16/08/2026
17-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - बाप और दादा की भी वन्डरफुल कहानी है, बाप जब दादा में प्रवेश करे तब तुम ब्रह्माकुमार-कुमारी वर्से के अधिकारी बनो''
प्रश्नः-
निश्चित ड्रामा को जानते हुए भी तुम बच्चों को कौन सा लक्ष्य अवश्य रखना है?
उत्तर:-
पुरुषार्थ कर गैलप करने का अर्थात् विनाश के पहले बाप की याद में रह कर्मातीत बनने का लक्ष्य अवश्य रखना है। कर्मातीत अर्थात् आइरन एजेड से गोल्डन एजेड बनना। पुरुषार्थ का यही थोड़ा सा समय है इसलिए विनाश के पहले अपनी अवस्था को अचल-अडोल बनाना है।
ओम् शान्ति।
ओम् शान्ति। यह दोनों कौन कहते हैं? एक था बाबा, एक था दादा। कहानी सुनाते हैं ना - एक था राजा, एक थी रानी। अब यह फिर हैं नई बातें। एक बाबा एक दादा तुम कहेंगे 5 हजार वर्ष पहले भी एक था शिवबाबा, दूसरा था ब्रह्मा दादा। अब शिव के बच्चे तो सब हैं। सभी आत्मायें एक बाप की सन्तान हैं। वह तो है ही है। ब्रह्मा के बच्चे ब्राह्मण भी थे, प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान ब्रह्माकुमार-कुमारियां थे। उन्हों को कौन पढ़ाते थे? शिवबाबा। प्रजापिता ब्रह्मा के यह ब्रह्माकुमार-कुमारियां ढेर बच्चे हैं ना। ब्रह्माकुमार-कुमारियां मानते हैं बरोबर हम शिवबाबा के बच्चे भी हैं, पोत्रे भी हैं। बच्चे तो हैं ही अब पोत्रे बने हैं। ब्रह्मा द्वारा दादे से वर्सा लेने। अभी तुमको दादे से वर्सा मिलता है, जिसको शिवबाबा कहते हैं। परन्तु ब्रह्माकुमार-कुमारियां होने कारण उनको हम दादा कहते हैं। वर्सा दादे का है। ब्रह्मा दादा का नहीं। वैकुण्ठ वासी बनने का वर्सा उस बाप से मिलता है। आधाकल्प वर्सा पाते हो फिर तुमको श्राप मिलता है - रावण से। नीचे उतरते आते हो। जैसेकि ग्रहचारी बैठती है, नीचे उतरने की। अभी तुम बच्चे समझते हो - हमारी ग्रहचारी राहू की दशा पूरी हुई। राहू की दशा है सबसे बुरी। ऊंच ते ऊंच बृहस्पति की दशा फिर राहू की दशा बैठी तो 5 विकारों के कारण हम काले हो गये। अब फिर बाप कहते हैं दे दान तो छूटे ग्रहण। है तुम्हारी बात। उन्होंने फिर सूर्य चन्द्रमा का ग्रहण समझ लिया है। जब ग्रहण लगता है तो दान मांगते हैं। यहाँ बाप तुमको कहते हैं 5 विकारों का दान दो तो ग्रहचारी उतर जायेगी। इन विकारों से ही तुम पापात्मा बने हो। मुख्य है देह-अभिमान। पहले ऐसे सतोप्रधान थे, फिर सतो रजो तमो बने हैं। 84 जन्म लिए हैं। यह तो पक्का निश्चय है बरोबर देवतायें ही 84 जन्म लेते हैं। पहले उन्हों को ही मिलना चाहिए बाप से। गाया भी जाता है आत्मायें परमात्मा अलग रहे...
