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12/08/2026

#मनुस्मृति और षड्यंत्रकारी शासक

#1881 की एक काली रात... कलकत्ता की ईस्ट इंडिया कंपनी की गुप्त प्रिंटिंग प्रेस में दीये जल रहे थे। पांडुलिपियों के पन्ने पलटे जा रहे थे, और एक ब्रिटिश विद्वान की स्याही से सने हाथों से भारतीय समाज के महा-विभाजन का डेथ-वारंट लिखा जा रहा था..."
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस देश में ऋग्वेद से लेकर महाभारत तक हर ग्रन्थ की रक्षा कंठस्थ (oral tradition) और सख्त व्याकरणिक नियमों से हुई, उस देश का सबसे बड़ा आचार-शास्त्र 'मनुस्मृति' रातों-रात अंतर्विरोधों (contradictions) का पुलिंदा कैसे बन गया?
कैसे एक ही ग्रन्थ के एक पन्ने पर लिखा है—‘ #यत्र_नार्यस्तु_पूज्यन्ते_रमन्ते_तत्र_देवताः’ (जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं)... और ठीक अगले ही पन्ने पर नारी जाति के प्रति अत्यंत अपमानजनक श्लोक आ जाता है? क्या महर्षि मनु का दिमाग अचानक बदल गया था, या फिर यह 'इतिहास की सबसे बड़ी लिंग्विस्टिक मिलावट' (Textual Tampering) का नतीजा था?
आज 'प्रयाग फाइल्स' अपनी सबसे सनसनीखेज फाइल खोलने जा रहा है। आज हम कोई केवल ज़बानी दावा नहीं करेंगे, बल्कि फॉरेंसिक भाषा-विज्ञान (Forensic Linguistics), छन्द-शास्त्र के गणित और ऐतिहासिक सबूतों से साबित करेंगे कि अंग्रेजों और वामपंथी इतिहासकारों ने मनुस्मृति में श्लोकों की मिलावट (Interpolations) कैसे की!

1. विरोधाभास का महा-जाल: एक ही ग्रन्थ में दो परस्पर-विरोधी बातें कैसे?
यदि आप मनुस्मृति का निष्पक्ष अध्ययन करें, तो आपको हर अध्याय में ऐसे विरोधाभास मिलेंगे जो किसी एक व्यक्ति की रचना हो ही नहीं सकते। आइए पहले इस 'वैचारिक विरोधाभास' के सबूतों को देखिए:
मनुस्मृति का अंतर्विरोध


[मूल वैदिक श्लोक] [औपनिवेशिक मिलावटी श्लोक]
- महिला पूजा के योग्य है (3.56) - महिला स्वतंत्रता के अयोग्य है (9.3)
- गुण-कर्म से वर्ण तय होता है (10.64) - जन्म से वर्ण तय होता है (जातिगत श्लोक)
- हिंसा एवं मदिरा का निषेध (5.56) - पशु-बलि व मांस भक्षण की छूट (5.31)

स्त्री-सम्मान बनाम स्त्री-अपमान:
अध्याय 3, श्लोक 56: यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। (जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।)
अध्याय 9, श्लोक 3 (प्रक्षिप्त): न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति। (स्त्री कभी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है।)
कर्मणा वर्ण (कर्म से पहचान) बनाम जन्मना वर्ण (जन्म से जाति):
अध्याय 10, श्लोक 64: शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्... (शूद्र अपने गुणों और कर्मों से ब्राह्मण बन जाता है, और ब्राह्मण कर्महीन होने पर शूद्र बन जाता है।)
अन्य मिलावटी श्लोक: जन्म के आधार पर ऊँच-नीच और कठोर दंड का विधान।

