14/09/2023
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14/09/2023
20/08/2023
भारतीय स्वाधीनता संग्राम की वीरांगनाएं (5) अवध की रानी बेगम हजरत महल
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बेगम हजरत महल 1857 के विद्रोह की प्रमुख वीरांगना थी. उन्होंने अपनी बहादुरी का परचम लहराते हुए, ईस्ट इंडिया कंपनी के जवानों के छक्के छुड़ा दिए थे. महारानी लक्ष्मीबाई के साथ साथ बेगम हजरत महल का नाम भी लोग बड़े अदब के साथ लेते हैं. बेगम हजरत महल और उनके शौर्य की कहानी को जानने से पहले उनके शौहर अवध (लखनऊ) के नबाब वाजिद अली शाह के बारे में जानना जरूरी है.
नबाब वाजिद अली शाह के वालिद नबाब अमजद अली शाह थे. भारत के नबाबों की फेहरिस्त में नबाब वाजिद अली शाह का नाम ऐसे नबाब के रूप में जाना जाता है, जो साहित्य, कला, संगीत के प्रेमी होने के साथ शतरंज के खिलाड़ी एवं रूमानी शायर के रूप में विख्यात थे. उन्होंने कई शायरों और अदीबों को रियासत की ओर से वजीफा दिया था. उनमें प्रमुख थे - बराक, अहमद मिर्जा साबीर, मुफ्ती मुंशी, आमिद अहमद अमीर आदि. इसके साथ ही वे एक ऐसे ऐय्याश और रंगीन मिज़ाज इंसान थे जिनका जोड़ा पूरे हिन्दुस्तान में न था.
कहते हैं उनके हरम (परी खाना) में देश और विदेश की एक से बढ़कर एक खुबसूरत बेगमें थी. रूस इंग्लैंड, नेपाल के साथ साथ अफ्रीका की औरतें भी अवध के हरम की शोभा थी. इन बेगमों की संख्या लगभग पांच सौ के करीब थी. नबाब वाजिद अली पर एक बेहूदे किश्म का सनक सवार था. वे प्रत्येक दिन एक खुबसूरत औरत के साथ निकाह किया करते थे. निकाह करने के बाद जो औरत उनकी कसौटी पर खरी उतरती उसे वे परी का दर्जा देकर अपने हरम, (जिसका नाम परी खाना या परी महल था) की जीनत बढ़ाने के लिए भेज दिया करते थे. जो उन्हें नापसंद होती उसे अहले सुबह ही तलाक देकर आजाद कर दिया जाता था.
वे नृत्य, गीत और संगीत के ऐसे शौकीन थे कि उनके हरम (परी खाना) में ही प्रत्येक रात्रि को महफिल सजा करती. माना जाता है कि ठुमरी का इजाद नबाब वाजिद अली शाह ने ही किया था. उन्होंने अपने परी महल में लखनऊ की तवायफों को भी ऊंचा स्थान दिया था. उनके ठुमरी के राग पर जो तवायफ उच्च कोटि का नृत्य प्रस्तुत करती उन्हें तरक्की देकर बेगम का दर्जा दिया जाता था.
लखनऊ की विख्यात ठुमरी गायिका अमिरन बाई उनके परीखाना की सबसे हसीन परी थी. रोजा नाम की तवायफ भी बेहतरीन ठुमरी गायिका थी. हरम यानि परीखाना में कई और तवायफें थी जिनकी खुबसूरती बेमिसाल थी.उन्हीं तवायफों में से एक मुहम्मदी खानम भी थी. जिसने अपनी खुबसूरती और शोख अदाओं से नबाब वाजिद अली शाह का दिल जीतकर पहले महक परी बनी और बाद में नबाब की दूसरी बेगम के साथ साथ अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और तेजस्विता के बल पर अवध की मलिका बन गयी. नबाब वाजिद अली शाह ने उसकी तेजस्विता से खुश होकर उसे बेगम हजरत महल के खिताब से नवाजा.