बाप कहते हैं - पहले-पहले तुमको सतयुग में भेजा था। फिर अभी तुम ही आकर मिले हो। आगे तो सिर्फ गाते थे उनका यथार्थ अर्थ अभी बाप बैठ समझाते हैं। सभी वेद शास्त्र, जप, तप, स्लोगन आदि जो भी हैं सबका सार बाप बैठ समझाते हैं। चक्र तो बिल्कुल सहज है। अभी कलियुग और सतयुग का संगम है। लडाई भी सामने खड़ी है। यह भी तुमको निश्चय है - सतयुग की स्थापना होती है। कलियुग में जितने भी हैं, उन सबके शरीर खलास हो जायेंगे, बाकी आत्मायें पवित्र बन हिसाब-किताब चुक्तू कर जायेंगी। यह सबके कयामत का समय है। आत्मायें शरीर छोड़ चली जायेंगी। यह तुम्हारी बुद्धि में अभी है। जब तक हम कर्मातीत अवस्था को पायें तब तक संगम पर खड़े हैं। एक तरफ हैं करोड़ों मनुष्य, दूसरे तरफ हो सिर्फ तुम थोड़े से। तुम्हारे में भी कितने हैं जो निश्चयबुद्धि होते जाते हैं। निश्चयबुद्धि विजयन्ती फिर जाकर विष्णु के गले की माला बनेंगे। एक है रूद्राक्ष की माला, दूसरी है रूण्ड माला। उस रूण्ड माला में छोटी-छोटी शक्ल होती है। यह निशानी है। हम आत्मायें ही आकर फिर बाप के गले की माला के दाने बनेंगे फिर यहाँ आयेंगे नम्बरवार। माला 8 की भी है, 108 की भी है, 16108 की भी है। अब 16 हजार हैं या 5-10 हजार हैं, उनका कोई हिसाब नहीं निकाला जाता। यह मालायें गाई जाती हैं। बाबा कहते हैं यह सब तुम क्यों विचार करते हो। जितने भी राजायें कल्प पहले सतयुग त्रेता में बने थे, उतने ही बनेंगे। 100 बनें या 2-3 सौ बनें - यह पूछना नहीं है।
बाप कहते हैं - तुम जितना नजदीक आते जायेंगे तो यह सब समझ जायेंगे। आज हम यहाँ हैं कल विनाश होगा फिर सतयुग में थोड़े से देवी-देवता होंगे। बाद में वृद्धि को पाते हैं। सतयुग के आसार भी दिखाई पड़ते हैं। बाकी लाखों जाकर रहेंगे फिर लाख रहें वा 9-10 लाख रहें, एक्यूरेट नहीं कह सकते। हाँ तुम जब एक्यूरेट सम्पूर्ण बनने के लायक बनेंगे तब तुमको और जास्ती साक्षात्कार हो जायेगा। अभी तो बहुत कुछ समझने का समय पड़ा है। बहुत साक्षात्कार करते रहेंगे। लड़ाई की तैयारियां भी बहुत होती रहती हैं। सब चीजें महंगी होती जायेंगी। विलायत में भी अब खूब टैक्स आदि लगते रहेंगे। बहुत-बहुत महंगाई होकर फिर एकदम सस्ताई हो जायेगी। सतयुग में कोई चीज़ पर खर्चा नहीं होगा। सब खानियां आदि भरपूर हो जायेंगी। नई दुनिया में वैभव बहुत होते हैं। लक्ष्मी-नारायण के पास बहुत वैभव थे ना। श्रीनाथ द्वारे में मूर्तियों के आगे भी कितने वैभवों का भोग लगाते हैं। वहाँ बहुत माल बनाते हैं और खाते रहते हैं। कहेंगे हम देवताओं को भोग चढ़ाते हैं। कहेंगे देवताओं को भोग नहीं लगायेंगे तो वह नाराज हो जायेंगे। अब इसमें नाराज होने की तो बात ही नही। तुम कोई पर नाराज नहीं होते हो। जानते हो ड्रामानुसार यह विनाश होना ही है। कलियुग से बदल कर सतयुग होगा। हम ड्रामा को समझते हैं कि ड्रामानुसार अभी नया चक्र शुरू होना है। तुम भी ड्रामा के वश हो। ड्रामानुसार बाप भी आया हुआ है। ड्रामा में एक मिनट भी नीचे ऊपर नहीं हो सकता है। जैसे बाबा आया तुमने देखा कल्प बाद भी हूबहू ऐसे होगा। शास्त्रों में तो कल्प की आयु लम्बी लिख दी है। अभी तुम बच्चों की बुद्धि में है बरोबर विनाश सामने खड़ा है। अभी तुम गैलप कर रहे हो। जानते हो बाप को याद कर हमको कर्मातीत अवस्था को जरूर पाना है अर्थात् आइरन एज से गोल्डन एज बनना है। अभी अगर पुरुषार्थ नहीं करेंगे तो पद भ्रष्ट हो जायेगा। हे आत्मायें अभी तुम पतित बन गई हो। यह भी जानते हो बहुत किसम के आयेंगे जो और धर्म में बदली हो गये हैं वह निकलकर आते रहेंगे। आकर अपना पुरुषार्थ करते रहेंगे - बाप से वर्सा पाने। ब्राह्मण धर्म में आकर फिर देवता धर्म में आयेंगे। ब्राह्मण धर्म में नहीं आयेंगे तो देवता धर्म में कैसे आयेंगे। ब्राह्मण दिन-प्रतिदिन वृद्धि को पाते रहेंगे। देखेंगे विनाश सामने आ गया है, यह तो ठीक कहते हैं फिर वृद्धि होती जायेगी। ब्राह्मणों का झाड़ वृद्धि को पाकर फुल हो जायेगा फिर वापस जायेंगे। देवताओं का झाड़ बढ़ेगा।