तर्क शास्त्र का प्रश्न (Logical Question):
विश्व का कोई भी बुद्धिमान रचनाकार, ऋषियों के कुल में जन्मा दार्शनिक या संविधान निर्माता अपने ही ग्रंथ में 50 पन्नों के भीतर अपने ही बनाए नियमों का पूरी तरह खंडन कैसे कर सकता है? यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि मूल मनुस्मृति में बाद में बड़े पैमाने पर फर्जी श्लोक घुसाए गए हैं।

2. फॉरेंसिक भाषा-विज्ञान (Forensic Linguistics) से मिलावट का पर्दाफाश
जब कोई आधुनिक अपराधी किसी दस्तावेज़ में जालसाजी करता है, तो फॉरेंसिक साइंस उसकी लिखावट, स्याही और कागज़ से सच पकड़ लेती है। ठीक उसी तरह जब प्राचीन संस्कृत साहित्य में मिलावट की जाती है, तो छन्द-शास्त्र, व्याकरणिक शैली (Stylometrics) और 'प्रक्षिप्त' (Interpolation) विश्लेषण से झूठ पकड़ा जाता है।
मिलावट पकड़ने की 3 वैज्ञानिक पद्धतियाँ



(क) #अनुष्टुप_छन्द की अशुद्धि (Metric Faults)
महर्षि मनु की मूल संस्कृत रचना 'अनुष्टुप छन्द' (Anushtup Meter) में है। अनुष्टुप छन्द के प्रत्येक चरण में 8 वर्ण होते हैं और उसके 5वें, 6वें तथा 7वें वर्णों के लघु-गुरु (Short-Long Sound) का एक निश्चित गणितीय नियम होता है।

शोधकर्ताओं का निष्कर्ष: महर्षि दयानंद सरस्वती (19वीं सदी) और बाद में डॉ. सुरेन्द्र कुमार (जिन्होंने मनुस्मृति पर गहन शोध किया) ने पाया कि लगभग आधा मनुस्मृति ग्रंथ छन्द-शास्त्र के नियमों को तोड़ता है।
मिलावट करने वाले अंग्रेज अनुवादकों और बाद के मिलावटखोरों को संस्कृत के उच्च छन्द-शास्त्र का पूर्ण ज्ञान नहीं था, इसलिए उनके द्वारा जोड़े गए श्लोकों में व्याकरण और छन्द के भारी दोष पाए गए।

(ख) 'प्रक्षिप्त' श्लोकों का गणितीय आँकड़ा
प्रसिद्ध संस्कृत विद्वानों और फॉरेंसिक भाषा-वैज्ञानिकों के अनुसार मनुस्मृति के वर्तमान उपलब्ध संस्करणों (जिनमें कुल 2684 श्लोक हैं) का जब आंतरिक संगति परीक्षण (Internal Consistency Test) किया गया, तो चौंकाने वाला सच सामने आया:
यानी वर्तमान में मनुस्मृति के नाम पर जो किताब बेची या प्रचारित की जाती है, उसका 54% से अधिक हिस्सा नकली और मिलावटी है!

"लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—आखिर यह मिलावट किसने, कब और क्यों की? क्या अंग्रेजों के पास इसका कोई गुप्त दस्तावेज था? क्या ईस्ट इंडिया कंपनी का गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स इस षड्यंत्र का मास्टरमाइंड था?"
अब हम आपको 18वीं सदी की अंग्रेजों की उस गुप्त रणनीति के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके तहत 'कोड ऑफ जेंटू लॉज़' (A Code of Gentoo Laws) तैयार किया गया और भारत के इतिहास को सदा के लिए ज़हरीला बना दिया गया...