अवध की रानी (मलिका) का तवायफ मुहम्मदी खानम से बेगम हजरत महल बनने तक का सफर जितना ही दिलचस्प है उतना ही दुश्वारियों भरा भी.
बेगम हजरत महल यानि तवायफ मुहम्मदी खानम का जन्म सन् 1820 में फैजाबाद में हुआ था. उसके माता पिता काफी निर्धन थे. उन लोगों ने उसे लखनऊ के तवायफों की मंडी के एक कोठे पर उसके बचपन में ही बेच दिया था. मुहम्मदी खानम काफी हसीन और शोख थी. किशोरावस्था में ही वह नृत्य, गीत और संगीत में पारंगत हो गयी. अल्प समय में ही मुहम्मदी खानम, लखनऊ की मंडी की सबसे हसीन, शोख और सर्वगुण सम्पन्न तवायफ के रूप में विख्यात हो गयी. एक दिन अवध रियासत का एक हाकिम जो नबाब वाजिद अली शाह का खास खिदमतगार और वफादार था मुहम्मदी खानम के कोठे पर आया और मुहम्मदी खानम की सुन्दरता पर कुर्बान हो गया. उसने मुहम्मदी खानम को कोठे की मालकिन से मुंह मांगी कीमत पर खरीद लिया और अपने हरम में ले आया. यहीं से मुहम्मदी खानम की तकदीर का सितारा चमक गया.
एकबार नबाब वाजिद अली शाह की नजर मुहम्मदी खानम पर पड़ गयी. नबाब साहब उसकी खुबसूरती पर मर मिटे और अपने उस खिदमतगार को हुक्म दिया कि वह मुहम्मदी खानम को एक रात के लिए उनके हरम में भेज दे. उनके वफादार खिदमतगार ने खुशी खुशी मुहम्मदी खानम को उनके हरम में भेज दिया. नबाब वाजिद अली शाह ने मुहम्मदी खानम से मुताह निकाह (सिर्फ कुछ समय के लिए किया जाने वाला निकाह.) किया. पहली रात में ही मुहम्मदी खानम ने अपनी मोहक अदाओं से नबाब साहब को अपना मुरीद बना लिया. नबाब साहब उसकी खुबसूरती और शोखियों पर लट्टू की तरह नाचने लगे. उन्होंने मुहम्मदी खानम को महक परी का दर्जा देकर परी खाना में भेज दिया. अब आलम यह हो गया कि नबाब साहब के दिलोदिमाग में महक परी मुहम्मदी खानम छा गयी और रातदिन वे उसके ही ख्यालों में खोए रहने लगे.
मुहम्मदी खानम के साथ किए गये मुताह निकाह को तोड़ कर उन्होंने हदीस में दिए गये नियमों के मुताबिक दुवारा निकाह किया और अपनी दूसरी बेगम का दर्जा दिया. अपनी इस दूसरी बेगम से खुश होकर उन्होंने उसके लिए एक अलग महल का निर्माण करवाया जिसका नाम हजरत महल रखा गया. (अभी लखनऊ का संगीत विश्व विद्यालय जिस महल में स्थापित है, वह उन दिनों हजरत महल के नाम से जाना जाता था.) जब नबाब वाजिद अली शाह की दूसरी बीबी मुहम्मदी खानम पूरे लाव-लश्कर के साथ इस हजरत महल में रहने के लिए आयी, तब से उसका नाम बेगम हजरत महल हो गया. बेगम हजरत महल के गर्भ से नबाब साहब को एक औलाद हुआ जिसका नाम नबाब जादा बिरजिस कद्र रखा गया.