अभी तुम संगम पर राजयोग सीख रहे हो। इस संगम को कल्याणकारी युग कहा जाता है। संगम का ही गायन है - गंगा सागर का मेला दिखाते हैं। वह सब है भक्ति मार्ग का। यह है ज्ञान सागर और ज्ञान सागर से निकली हुई ज्ञान गंगायें। ज्ञान सागर से पतित-पावन अक्षर लगता है। वह समझते हैं - पतित पावनी गंगा है और फिर गंगा में स्नान करते ही आते हैं। यह नदियां तो सतयुग से लेकर चलती आती हैं, आजकल तो नदियां भी कहाँ-कहाँ डुबो देती हैं। प्रकृति भी तमोप्रधान, सागर भी तमोप्रधान हो पड़ा है। सागर थोड़ी सी उछल खायेगा तो सब कुछ खलास कर देंगे। सतयुग में सिर्फ हम थोड़े ही भारत में रहते हैं - यमुना के कण्ठे पर। देहली परिस्थान थी फिर बननी है। सतयुग में थोड़ी ही जीव आत्मायें रहती हैं फिर धीरे-धीरे आते जाते हैं। अभी है कलियुग का अन्त। कितने ढेर मनुष्य हो गये हैं, बेहद का नाटक है, जिसको अच्छी रीति समझना है। भल कोई अपने को एक्टर समझते भी हैं परन्तु कल्प 5 हजार वर्ष का है, यह किसको भी पता नहीं है। कहाँ 84 जन्म, कहाँ 84 लाख। अभी तुम रोशनी में हो। तुमको बाप से वर्सा मिलता है। बाप कहते हैं - मनमनाभव। बाप को याद करना है। शिव भगवानुवाच, भगवान की महिमा में और देवताओं की महिमा में बहुत फ़र्क है। बाप जो नई रचना रचते हैं, उनकी महिमा हैं सर्वगुण सम्पन्न... अभी तुम ऐसे बन रहे हो। बाप की महिमा और इनकी महिमा में रात-दिन का फ़र्क है। यह राजयोग है ना। गाया भी जाता है - भगवान राजयोग सिखलाते हैं। वह है निराकार, तो जरूर निराकार से साकार में आना पड़े। भगवान की इतनी महिमा है तो जरूर आना पड़े। उनका जन्म दिव्य अलौकिक है और किसका दिव्य जन्म नहीं गाया जाता। यह भी बच्चों को समझाया है एक होता है लौकिक बाप, दूसरा है पारलौकिक बाप, जिसको ही भगवान कह याद करते हैं और तीसरा है अलौकिक बाप, यह फिर वन्डरफुल बाप है। जब पारलौकिक बाप बच्चों को एडाप्ट करते हैं तो बीच में यह अलौकिक आ जाता है। प्रजापिता ब्रह्मा के कितने ढेर बच्चे हैं। शिवबाबा आकर ब्रह्मा द्वारा तुमको अपना बनाते हैं। कितने ब्रह्माकुमार-कुमारियां बनते हैं। लौकिक बाप को तो करके 8-10 बच्चे होंगे। अच्छा शिवबाबा भी है पारलौकिक बाप। उनके तो अनेक बच्चे हैं। सभी आत्मायें कहती हैं - हम सब ब्रदर्स हैं। अब इस संगम पर फिर अलौकिक बाप मिलता है। यह ज्ञान तुमको वहाँ नहीं रहेगा। प्रजापिता ब्रह्मा बाप मिलता ही तब है जबकि बाप आकर नई सृष्टि रचते हैं। तो यह अलौकिक जन्म हुआ ना, इनको कोई समझ नहीं सकते। वह लौकिक वह पारलौकिक और यह है संगमयुगी अलौकिक बाप। लौकिक बाप तो सतयुग से लेकर होते आये हैं। पारलौकिक बाप को वहाँ कोई याद नहीं करते, वहाँ होता ही है एक बाप। हे भगवान, हे परमात्मा कहकर याद नहीं करते हैं फिर द्वापर में जब भक्ति मार्ग शुरू होता है तो बाप दो होते हैं। संगम पर हैं 3 बाप। प्रजापिता ब्रह्मा भी अभी मिलता है, अभी तुम उनके बने हो। जानते हो यह अलौकिक बाप है। अभी तुम इन बातों को अच्छी रीति जानते हो और याद करते हो। