिंह को मारवाड़ राज के बेरू के आसपास के 12 गांवों का विदेशी लूटेरों से रक्षा का जिम्मा सौंपा हुआ था । जिसे उन्होंने बखूबी निभाते हुए इस क्षेत्र को अफगान लुटेरों के भय से मुक्त किया। यदुवंश के इसी पवित्र वंश क्रम में बेरू की इस पावन धरा पर रेंवत सिंह जी के घर लादूकंवर गोगादेजी की कूख से वि.सं.1984 तदनुसार (ई.सन 1927) की साल रिड़मलसिंह जी का जन्म हुआ। पूत के पग पालने में ही दिख जाते हैं। शहीद रिड़मलसिंह जी भाटी बचपन से ही दृढ़ निश्चयी व साहसी प्रवृत्ति के धनी थे । धुन के धनी दाता हुकम रिड़मलसिंह जी सन 1948 में मारवाड़ रियासत की सेना में भर्ती हो गए थे। मारवाड़ रियासत के भारत में विलय के साथ ही आप भारतीय सेना के अंग बन गए। आपश्री ने सेवा में रहते हुए जम्मू कश्मीर और नागा हिल्स जैसे दुर्गम क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दी। 21 नवंबर 1962 का दिन भारत के लिए एक ऐतिहासिक दिन था। 20अक्टूबर 1962 को आरंभ हुआ भारत-चीन युद्ध इसी दिन 21 नवंबर 1962 की मध्यरात्रि रात्रि को समाप्त हो गया था। इसके साथ ही बेरू के इतिहास में भी यह दिन स्वर्णाक्षरों से अंकित हो गया । इसी दिन युद्ध में चीनियों के विरुद्ध नेफा में सैला पोस्ट पर अपने शरीर में रक्त की अंतिम बूंद तक लड़ते हुए अपनी पीढीयों से चले आ रहे "उत्तर भड़किंवाड़" के विरूद को चरितार्थ करने वाला भारतवर्ष की उत्तरी सीमा का यह सजग प्रहरी 21 नवंबर 1962 को रज रज होकर भारतमाता की पावन रज में हमेशा हमेशा के लिए विलीन हो गया परंतु जीते जी अपनी मातृभूमि का एक रजकण भी दुश्मनों को हथियाने नहीं दिया।

रण कर कर रज रज रंगै,रवि ढंकै रज हूंत।
रज जैतली धर न दियै,रज रज व्है रजपूत।।

दादोसा हुकम शहीद श्री रिड़मल सिंह जी को जम्मू कश्मीर में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए "सेन्य सेवा पदक" व नागा हिल्स में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए "सामान्य सेवा पदक" से सम्मानित किया गया।
दाता हुकम आपने अपनी शहादत से समस्त हरिदासोत परिवार के साथ ही समस्त बेरू गांव व देश को गौरवान्वित किया है।

देश की संप्रभुता, स्वतंत्रता, एकता और अखंडता की रक्षार्थ अपना सर्वस्व न्यौछावर करके भारतमाता के पावन चीर को अपने लहू से केसरिया रंग में रंगने वाले रजवट के रखवाले भारतमाता के अमर बलिदानी सपूत शहीद हवलदार रिड़मल सिंह जी भाटी बेरू को उनके 63 वें शहादत दिवस पर हम सभी परिजनों सहित बेरू के समस्त ग्रामवासी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कोटिशः वंदन करते हैं।

