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21/06/2024

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11/05/2024

जुबानों के पीछे मत चलो, कोई तुम्हें ऐसी कहानी नहीं सुनायेगा, जिसमे वो खुद ग़द्दार हो।
जय हो बाबा रामा राम 🙏

27/01/2024

शाम होती गई सूरज ढलता गया।
मैं मुसाफ़िर था दूर तक चलता गया।।
एक एक कर के हर वो शख़्स मुझे छोड़ता गया,
जिस जिस का मुझ से मतलब निकलता गया।
जीनको मैं अपना आइना कहता था,
वक़्त के साथ वो आईना भी बदलता गया।
शाम होती गई सूरज ढलता गया।
मैं मुसाफ़िर था दूर तक चलता गया।।

04/01/2024

एक व्यक्ति की नई नई शादी हुई और वो अपनी पत्नी के साथ वापिस आ रहे थे।

रास्ते में वो दोनों एक बड़ी झील को नाव के द्वारा पार कर रहे थे, तभी अचानक एक भयंकर तूफ़ान आ गया ।

वो आदमी वीर था लेकिन औरत बहुत डरी हुई थी, क्योंकि हालात बिल्कुल खराब थे।

नाव बहुत छोटी थी और तूफ़ान वास्तव में भयंकर था और दोनों किसी भी समय डूब सकते थे।

लेकिन वो आदमी चुपचाप, निश्चल और शान्त बैठा था, जैसे कि कुछ नहीं होने वाला ।

औरत डर के मारे कांप रही थी और वो बोली "क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा" ये हमारे जीवन का आखिरी क्षण हो सकता है ।

ऐसा नहीं लगता कि हम दूसरे किनारे पर कभी पहुंच भी पायेंगे ! अब तो कोई चमत्कार ही हमें बचा सकता है वर्ना हमारी मौत निश्चित है।

औरत फिर बोली - क्या तुम्हें बिल्कुल डर नहीं लग रहा ? कहीं तुम पागल वागल या पत्थर वत्थर तो नहीं हो, मेंरे बोलने का तुम पर कोई असर ही नहीं पड़ रहा है ?

वो आदमी खूब हँसा और एकाएक उसने म्यान से तलवार निकाल ली ?

औरत अब और परेशान हो गई कि वो क्या कर रहा था?

तब वो उस तलवार को उस औरत की गर्दन के पास ले आया, इतना पास कि उसकी गर्दन और तलवार के बीच बिल्कुल कम फर्क बचा था, क्योंकि तलवार लगभग उसकी गर्दन को छू रही थी, लेकिन उसे मारने के विचार से नहीं।

वो अपनी पत्नी से बोला "क्या तुम्हें डर लग रहा है" ?

पत्नी खूब हँसी और बोली "जब तलवार तुम्हारे हाथ में है तो मुझे क्या डर" ?
मैं जानती हूं कि तुम मुझे बहुत प्यार करते हो ।

उसने तलवार वापिस म्यान में डाल दी और बोला कि "यही मेरा जवाब है"।
मैं जानता हूं कि भगवान मुझे बहुत प्यार करते हैं और ये तूफ़ान उनके हाथ में है । इसलिए जो भी होगा अच्छा ही होगा।

अगर हम बच गये तो भी अच्छा और अगर नहीं बचे तो भी अच्छा, क्योंकि सब कुछ उस परमात्मा के हाथ में है और वो कभी कुछ भी गलत नहीं कर सकते।

लक्ष्मी कांत वो जो भी करेंगे हमारे भले के लिए करेंगे ।

सिख:- हमें हमेशा विश्वास बनाये रखना चाहिए और व्यक्ति को हमेशा उस परमपिता परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिये जिसने हमें जन्म दिया है, और हमारे पूरे जीवन की रक्षा की जिम्मेदारी उन्हीं की है। हमलोग उनके विधान के बिरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकते।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है-पर्याप्त है।।

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31/12/2023

राह संघर्ष की तुझे,
अकेला ही चलना होगा।
कर्म की शाख पर
तब ही खिल सकेंगे फूल,
मेहनत के पानी से
उसे सींचना होगा।

निराशा में हाथों की लकीरों को,
दोष देना नहीं।
मुश्किलों से भागेगा तू,
तो कभी सफल होगा नहीं।
टूटते हौंसलों के अंधेरों में तुझे,
दिया दृढ़ निश्चय का जलाना होगा।
राह संघर्ष की...