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। सतयुग में याद करने की दरकार ही नहीं। दु:ख में पारलौकिक बाप का सब सिमरण करते हैं। यह तो बिल्कुल सहज बात है। सतयुग त्रेता में एक बाप होता है, द्वापर में दो बाप होते हैं। इस समय तुम अलौकिक बाप के बच्चे बने हो जिस द्वारा तुम वर्सा लेते हो। तुम बच्चे ही ब्राह्मण बनते हो जो फिर देवता बनेंगे। विनाश भी तुम्हारे को ही देखना है, जो तुम इन आंखों से देखेंगे, बॉम्बस छोड़ेंगे। मनुष्य तो मरेंगे ना। जापान में भी बॉम्ब छोड़ा, देखा ना कैसे मनुष्य मरे। अब यहाँ लड़ाइयां लगती रहती हैं। खुद भी कहते हैं हम तंग होते जाते हैं। 10-10 वर्ष तक भी लड़ाई चलती रहती है। बॉम्ब्स में तो चपटी में (सेकेण्ड में) सब खलास हो जायेगा। चिन्गारी लगती है तो शहर नष्ट हो जाते हैं। यह तो बॉम्ब्स हैं। आग भी लगनी है।
तुम बच्चे जानते हो बाप आये ही हैं स्थापना और विनाश कराने। तो जरूर यह सब होगा। पुरुषार्थ करने का अभी समय है। माया घड़ी-घड़ी तुम्हारा बुद्धियोग तोड़ देती है। अजुन तुम अडोल स्थिर कहाँ बने हो। कहते हैं बाबा माया के तूफान बहुत आते हैं। कोई तो सारे दिन में घण्टा आधा भी याद नहीं करते हैं। बाप कहते हैं - तुम कर्मयोगी हो। 8 घण्टा तो यह सेवा करेंगे। 8 घण्टा याद कर सको इतना पुरुषार्थ करना है। याद करते रहने से विकर्म विनाश होते जायेंगे, इसको ही योग अग्नि कहा जाता है। यह है मेहनत। गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए सिर्फ याद करना है। यह भी बाबा बतलाते हैं कि जिन्होंने गृहस्थ छोड़ा है, बच्चे बने हैं, वह भी इतना याद नहीं करते हैं। घर में रहने वाले और ही जास्ती याद करते हैं। अर्जुन और भील का भी मिसाल देते हैं ना। मेहनत है बाप को याद करना और चक्र को समझना है। महाभारत लड़ाई भी जरूर लगेगी। सतयुग में थोड़ेही लगेगी। तो तुम बच्चों को अन्धों की लाठी भी बनना है। सबको रास्ता बताना है कि बाप को याद करो, चक्र को याद करो। स्वदर्शन चक्रधारी बनो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कम से कम 8 घण्टा याद में रहने का पुरुषार्थ करना है। अपनी अवस्था अचल-अडोल रखने के लिए याद का अभ्यास बढ़ाना है। गफलत नहीं करनी है।
2) यह ड्रामा बिल्कुल एक्यूरेट बना हुआ है इसलिए किसी पर भी नाराज़ नहीं होना है। निश्चयबुद्धि बनना है।
वरदान:-
तोड़ना, मोड़ना और जोड़ना - इन तीन शब्दों की स्मृति द्वारा सदा विजयी भव
सारी पढ़ाई और शिक्षाओं का सार यह तीन शब्द हैं:- 1-कर्मबन्धन तोड़ने हैं। 2-अपने संस्कार-स्वभाव को मोड़ना है और 3- एक बाप से सर्व सम्बन्ध जोड़ने हैं - यही तीन शब्द सम्पूर्ण विजयी बना देंगे। इसके लिए सदा यही स्मृति रहे कि जो भी इन नयनों से विनाशी चीज़े देखते हैं वह सब विनाश हुई पड़ी हैं। उन्हें देखते भी अपने नये सम्बन्ध, नई सृष्टि को देखते रहो तो कभी हार हो नहीं सकती।
स्लोगन:-
योगी की निशानी है - सदा क्लीन और क्लीयर।
ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
अगर ब्राह्मण जीवन में संकल्प में भी अपवित्रता वा अमर्यादा आ जाती है तो तख्तनशीन की बजाए गिरती कला में अर्थात् नीचे आ जाते हो। कोई विकर्म नहीं हुआ लेकिन व्यर्थ कर्म भी हुआ तो पश्चाताप के बजाए महसूसता की स्टेज होती है। महसूस होता है कि यह राँग है, नहीं होना चाहिए.. वह बात काँटे के समान चुभती रहेगी, इसलिए इस व्यर्थ से भी मुक्त बनो।
16-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 16.03.2011 "बापदादा" मधुबन
“मन्सा द्वारा प्रकृति को सतोगुणी बनाने की सेवा करो, शुभ भावना, शुभकामना रख संस्कार मिलन की रास करो''
