Prajapita Bhrahma Kumaris Ishvariy Vishva Vidhyalay

Prajapita Bhrahma Kumaris Ishvariy Vishva Vidhyalay ISHVARIY MISSION SINC 1937

18/08/2026

19-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम्हें अभी रूहानी कारोबार करनी है, रूह समझकर हर कर्म करने से आत्मा निर्विकारी बनती जाती है''

प्रश्नः-
स्वर्ग का वर्सा लेने और स्वर्ग में ऊंच पद पाने का आधार क्या है?

उत्तर:-
ब्रह्माकुमार/कुमारी बनें तो स्वर्ग का वर्सा मिल जायेगा। परन्तु ऊंच पद का आधार है पढ़ाई। अगर बाप का बनकर अच्छी रीति पढ़ाई पढ़ते रहें, पूरा पवित्र बनें तो राजाई पद मिलता है। कोई पूरा पढ़ते नहीं, कर्मबन्धन है, पूरा पवित्र नहीं बने और शरीर छूट गया तो प्रजा में भी साधारण पद पा लेंगे।

ओम् शान्ति।
रूहानी बच्चों को रूहानी बाप समझा रहे हैं। यहाँ रूहानी कारोबार है। बाकी सारी दुनिया में जिस्मानी कारोबार है। वास्तव में कारोबार चलती है रूहों की। आत्मा ही इस शरीर द्वारा पढ़ती है, चलती है, विकर्म करती है इसलिए पतित-आत्मा, पाप-आत्मा कहा जाता है। आत्मा ही सब कुछ करती है। इस समय सब मनुष्य देह-अभिमानी हैं, मैं आत्मा हूँ समझने बदले, समझते हैं मैं फलाना हूँ। यह व्यापार करता हूँ। यह फलाने कामी, क्रोधी हैं। शरीर का ही नाम लेते हैं। इसको कहा जाता है देह-अभिमानी दुनिया, उतरती कला की दुनिया। सतयुग में ऐसे नहीं होता। वहाँ देही-अभिमानी होते हैं। तुमको देही-अभिमानी बनाया जाता है। अपने को आत्मा निश्चय करो। मैं आत्मा यह शरीर रूपी चोला धारण कर पार्ट बजाती हूँ। वह एक्टर्स भी भिन्न-भिन्न कपड़ा बदली कर पार्ट बजाते हैं। बाप कहते हैं - तुम आत्मायें पहले शान्तिधाम में थी। तुम्हारा घर है शान्तिधाम। जैसे वह हद का नाटक होता है, यह फिर है बेहद का नाटक। सभी आत्मायें परमधाम से आकर, शरीर धारण कर पार्ट बजाती हैं। आत्माओं का असुल घर है परमधाम। उन एक्टर्स का तो घर यहाँ ही होता है। सिर्फ ड्रेस बदली कर आकर पार्ट बजाते हैं। तो बाप बैठ समझाते हैं, तुम आत्मायें हो। बाप तो बच्चे-बच्चे ही कहेंगे। संन्यासी बच्चे-बच्चे नहीं कहेंगे। बाप कहते हैं - मैं पतित-पावन तुम सभी आत्माओं का बाप हूँ, जिसको तुम गॉड फादर कहते हो। गॉड फादर तो निराकार है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी गॉड फादर नहीं कहेंगे। उनमें भी आत्मा है परन्तु उनको कहते हैं ब्रह्मा देवता नम:, विष्णु देवता नम:... देवतायें क्या करते हैं? यह किसको पता नहीं है। बाप ही आकर समझाते हैं - तुम कैसे ड्रामा प्लैन अनुसार पार्ट बजाते हो। दुनिया एक ही है। ऐसे नहीं कोई नीचे पाताल वा ऊपर में दुनिया है। दुनिया एक ही है, जिसका चक्र फिरता रहता है। लोग तो कह देते हैं मून में प्लाट लेंगे। बाप समझाते हैं बच्चे कितने इन्सालवेन्ट बन पड़े हैं। भारतवासियों के लिए ही कहते हैं, तुम कितने साहूकार समझदार थे। इन लक्ष्मी-नारायण का सारे विश्व पर राज्य था, जिसको कोई लूट न सके। वहाँ कोई पार्टीशन आदि नहीं होती। यहाँ तो कितनी पार्टीशन हैं। आपस में टुकड़े-टुकड़े पर लड़ते रहते हैं। तुम सारे विश्व के मालिक थे। सारा आकाश, पृथ्वी, समुद्र सब तुम्हारा था, तुम उनके मालिक थे। अब तो टुकड़े हो गये हैं। यह किसको पता नहीं है, भारत ही विश्व का मालिक था।

बाप समझाते हैं, आत्मा को जो पार्ट मिला हुआ है वह कभी घिसता नहीं। चलता ही रहता है। अभी तुम फिर से मनुष्य से देवता बन रहे हो। फिर 84 जन्म लेंगे। तुम्हारा पार्ट चलता ही रहता है, कभी बन्द नहीं होता है। कोई मोक्ष आदि पाते नहीं। जितने अनेक गुरू, अनेक शास्त्र, उतनी अनेक मतें होती हैं। मनुष्यों में कितनी अशान्ति है। जहाँ भी जाओ कहेंगे मन को शान्ति कैसे मिले। यह देह-अभिमान में आकर कहते हैं। बाप समझाते हैं मन और बुद्धि - यह हैं आत्मा के आरगन्स। बाकी यह सब शरीर की इन्द्रियां हैं। आत्मा कहती है मेरे मन को शान्ति कैसे मिले। वास्तव में यह कहना गलत है। तुम आत्मा हो, तुम्हारा स्वधर्म ही शान्त है। तुम ऐसे कहो मुझ आत्मा को शान्ति कैसे मिलेगी। इसमें कर्म तो करना ही है। यह बातें बाप ही बैठ समझाते हैं। दुनिया में यह ज्ञान किसको नहीं। वहाँ है भक्ति मार्ग। उनको ज्ञान का पता नहीं है। ज्ञान तो एक बाप ही देते हैं। बाप खुद कहते हैं मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुग पर आता हूँ। कलियुग के अन्त में सभी पतित हैं। यह है रावण-राज्य। रावण को जलाते भी भारतवासी ही हैं। बाप पतित-पावन का जन्म भी यहाँ है। तो रावण का जन्म भी यहाँ है। रावण जो सबको पतित बनाते हैं, इसलिए उनको जलाते हैं। यह बातें किसकी बुद्धि में नहीं हैं।

