इस्लाम में सिर्फ दो त्यौहार हैं ईद ( ईदुल फितर) और बकरीद ( ईदुल अजहा)।
चूंकि त्यौहार का मतलब ही खुशियां मनाना होता है। अब जो अमीर हैं वे तो त्योहार मना लेंगे मगर गरीबों का क्या?
इस्लाम ने त्यौहार मनाने से पहले अमीरों को हुक्म दे दिया कि बिना गरीबों को इस खुशी में शामिल किए आप अकेले खुशियां नहीं मना सकते।
ईद से पहले अमीरों को हुक्म हुआ कि आप अगर ईद की खुशियां मनाना चाहते हैं तो अपने माल का ढाई फीसदी हिस्सा गरीबों को दो और ईद की नमाज से पहले अपना और अपने आल औलाद का फितरा भी गरीबों को दो ताकि वे भी ईद खुशियों के साथ ईद मना सकें।
बकरीद में हुक्म हुआ की अगर आप मालदार हैं तो कुर्बानी करें और हां ऐसा नहीं होगा कि आप कुर्बानी करके गोश्त खाएं और गरीब देखता रहे। अपनी कुर्बानी का एक तिहाई हिस्सा गरीबों को दें ताकि उनके बच्चे भी त्यौहार मना सकें।
कहने का मतलब है कि इस्लाम ने गरीबों का कितना ख्याल रखा है। क्या इससे बेहतर सिस्टम आपको कहीं और देखने को मिलता है?
Rajae mustafa madarsa lawera kallan jodhpur
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18/08/2021
मेरी तारीख़ से रौशन है गुलसिताँ मेरा,
कहाँ - कहाँ से मिटाओगे तुम निशाँ मेरा ✊
जब मुग़लों ने पूरे भारत को एक किया तो इस देश का नाम कोई इस्लामिक नहीं बल्कि 'हिन्दोस्तान' रखा, हाँलाकि इस्लामिक नाम भी रख सकते थे, कौन विरोध करता...?
जिनको इलाहाबाद और फैज़ाबाद चुभता है वह समझ लें कि मुग़लों के ही दौर में 'रामपुर' बना रहा तो 'सीतापुर' भी बना रहा... अयोध्या तो बसा ही मुग़लों के दौर में...। 'राम चरित मानस' भी मुग़लिया काल में ही लिखी गई...।
आज के वातावरण में मुग़लों को सोचता हूँ, मुस्लिम शासकों को सोचता हूँ तो लगता है कि उन्होंने मूर्खता की...। होशियार तो ग्वालियर का सिंधिया घराना था, होशियार मैसूर का वाडियार घराना भी था और जयपुर का राजशाही घराना भी था तो जोधपुर का भी राजघराना था...।
टीपू सुल्तान हों या बहादुरशाह ज़फ़र... बेवक़ूफ़ी कर गए और कोई चिथड़े-चिथड़ा हो गया तो किसी को देश की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई और ज़्यादातर के वंशज आज ग़रीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं...। अँग्रेज़ों से मिल जाते तो वह भी अपने महल बचा लेते और अपनी रियासतें बचा लेते, वाडियार, जोधपुर, सिंधिया और जयपुर राजघराने की तरह उनके भी वंशज आज ऐश करते...। उनके भी बच्चे आज मंत्री विधायक बनते...।
यह आज का दौर है, यहाँ 'भारत माता की जय' और 'वंदेमातरम' कहने से ही इंसान देशभक्त हो जाता है, चाहे उसका इतिहास देश से गद्दारी का ही क्यों ना हो...।
बहादुर शाह ज़फ़र ने जब 1857 के गदर में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ पूरे देश का नेतृत्व किया और उनको पूरे देश के राजा रजवाड़ों तथा बादशाहों ने अपना नेता माना... भीषण लड़ाई के बाद अंग्रेज़ों की छल कपट नीति से बहादुर शाह ज़फ़र पराजित हुए और गिरफ़्तार कर लिए गए...।
ब्रिटिश कैद में जब बहादुर शाह जफर को भूख़ लगी तो अंग्रेज़ उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए... उन्होंने अंग्रेज़ों को जवाब दिया कि - "हिन्दोस्तान के बेटे देश के लिए सिर क़ुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज़ में आया करते हैं...।"
बेवकूफ़ थे बहादुरशाह ज़फ़र...। ये देश का दुर्भाग्य है कि आज उनकी पुश्तें ऐसे जी रही हैं कि एक नफ़रती कीड़ा उनका मज़ाक उड़ा रहा है...।
अपने इस हिन्दोस्तान की ज़मीन में दफ़्न होने की उनकी चाह भी पूरी ना हो सकी और क़ैद में ही वह "रंगून" और अब वर्मा की मिट्टी में दफ़्न हो गए...। अंग्रेज़ों ने उनकी क़ब्र की निशानी भी ना छोड़ी और मिट्टी बराबर करके फसल उगा दी, बाद में एक खुदाई में उनका वहीं से कंकाल मिला और फिर शिनाख़्त के बाद उनकी क़ब्र बनाई गई... सोचिए कि आज "बहादुरशाह ज़फर" को कौन याद करता है...? क्या मिला उनको देश के लिए दी अपने खानदान की क़ुर्बानी से...?