आज होलीएस्ट बाप अपने बच्चों से होली मनाने आये हैं। आप सभी भी होली मनाने आये हैं। चारों ओर के दूर बैठे हुए बच्चे भी दूर बैठे भी होली मनाने बैठे हैं। आप सभी कौन से रंग की होली मनाने आये हैं! जानते हैं सबसे श्रेष्ठ रंग है परमात्म संग का रंग। यह रंग सदा श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनाने वाला है। जैसे बाप ऊंचे ते ऊंचा है ऐसे यह परमात्म संग ऊंचे ते ऊंचा बनाने वाला है। हर एक बच्चे के मस्तक में चमकता हुआ भाग्य का सितारा देख रहे हैं। यह भाग्य का सितारा सारे कल्प में आप भाग्यशाली बच्चों के सिवाए और कोई प्राप्त नहीं कर सकता। वह श्रेष्ठ भाग्य है कि आप बच्चे ही डबल पवित्र अर्थात् होली बनते हो। वैसे धर्मात्मायें भी हैं लेकिन वह शरीर से पवित्र नहीं बनते हैं। आप ब्राह्मण आत्माओं की भविष्य में आत्मा भी पवित्र बनती और शरीर भी पवित्र बनता है। इनकी निशानी डबल पवित्र तो डबल ताज प्राप्त होता है। सारे कल्प में आप संगमयुग पर बाप के संग के रंग से डबल पवित्र डबल ताजधारी बनते हो। संगमयुग का परमात्म संग डबल पवित्र बना देता है। तो आप होली बाप के साथ रहने से, बाप को कम्बाइण्ड बनाने से डबल पवित्र बन जाते हो। सदा दिल में बाप का संग रहता है, यह संग कितना श्रेष्ठ है जो इतना श्रेष्ठ बना देता है। लोग तो स्थूल रंग से होली मनाते हैं लेकिन आप बाप के संग के रंग से होली बन जाते हो। वह भी डबल होली। तो आपकी होली दुनिया से न्यारी परमात्मा की प्यारी है। तो नशा रहता है ना कि हमारी होली प्रभु संग के रंग के कारण आधाकल्प ऐसा पवित्र बनाती है जो अब तक भी आपके चित्र कायदे प्रमाण पूजे जाते हैं और कोई के भी चित्र ऐसे प्रेम पूर्वक पूजे नहीं जाते हैं। आप स्वयं अपने चित्रों को देख रहे हो। और भी पूजे जाते हैं लेकिन इतना समय और ऐसे विधिपूर्वक पूजा नहीं होती। आप सदा उमंग और उत्साह में रहते हो। रहते हो ना! उमंग-उत्साह में रहते हो? हाथ उठाओ। रहते हो, कभी कभी या सदा? जो कहते हैं हम सदा उमंग-उत्साह में रहते भी हैं और दूसरे को भी उमंग-उत्साह दिलाते हैं, वह हाथ उठाओ। कभी कभी नहीं, सदा। सदा शब्द को अण्डरलाइन करते हो ना! लेकिन आपका यादगार, जो भी आपकी स्थिति रही है उसका यादगार आपके भक्त उत्सव के रूप में मनाते हैं। आपने प्रभू के संग का रंग लगाया तो वह भी रंग लगाते हैं लेकिन बॉडीकान्सेस हैं ना तो स्थूल रंग लगा देते हैं। जिस रंग में खर्चा भी बहुत और फिर रिजल्ट भी कुछ अच्छी कुछ नहीं अच्छी, ऐसे मनाते हैं। लेकिन आपके उत्साह का यादगार उत्सव जरूर मनाया है। आप परमात्मा का बनने के लिए पहले अपने पुराने संस्कारों को जलाते हो और फिर प्रभु के संग का रंग लगने से सदा मनाते रहते हो। वह भी पहले जलाते हैं फिर मनाते हैं लेकिन आपका मनाना और उन्हों के मनाने में रात दिन का अन्तर है। वह बॉडीकान्सेस आप आत्म अभिमानी। वह देह भान में आप आत्मिक भान में।
आपको बापदादा का डायरेक्शन है होली अर्थात् बीती सो बीती। यह भी कहते हैं हो ली लेकिन अर्थ को प्रैक्टिकल में नहीं ला सकते। आप सब हो ली अर्थात् बीती सो बीती करते हो। करते हो ना! कि कभी कभी करते हो? क्योंकि बीती को याद करने से व्यर्थ संकल्प बहुत चलते हैं। समय भी व्यर्थ जाता है। जो बहुत समय के संस्कार हैं वह न चाहते भी जब चलते हैं तो इस संगमयुग का एक-एक मिनट जो एक जन्म में 21 जन्म की प्रालब्ध बनाता है, वह एक-एक संकल्प एक-एक मिनट कितना वैल्यूएबल है। एक सेकण्ड नहीं गया लेकिन अनेक जन्म की प्रालब्ध में फर्क पड़ जाता है। बापदादा ने पहले भी कहा है कि संगम समय का समय और संकल्प कभी भी व्यर्थ नहीं गंवाना है। अगर सदा प्रभु रंग में रंगे हुए हो अर्थात् बाप को सदा का साथी बनाके रहते हो तो