म्हारी अंतस तणी सबदांजलीः-

🌹🌹रिड़माल छत्तीसी🌹🌹

**रण मांही रिड़माल**

रेंवत वाळै रावळै, लादू जायौ लाल।
शीश समप्यौ सूरमै,रण मांही रिड़माल।।1।।

गढ बेरू रै गोरवै,भळहळ ऊगौ भाण।
भाटी कुळ रै भोमियै,पत राखी परवाण।।2।।

मामा जिणरा मारका,गोगादे जिण गोत।
भूंडा किम वै भाणजा,मीठी कीनी मौत।।3।।

चौड़ै बेरू चोंवटै, गावै संधवा गीत।
भारत चढही भोमियौ,रण री राखण रीत।।4।।

दळ अरियां रा देखनै, लोयण करिया लाल।
काटकियौ बण केहरी,रण मांही रिड़माल।।5।।

केवी रा दळ काटतां, जबर मचाई झाळ।
रटक बजाई रीठ थैं,रण मांही रिड़माल।।6।।

शत्रवां तणी सूरमै, खैंची जबरी खाल।
पाड़ घणा दळ पोढियौ,रण मांही रिड़माल।।7।।

जणणी थैं भल जामियौ,रिड़मल जेहौ लाल।
मान राखियौ मातरौ, रण मांही रिड़माल।।8।।

गोळां री गयणांगणै,झड़वा लागी झाळ।
बंकौ अड़ियौ बेरु तो,रण मांही रिड़माल।।9।।

आया दळ उतराद रा,चीनियां करी चाल।
सामी लड़ियौ सूरमौ,रण मांही रिड़माल।।10।।

इकीस नवंबर आवियौ,सन बासठ री साल।
मान अरी रौ मारनै,रण सूतौ रिड़माल।।11।।

कथी हिमगीर कीरती, गाया सागर गीत।
डीगा जस रा डूंगरां, जादम गयौह जीत।।12।।

गोगादे री गोद, लजाई नंह थैं लाल।
मायड़ करियौ मोद,पूत महारण पोढतां।।13।।

चावौ कुळ रौ चानणौ, सूरां रौ सिरमौड़।
सुरगां मांही सूरमै, ठावी करदी ठौड़।।14।।

मान रखावण मात रौ,अरपण करिया अंग।
भड़ उत्तराद भोम रा,रंग रिड़मल्ल रंग।।15।।

ऊँचौ करियौ ऊजळौ, भारत माँ रौ भाल।
लड़ियौ जबरौ लाडकौ रण मांही रिड़माल।16।।

उतराद धरा ऊजळी, लोहियां किनी लाल।
रगत खाळ रळकाविया,रण मांही रिड़माल।।17।।

कुळ री ऊजळ कीरती, जग राखी जूंझार।
बेरू गढ़ रै बाळकै, आण लीवी उबार।।18।।

बासठ वाळी वार में,अरियौ आडी ढाल।
सूतौ रण री सेज थूं, रण मांही रिड़माल।।19।।

जादम कुळ री जोतड़ी,जग राखी उजाळ।
रजवट रीतां राखली, रण मांही रिड़माल।।20।।

बारै मासां बाळकी, पेमल करै पुकार।
काढ अरी रौ काळजौ,आजौ एकण वार।।21।।

भड़ उतराद भाटियां,पाळी रण सूं प्रीत।
रेंवतसुत रिड़मालसी,राखी रजवठ रीत।।22।।

सिंधूराग सुणीजतां,पूगौ रण पणपाळ।
भार उतारण भोम रौ,रण मांही रिड़माल।।23।।

जूंझत रण में जादमा,हिमगिर पूछै हाल।
कहै बातां रण कारणी,रण मांही रिड़माल।।24।।

परणतीह धण पैखियौ,भाटी हंदौ भाल।
ऊजळौ कुळ उजाळही,रण मांही रिड़माल।।25।।

परणतीह धण पेखियौ,धांधल धरियौ धीर।
मन राणी मोदीजतां,वरियौ रिड़मल वीर।।26।।

धांधलां घर पूजियौ,राठोड़ां वरमाळ।
खळां पूजियौ गोळियां,रण मांही रिड़माल।।27।।

बरस चारां बाळकौ,तेजस थारौ तखतेश।
वंश उजाळण वाहरू,दीपै मुरधर देश।28।।

लाल मरूधर लाडकौ, भारत हंदौ भाल।
मही अंजसै मुरधरा,रण रूड़ा रिड़माल।।29।।

सेक्टर नेफा सूरमै, गात दीन्हौ गाळ।
भारत भिड़तां भोमियै, रण मांही रिड़माल।।30।।

ऊँचौ हिमगिर ऊजळौ, भारत माँ रौ भाल।
हेला देवै हेमाळौ,रण मांही रिड़माल।।31।।

मारू बेहू मारका, लड़िया साथै लाल।
सूर बळवंत साथ में, रण मांही रिड़माल।।32।।

मगर बतीसां मांयनै, भळकियौ भारत भाल।
चीनी घण चिंचाड़िया, रण मांही रिड़माल।।33।।

पाछी फेरां पीठ तो,गोतर लागै गाळ।
रळियौ रजवट राह थूं, रण मांही रिड़माल।।34।।

लाखां लाशां ऊपरै,पोढियौ परणपाळ।
कीरत खेती काटतौ,रण मांही रिड़माल।।35।।

कथी पीथळ कीरती, जस री कलमां झाल।
लाटौ जस रौ लाटियौ,रण मांही रिड़माल।।36।।

©कुँ. पृथ्वीराजसिंह बेरू;पीथळ
व्याख्याता (राजस्थानी)

04/03/2025

मायड़ भासा मोवणी, मांगै निज रौ मान।
हक देवौ थे हाकमां, औ नह छै अहसाण।।

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