अब भारत में श्रीकृष्ण जयन्ती मनाते हैं। श्रीकृष्ण की लीला, भजन आदि करते हैं। अब बाप कहते हैं - वास्तव में श्रीकृष्ण लीला कुछ है ही नहीं। श्रीकृष्ण ने क्या किया! कहते हैं कंसपुरी में जन्म लिया। अब कंस तो डेविल को कहा जाता है। सतयुग में डेविल कहाँ से आये। तुम जानते हो श्रीकृष्ण की आत्मा जो सतयुग में थी वह अपने 84 जन्म भोग इस समय पतित से पावन बन रही है। अपना पद फिर से ले रही है। वैसे ही तुम कृष्णपुरी में रहने वाले थे। 84 जन्म ले अब फिर अपना पद ले रहे हो। जयन्ती मनानी है वास्तव में शिवबाबा की। जो शिवबाबा सबको हेल से हेविन में ले जाते हैं, उनकी कोई लीला है नहीं। कहते हैं कि हे पतित-पावन बाबा आओ, आकर हमको हेल से हेविन में ले जाओ। आप हमारे बाप हो तो हम स्वर्ग में होने चाहिए, हम विशश दुनिया में क्यों हैं? इसलिए बुलाते हैं हे गॉड फादर हमको इस दु:ख की दुनिया से लिबरेट करो। यह भी ड्रामा में नूँध है। बाप कहते हैं इस ड्रामा को कोई जानते नहीं। शास्त्रों में ड्रामा की आयु लम्बी लिख दी है। नई दुनिया को पुरानी बनना ही है। सतो रजो तमो में आना ही है। यह है बेहद की बात। अभी तुम फिर से विश्व के मालिक बन रहे हो। भारतवासी जो नई दुनिया में थे, वही 84 जन्मों का पार्ट बजायेंगे। अभी तुम पवित्र बनते हो, बाकी सब मनुष्य पतित हैं, तब तो पावन के आगे जाकर नमन करते हैं। पावन को पावन नमन क्यों करेंगे। संन्यासी पावन हैं तब तो पतित मनुष्य उनके आगे माथा झुकाते हैं। कन्या पवित्र है तो सब उनके आगे सिर झुकाते हैं। वही कन्या शादी कर ससुर घर जायेगी तो माथा टेकना पड़ता है। अभी बेहद का बाप आये हैं सबको पावन बनाने। वह सब हैं कलियुग में। तुम हो अभी संगम पर। अब तुमको पतित दुनिया में नहीं जाना है। यह है ही कल्याणकारी युग। बाप आकर सबका कल्याण करते हैं। तुम अभी श्रीकृष्ण जयन्ती मनायेंगे, नहीं तो लोग समझेंगे यह तो नास्तिक हैं। नास्तिक वास्तव में उनको कहा जाता है जो अपने बाप को और रचना के आदि-मध्य-अन्त को नहीं जानते हैं। इस समय सब निधन के आरफन बन पड़े हैं। घर-घर में झगड़ा है, एक दो को मारने में देरी नहीं करते हैं, इसलिए इसको नास्तिकों की दुनिया कहा जाता है, बाप को न जानने वाले। तुम हो जानने वाले। अभी तुम समझते हो कि हम पत्थरबुद्धि थे, बाप हमको पारसबुद्धि बना रहे हैं और कोई तकलीफ की बात नहीं। बाप सिर्फ कहते हैं एक घण्टा पढ़ो। अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। शरीर को याद करेंगे तो लौकिक सम्बन्धों की याद आयेगी। देही-अभिमानी रहेंगे तो मुझ बाप की याद रहेगी। यह तो है ही विशश दुनिया। विषय सागर में गोते खाते रहते हैं। विष्णु को क्षीरसागर में दिखाते हैं। कहते हैं वहाँ घी की नदियाँ बहती हैं। यहाँ तो घासलेट भी नहीं मिलता। फ़र्क है ना। तो तुम बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। बाप ही खिवैया है ना। गाते भी हैं नईया मेरी पार लगाओ। यह सब नईयायें हैं, खिवैया एक बाप ही है। यह शरीर यहाँ ही छोड़ देंगे। बाकी आत्माओं को पार ले जायेंगे शान्तिधाम। वहाँ से फिर भेज देंगे सुखधाम। परमपिता परमात्मा को ही खिवैया कहा जाता है। बाप की ही महिमा गाते हैं अनेक प्रकार से। अभी तुम पवित्र बन पवित्र दुनिया के मालिक बनते हो। श्री श्री शिवबाबा आये हैं श्रेष्ठ बनाने। खुद भगवान कहते हैं यह भ्रष्टाचारी दुनिया है। अभी तुम परमपिता परमात्मा की श्रीमत पर चल श्रेष्ठाचारी बनते हो। कितनी यह गुप्त रमणीक बातें हैं, जो तुम बच्चों को ही समझ में आती हैं। औरों को समझ में आयेंगी ही नहीं। तुम जानते हो कि अभी देवी-देवता धर्म का कलम लग रहा है। जो भी देवी-देवता धर्म वाले और धर्मों में चले गये हैं, वही आकर फिर ब्राह्मण बनेंगे। ब्रह्माकुमार-कुमारी बनने बिगर बाप से स्वर्ग का वर्सा ले नहीं सकते। अभी तुम ब्रह्माकुमार-कुमारियां स्वर्ग का वर्सा ले रहे हो। जितना पुरुषार्थ करेंगे, करायेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। सब तो इतना नहीं कर सकते। पूरा नहीं पढ़ेंगे तो उसका नतीजा क्या होगा। अगर शरीर छूट जाये तो स्वर्ग में आ जायेंगे। परन्तु प्रजा में बिल्कुल ही साधारण। अगर बाप का बनकर अच्छी रीति पढ़े तो राजाई पद पा सकते हैं। नहीं पढ़ते हैं तो समझेंगे उनकी तकदीर में नहीं है। पवित्र रहेंगे, पढ़ेंगे तो ऊंच पद पायेंगे। अपवित्र होने से बाप को याद नहीं कर सकेंगे। ऐसे भी बहुत हैं - कर्मबन्धन का हिसाब जब छूटे। गाड़ी के दोनों पहिया पवित्र होंगे तो ठीक चलेंगे। दोनों पवित्र रहेंगे तो ज्ञान चिता पर बैठ जायेंगे, नहीं तो खिटपिट होती है।

कई बच्चे कहते हैं कि बाबा हम तो जानते हैं श्रीकृष्ण सतयुग का पहला प्रिन्स है, तो क्यों नहीं कुछ मनायें। अच्छा हम श्रीकृष्ण की आत्मा को बुला भी सकते हैं। आकर खेल-पाल करेगी, रास करेगी और क्या करेगी। गोप-गोपियाँ तो यहाँ ही होते हैं। वहाँ तो प्रिन्स-प्रिन्सेज आपस में मिलते हैं तो रास करते हैं। सोने की मुरली बजाते हैं। यह सब खेल-पाल तुम पिछाड़ी में देखेंगे। यह सब पार्ट चलेंगे। शुरू में दिखाया गया फिर तुम पुरुषार्थ में लग गये हो। अब फिर पिछाड़ी में साक्षात्कार होना शुरू होगा। कौन-कौन किस पद को पायेंगे, यह तुम जानते हो। बाप बैठ यह सब राज़ समझाते हैं। तुमसे पूछते हैं वेदों, शास्त्रों को मानते हो! बोलो हाँ, हम क्यों नहीं मानते हैं। यह सब भक्ति मार्ग की सामग्री है, इनमें कोई ज्ञान नहीं है। ज्ञान देने वाला तो एक है। ज्ञान मिलता है तो भक्ति आपेही छूट जाती है। तुम मन्दिर में भी जायेंगे तो बुद्धि में रहेगा कि यह लक्ष्मी-नारायण फिर अब नई दुनिया में राज्य करेंगे।

बाप बच्चों को समझाते हैं, दोनों तरफ तोड़ निभाना है। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनना है। श्रीमत कहती है पूरे पवित्र बनो, पूरा वैष्णव बनो और विष्णुपुरी का राज्य लो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) योग द्वारा कर्मबन्धन का हिसाब-किताब चुक्तू कर, पावन बनना है। ज्ञान-चिता पर बैठना है। पूरा-पूरा वैष्णव अर्थात् पवित्र बनना है।

2) अपने शान्त स्वधर्म में स्थित रहना है। सबको शान्तिधाम की याद दिलानी है। कभी भी अशान्त नहीं होना है।

वरदान:-
आवाज से परे की स्थिति में स्थित हो सर्व गुणों का अनुभव करने वाले मा. बीजरूप भव

जैसे बीज में सारा वृक्ष समाया हुआ होता है वैसे ही आवाज से परे की स्थिति में संगमयुग के सर्व विशेष गुण अनुभव में आते हैं। मास्टर बीजरूप बनना अर्थात् सिर्फ शान्ति नहीं लेकिन शान्ति के साथ ज्ञान, अतीन्द्रिय सुख, प्रेम, आनंद, शक्ति आदि-आदि सर्व मुख्य गुणों का अनुभव करना। यह अनुभव सिर्फ स्वयं को नहीं होता लेकिन अन्य आत्मायें भी उनके चेहरे से सर्वगुणों का अनुभव करती हैं। एक गुण में सर्वगुण समाये हुए रहते हैं।

स्लोगन:-
अच्छाई धारण करो लेकिन अच्छाई में प्रभावित नहीं हो जाओ।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

पवित्रता आप ब्राह्मण आत्माओं का अनादि आदि संस्कार है, इस नैचुरल संस्कार से स्वप्न व संकल्प में भी अपवित्रता इमर्ज न हो। संकल्प आवे और विजयी बनो, इनसे भी ऊपर नैचुरल संस्कार बना लो। तो इस सबजेक्ट में पुरुषार्थ करने की आवश्यकता नहीं रहेगी।

17/08/2026

18-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - सुनी सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करो, अगर कोई उल्टी सुल्टी बातें सुनाये तो एक कान से सुन दूसरे से निकाल दो''

प्रश्नः-
जो बच्चे ज्ञान की खुशी में रहते हैं उनकी निशानी क्या होगी?

उत्तर:-
वे पुराने कर्मभोग का हिसाब-किताब उस खुशी में मर्ज करते जायेंगे। ज्ञान की खुशी में दु:ख दर्द, गम की दुनिया ही भूल जाती है। बुद्धि में रहता अब तो हम खुशी की दुनिया में जा रहे हैं। रावण ने श्रापित कर दु:खी किया, अब बाप आये हैं उस दु:ख की, गम की दुनिया से निकाल खुशी की दुनिया में ले जाने।

गीत:-
तुम्हें पाके हमने....