संगमयुग के एक-एक संकल्प और समय माना एक-एक मिनट को सफल कर सकते हो। तो चेक करो अपने को कि एक-एक मिनट, एक-एक संकल्प सफल होता है? या व्यर्थ भी जाता है? क्योंकि एक मिनट नहीं 21 जन्म का कनेक्शन हर मिनट और हर संकल्प का है। इतनी वैल्यू है। तो अपनी दिल में सोचो कि इतनी वैल्यू सदा रहती है! इस संगम के समय के लिए कहा हुआ है - “अब नहीं तो कब नहीं।'' इतनी वैल्यू सदा स्मृति में रहे। तो आप सभी ने आज होली मनाई अर्थात् सदा बाप के संग का रंग लगाया। तो सारा दिन चेक किया कि बाप का रंग लगा हुआ रहा? परमात्म संग में रहे या और भी कहाँ समय वा संकल्प गया? चेक किया? कांध हिलाओ, हाथ नहीं, ऐसे करो।
बापदादा सदा ही इशारा देते हैं कि अपने मन के शुभ सतोगुणी संकल्प द्वारा प्रकृति को भी सतोगुणी बनाते रहो। तो वह मन्सा सेवा याद रहती है? क्योंकि अभी प्रकृति बड़े रूप में अपना कार्य करने वाली है। यह तो छोटी सी बात है लेकिन प्रकृति को मनुष्यात्मायें तंग करती हैं तो वह भी तंग करना शुरू करती है इसलिए बाप कहते हैं जैसे मायाजीत बनने का अटेन्शन रखते हो। रखते हो ना! माया से वायदा है आपका काम है आना और हमारा काम है विजय प्राप्त करना। किया है ना वायदा सभी ने? किया है? मायाजीत बनना है ना! ऐसे ही प्रकृति जीत भी बनना है क्योंकि आपको राज्य करना है ना। आपका राज्य आ रहा है ना! नशा है ना! लोग तो बिचारे सोचते हैं क्या होगा, डरते हैं। लेकिन आप को पता है तो अभी संगमयुग अमृतवेला चल रहा है। तो अमृतवेले के बाद क्या आता है? सवेरा। उस सवेरे में ही हमारा राज्य आना है। है ना नशा! हमारा राज्य है या केवल महारथियों के लिए राज्य है? आप सबका राज्य है। आपको चिंता नहीं क्या होगा! अच्छे ते अच्छा होगा। तो आपके राज्य में प्रकृति भी सतोप्रधान होनी है। तो प्रकृति को तमोगुणी से सतोगुणी कौन बनायेगा? कि प्रकृति जैसी भी हो चलेगी? आपके राज्य में चलेगा? चलेगा? हाँ करो या ना करो। नहीं चलेगी? तो प्रकृति को सतोगुणी कौन बनायेगा? आप ही बनायेंगे ना! इसलिए अभी अचानक का पहला दृश्य, छोटा है यह, शुरू हुआ है। अभी तो बड़े-बड़े आने हैं और अचानक ही आने हैं। जो सोच में नहीं होगा वही होना है।
बापदादा ने तो बहुत समय से अचानक का पाठ पढ़ाया है। लेकिन अभी प्रत्यक्ष रूप में देख करके अभी अपना काम शुरू करो। घबराओ नहीं। कहानी सुनाते हैं ना - चारों ओर आग लगी लेकिन परमात्मा के बच्चे सेफ रहे। तो अभी भी बच्चे तो सेफ हैं ना! पेपर तो आने ही हैं लेकिन आपका डबल काम है। एक तो निर्भय होके सामना करो, दूसरा अपने भक्त और अपने दु:खी भाई-बहिनों की सेवा भी कौन करेगा? आप प्रभु के संग में रंग लगे हुए हो, तो जो परमात्मा के संग के रंग में प्राप्त किया है वह अपने भाई बहिनों को, भक्तों को खूब प्यार से दिल से बांटो। दु:ख के समय कौन याद आता है? फिर भी परमात्मा चाहे समझें चाहे नहीं समझें, लेकिन मजबूरी से भी हे बाप, हे परमात्मा कहेंगे जरूर। तो आप परमात्म बच्चों को अभी दु:खियों का सहारा बनना है। उन्हों को शुभ भावना शुभ कामना द्वारा, बाप द्वारा प्राप्त हुई किरणों द्वारा सहारा बनो। फिर भी आपका परिवार है ना! तो परिवार में एक दो को सहयोग देते हैं ना! तो नाम ही है सह योग, श्रेष्ठ योग। वही साधन है सहारा देने का। सन्देश भी भेजा था कि समय फिक्स करो। ऐसे नहीं हो जायेगा, जैसे ट्राफिक कन्ट्रोल, अमृतवेला निश्चित है तो करते हो ना। ऐसे अपने कार्य प्रमाण यह मन्सा सेवा भी अभी के समय प्रमाण अति आवश्यक है। तो समय निकालो, रहमदिल बनो। कल्याणकारी बनो। आपका स्वमान क्या है? विश्व कल्याणकारी। तो रहम आता है? कि हो जायेगा? इसमें अलबेले नहीं बनना क्योंकि जिन्हों को आप सकाश देंगे वही आपके भक्त बनेंगे इसलिए क्या करना है? है अटेन्शन है? जो समझते हैं हमारा अटेन्शन है और बढ़ेगा वह हाथ उठाओ। नीचे-ऊपर कर रहे हैं। यहाँ देखने आ रहे हैं। (टी.