हड़प नीति के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी की नजर कबसे अवध रियासत पर टिकी हुई थी. मगर सबों को उम्मीद थी कि नबाब साहब की पहली बीबी की कोख से अवध का वारिस पैदा होगा. लेकिन पहली बीबी के बदले दूसरी बीबी हजरत महल की कोख से नबाब साहब को औलाद का मुंह देखना नसीब हुआ. ईस्ट इंडिया कंपनी और अवध के रियासत का कानूनी पेंच यहीं आकर फंस गया. लखनऊ रेजिडेंसी के अफसरों ने नबाब वाजिद अली शाह की दूसरी बीबी के औलाद को अवध का वारिस मानने से इंकार कर दिया. नबाब वाजिद अली शाह के समक्ष भारी मुसीबत आकर खड़ी हो गयी. उन्होंने कुछ रियासतों के जानकारों से राय मशवरा किया. सबों ने मशवरा दिया कि बेगम हजरत महल को पहली बेगम का दर्जा दे दिया जाए.
नबाब साहब ने वह भी कर दिया, मगर कंपनी ने उनके इस कारनामे को भी ठुकरा दिया. और संधि के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लम्बे समय से संरक्षित अवध के रियासत को 7 फरवरी 1856 में नबाब वाजिद अली शाह के जन्म दिन के जश्न मनाये जाने के दो दिन पूर्व डिक्लेरेशन के जरिये अपने साम्राज्य में मिला लिया गया. कहते हैं कि नबाब वाजिद अली शाह इतने बड़े रईस और आला मिज़ाज थे कि अपनी शान के सामने उन्हें अपने जान की भी परवाह न थी. जिस समय अंग्रेज सैनिकों ने उनके राज महल पर हमला किया उस समय वे अपने एक खास दोस्त के साथ शतरंज खेलने में मशगूल थे. अंग्रेजी सेना ने महल में घुसकर मारकाट शुरू कर दिया. उनके सैनिकों ने काफी दिलेरी से गोरे सिपाहियों का मुकाबला किया मगर उनकी ताकत के सामने टिक नहीं पाए और महल छोड़ कर भाग खड़े हुए. उनके साथ शतरंज खेल रहे उनके दोस्त भी भाग गये, मगर काहिल नबाब वाजिद अली शाह इसलिए पकड़ लिए गये कि उनको जूता पहनाने वाला कोई खिदमतगार वहाँ नहीं था.
नबाब वाजिद अली शाह को गिरफ्तार करके कलकत्ता (कोलकाता) के मटिया बुर्ज कारागार में डाल दिया गया. जिस समय नबाब साहब को बंदी बनाया जा रहा था उस समय बेगम हजरत महल केसरबाग के अपने महल में थी. उनके महल की सुरक्षा के लिए अवध रियासत के पांच सौ सैनिक तैनात थे. जब बेगम को अपने शौहर की गिरफ्तारी की खबर मिली तब उनका खून खौल उठा और उसी समय उन्होंने तलवार उठाकर कसम खाई कि वे अंग्रेजी हुकूमत से नबाब साहब के साथ हुए जुल्मो सितम का बदला लेकर रहेंगी. अंग्रेजी हुकूमत (ईस्ट इंडिया कंपनी) द्वारा उनके गुजारा के लिए एक निश्चित रकम तय कर दी गयी मगर बेगम को इस्ट इंडिया कंपनी की यह भीख मंजूर नहीं थी. उनके दिल में बगावत के शोले भड़कने लगे. गुप्त रूप से उन्होंने लखनऊ के बड़े बड़े सेठों तथा तवायफों से आर्थिक मदद की गुहार लगाई. जो देशप्रेमी सेठ थे उन्होंने उदारता पूर्वक उन्हें सहयोग प्रदान किया.