ओम् शान्ति।
मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत सुना। जरूर बच्चों के रोमांच खड़े हो जाने चाहिए क्योंकि गाया जाता है खुशी जैसी खुराक नहीं। अभी तुम सभी रूहानी बच्चों को बेहद का बाप मिला है। बेहद का बाप तो एक ही होता है और बच्चे जानते हैं जब और बच्चे बनेंगे तो उन्हों के भी रोमांच खड़े होंगे। तुम जानते हो हमारा राज्य था फिर राज्य गँवाया, अब फिर राज्य लेते हैं। भारतवासियों के लिए यह खुशखबरी है ना। परन्तु जबकि अच्छी रीति सुनें और समझें। बरोबर यह खुशी की बात है ना, कल्प-कल्प बाप आते हैं। बाप का जन्म भी यहाँ गाया जाता है। त्योहार भी जो हैं सब इस समय के हैं। बाप ने आकर तुमको बहुत सहज रास्ता बताया है। मनुष्यों को तो अनेक प्रकार के गम हैं, यहाँ इस ज्ञान की खुशी में वह गम दु:ख आदि सब मर्ज हो जाते हैं। जैसे कोई बीमार ठीक होने पर आता है तो सबको खुशी होती है। बीमारी आदि दु:ख की बातें जैसे भूल जाती हैं। पियरघर, ससुरघर, मित्र सम्बन्धी आदि सब खुशी में आ जाते हैं। तुम बच्चे जानते हो हम सब विश्व के मालिक थे फिर रावण ने श्राप दिया है। यह है गम की, दु:ख की दुनिया। फिर कल होगी खुशी की दुनिया। खुशी की दुनिया याद रहने से गम दु:ख आदि सब भूल जाने चाहिए। यह है तमोप्रधान दुनिया। भिन्न-भिन्न प्रकार का कर्मभोग है। अबलाओं पर भी कितने अत्याचार होते हैं। अनेक प्रकार के विघ्न आते हैं। यह विघ्नों के, कर्मभोग के दिन बाकी थोड़ा समय है। बाप धीरज़ देते हैं, बाकी थोड़े रोज़ हैं। कल्प पहले भी हुआ था। कर्मभोग का हिसाब-किताब चुक्तू होना है। खुशी में यह सब मर्ज करते जाओ। बस बाप और वर्से को याद करते रहो। उल्टा-सुल्टा कोई भी काम मत करो। नहीं तो और ही दण्ड पड़ जाता है, पद भ्रष्ट हो जाता है। बच्चों का काम है एक बाप को याद करना। बाप कहते हैं - मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हो जायेंगे। हिसाब-किताब चुक्तू हो जायेगा। बाकी थोड़ा समय है, हिसाब-किताब चुक्तू करते जाओ क्योंकि तुम हो अन्धों की लाठी। तुम भी याद करो, दूसरों को भी रास्ता बताओ। विघ्न तो बहुत पड़ेंगे। जितना हो सके, सबको यह समझाते रहो कि बाप को याद करो। अक्षर भी नामीग्रामी हैं, मनमनाभव अर्थात् हे आत्मायें मामेकम् याद करो तो तुम्हारे पास्ट के विकर्म भस्म होंगे। इसमें मूँझने की तो बात ही नहीं। सिर्फ बाप को याद करो तो तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे। तुम जानते हो हमने 84 का चक्र लगाया है। चक्र लगाते आये हैं, लगाते रहेंगे। यह है पुरानी दुनिया, पुराना चोला.... इनको भूल जाना है। यह है आत्माओं का बेहद का संन्यास। उन्हों का है हद का संन्यास, घरबार छोड़ जाते हैं। उन्हों का भी ड्रामा में पार्ट है। फिर भी ऐसे ही होगा। सेकेण्ड-सेकेण्ड जो पास हुआ सो ड्रामा फिर वही ड्रामा रिपीट होगा। शास्त्र सब हैं भक्तिमार्ग के पुस्तक। भक्ति के बाद है ज्ञान। इस सीढ़ी के चित्र पर किसको भी समझाना बहुत सहज है। मुख्य जो चित्र हैं वह अपने घर में भी रख सकते हो। त्रिमूर्ति भी बड़ा क्लीयर है। ऊपर में शिव भी है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी है, सूक्ष्मवतन वासी फिर ऊंच ते ऊंच है भगवान। बच्चे भी समझते हैं जहाँ बाप रहते हैं वह है हम आत्माओं के रहने का स्थान, जिसको निर्वाणधाम कहो अथवा शान्तिधाम कहो - बात एक ही है। शान्तिधाम नाम ठीक है अथवा निर्वाणधाम अर्थात् वाणी से परे धाम, वह शान्तिधाम ही हो गया। वह शान्तिधाम फिर है सुख और शान्ति सम्पत्ति धाम। फिर होता है दु:ख और अशान्तिधाम। सुख-धाम में तो कारून के खजाने होते हैं अथाह। आज क्या है, कल क्या होगा। आज कलियुग का अन्त, कल होगा सतयुग का आदि। रात दिन का फ़र्क है ना। कहते भी हैं ब्रह्मा और ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मणों का दिन और फिर रात। दिन में हैं देवतायें। रात में हैं शूद्र। बीच में हो तुम ब्राह्मण। इस संगमयुग का किसको पता नहीं है। मनुष्य तो बिल्कुल ही घोर अन्धियारे में हैं। तो घोर सोझरे में ले आना तुम बच्चों का फर्ज है। अभी सामने वही महाभारत लड़ाई है। गाया हुआ भी है - विनाश काले विप्रीत बुद्धि विनशन्ती। विनाश काले प्रीत बुद्धि विजयन्ती।

तुम बच्चे जानते हो बाबा हमको फिर से वही राजाई देते हैं। वह हमारी राजाई कोई छीन न सके। रावण की प्रवेशता तो होगी द्वापर से। रावण ने हमारी राजाई छीनी है, जिसको दुश्मन ही समझो क्योंकि दुश्मन का ही एफीजी बनाकर जलाते हैं। यह बहुत पुराना दुश्मन है। कहते भी हैं - रावण राज्य परन्तु किसकी बुद्धि में नहीं आता है। तो घोर अन्धियारा कहेंगे ना। बेहद का बाप है नॉलेजफुल। उनको ज्ञान का दाता, दिव्य चक्षु विधाता कहते हैं। अभी तुम आत्माओं को ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। आगे तो कुछ नहीं जानते थे। अब सब जान गये हो। बाप ज्ञान का सागर है तो जरूर ज्ञान सुनायेंगे ना। ज्ञान सुनाने बिगर सिद्ध कैसे हो! तुम देखते हो बाप ज्ञान सुनाते हैं, जिस ज्ञान से फिर आधाकल्प सद्गति होती है। भक्ति को ही आधा-कल्प चलना है। ज्ञान से सद्गति संगम पर ही होती है। कोई भी बात बच्चों की कब छिप नहीं सकती। बाप कहते हैं - कोई भी बुरा काम हो जाए तो बताओ। बाबा जानते हैं कईयों से बुरे कर्म होते रहते हैं। रावण राज्य है ना। माया चमाट मारती है, परन्तु छिपाते हैं बहुत। बाबा कहते हैं कोई भी भूल होती है तो फौरन बतलाने से आगे के लिए युक्ति मिलेगी। नहीं तो वृद्धि होती जायेगी। काम महाशत्रु है। बाबा को लिखते हैं - बाबा माया का बहुत आपोजीशन होता है। सदैव तो किसका योग नहीं रहता जो माया से बच सके। देह-अभिमान बहुत आता है। बहुत हैं जो माया के थप्पड़ खाते हैं। बाबा के पास समाचार तो सब तरफ से आते रहते हैं ना। अखबारों आदि में तो उल्टा-सुल्टा भी कितना डाल देते हैं। आजकल मनुष्य बातें तो कितनी भी बना सकते हैं, तमोप्रधान हैं ना। व्यास की जब रजो बुद्धि थी तो क्या-क्या बातें बैठ लिखी हैं। बाप बच्चों को समझाते हैं सुनी-सुनाई बातों पर कभी भी विश्वास कर बिगड़ो मत। फलाने ने ऐसे कहा, यह किया... माथा ही फिर जाता है। समझते नहीं तमोप्रधान दुनिया है। माया गिराने की कोशिश करेगी। कोई भी झूठ-मूठ बातें सुनाये तो एक कान से सुन दूसरे से निकाल दो। औरों को भी यही पैगाम देते रहो। बाप कहते हैं - मैं पैगाम ले आता हूँ। अब हे आत्मायें श्रीमत पर चलो। हमारा पैगाम सुनो। सिर्फ मामेकम् याद करो। जो याद करेंगे वह अपना ही कल्याण करेंगे। याद आत्मा को करना है, भूली भी आत्मा है। अब बाप की श्रीमत मिलती है, इसमें आशीर्वाद वा रहम आदि कुछ भी नहीं माँगना है। सिर्फ बाप को याद करना है और कोई बात पूछने करने की भी दरकार नहीं है। सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है - यह तो सुना। इसमें खिटखिट की कोई बात नहीं। घोर अन्धियारे में ही बाप आते हैं इसलिए शिव रात्रि मनाते हैं। श्रीकृष्ण का भी जन्म रात्रि को मनाते हैं। खीर-पूरी आदि मन्दिरों में बनती है रात को। अब शिव के लिए क्या बनायेंगे? वह तो है निराकार। किसको पता भी नहीं है, बाबा किस घड़ी आते हैं और कैसे चले जाते हैं। सदैव तो सवारी नहीं करते हैं। आयेंगे और चले जायेंगे। अभी तुम जानते हो हम शिवबाबा के पोत्रे हैं। वर्सा उनसे मिलता है। ब्रह्मा को भी वर्सा उनसे मिलता है। यह तो मनुष्य हैं ना। सद्गति में पहला नम्बर है यह श्रीकृष्ण। यह सबको प्यारा है क्योंकि सतोप्रधान बाल अवस्था है ना। थोड़ा बड़ा होता है तो उनको सतो कहा जाता है। फिर रजो तमो। श्रीकृष्ण राधे ही फिर लक्ष्मी-नारायण बनते हैं, जिनको बाप ने ज्ञान दिया है उनको ही देंगे। भारत में ही देवी-देवता होकर गये हैं तो मन्दिर भी भारत में बहुत हैं। क्रिश्चियन की चर्च में क्राइस्ट ही क्राइस्ट देखेंगे। देवताओं के कितने ढेर मन्दिर हैं। बाप आये हैं हमको मनुष्य से देवता बनाने अथवा भारत को स्वर्ग बनाने। हम बाप को याद कर पावन बन रहे हैं। बाप के साथ हम भी भारत को स्वर्ग बना रहे हैं। जैसे हम बाप के साथ आये हैं। भक्ति मार्ग में देवताओं के मन्दिर मूर्तियों आदि पर कितना खर्चा कर बनाते हैं। उत्पत्ति कर, पालना कर, फिर विनाश कर देते। 9 रोज़ के अन्दर ही डूबो देते हैं। बहुत उनमें प्रेम होता है। नवरात्रि कलकत्ते में बहुत मनाते हैं। इन सब बातों पर अभी वन्डर लगता है। आगे तो हम भी पार्टधारी थे। करोड़ों रूपया खर्च करते हैं। कितनी अन्धश्रद्धा है। रामायण से कितना प्यार होता है। बातें सुनकर आंखों से आंसू बहा देते हैं। यह सब है भक्ति मार्ग, इससे फायदा कुछ नहीं। बाबा अब हमको कितना समझदार बनाते हैं। तो यह सब सुनकर यहाँ का यहाँ भूल न जाओ, सब बातें याद करो। पूरा रिफ्रेश होकर जाओ। अपने को आत्मा समझ देह सहित जो कुछ देखते हो सब भूल जाओ। यह सब कब्रिस्तान है। देहली में बिड़ला मन्दिर में लिखा हुआ है - भारत परिस्तान था, जो धर्मराज ने स्थापन किया था। अभी तुम बच्चे जानते हो यह दुनिया कब्रिस्तान बननी है।