वी. में) अगर इतने सभी ने अपने स्वमान को प्रैक्टिकल में लाया तो आत्मायें अभी भी संगम पर आपके दिल से गीत गायेंगे वाह परमात्म बच्चे वाह! हमें सहारा दिया। अभी का सहारा आधाकल्प आपके गीत गाते रहेंगे। आप उसके पूर्वज हो जायेंगे। पूर्वज हो। झाड़ में कहाँ बैठे हैं ब्राह्मण! नीचे बैठे हैं ना! तो पूर्वज हो ना! आवाज सुनने आता है भक्तों का? थोड़ा अपने को सावधान करो, दु:खियों का सहारा बनना ही है तो आवाज सुनने आयेगी।
तो सभी ने होली तो मनाई, आपकी तो सारा संगम ही होली है। परमात्मा के संग के रंग में ही रहते हो। यादगार मनाते हैं एक दो दिन लेकिन आप तो पूरा संगम प्रभु के संग में रहने वाले हो। नशा है ना! लोग बिचारे मांगते रहते हैं हे प्रभु यह कर दो, वह कर दो लेकिन आपको 21 जन्म की गैरन्टी मिली है, कभी दु:ख का स्वप्न में भी कोई दृश्य नहीं आयेगा। संकल्प में भी दु:ख की लहर नहीं आयेगी। तो सदा हर एक को अगर राज्य लेना है तो अभी अपने परिवार सतयुग के साथी और रॉयल प्रजा, साधारण प्रजा सब अभी बना सकते हो। 21 जन्म की गैरन्टी है। थोड़ी सी सेवा करो, समय निकालो क्योंकि आपके पास संकल्प शक्ति तो है ही। सिर्फ जो बाप से मिला है वह अपने भाई-बहिनों को भी दो।
बापदादा ने पहले भी कहा था कि सदा यह चेक करो कि मुझे ब्राह्मण परिवार के बीच संस्कार मिलन की रास करना आता है? बापदादा ने कहा था वह रास कब करेंगे उसकी डेट भी फिक्स करो। फिक्स हो सकती है? हो सकती है? पहली लाइन बताओ। हाथ उठाओ। हो सकती है? पाण्डव भी उठाओ। पाण्डवों के बिना गति नहीं है। अच्छा। तो अभी लास्ट टर्न है, एक टर्न रहा हुआ है। उसमें हर एक अपने लिए क्या दृढ़ संकल्प है, वह फिक्स करके लिखना। कितना समय लगेगा, जो ब्राह्मण परिवार में कहाँ भी कभी भी संस्कार अपना कार्य नहीं करे। चाहे मेरा संस्कार, चाहे दूसरे का संस्कार भी, मेरे को प्रभाव नहीं डाले। यह डेट फिक्स हो सकती है? हो सकती है? हाथ उठाओ। अच्छा, सभी का फोटो निकाला! क्योंकि जैसे यह अचानक सीन देखी ना। (जापान में भुकम्प और सुनामी आई है जिसमें बहुत नुकसान हुआ है) ऐसे सब अचानक ही होना है इसलिए बापदादा तैयारी तो देखेंगे ना! जब दूसरों को शुभ भावना शुभ कामना देते हो, बापदादा ने देखा यह दूसरों की सेवा का प्रोग्राम भी बनाया था तो अगर हर आत्मा के प्रति सदा शुभ भावना और शुभ कामना रखो, नम्बरवार तो होना ही है। आपकी यादगार माला में सब एक नम्बर हैं क्या? नम्बरवार हैं लेकिन माला में तो पिरोये हैं ना! नम्बर क्यों मिला? भिन्न-भिन्न संस्कार हैं लेकिन हमको संस्कार देखने के बजाए शुभ भावना शुभ कामना रखनी है। आखिर भी ब्राह्मण परिवार है ना। कैसा भी है, परिवार तो मेरा है ना! जैसे मेरा बाबा कहते हो, वैसे मेरा परिवार भी है। तो अच्छा है मैजारिटी ने हाथ उठाया है। तो सभी का उमंग-उत्साह है तब तो हाथ उठाया है ना! तो एक दो के सहयोगी बन शुभ भावना शुभ कामना की दृष्टि वृत्ति स्मृति रखने से यह रास होना कोई बड़ी बात नहीं है। इस पर जो बहुत अच्छा नम्बर लेगा, डेट पर प्रैक्टिकल करके दिखायेगा उनको न्यारा और प्यारा इनाम मिलेगा। इनाम अभी नहीं बतायेंगे लेकिन बापदादा इनाम देंगे। क्यों? सेवा करने का टाइम निकालना है ना। तो यह संस्कार की खिटखिट समय अपने तरफ खींच लेती है इसलिए समय की अभी आवश्यकता है। ठीक है ना!