मीत,रिश्ते-नाते सब साथ छोड़ जायेंगे,
सिर्फ सत्य तेरा साथ निभाएगा।
कौन तेरा अपना है इस जहां में,
तू खुद ही समझ जाएगा।
जिन्दगी तजुर्बा है जीने का,
तुझे सीखना होगा।
राह संघर्ष की...

है जिस रास्ते में मुश्किल,
है रास्ता वो ही सही।
जो भागने लगे डरकर,
है सबसे बड़ा कायर वही।
जिन्दगी इम्तिहान है,
तुझे देना होगा।
राह संघर्ष की...

परिश्रम की धूप में जो है चलता,
सफलता की छांव उसी को है मिलती।
जो अनवरत लड़ता है मैदान-ए-जंग में,
जीत उसी को है मिलती।
हारने का जो डर है,
तुझे उसे निकालना होगा।
राह संघर्ष की...

27/12/2023

एक सुनार से लक्ष्मी जी रूठ गई और जाते वक्त बोली मैं जा रही हूँ और मेरी जगह नुकसान आ रहा है, तैयार हो जाओ। लेकिन मै तुम्हे अंतिम भेट जरूर देना चाहती हूँ। मांगो जो भी इच्छा हो।

सुनार बहुत समझदार था। उसने विनती की कि नुकसान आए तो आने दो, लेकिन उससे कहना की मेरे परिवार में आपसी प्रेम बना रहे।बस मेरी यही इच्छा है।
लक्ष्मीजी ने तथास्तु कहा और अंतर्ध्यान हो गयी।

कुछ दिन के बाद सुनार की सबसे छोटी बहू खिचड़ी बना रही थी। उसने नमक आदि डाला नवनीत और अन्य काम करने लगी। तभी दूसरे लड़के की बहू आई और उसने भी बिना चखे नमक डाला और चली गई

इसी प्रकार तीसरी, चौथी बहुएं आई और नमक डालकर चली गई। उनकी सास ने भी ऐसा किया। शाम को सबसे पहले सुनार आया। पहला निवाला मुह में लिया। देखा बहुत ज्यादा नमक है, लेकिन वह समझ गया कि नुकसान (हानि) आ चुका है।

चुपचाप खिचड़ी खाई और चला गया। इसके बाद बङे बेटे का नम्बर आया। पहला निवाला मुह में लिया और पूछा पिता जी ने खाना खा लिया? क्या कहा उन्होंने ?

सभी महिलाओं ने उत्तर दिया :- हाँ खा लिया, कुछ नही बोले।
अब लड़के ने सोचा जब पिता जी ही कुछ नही बोले तो मै भी चुपचाप खा लेता हूँ।

इस प्रकार घर के अन्य सदस्य एक -एक कर के आए। पहले वालो के बारे में पूछते और चुपचाप खाना खा कर चले गए। रात को नुकसान (हानि) हाथ जोड़कर सुनार से कहने लगा : - मै जा रहा हूँ।

सुनार ने पूछा :- क्यों?
तब नुकसान (हानि ) कहता है:- आप लोग एक किलो तो नमक खा गए। लेकिन बिलकुल भी झगड़ा नही हुआ। मेरा यहाँ कोई काम नहीं।

शिक्षा ..