बाप कहते हैं - सब काम चिता पर बैठ एकदम जल मरे हैं।। क्रोध चिता नहीं कही जाती। काम चिता कहा जाता है। उसमें भी हल्का नशा, सेमी नशा भी होता है। बच्चों को ही बाप बैठकर समझाते हैं। घर में अगर कोई कपूत बच्चा होगा तो कहेंगे ना - यह क्या बाप की आबरू गँवाते हो। बाप की इज्जत जाती है ना। बेहद का बाप भी कहते हैं तुम काला मुँह करते हो तो ब्राह्मण कुल भूषण जो देवता बनते हैं, उनका नाम बदनाम करते हो। तुम बच्चे जानते हो - हम पवित्रता की ताकत से ही भारत को फिर से श्रेष्ठाचारी देवता बनाते हैं। तुम्हारे लिए तो जैसे कॉमन बात है। देखते हो महाभारत लड़ाई भी खड़ी है, इनसे ही स्वर्ग के गेट खुलते हैं। शास्त्रों में महाभारत लड़ाई तो दिखाई है। उसके बाद क्या हुआ - यह दिखाया नहीं है। कह देते हैं प्रलय हो गई। अब श्रीकृष्ण का एक तरफ तो माता के गर्भ से जन्म दिखाया है और दूसरे तरफ फिर कहते हैं कि पीपल के पत्ते पर अंगूठा चूसता आया, कुछ भी समझते नहीं। वहाँ तो गर्भ महल में रहते हैं बड़े विश्राम से। बाकी सागर में थोड़ेही पत्ते पर हो सकता। यह तो इम्पासिबुल है। तो यह सब ड्रामा बना हुआ है, जिसको तुम जानते हो। कल्प-कल्प ऐसे होता ही है। अब बच्चों को अपना कल्याण करना है और दूसरों का भी कल्याण करना है। मूल बात है यह। बाप तो स्वर्ग का रचयिता है। उसको कहा ही जाता है हेविनली गॉड फादर। तो फिर हम बच्चे स्वर्ग के मालिक होने चाहिए ना। शिव जयन्ती भी भारत में ही मनाते हैं तो जरूर भारत को कुछ दिया होगा। अभी तुमको स्वर्ग की बादशाही दे रहे हैं ना। बाप है ही सद्गति दाता। ज्ञान का सागर, नॉलेज बाप ही आकर देते हैं। अभी बाप तुमको नॉलेज दे रहे हैं। 5 हजार वर्ष बाद फिर यहाँ ही आयेंगे। बच्चों को निश्चय है जो-जो इस ब्राह्मण कुल के होंगे वह आते जायेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्रीमत पर अपना और दूसरों का कल्याण करना है। कोई कुछ झूठी बात सुनाये तो सुनी-अनसुनी कर देना है। उस पर बिगड़ना नहीं है।

2) कभी भी देवता बनने वाले ब्राह्मण कुल भूषणों का नाम बदनाम न हो - इसका ध्यान रखना है। कोई उल्टा कर्म कभी नहीं करना है। पिछले हिसाब-किताब चुक्तू करने हैं।

वरदान:-
नशे और निशाने की स्मृति से सर्व कर्मेन्द्रियों को आर्डर प्रमाण चलाने वाले ताज व तख्तनशीन भव

संगमयुग पर बापदादा द्वारा सभी बच्चों को ताज और तख्त प्राप्त होता है। प्योरिटी का भी ताज है तो जिम्मेवारियों का भी ताज है, अकाल तख्त भी है तो दिलतख्तनशीन भी हो। जब ऐसे डबल ताज और तख्तनशीन बनते हो तो नशा और निशाना स्वत: याद रहता है। फिर यह कर्मेन्द्रियां जी हजूर करती हैं। जो ताज व तख्त छोड़ देते हैं उनका आर्डर कोई भी कारोबारी नहीं मानते।

स्लोगन:-
कमजोर संकल्प ही प्रसन्नचित के बजाए प्रश्नचित बना देते हैं।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

ईश्वरीय सेवा का बड़े-से-बड़ा पुण्य है - पवित्रता का दान देना। पवित्र बनना और बनाना ही पुण्य आत्मा बनना है क्योंकि किसी आत्मा को आत्म-घात महा पाप से छुड़ाते हो। अपवित्रता आत्म-घात है। पवित्रता जीय-दान है।

16/08/2026

17-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - बाप और दादा की भी वन्डरफुल कहानी है, बाप जब दादा में प्रवेश करे तब तुम ब्रह्माकुमार-कुमारी वर्से के अधिकारी बनो''

प्रश्नः-
निश्चित ड्रामा को जानते हुए भी तुम बच्चों को कौन सा लक्ष्य अवश्य रखना है?

उत्तर:-
पुरुषार्थ कर गैलप करने का अर्थात् विनाश के पहले बाप की याद में रह कर्मातीत बनने का लक्ष्य अवश्य रखना है। कर्मातीत अर्थात् आइरन एजेड से गोल्डन एजेड बनना। पुरुषार्थ का यही थोड़ा सा समय है इसलिए विनाश के पहले अपनी अवस्था को अचल-अडोल बनाना है।

ओम् शान्ति।
ओम् शान्ति। यह दोनों कौन कहते हैं? एक था बाबा, एक था दादा। कहानी सुनाते हैं ना - एक था राजा, एक थी रानी। अब यह फिर हैं नई बातें। एक बाबा एक दादा तुम कहेंगे 5 हजार वर्ष पहले भी एक था शिवबाबा, दूसरा था ब्रह्मा दादा। अब शिव के बच्चे तो सब हैं। सभी आत्मायें एक बाप की सन्तान हैं। वह तो है ही है। ब्रह्मा के बच्चे ब्राह्मण भी थे, प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान ब्रह्माकुमार-कुमारियां थे। उन्हों को कौन पढ़ाते थे? शिवबाबा। प्रजापिता ब्रह्मा के यह ब्रह्माकुमार-कुमारियां ढेर बच्चे हैं ना। ब्रह्माकुमार-कुमारियां मानते हैं बरोबर हम शिवबाबा के बच्चे भी हैं, पोत्रे भी हैं। बच्चे तो हैं ही अब पोत्रे बने हैं। ब्रह्मा द्वारा दादे से वर्सा लेने। अभी तुमको दादे से वर्सा मिलता है, जिसको शिवबाबा कहते हैं। परन्तु ब्रह्माकुमार-कुमारियां होने कारण उनको हम दादा कहते हैं। वर्सा दादे का है। ब्रह्मा दादा का नहीं। वैकुण्ठ वासी बनने का वर्सा उस बाप से मिलता है। आधाकल्प वर्सा पाते हो फिर तुमको श्राप मिलता है - रावण से। नीचे उतरते आते हो। जैसेकि ग्रहचारी बैठती है, नीचे उतरने की। अभी तुम बच्चे समझते हो - हमारी ग्रहचारी राहू की दशा पूरी हुई। राहू की दशा है सबसे बुरी। ऊंच ते ऊंच बृहस्पति की दशा फिर राहू की दशा बैठी तो 5 विकारों के कारण हम काले हो गये। अब फिर बाप कहते हैं दे दान तो छूटे ग्रहण। है तुम्हारी बात। उन्होंने फिर सूर्य चन्द्रमा का ग्रहण समझ लिया है। जब ग्रहण लगता है तो दान मांगते हैं। यहाँ बाप तुमको कहते हैं 5 विकारों का दान दो तो ग्रहचारी उतर जायेगी। इन विकारों से ही तुम पापात्मा बने हो। मुख्य है देह-अभिमान। पहले ऐसे सतोप्रधान थे, फिर सतो रजो तमो बने हैं। 84 जन्म लिए हैं। यह तो पक्का निश्चय है बरोबर देवतायें ही 84 जन्म लेते हैं। पहले उन्हों को ही मिलना चाहिए बाप से। गाया भी जाता है आत्मायें परमात्मा अलग रहे...