यह सभी मधुबन वाले हैं ना! (आगे बैठने वालों को देख बाबा बोले) पसन्द है ना! क्योंकि मधुबन वासी विशेष हैं। बापदादा का भी मधुबन निवासियों प्रति दिल का प्यार है। और मधुबन वालों का भी है। यह भी बाबा कहते, बाप से प्यार है और रहेगा। मिट नहीं सकता है। अमर है इसमें। तब तो मधुबन वासी बने हैं ना! कहाँ भी मधुबन वासी जाते हैं तो किस रिगार्ड से देखते हैं? मधुबन का है, मधुबन का है। इसलिए यह अटेन्शन रखना लास्ट टर्न के पहले सभी मधुबन में कोई स्थान मुकरर करना जहाँ अपनी चिटकी डालें। लेकिन लास्ट टर्न के पहले।
सभी ने होली मनाई? आपकी तो रोज़ होली है। अभी भी यह तो बाहर का थोड़ा मनाना होता है। कहाँ मनाने जायें, यहीं तो मनायेंगे। लेकिन वो हुई रीति रसम। तो सभी चारों ओर के बापदादा के अति स्नेही, अति प्यारे, लाडले, सिकीलधे, स्वमान-धारी, हर बच्चे को बापदादा पदमगुणा यादप्यार भी दे रहे हैं और दिल का दुलार भी दे रहे हैं। बापदादा देख रहे हैं चारों ओर सब सुनके देख के हर्षित हो रहे हैं।
अच्छा, आज पहली बारी कौन आये हैं? उठो। यह सभी पहली बारी आये हैं। अच्छा, पहले बारी मधुबन निवासी बनने का भाग्य प्राप्त हुआ है। सभी आपके भाई-बहिनें और बापदादा भी आप सभी को पहले बारी आने की मुबारक दे रहे हैं। अभी बापदादा देखेंगे क्योंकि चांस है कि थोड़ी देरी से आये हैं लेकिन जो चाहे वह अभी भी लास्ट सो फास्ट जाकरके फर्स्ट नम्बर लेकर फर्स्ट डिवीजन में आ सकते हो। यह बापदादा का जो भी आज आये हैं उन सभी बच्चों को वरदान है। सिर्फ जो बाप के महावाक्य हैं उस श्रीमत पर चलते रहेंगे तो श्रीमत आपको श्रेष्ठ डिवीजन में ला सकती है, लायेगी। इतने सारे परिवार द्वारा आप सभी को, वरदान तो बाप का होता है, लेकिन शुभ भावना शुभ कामना है कि आप जितना आगे बढ़ने चाहो उतना बढ़ सकते हो। सभी आपको दिल से दुआयें देंगे। जहाँ भी क्लास में आते हो वहाँ आपको दुआयें मिलती रहेंगी और वह दुआयें आपको तीव्र पुरुषार्थी बनाके आगे बढ़ायेंगी, यह निश्चय रखो। अच्छा। अभी बापदादा सभी से बहुत बढ़िया सुन्दर गुडनाइट कर रहे हैं। अच्छा।
वरदान:-
हर संकल्प और कर्म में सिद्धि अर्थात् सफलता प्राप्त करने वाले सम्पूर्ण मूर्त भव
संकल्पों की सिद्धि तब प्राप्त होगी जब समर्थ संकल्पों की रचना करेंगे। जो अधिक संकल्पों की रचना करते हैं वह उनकी पालना नहीं कर पाते इसलिए जितनी रचना ज्यादा उतनी शक्तिहीन होती है। तो पहले व्यर्थ रचना बन्द करो तब सफलता प्राप्त होगी और कर्मों में सफलता प्राप्त करने की युक्ति है - कर्म करने से पहले आदि-मध्य और अन्त को जानकर फिर कर्म करो। इससे ही सम्पूर्ण मूर्त बन जायेंगे।
स्लोगन:-
समय पर दु:ख और धोखे से बचकर सफल होने वाला ही ज्ञानी (समझदार) है।
ये अव्यक्त इशारे: अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
आप होलीहंस बच्चों का आहार भी शुद्ध, व्यवहार भी शुद्ध, अशुद्धि का नाम निशान भी न हो क्योंकि शुद्ध दुनिया में जा रहे हो जहाँ अपवित्रता वा अशुद्धि का नामनिशान नहीं है। जब ऐसे होलीहंस बनते हो तब भविष्य में हिज़ होलीनेस कहलाते हो।
विशेष सूचना - मास के तीसरे रविवार का योग अभ्यास
आज मास का तीसरा रविवार है, सभी भाई बहिनें संगठित रूप में एकत्रित होकर सायं 6.30 से 7.30 बजे तक अपने परम पवित्र स्वरूप में स्थित हो, पवित्रता की दिव्य किरणें फैलाते हुए सर्व आत्माओं को “पवित्र बनो-योगी बनो'' की शुभ प्रेरणायें सकाश रूप में देना की सेवा करें।