उन दिनों लखनऊ की सबसे दौलतमंद तवायफ थी हैदरी बाई. इसके कोठे पर ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों से लेकर बागी रजवाड़ों के राजकुमार और स्वाधीनता के दीवाने भी आया करते थे. हैदरी बाई ने बेगम हजरत महल को न सिर्फ आर्थिक सहायता दी बल्कि वतनपरस्ती का मिसाल कायम करती हुई अंग्रेजों के खिलाफ मुखबरी करने की जिम्मेदारी भी संभाल ली. बाद में हैदरी बाई बेगम हजरत महल की महिला सेना में शामिल होकर अंग्रेजों को पानी पिला दिया. सूझबूझ से काम लेते हुए बेगम हजरत महल ने अपने सैन्य शिविरों का गठन गुप्त रूप से अवध रियासत के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में किया. उन्होंने इस कार्य हेतु ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों का चुनाव किया जहाँ के जमींदार और गांव के प्रधान उनके वफादार थे. उनके सबसे वफादार अवध रियासत के सेनापति राजा जय सिंह थे. पुरुष सेना के साथ साथ महारानी लक्ष्मीबाई की तरह उन्होंने महिला सेना का भी गठन किया.
अपनी महिला सेना का सेनापति रहिमी खातुन को बनाया. इसके साथ उदा देवी पासी तथा तवायफ हैदरी बाई को भी महिला सेना में दूसरा और तीसरा ओहदा दिया. उदा देवी अवध की सेना के वीर सेनानी मक्का पासी की पत्नी थी. (मक्का पासी अवध के महल को बचाने के दौरान अंग्रेज सैनिकों से वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हुए थे.) उनके सैन्य दलों को प्रशिक्षित करने का काम राजा जय सिंह किया करते थे. अपना भेष बदल कर बेगम भी राजा जय सिंह से सैन्य प्रशिक्षण लिया करती थी. यह सब करते हुए एक वर्ष बीत गया. इस एक वर्ष के दौरान लखनऊ रेजिमेंट (ईस्ट इंडिया कंपनी का सैन्य दल) को बेगम की सैन्य संगठन की भनक तक न लगी. अचानक 10 मई 1857 को मेरठ रेजिमेंट के सिपाहियों ने अंग्रेजी हुकूमत (ईस्ट इंडिया कंपनी) के खिलाफ बगावत का बिगुल फूँक दिया. इस सिपाही विद्रोह से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ साथ अवध की रानी बेगम हजरत महल को भी मांगी मुराद मिल गयी.
हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की यह अग्नि धीरे धीरे मेरठ, बरेली, अवध, झांसी, कानपुर, दिल्ली से लेकर बिहार तक फैल गयी. इन तमाम जगहों के ब्रिटिश रेजिमेंट में जो भारतीय मूल के सिपाही (सैनिक) थे उनलोगों ने बंदूक में गाय और सुअर की चर्बी होने के आरोप मे, हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर दिया और ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्जे वाले रियासतों को आजाद कराने में रियासत के राजाओं और नबाबों की मदद करने लगे. लखनऊ रेजिमेंट के भारतीय सैनिकों ने बेगम हजरत महल का साथ दिया.
उस समय तक कानपुर में विद्रोही सैनिकों ने नाना साहब को पेशवा घोषित कर दिया था. और कानपुर के सिंहासन पर नाना साहब का कब्जा हो चुका था. नाना साहब ने अपनी सेना भेजकर महारानी लक्ष्मीबाई और बेगम हजरत महल को उनका राज्य वापस दिलाने में मदद की. फैजाबाद के रसूखदार मौलाना अहमद्दुल्ला शाह ने भी बेगम की हर तरह से सहायता की. बेगम भारी भरकम सैनिकों जिसमें रहीमी खातुन, हैदरी बाई और उदा देवी के नेतृत्व में महिला सेना भी शामिल थी के साथ स्वयं हाथी पर सवार होकर अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाती हुई, ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्जे में जो उनका महल था उसे मुक्त कराने के लिए चढ़ाई कर दी. दोनों सेनाओं के बीच जमकर संघर्ष हुआ. कहते हैं महिला सेना की प्रमुख रहीमी खातुन, हैदरी बाई और उदा देवी पासी ने सैकड़ों गोरे सैनिकों का वध करके एक इतिहास रच दिया. अपनी बहादुरी का परचम लहराते हुए बेगम हजरत महल की सेना ने अबध की रानी के नेतृत्व में अबध के महल को जीतकर और महल के कंगूरे पर से ब्रिटिश झंडा को उतार कर अवध का झंडा लहरा दिया.