बाप कहते हैं - पहले-पहले तुमको सतयुग में भेजा था। फिर अभी तुम ही आकर मिले हो। आगे तो सिर्फ गाते थे उनका यथार्थ अर्थ अभी बाप बैठ समझाते हैं। सभी वेद शास्त्र, जप, तप, स्लोगन आदि जो भी हैं सबका सार बाप बैठ समझाते हैं। चक्र तो बिल्कुल सहज है। अभी कलियुग और सतयुग का संगम है। लडाई भी सामने खड़ी है। यह भी तुमको निश्चय है - सतयुग की स्थापना होती है। कलियुग में जितने भी हैं, उन सबके शरीर खलास हो जायेंगे, बाकी आत्मायें पवित्र बन हिसाब-किताब चुक्तू कर जायेंगी। यह सबके कयामत का समय है। आत्मायें शरीर छोड़ चली जायेंगी। यह तुम्हारी बुद्धि में अभी है। जब तक हम कर्मातीत अवस्था को पायें तब तक संगम पर खड़े हैं। एक तरफ हैं करोड़ों मनुष्य, दूसरे तरफ हो सिर्फ तुम थोड़े से। तुम्हारे में भी कितने हैं जो निश्चयबुद्धि होते जाते हैं। निश्चयबुद्धि विजयन्ती फिर जाकर विष्णु के गले की माला बनेंगे। एक है रूद्राक्ष की माला, दूसरी है रूण्ड माला। उस रूण्ड माला में छोटी-छोटी शक्ल होती है। यह निशानी है। हम आत्मायें ही आकर फिर बाप के गले की माला के दाने बनेंगे फिर यहाँ आयेंगे नम्बरवार। माला 8 की भी है, 108 की भी है, 16108 की भी है। अब 16 हजार हैं या 5-10 हजार हैं, उनका कोई हिसाब नहीं निकाला जाता। यह मालायें गाई जाती हैं। बाबा कहते हैं यह सब तुम क्यों विचार करते हो। जितने भी राजायें कल्प पहले सतयुग त्रेता में बने थे, उतने ही बनेंगे। 100 बनें या 2-3 सौ बनें - यह पूछना नहीं है।

बाप कहते हैं - तुम जितना नजदीक आते जायेंगे तो यह सब समझ जायेंगे। आज हम यहाँ हैं कल विनाश होगा फिर सतयुग में थोड़े से देवी-देवता होंगे। बाद में वृद्धि को पाते हैं। सतयुग के आसार भी दिखाई पड़ते हैं। बाकी लाखों जाकर रहेंगे फिर लाख रहें वा 9-10 लाख रहें, एक्यूरेट नहीं कह सकते। हाँ तुम जब एक्यूरेट सम्पूर्ण बनने के लायक बनेंगे तब तुमको और जास्ती साक्षात्कार हो जायेगा। अभी तो बहुत कुछ समझने का समय पड़ा है। बहुत साक्षात्कार करते रहेंगे। लड़ाई की तैयारियां भी बहुत होती रहती हैं। सब चीजें महंगी होती जायेंगी। विलायत में भी अब खूब टैक्स आदि लगते रहेंगे। बहुत-बहुत महंगाई होकर फिर एकदम सस्ताई हो जायेगी। सतयुग में कोई चीज़ पर खर्चा नहीं होगा। सब खानियां आदि भरपूर हो जायेंगी। नई दुनिया में वैभव बहुत होते हैं। लक्ष्मी-नारायण के पास बहुत वैभव थे ना। श्रीनाथ द्वारे में मूर्तियों के आगे भी कितने वैभवों का भोग लगाते हैं। वहाँ बहुत माल बनाते हैं और खाते रहते हैं। कहेंगे हम देवताओं को भोग चढ़ाते हैं। कहेंगे देवताओं को भोग नहीं लगायेंगे तो वह नाराज हो जायेंगे। अब इसमें नाराज होने की तो बात ही नही। तुम कोई पर नाराज नहीं होते हो। जानते हो ड्रामानुसार यह विनाश होना ही है। कलियुग से बदल कर सतयुग होगा। हम ड्रामा को समझते हैं कि ड्रामानुसार अभी नया चक्र शुरू होना है। तुम भी ड्रामा के वश हो। ड्रामानुसार बाप भी आया हुआ है। ड्रामा में एक मिनट भी नीचे ऊपर नहीं हो सकता है। जैसे बाबा आया तुमने देखा कल्प बाद भी हूबहू ऐसे होगा। शास्त्रों में तो कल्प की आयु लम्बी लिख दी है। अभी तुम बच्चों की बुद्धि में है बरोबर विनाश सामने खड़ा है। अभी तुम गैलप कर रहे हो। जानते हो बाप को याद कर हमको कर्मातीत अवस्था को जरूर पाना है अर्थात् आइरन एज से गोल्डन एज बनना है। अभी अगर पुरुषार्थ नहीं करेंगे तो पद भ्रष्ट हो जायेगा। हे आत्मायें अभी तुम पतित बन गई हो। यह भी जानते हो बहुत किसम के आयेंगे जो और धर्म में बदली हो गये हैं वह निकलकर आते रहेंगे। आकर अपना पुरुषार्थ करते रहेंगे - बाप से वर्सा पाने। ब्राह्मण धर्म में आकर फिर देवता धर्म में आयेंगे। ब्राह्मण धर्म में नहीं आयेंगे तो देवता धर्म में कैसे आयेंगे। ब्राह्मण दिन-प्रतिदिन वृद्धि को पाते रहेंगे। देखेंगे विनाश सामने आ गया है, यह तो ठीक कहते हैं फिर वृद्धि होती जायेगी। ब्राह्मणों का झाड़ वृद्धि को पाकर फुल हो जायेगा फिर वापस जायेंगे। देवताओं का झाड़ बढ़ेगा।