झगड़ा कमजोरी, हानि और नुकसान की पहचान है। जहाँ प्रेम है, वहाँ लक्ष्मी का वास है। सदा प्यार प्रेम बांटते रहे। छोटे बड़े की कदर करे। जो बड़े हैं वो बड़े ही रहेंगे, चाहे आपकी कमाई उसकी कमाई से बड़ी क्यों न हो।

सदैव प्रसन्न रहिये!!
जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!

23/12/2023

बीते हफ़्ता, दो मित्रों ने अपना नया मकान देखने बुलाया।
एक को 11साल लगे.. मकान बनवाने में , दूसरे को 9 साल।
इस एक दशक के समय में उन मित्रों ने बस एक ही काम किया ..वह यह कि - 'मकान बनवाया' !
..औऱ उससे पहले 20 साल तक जो काम किया वो यह कि 'मकान बनवाने" लायक पैसा जुटाया।
यानि,
जीवन के बेशक़ीमती 30 साल सिर्फ़ 'अपना मकान बनवा लूं' इस फितूर में निकाल दिए।

मेरी, मकान, इंटीरियर , एलिवेशन , लक धक साज-सज्जा जैसी चीज़ों में बिल्कुल भी रूचि नही है ..बल्कि साफ़ कहूं ..तॊ अरुचि ही है।

.वे मित्र , उच्चता के घमंड से विकृत हुए ..एक-एक कमरे , गैलरी, गार्डन , आर्किटेक्ट की बारीकियां , उनके निर्माण में लगी सामग्री , ख़र्च हुआ पैसा ..आदि विवरण दे रहे थे ।
इधर मैं भी सौजन्यतावश "हूं , हां " अच्छा ", वाह , ग़ज़ब " जैसी प्रतिक्रियाएं देकर उनके अभिमान को पुष्ट किए दे रहा था !
जबकि हक़ीक़त यह थी कि मैंने शायद ही किसी चीज़ को गौर से देखा हो !!
बचपन से ही मुझे मकान , गाड़ी , कपड़े जैसी बातों में न्यूनतम रूचि रही है ।
उनकी रनिंग कॉमेंट्री रुकने का नाम नहीं ले रही थी - "ये देखिए , वो देखिए , " गैरिज ऐसा है , गार्डन की लाइटिंग ऐसी है " and so on and on ,and on !!!

जबकि मेरी दृष्टि उनके नवीन लक-धक मकान से अधिक , उनके रूखे और नीरस चेहरे पर थी !
जिस विषय में आपकी रूचि होती है , वैसा ही आपका व्यक्तित्व बन जाता है !
वस्तुओं में अधिक रूचि रखने वाला व्यक्ति भी वस्तु की तरह ही हो जाता है - पार्थिव , चेतना विहीन , निष्प्राण !!

ज़्यादातर वे सभी व्यक्ति जिनके "क़ीमती मकान" होते हैं , कौडियों के आदमी होते हैं !!

उनका पूरा व्यक्तित्व ..लाभ-हानि , गुणा-भाग, जोड़-घटाना जैसे गणित के उबाऊ प्रमेय की तरह हो जाता है ।
पीछे उनकी सजी-धजी पत्नियाँ भी थीं ...
ऐसे बर्तनों की तरह , जिन्हें ऊपर से चमका दिया गया हो लेकिन जिनके भीतर फफूंद लगी है !
जो सिर्फ़ एक ही बात से मदमत्त थीं कि 'मैं इतने क़ीमती घर की स्वामिनी हूं ! '

भारतवर्ष में लोगों को एक ही शौक हैं -'अपने सपनों का मकान बनवाना' या फिर बने हुए मकान को रेनोवेट करवाना !!
वे पूरी ज़िंदगी इसी में खपाए रहते हैं !!