बेगम हजरत महल की बहादुरी और दिलेरी की पूरे अबध (लखनऊ) में प्रशंसा होने लगी. मगर यह खुशी अधिक दिनों तक कायम न रह सकी. लखनऊ रेजिमेंट के सेना प्रमुख कॉलिन कैंपबेल ने नेपाल के राजा जंग बहादुर से सहयोग करने की अपील की. राजा जंग बहादुर ने बेगम हजरत महल को पराजित करने के लिए 3000 गोरखा सैनिकों को अवध भेज दिया. साथ ही अन्य रियासतों, जो अंग्रेजों के कब्जे में थे, से सैनिकों को एकत्रित कर कॉलिन कैंपेन ने मार्च 1958 को अवध के महल पर चढ़ाई कर दी. इसबार बेगम अंग्रेजों तथा नेपाल राज्य की भारी भरकम सेना का मुकाबला कर पाने में अक्षम साबित हुई और उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा. अंग्रेजों ने सिर्फ अवध के मुख्य महल ही नहीं बल्कि चारबाग, लुसाबाग, आलमबाग, केसरबाग आदि जगहों पर स्थित उनके महलों पर भी कब्जा कर लिया.
विवश होकर बेगम अपने पुत्र और अवध रियासत के एकमात्र वारिस नबाब जादा बिरजिस क़द्र के साथ काठमांडू (नेपाल) चली गयी. पहले तो नेपाल के राजा जंगबहादुर ने उन्हें आश्रय देने से मना कर दिया, मगर बाद में मानवता के नाते उन्होंने बेगम को राजाश्रय प्रदान किया. यहाँ भी बेगम चुप न रहीं और अपने रियासत को हासिल करने की हर मुमकिन कोशिशें करती रही. मगर उन्हें सफलता न मिली और काफी संघर्ष करने के बाद 7 अप्रैल 1879 को बेगम हजरत का काठमांडू में ही इंतकाल हो गया. उन्हें काठमांडू के घंटाघर के पास स्थित जामा मस्जिद के निकट दफनाया गया. यहीं उनका मकबरा है, जिसकी देखरेख का जिम्मा जामा मस्जिद के इमाम को सुपुर्द कर दिया गया. यह कैसा दुर्भाग्य है कि स्वाधीनता संग्राम की एक वीरांगना को दफ़न के लिए अपने मादरे वतन की मिट्टी भी नसीब न हुई.
रामबाबू नीरव
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स्वाधीनतासंग्राम ❣️
20/08/2023
ब्रिटेन की राजकुमारी Lady Godiva के बारे में कथा प्रचलित है।
करीब 900 साल पहले Godiva ने अपने पति राजा केन्यूट से कहा कि जनता पर से भारी भरकम टैक्स हटाइए।
तब राजा ने शर्त रख दी कि, अगर वो लंदन की सड़कों पर नंगी घूमे तो ऐसा किया जा सकता है।
तब राजकुमारी Godiva ने ये कर दिखाया और ब्रिटेन के इतिहास में अमर हो गई।
कुछ लोगों ने राजकुमारी के सम्मान में अपने घर की खिड़कियां, दरवाजे उस समय बंद रखे।
कुछ जिन्होंने देखने की हिम्मत जुटाई उन्होंने एन वक्त गर्दन नीची कर ली...
आज भी Godiva का नाम ब्रिटेन की कहावतों, इतिहास और म्यूजियम में देखा व सुना जा सकता है।
देश के लिए त्याग और देशवासियों के हित में यह भावना भी अद्भुत और अकल्पनीय थी।
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29/03/2023
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24/01/2023
"अकेले ही तय करने होते हैं कुछ 'सफर 'जिंदगी के, हर सफर में 'हमसफर' नहीं होता....❤️
❤️ गांव का रास्ता हैं सुकून तक जाएगा ❤️
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23/03/2023