अभी तुम संगम पर राजयोग सीख रहे हो। इस संगम को कल्याणकारी युग कहा जाता है। संगम का ही गायन है - गंगा सागर का मेला दिखाते हैं। वह सब है भक्ति मार्ग का। यह है ज्ञान सागर और ज्ञान सागर से निकली हुई ज्ञान गंगायें। ज्ञान सागर से पतित-पावन अक्षर लगता है। वह समझते हैं - पतित पावनी गंगा है और फिर गंगा में स्नान करते ही आते हैं। यह नदियां तो सतयुग से लेकर चलती आती हैं, आजकल तो नदियां भी कहाँ-कहाँ डुबो देती हैं। प्रकृति भी तमोप्रधान, सागर भी तमोप्रधान हो पड़ा है। सागर थोड़ी सी उछल खायेगा तो सब कुछ खलास कर देंगे। सतयुग में सिर्फ हम थोड़े ही भारत में रहते हैं - यमुना के कण्ठे पर। देहली परिस्थान थी फिर बननी है। सतयुग में थोड़ी ही जीव आत्मायें रहती हैं फिर धीरे-धीरे आते जाते हैं। अभी है कलियुग का अन्त। कितने ढेर मनुष्य हो गये हैं, बेहद का नाटक है, जिसको अच्छी रीति समझना है। भल कोई अपने को एक्टर समझते भी हैं परन्तु कल्प 5 हजार वर्ष का है, यह किसको भी पता नहीं है। कहाँ 84 जन्म, कहाँ 84 लाख। अभी तुम रोशनी में हो। तुमको बाप से वर्सा मिलता है। बाप कहते हैं - मनमनाभव। बाप को याद करना है। शिव भगवानुवाच, भगवान की महिमा में और देवताओं की महिमा में बहुत फ़र्क है। बाप जो नई रचना रचते हैं, उनकी महिमा हैं सर्वगुण सम्पन्न... अभी तुम ऐसे बन रहे हो। बाप की महिमा और इनकी महिमा में रात-दिन का फ़र्क है। यह राजयोग है ना। गाया भी जाता है - भगवान राजयोग सिखलाते हैं। वह है निराकार, तो जरूर निराकार से साकार में आना पड़े। भगवान की इतनी महिमा है तो जरूर आना पड़े। उनका जन्म दिव्य अलौकिक है और किसका दिव्य जन्म नहीं गाया जाता। यह भी बच्चों को समझाया है एक होता है लौकिक बाप, दूसरा है पारलौकिक बाप, जिसको ही भगवान कह याद करते हैं और तीसरा है अलौकिक बाप, यह फिर वन्डरफुल बाप है। जब पारलौकिक बाप बच्चों को एडाप्ट करते हैं तो बीच में यह अलौकिक आ जाता है। प्रजापिता ब्रह्मा के कितने ढेर बच्चे हैं। शिवबाबा आकर ब्रह्मा द्वारा तुमको अपना बनाते हैं। कितने ब्रह्माकुमार-कुमारियां बनते हैं। लौकिक बाप को तो करके 8-10 बच्चे होंगे। अच्छा शिवबाबा भी है पारलौकिक बाप। उनके तो अनेक बच्चे हैं। सभी आत्मायें कहती हैं - हम सब ब्रदर्स हैं। अब इस संगम पर फिर अलौकिक बाप मिलता है। यह ज्ञान तुमको वहाँ नहीं रहेगा। प्रजापिता ब्रह्मा बाप मिलता ही तब है जबकि बाप आकर नई सृष्टि रचते हैं। तो यह अलौकिक जन्म हुआ ना, इनको कोई समझ नहीं सकते। वह लौकिक वह पारलौकिक और यह है संगमयुगी अलौकिक बाप। लौकिक बाप तो सतयुग से लेकर होते आये हैं। पारलौकिक बाप को वहाँ कोई याद नहीं करते, वहाँ होता ही है एक बाप। हे भगवान, हे परमात्मा कहकर याद नहीं करते हैं फिर द्वापर में जब भक्ति मार्ग शुरू होता है तो बाप दो होते हैं। संगम पर हैं 3 बाप। प्रजापिता ब्रह्मा भी अभी मिलता है, अभी तुम उनके बने हो। जानते हो यह अलौकिक बाप है। अभी तुम इन बातों को अच्छी रीति जानते हो और याद करते हो। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। सतयुग में याद करने की दरकार ही नहीं। दु:ख में पारलौकिक बाप का सब सिमरण करते हैं। यह तो बिल्कुल सहज बात है। सतयुग त्रेता में एक बाप होता है, द्वापर में दो बाप होते हैं। इस समय तुम अलौकिक बाप के बच्चे बने हो जिस द्वारा तुम वर्सा लेते हो। तुम बच्चे ही ब्राह्मण बनते हो जो फिर देवता बनेंगे। विनाश भी तुम्हारे को ही देखना है, जो तुम इन आंखों से देखेंगे, बॉम्बस छोड़ेंगे। मनुष्य तो मरेंगे ना। जापान में भी बॉम्ब छोड़ा, देखा ना कैसे मनुष्य मरे। अब यहाँ लड़ाइयां लगती रहती हैं। खुद भी कहते हैं हम तंग होते जाते हैं। 10-10 वर्ष तक भी लड़ाई चलती रहती है। बॉम्ब्स में तो चपटी में (सेकेण्ड में) सब खलास हो जायेगा। चिन्गारी लगती है तो शहर नष्ट हो जाते हैं। यह तो बॉम्ब्स हैं। आग भी लगनी है।

तुम बच्चे जानते हो बाप आये ही हैं स्थापना और विनाश कराने। तो जरूर यह सब होगा। पुरुषार्थ करने का अभी समय है। माया घड़ी-घड़ी तुम्हारा बुद्धियोग तोड़ देती है। अजुन तुम अडोल स्थिर कहाँ बने हो। कहते हैं बाबा माया के तूफान बहुत आते हैं। कोई तो सारे दिन में घण्टा आधा भी याद नहीं करते हैं। बाप कहते हैं - तुम कर्मयोगी हो। 8 घण्टा तो यह सेवा करेंगे। 8 घण्टा याद कर सको इतना पुरुषार्थ करना है। याद करते रहने से विकर्म विनाश होते जायेंगे, इसको ही योग अग्नि कहा जाता है। यह है मेहनत। गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए सिर्फ याद करना है। यह भी बाबा बतलाते हैं कि जिन्होंने गृहस्थ छोड़ा है, बच्चे बने हैं, वह भी इतना याद नहीं करते हैं। घर में रहने वाले और ही जास्ती याद करते हैं। अर्जुन और भील का भी मिसाल देते हैं ना। मेहनत है बाप को याद करना और चक्र को समझना है। महाभारत लड़ाई भी जरूर लगेगी। सतयुग में थोड़ेही लगेगी। तो तुम बच्चों को अन्धों की लाठी भी बनना है। सबको रास्ता बताना है कि बाप को याद करो, चक्र को याद करो। स्वदर्शन चक्रधारी बनो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कम से कम 8 घण्टा याद में रहने का पुरुषार्थ करना है। अपनी अवस्था अचल-अडोल रखने के लिए याद का अभ्यास बढ़ाना है। गफलत नहीं करनी है।

2) यह ड्रामा बिल्कुल एक्यूरेट बना हुआ है इसलिए किसी पर भी नाराज़ नहीं होना है। निश्चयबुद्धि बनना है।

वरदान:-
तोड़ना, मोड़ना और जोड़ना - इन तीन शब्दों की स्मृति द्वारा सदा विजयी भव

सारी पढ़ाई और शिक्षाओं का सार यह तीन शब्द हैं:- 1-कर्मबन्धन तोड़ने हैं। 2-अपने संस्कार-स्वभाव को मोड़ना है और 3- एक बाप से सर्व सम्बन्ध जोड़ने हैं - यही तीन शब्द सम्पूर्ण विजयी बना देंगे। इसके लिए सदा यही स्मृति रहे कि जो भी इन नयनों से विनाशी चीज़े देखते हैं वह सब विनाश हुई पड़ी हैं। उन्हें देखते भी अपने नये सम्बन्ध, नई सृष्टि को देखते रहो तो कभी हार हो नहीं सकती।

स्लोगन:-
योगी की निशानी है - सदा क्लीन और क्लीयर।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

अगर ब्राह्मण जीवन में संकल्प में भी अपवित्रता वा अमर्यादा आ जाती है तो तख्तनशीन की बजाए गिरती कला में अर्थात् नीचे आ जाते हो। कोई विकर्म नहीं हुआ लेकिन व्यर्थ कर्म भी हुआ तो पश्चाताप के बजाए महसूसता की स्टेज होती है। महसूस होता है कि यह राँग है, नहीं होना चाहिए.. वह बात काँटे के समान चुभती रहेगी, इसलिए इस व्यर्थ से भी मुक्त बनो।



16-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 16.03.2011 "बापदादा" मधुबन

“मन्सा द्वारा प्रकृति को सतोगुणी बनाने की सेवा करो, शुभ भावना, शुभकामना रख संस्कार मिलन की रास करो''

आज होलीएस्ट बाप अपने बच्चों से होली मनाने आये हैं। आप सभी भी होली मनाने आये हैं। चारों ओर के दूर बैठे हुए बच्चे भी दूर बैठे भी होली मनाने बैठे हैं। आप सभी कौन से रंग की होली मनाने आये हैं! जानते हैं सबसे श्रेष्ठ रंग है परमात्म संग का रंग। यह रंग सदा श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनाने वाला है। जैसे बाप ऊंचे ते ऊंचा है ऐसे यह परमात्म संग ऊंचे ते ऊंचा बनाने वाला है। हर एक बच्चे के मस्तक में चमकता हुआ भाग्य का सितारा देख रहे हैं। यह भाग्य का सितारा सारे कल्प में आप भाग्यशाली बच्चों के सिवाए और कोई प्राप्त नहीं कर सकता। वह श्रेष्ठ भाग्य है कि आप बच्चे ही डबल पवित्र अर्थात् होली बनते हो। वैसे धर्मात्मायें भी हैं लेकिन वह शरीर से पवित्र नहीं बनते हैं। आप ब्राह्मण आत्माओं की भविष्य में आत्मा भी पवित्र बनती और शरीर भी पवित्र बनता है। इनकी निशानी डबल पवित्र तो डबल ताज प्राप्त होता है। सारे कल्प में आप संगमयुग पर बाप के संग के रंग से डबल पवित्र डबल ताजधारी बनते हो। संगमयुग का परमात्म संग डबल पवित्र बना देता है। तो आप होली बाप के साथ रहने से, बाप को कम्बाइण्ड बनाने से डबल पवित्र बन जाते हो। सदा दिल में बाप का संग रहता है, यह संग कितना श्रेष्ठ है जो इतना श्रेष्ठ बना देता है। लोग तो स्थूल रंग से होली मनाते हैं लेकिन आप बाप के संग के रंग से होली बन जाते हो। वह भी डबल होली। तो आपकी होली दुनिया से न्यारी परमात्मा की प्यारी है। तो नशा रहता है ना कि हमारी होली प्रभु संग के रंग के कारण आधाकल्प ऐसा पवित्र बनाती है जो अब तक भी आपके चित्र कायदे प्रमाण पूजे जाते हैं और कोई के भी चित्र ऐसे प्रेम पूर्वक पूजे नहीं जाते हैं। आप स्वयं अपने चित्रों को देख रहे हो। और भी पूजे जाते हैं लेकिन इतना समय और ऐसे विधिपूर्वक पूजा नहीं होती। आप सदा उमंग और उत्साह में रहते हो। रहते हो ना! उमंग-उत्साह में रहते हो? हाथ उठाओ। रहते हो, कभी कभी या सदा? जो कहते हैं हम सदा उमंग-उत्साह में रहते भी हैं और दूसरे को भी उमंग-उत्साह दिलाते हैं, वह हाथ उठाओ। कभी कभी नहीं, सदा। सदा शब्द को अण्डरलाइन करते हो ना! लेकिन आपका यादगार, जो भी आपकी स्थिति रही है उसका यादगार आपके भक्त उत्सव के रूप में मनाते हैं। आपने प्रभू के संग का रंग लगाया तो वह भी रंग लगाते हैं लेकिन बॉडीकान्सेस हैं ना तो स्थूल रंग लगा देते हैं। जिस रंग में खर्चा भी बहुत और फिर रिजल्ट भी कुछ अच्छी कुछ नहीं अच्छी, ऐसे मनाते हैं। लेकिन आपके उत्साह का यादगार उत्सव जरूर मनाया है। आप परमात्मा का बनने के लिए पहले अपने पुराने संस्कारों को जलाते हो और फिर प्रभु के संग का रंग लगने से सदा मनाते रहते हो। वह भी पहले जलाते हैं फिर मनाते हैं लेकिन आपका मनाना और उन्हों के मनाने में रात दिन का अन्तर है। वह बॉडीकान्सेस आप आत्म अभिमानी। वह देह भान में आप आत्मिक भान में।

