18/08/2021
मेरी तारीख़ से रौशन है गुलसिताँ मेरा,
कहाँ - कहाँ से मिटाओगे तुम निशाँ मेरा ✊
जब मुग़लों ने पूरे भारत को एक किया तो इस देश का नाम कोई इस्लामिक नहीं बल्कि 'हिन्दोस्तान' रखा, हाँलाकि इस्लामिक नाम भी रख सकते थे, कौन विरोध करता...?
जिनको इलाहाबाद और फैज़ाबाद चुभता है वह समझ लें कि मुग़लों के ही दौर में 'रामपुर' बना रहा तो 'सीतापुर' भी बना रहा... अयोध्या तो बसा ही मुग़लों के दौर में...। 'राम चरित मानस' भी मुग़लिया काल में ही लिखी गई...।
आज के वातावरण में मुग़लों को सोचता हूँ, मुस्लिम शासकों को सोचता हूँ तो लगता है कि उन्होंने मूर्खता की...। होशियार तो ग्वालियर का सिंधिया घराना था, होशियार मैसूर का वाडियार घराना भी था और जयपुर का राजशाही घराना भी था तो जोधपुर का भी राजघराना था...।
टीपू सुल्तान हों या बहादुरशाह ज़फ़र... बेवक़ूफ़ी कर गए और कोई चिथड़े-चिथड़ा हो गया तो किसी को देश की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई और ज़्यादातर के वंशज आज ग़रीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं...। अँग्रेज़ों से मिल जाते तो वह भी अपने महल बचा लेते और अपनी रियासतें बचा लेते, वाडियार, जोधपुर, सिंधिया और जयपुर राजघराने की तरह उनके भी वंशज आज ऐश करते...। उनके भी बच्चे आज मंत्री विधायक बनते...।
यह आज का दौर है, यहाँ 'भारत माता की जय' और 'वंदेमातरम' कहने से ही इंसान देशभक्त हो जाता है, चाहे उसका इतिहास देश से गद्दारी का ही क्यों ना हो...।
बहादुर शाह ज़फ़र ने जब 1857 के गदर में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ पूरे देश का नेतृत्व किया और उनको पूरे देश के राजा रजवाड़ों तथा बादशाहों ने अपना नेता माना... भीषण लड़ाई के बाद अंग्रेज़ों की छल कपट नीति से बहादुर शाह ज़फ़र पराजित हुए और गिरफ़्तार कर लिए गए...।
ब्रिटिश कैद में जब बहादुर शाह जफर को भूख़ लगी तो अंग्रेज़ उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए... उन्होंने अंग्रेज़ों को जवाब दिया कि - "हिन्दोस्तान के बेटे देश के लिए सिर क़ुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज़ में आया करते हैं...।"
बेवकूफ़ थे बहादुरशाह ज़फ़र...। ये देश का दुर्भाग्य है कि आज उनकी पुश्तें ऐसे जी रही हैं कि एक नफ़रती कीड़ा उनका मज़ाक उड़ा रहा है...।
अपने इस हिन्दोस्तान की ज़मीन में दफ़्न होने की उनकी चाह भी पूरी ना हो सकी और क़ैद में ही वह "रंगून" और अब वर्मा की मिट्टी में दफ़्न हो गए...। अंग्रेज़ों ने उनकी क़ब्र की निशानी भी ना छोड़ी और मिट्टी बराबर करके फसल उगा दी, बाद में एक खुदाई में उनका वहीं से कंकाल मिला और फिर शिनाख़्त के बाद उनकी क़ब्र बनाई गई... सोचिए कि आज "बहादुरशाह ज़फर" को कौन याद करता है...? क्या मिला उनको देश के लिए दी अपने खानदान की क़ुर्बानी से...?
ऐसा इतिहास और देश के लिए बलिदान किसी संघी का होता तो अब तक सैकड़ों शहरों और रेलवे स्टेशनों का नाम उनके नाम पर हो गया होता...।
क्या इनके नाम पर हुआ...?
नहीं ना...? इसीलिए कहा कि अंग्रेज़ों से मिल जाना था, ऐसा करते तो ना क़ैद मिलती ना क़ैद में मौत, ना यह ग़म लिखते जो रंगून की ही क़ैद में लिखा:-
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में
कितना है बदनसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में...।
शिवाकांत की आवाज़ में मिली हुई अपनी आवाज़...
#पुरानी_पोस्ट