ऐसा इतिहास और देश के लिए बलिदान किसी संघी का होता तो अब तक सैकड़ों शहरों और रेलवे स्टेशनों का नाम उनके नाम पर हो गया होता...।
क्या इनके नाम पर हुआ...?
नहीं ना...? इसीलिए कहा कि अंग्रेज़ों से मिल जाना था, ऐसा करते तो ना क़ैद मिलती ना क़ैद में मौत, ना यह ग़म लिखते जो रंगून की ही क़ैद में लिखा:-
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में
कितना है बदनसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में...।
शिवाकांत की आवाज़ में मिली हुई अपनी आवाज़...
#पुरानी_पोस्ट
*🌹माफीनामा🌹*
शब्बे बरात आने वाली है, इस मुबारक रात में अल्लाह की
बारगाह में हम सब के आमाल
नामे पेश होने है
आज तक मेरी तरफ से जाने अनजाने में कोई गलती,गुस्ताखी,
गीबत हुई हो या मेरी किसी बात से आपका दिल दुखा हो तो बराए मेहरबानी अल्लाह की रजा के लिए शबे बरात से पहले मुझे माफ़ कर दें।🌹🤲🏻barkat ali* ♥️
28/02/2021
#आयशा
इस स्टोरी को आपनें अबतक कहीं ना कहीं पढ़ ही लिया होगा..... बारहाल मसला ये है कि ऐसा होता क्यूँ है क्या इस घटना के बाद मर्द-ज़ात को एक विलन की तरह देखा जायेगा या एक दूसरा तबका एक औरत को ही इसका ज़िम्मेदार मनेगा जो इस बहन आयशा की ' सास , नंद , भाभी ' के रुप में इसे दहेज के लिये मजबूर करनें के पीछे हो सकती है...❗
मेरा भाई आजकल के मुआशिरे में शादी की बुनियाद दीन , इल्मी तालीमात , घर का दीनी माहौल ना होके बल्कि ये है कि अगर किसी को अपनी लड़की के रिश्ते के लिये लड़का चाहिये होता है तो लड़की वाले उस रिश्ते की बुनियाद लड़के के दीनी माहौल पे नहीं बल्कि सरकारी नौकरी , इकलौता हो , बड़ा बिजनेस , या पैसे में मज़बूत घर देखते हैं और फिर जैसी नियत होती है अल्लाह की तरफ से फैसले भी वैसे ही आते कि लड़की वालों को रसूखदार दामाद तो मिल जाता है लेकिन दीनी तालीम उसमें नहीं होती क्यूँकि आपनें पैसा देखा था वो मिल गया दीन को आपनें तवज्जो ही नहीं दी वो नहीं मिला..... कोई भी शख्स कितना भी पैसे वाला क्यूँ ना हो अगर उसमें दीन की समझ नहीं तो उससे बहतर सड़क पर ठेला लगानें वाला वो मज़दूर है जो दीन की समझ रखता है उसको मालूम है उसे अपनें ' माँ - बाप , भाई , बहन , बीबी , बच्चों से किस तरह सलूक करना है...❗
बारहाल इस आयशा की मौत का ज़िम्मेदार हर वो शख्स है जो शादी दहेज के लिये करे और वो जो शादी सिर्फ लड़के की अमीरी देखकर करे...❗
21/10/2020
05/09/2020
Madarse ke kuch purani tasvire
28/08/2020
आज मुहर्रम हिजरी 8 तारिख आज ही के दीन मौला अली के शेर हजरत अब्बाश की शहादत का दीन है।
कर्बला के खेमो मे आले रसुल की औलाद प्यासी थी और यजीद ने नहरेफरात पे पहेरा लगा दिया था।
इसी दौरान मौला अली के लखतेजिगर शेर हजरत अब्बाश अकेले अपने घोडे पे बैठकर नहरेफरात पे गये।
पानी लिया और वापस आने लगे लेकिन यज़ीदी लश्करो ने हजरते अब्बास के पहले एक बाजु फिर दुसरे बाजु इस तरह करके अनगिनत तीर से हमला किया।
पानी खेमो तक पहुचने न दिया आप भी प्यासे रहे आपका घोडा भी प्यासा शहीद हो गया।
अल्लाह हम सबको मुहब्बते अहलेबैत मे हमारे गुनाह को माफ कर दे।
हमारे नस्लों को अहले बैत का दिवाना बनाये रखे।
आमीन
#शिफा_इमरान
Ash salamuaaleykunb
या अल्लाह फिर से खिला दे जमीन का कोना -कोना,
अब रहम कर और मिटा दे जमीन से अजाब-ए- कोरोना !!
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