आपको बापदादा का डायरेक्शन है होली अर्थात् बीती सो बीती। यह भी कहते हैं हो ली लेकिन अर्थ को प्रैक्टिकल में नहीं ला सकते। आप सब हो ली अर्थात् बीती सो बीती करते हो। करते हो ना! कि कभी कभी करते हो? क्योंकि बीती को याद करने से व्यर्थ संकल्प बहुत चलते हैं। समय भी व्यर्थ जाता है। जो बहुत समय के संस्कार हैं वह न चाहते भी जब चलते हैं तो इस संगमयुग का एक-एक मिनट जो एक जन्म में 21 जन्म की प्रालब्ध बनाता है, वह एक-एक संकल्प एक-एक मिनट कितना वैल्यूएबल है। एक सेकण्ड नहीं गया लेकिन अनेक जन्म की प्रालब्ध में फर्क पड़ जाता है। बापदादा ने पहले भी कहा है कि संगम समय का समय और संकल्प कभी भी व्यर्थ नहीं गंवाना है। अगर सदा प्रभु रंग में रंगे हुए हो अर्थात् बाप को सदा का साथी बनाके रहते हो तो संगमयुग के एक-एक संकल्प और समय माना एक-एक मिनट को सफल कर सकते हो। तो चेक करो अपने को कि एक-एक मिनट, एक-एक संकल्प सफल होता है? या व्यर्थ भी जाता है? क्योंकि एक मिनट नहीं 21 जन्म का कनेक्शन हर मिनट और हर संकल्प का है। इतनी वैल्यू है। तो अपनी दिल में सोचो कि इतनी वैल्यू सदा रहती है! इस संगम के समय के लिए कहा हुआ है - “अब नहीं तो कब नहीं।'' इतनी वैल्यू सदा स्मृति में रहे। तो आप सभी ने आज होली मनाई अर्थात् सदा बाप के संग का रंग लगाया। तो सारा दिन चेक किया कि बाप का रंग लगा हुआ रहा? परमात्म संग में रहे या और भी कहाँ समय वा संकल्प गया? चेक किया? कांध हिलाओ, हाथ नहीं, ऐसे करो।

बापदादा सदा ही इशारा देते हैं कि अपने मन के शुभ सतोगुणी संकल्प द्वारा प्रकृति को भी सतोगुणी बनाते रहो। तो वह मन्सा सेवा याद रहती है? क्योंकि अभी प्रकृति बड़े रूप में अपना कार्य करने वाली है। यह तो छोटी सी बात है लेकिन प्रकृति को मनुष्यात्मायें तंग करती हैं तो वह भी तंग करना शुरू करती है इसलिए बाप कहते हैं जैसे मायाजीत बनने का अटेन्शन रखते हो। रखते हो ना! माया से वायदा है आपका काम है आना और हमारा काम है विजय प्राप्त करना। किया है ना वायदा सभी ने? किया है? मायाजीत बनना है ना! ऐसे ही प्रकृति जीत भी बनना है क्योंकि आपको राज्य करना है ना। आपका राज्य आ रहा है ना! नशा है ना! लोग तो बिचारे सोचते हैं क्या होगा, डरते हैं। लेकिन आप को पता है तो अभी संगमयुग अमृतवेला चल रहा है। तो अमृतवेले के बाद क्या आता है? सवेरा। उस सवेरे में ही हमारा राज्य आना है। है ना नशा! हमारा राज्य है या केवल महारथियों के लिए राज्य है? आप सबका राज्य है। आपको चिंता नहीं क्या होगा! अच्छे ते अच्छा होगा। तो आपके राज्य में प्रकृति भी सतोप्रधान होनी है। तो प्रकृति को तमोगुणी से सतोगुणी कौन बनायेगा? कि प्रकृति जैसी भी हो चलेगी? आपके राज्य में चलेगा? चलेगा? हाँ करो या ना करो। नहीं चलेगी? तो प्रकृति को सतोगुणी कौन बनायेगा? आप ही बनायेंगे ना! इसलिए अभी अचानक का पहला दृश्य, छोटा है यह, शुरू हुआ है। अभी तो बड़े-बड़े आने हैं और अचानक ही आने हैं। जो सोच में नहीं होगा वही होना है।

बापदादा ने तो बहुत समय से अचानक का पाठ पढ़ाया है। लेकिन अभी प्रत्यक्ष रूप में देख करके अभी अपना काम शुरू करो। घबराओ नहीं। कहानी सुनाते हैं ना - चारों ओर आग लगी लेकिन परमात्मा के बच्चे सेफ रहे। तो अभी भी बच्चे तो सेफ हैं ना! पेपर तो आने ही हैं लेकिन आपका डबल काम है। एक तो निर्भय होके सामना करो, दूसरा अपने भक्त और अपने दु:खी भाई-बहिनों की सेवा भी कौन करेगा? आप प्रभु के संग में रंग लगे हुए हो, तो जो परमात्मा के संग के रंग में प्राप्त किया है वह अपने भाई बहिनों को, भक्तों को खूब प्यार से दिल से बांटो। दु:ख के समय कौन याद आता है? फिर भी परमात्मा चाहे समझें चाहे नहीं समझें, लेकिन मजबूरी से भी हे बाप, हे परमात्मा कहेंगे जरूर। तो आप परमात्म बच्चों को अभी दु:खियों का सहारा बनना है। उन्हों को शुभ भावना शुभ कामना द्वारा, बाप द्वारा प्राप्त हुई किरणों द्वारा सहारा बनो। फिर भी आपका परिवार है ना! तो परिवार में एक दो को सहयोग देते हैं ना! तो नाम ही है सह योग, श्रेष्ठ योग। वही साधन है सहारा देने का। सन्देश भी भेजा था कि समय फिक्स करो। ऐसे नहीं हो जायेगा, जैसे ट्राफिक कन्ट्रोल, अमृतवेला निश्चित है तो करते हो ना। ऐसे अपने कार्य प्रमाण यह मन्सा सेवा भी अभी के समय प्रमाण अति आवश्यक है। तो समय निकालो, रहमदिल बनो। कल्याणकारी बनो। आपका स्वमान क्या है? विश्व कल्याणकारी। तो रहम आता है? कि हो जायेगा? इसमें अलबेले नहीं बनना क्योंकि जिन्हों को आप सकाश देंगे वही आपके भक्त बनेंगे इसलिए क्या करना है? है अटेन्शन है? जो समझते हैं हमारा अटेन्शन है और बढ़ेगा वह हाथ उठाओ। नीचे-ऊपर कर रहे हैं। यहाँ देखने आ रहे हैं। (टी.वी. में) अगर इतने सभी ने अपने स्वमान को प्रैक्टिकल में लाया तो आत्मायें अभी भी संगम पर आपके दिल से गीत गायेंगे वाह परमात्म बच्चे वाह! हमें सहारा दिया। अभी का सहारा आधाकल्प आपके गीत गाते रहेंगे। आप उसके पूर्वज हो जायेंगे। पूर्वज हो। झाड़ में कहाँ बैठे हैं ब्राह्मण! नीचे बैठे हैं ना! तो पूर्वज हो ना! आवाज सुनने आता है भक्तों का? थोड़ा अपने को सावधान करो, दु:खियों का सहारा बनना ही है तो आवाज सुनने आयेगी।