थोड़ा मनोवैज्ञानिक शोध करने पर मैंने पाया कि यह मूलतः उनका शौक़ नहीं है, इसके पीछे गहरे में दिखावे की मनोवृत्ति काम करती हैं !
यह एक ऐसा भाव हैं जो समाज की सामूहिक दिखावा वृति से प्रसारित होता हैं और सभी अहंकारी, प्रतिस्पर्धी रडार इसे कैच करते जाते हैं !!
फिर उसी सिग्नल के अनुरूप उनका जीवन टेलीकास्ट होता हैं !
वह हर वक़्त अपने आस-पास के लोगों से तुलना में व्यस्त रहता हैं !! ््
- "तेरे पास ऐसी कार हैं ..तॊ मेरे पास वैसी कार हैं"
- "तेरे कपड़े इतने महंगे ..तॊ मेरे कपड़े उतने महंगे ! "
- "तेरा फार्म हाऊस ऐसा हैं ..तॊ मेरा फार्म हाऊस वैसा हैं ! "
"तू सिंगापुर गया ..तॊ मैं स्विट्जरलैंड जाऊंगा "
- तेरा मकान ऐसा हैं ..तॊ मेरा मकान वैसा हैं !
ऊपर लिखे "तू" "तेरा" उसके रिलेटिव्ज , पड़ोसी और सर्किल के लोग होते हैंं जिनकी प्रगति और जीवन शैली से प्रतिस्पर्धा में वह पूरा जीवन गुज़ार देता हैं ।

वह सुंदर मकान तॊ बना लेता हैं मगर सुंदर मकान के आस्वाद लायक़ अपनी चेतना नहीं बना पाता !!
वह बाहरी मकान तॊ बना लेता हैं मगर उसकी चेतना का घर खण्डहर ही रहता हैं !
उसकी चेतना के सभी कमरे- शरीर , प्राण, मन, भाव , बुद्धी , परम चैतन्य कभी खड़े ही नहीं हो पाते ।

अगर भोक्ता उपस्थित नहीं हैं , तॊ भोग व्यर्थ हैं !
वर्ना तॊ आपके साथ आपका सूटकेस भी विदेश यात्रा कर आता हैं !
मगर सूटकेस को कोई रस नहीं हैं क्योंकि वह चेतनाशून्य हैं !
.तॊ मेरी तॊ दृष्टि इस बात पर हैं कि चैतन्य की ईमारत कितनी भव्य और विराट हो !
क्योंकि अंततः भोग तॊ चेतना से ही होना हैं !!

ज़्यादातर भव्य घरों में अकेलेपन से जूझते बीमार , तनावग्रस्त प्रौढ़ या बूढ़े ही पाए जाते हैं !
क्योंकि अक्सर ..तॊ सपनों का मकान बनाते-बनाते इतनी उम्र हो ही जाती हैं !!

अगर आपकी संगीत में रूचि नहीं हैं ..तॊ महंगा म्यूज़िक सिस्टम व्यर्थ हैं !
-अगर आपको फूलों में रस नहीं हैं ..तॊ फुलवारी व्यर्थ हैं !
-अगर आप रोमांटिक नही हैं ..तॊ सुंदर शयनकक्ष का क्या मज़ा ?
-अगर आप रोगी हैं ..तॊ लज़ीज़ पकवान किस काम के ??
अगर आपके भीतर ही रस नहीं हैं ..तॊ क्या कीजिएगा इस महंगे दिखावे का ??

अच्छा मकान , अच्छी बात हैं ..मगर चेतना की ईमारत भी बनाइए !!
जीवन बहुत छोटा और अनिश्चित हैं ! इसे महज़ पदार्थो के संग्रहण में ही न गुज़ार दें !
क्योंकि एक दिन तॊ यह देह भी मिट्टी में मिल जाना हैं ..और मकान भी !!
जो अजर अमर हैं , उस पर भी दृष्टि रखें !
चेतना का मकान बनाएं !!
समय उतना ही हैं !
अगर आप यहां लगाएंगे तॊ वहां नहीं लगा पाएंगे !!
महज़ दिखावे के ज़रा से रस के लिए जीवन की पूरी ऊर्जा और समय का निवेश कोई फ़ायदे का सौदा नहीं हैं।
आभार -

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