तो सभी ने होली तो मनाई, आपकी तो सारा संगम ही होली है। परमात्मा के संग के रंग में ही रहते हो। यादगार मनाते हैं एक दो दिन लेकिन आप तो पूरा संगम प्रभु के संग में रहने वाले हो। नशा है ना! लोग बिचारे मांगते रहते हैं हे प्रभु यह कर दो, वह कर दो लेकिन आपको 21 जन्म की गैरन्टी मिली है, कभी दु:ख का स्वप्न में भी कोई दृश्य नहीं आयेगा। संकल्प में भी दु:ख की लहर नहीं आयेगी। तो सदा हर एक को अगर राज्य लेना है तो अभी अपने परिवार सतयुग के साथी और रॉयल प्रजा, साधारण प्रजा सब अभी बना सकते हो। 21 जन्म की गैरन्टी है। थोड़ी सी सेवा करो, समय निकालो क्योंकि आपके पास संकल्प शक्ति तो है ही। सिर्फ जो बाप से मिला है वह अपने भाई-बहिनों को भी दो।

बापदादा ने पहले भी कहा था कि सदा यह चेक करो कि मुझे ब्राह्मण परिवार के बीच संस्कार मिलन की रास करना आता है? बापदादा ने कहा था वह रास कब करेंगे उसकी डेट भी फिक्स करो। फिक्स हो सकती है? हो सकती है? पहली लाइन बताओ। हाथ उठाओ। हो सकती है? पाण्डव भी उठाओ। पाण्डवों के बिना गति नहीं है। अच्छा। तो अभी लास्ट टर्न है, एक टर्न रहा हुआ है। उसमें हर एक अपने लिए क्या दृढ़ संकल्प है, वह फिक्स करके लिखना। कितना समय लगेगा, जो ब्राह्मण परिवार में कहाँ भी कभी भी संस्कार अपना कार्य नहीं करे। चाहे मेरा संस्कार, चाहे दूसरे का संस्कार भी, मेरे को प्रभाव नहीं डाले। यह डेट फिक्स हो सकती है? हो सकती है? हाथ उठाओ। अच्छा, सभी का फोटो निकाला! क्योंकि जैसे यह अचानक सीन देखी ना। (जापान में भुकम्प और सुनामी आई है जिसमें बहुत नुकसान हुआ है) ऐसे सब अचानक ही होना है इसलिए बापदादा तैयारी तो देखेंगे ना! जब दूसरों को शुभ भावना शुभ कामना देते हो, बापदादा ने देखा यह दूसरों की सेवा का प्रोग्राम भी बनाया था तो अगर हर आत्मा के प्रति सदा शुभ भावना और शुभ कामना रखो, नम्बरवार तो होना ही है। आपकी यादगार माला में सब एक नम्बर हैं क्या? नम्बरवार हैं लेकिन माला में तो पिरोये हैं ना! नम्बर क्यों मिला? भिन्न-भिन्न संस्कार हैं लेकिन हमको संस्कार देखने के बजाए शुभ भावना शुभ कामना रखनी है। आखिर भी ब्राह्मण परिवार है ना। कैसा भी है, परिवार तो मेरा है ना! जैसे मेरा बाबा कहते हो, वैसे मेरा परिवार भी है। तो अच्छा है मैजारिटी ने हाथ उठाया है। तो सभी का उमंग-उत्साह है तब तो हाथ उठाया है ना! तो एक दो के सहयोगी बन शुभ भावना शुभ कामना की दृष्टि वृत्ति स्मृति रखने से यह रास होना कोई बड़ी बात नहीं है। इस पर जो बहुत अच्छा नम्बर लेगा, डेट पर प्रैक्टिकल करके दिखायेगा उनको न्यारा और प्यारा इनाम मिलेगा। इनाम अभी नहीं बतायेंगे लेकिन बापदादा इनाम देंगे। क्यों? सेवा करने का टाइम निकालना है ना। तो यह संस्कार की खिटखिट समय अपने तरफ खींच लेती है इसलिए समय की अभी आवश्यकता है। ठीक है ना!

यह सभी मधुबन वाले हैं ना! (आगे बैठने वालों को देख बाबा बोले) पसन्द है ना! क्योंकि मधुबन वासी विशेष हैं। बापदादा का भी मधुबन निवासियों प्रति दिल का प्यार है। और मधुबन वालों का भी है। यह भी बाबा कहते, बाप से प्यार है और रहेगा। मिट नहीं सकता है। अमर है इसमें। तब तो मधुबन वासी बने हैं ना! कहाँ भी मधुबन वासी जाते हैं तो किस रिगार्ड से देखते हैं? मधुबन का है, मधुबन का है। इसलिए यह अटेन्शन रखना लास्ट टर्न के पहले सभी मधुबन में कोई स्थान मुकरर करना जहाँ अपनी चिटकी डालें। लेकिन लास्ट टर्न के पहले।

सभी ने होली मनाई? आपकी तो रोज़ होली है। अभी भी यह तो बाहर का थोड़ा मनाना होता है। कहाँ मनाने जायें, यहीं तो मनायेंगे। लेकिन वो हुई रीति रसम। तो सभी चारों ओर के बापदादा के अति स्नेही, अति प्यारे, लाडले, सिकीलधे, स्वमान-धारी, हर बच्चे को बापदादा पदमगुणा यादप्यार भी दे रहे हैं और दिल का दुलार भी दे रहे हैं। बापदादा देख रहे हैं चारों ओर सब सुनके देख के हर्षित हो रहे हैं।

अच्छा, आज पहली बारी कौन आये हैं? उठो। यह सभी पहली बारी आये हैं। अच्छा, पहले बारी मधुबन निवासी बनने का भाग्य प्राप्त हुआ है। सभी आपके भाई-बहिनें और बापदादा भी आप सभी को पहले बारी आने की मुबारक दे रहे हैं। अभी बापदादा देखेंगे क्योंकि चांस है कि थोड़ी देरी से आये हैं लेकिन जो चाहे वह अभी भी लास्ट सो फास्ट जाकरके फर्स्ट नम्बर लेकर फर्स्ट डिवीजन में आ सकते हो। यह बापदादा का जो भी आज आये हैं उन सभी बच्चों को वरदान है। सिर्फ जो बाप के महावाक्य हैं उस श्रीमत पर चलते रहेंगे तो श्रीमत आपको श्रेष्ठ डिवीजन में ला सकती है, लायेगी। इतने सारे परिवार द्वारा आप सभी को, वरदान तो बाप का होता है, लेकिन शुभ भावना शुभ कामना है कि आप जितना आगे बढ़ने चाहो उतना बढ़ सकते हो। सभी आपको दिल से दुआयें देंगे। जहाँ भी क्लास में आते हो वहाँ आपको दुआयें मिलती रहेंगी और वह दुआयें आपको तीव्र पुरुषार्थी बनाके आगे बढ़ायेंगी, यह निश्चय रखो। अच्छा। अभी बापदादा सभी से बहुत बढ़िया सुन्दर गुडनाइट कर रहे हैं। अच्छा।

वरदान:-
हर संकल्प और कर्म में सिद्धि अर्थात् सफलता प्राप्त करने वाले सम्पूर्ण मूर्त भव

संकल्पों की सिद्धि तब प्राप्त होगी जब समर्थ संकल्पों की रचना करेंगे। जो अधिक संकल्पों की रचना करते हैं वह उनकी पालना नहीं कर पाते इसलिए जितनी रचना ज्यादा उतनी शक्तिहीन होती है। तो पहले व्यर्थ रचना बन्द करो तब सफलता प्राप्त होगी और कर्मों में सफलता प्राप्त करने की युक्ति है - कर्म करने से पहले आदि-मध्य और अन्त को जानकर फिर कर्म करो। इससे ही सम्पूर्ण मूर्त बन जायेंगे।

स्लोगन:-
समय पर दु:ख और धोखे से बचकर सफल होने वाला ही ज्ञानी (समझदार) है।

ये अव्यक्त इशारे: अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

आप होलीहंस बच्चों का आहार भी शुद्ध, व्यवहार भी शुद्ध, अशुद्धि का नाम निशान भी न हो क्योंकि शुद्ध दुनिया में जा रहे हो जहाँ अपवित्रता वा अशुद्धि का नामनिशान नहीं है। जब ऐसे होलीहंस बनते हो तब भविष्य में हिज़ होलीनेस कहलाते हो।

विशेष सूचना - मास के तीसरे रविवार का योग अभ्यास

आज मास का तीसरा रविवार है, सभी भाई बहिनें संगठित रूप में एकत्रित होकर सायं 6.30 से 7.30 बजे तक अपने परम पवित्र स्वरूप में स्थित हो, पवित्रता की दिव्य किरणें फैलाते हुए सर्व आत्माओं को “पवित्र बनो-योगी बनो'' की शुभ प्रेरणायें सकाश रूप में देना की सेवा करें।

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