3. ईस्ट इंडिया कंपनी का 'ऑपरेशन मनुस्मृति': वॉरेन हेस्टिंग्स का गुप्त एजेंडा
1772 में ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने भारत पर स्थायी शासन के लिए एक नीति बनाई। अंग्रेजों को समझ आ गया था कि भारतीय समाज को तब तक गुलाम नहीं बनाया जा सकता, जब तक कि उनके अपने धर्मग्रंथों को उनके खिलाफ ही हथियार न बना दिया जाए।

(क) 'जेंटू लॉ' का षड्यंत्र (१७७६)
वॉरेन हेस्टिंग्स ने कलकत्ता में 11 कट्टरपंथी और औपनिवेशिक मानसिकता के समर्थक पंडितों को इकट्ठा किया। उनसे कहा गया कि वे हिंदू कानूनों का एक ऐसा संग्रह तैयार करें जिसे अदालत में लागू किया जा सके।
* इस संग्रह में जानबूझकर मध्यकाल में जोड़े गए सबसे निकृष्ट, संकीर्ण और जातिवादी श्लोकों को प्राथमिकता दी गई।
इसे 'A Code of Gentoo Laws' के नाम से प्रकाशित किया गया।

1794 में जब सर विलियम जोन्स ने मनुस्मृति का पहला अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया, तो उन्होंने इसी विकृत पांडुलिपि (Kulluka Bhatta's Commentary) को आधार बनाया और उसमें पश्चिमी सामंती शब्दों का तड़का लगा दिया।

(ख) पांडुलिपियों में विविधता का दुरुपयोग
अंग्रेजों ने देखा कि भारत में अलग-अलग क्षेत्रों (बंगाल, बनारस, दक्षिण भारत) में मनुस्मृति की पांडुलिपियों (Manuscripts) में भारी भिन्नता थी।
कोलकाता पांडुलिपि में श्लोकों की संख्या कुछ और थी।
बनारस पांडुलिपि में कुछ और थी।
अंग्रेजों ने वैज्ञानिक पद्धति से मूल श्लोकों की खोज करने के बजाय उस पांडुलिपि को चुना जिसमें सबसे ज्यादा सामाजिक विभाजन और छुआछूत की बातें थीं, ताकि वे यह साबित कर सकें कि "भारतीय समाज बर्बर है और इसे अंग्रेजों के शासन (Civilizing Mission) की जरूरत है।"
4. वामपंथी इतिहास लेखन: औपनिवेशिक झूठ का वामपंथी विस्तार
1947 में अंग्रेजों के जाने के बाद यह उम्मीद थी कि भारत के इतिहास और ग्रंथों का पुनर्मूल्यांकन (Re-evaluation) निष्पक्ष रूप से होगा। लेकिन सत्ता उन वामपंथी इतिहासकारों (Marxist Historians) के हाथ में आई जिन्होंने अंग्रेजों के बनाए झूठ को ही अपनी रोजी-रोटी बना लिया।


यूरोपीय 'क्लास वॉर' को भारत पर थोपना:
मार्क्सवादी इतिहासकारों (जैसे आर.एस. शर्मा, रोमिला थापर) ने यूरोप के 'मालिक और गुलाम' वाले मॉडल को भारत की वर्ण-व्यवस्था पर थोप दिया। उन्होंने मनुस्मृति के प्रक्षिप्त (मिलावटी) 54% श्लोकों को ही 'असली मनुस्मृति' घोषित कर दिया।

शुद्ध पाठ (Critical Edition) को दबाना:
जब दयानंद सरस्वती, डॉ. बी.आर. अंबेडकर (जिन्होंने स्वयं माना था कि बाद के काल में ग्रंथों में मिलावट हुई है), और बाद में डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैसे विद्वानों ने प्रमाणों के साथ दिखाया कि मनुस्मृति का आधा हिस्सा मिलावटी है, तो वामपंथी इतिहास लेखन ने इन शोधों को मुख्यधारा के पाठ्यक्रम से पूरी तरह गायब कर दिया।

5. सरल एवं बहती भाषा में व्यावहारिक कहानी (मिलावट का फॉरेंसिक सबूत)
आइए, इस मिलावट के पूरे खेल को एक बेहद सरल और बहती हुई कहानी से समझते हैं।

1. पानी में मिलावट की कहानी
मान लीजिए आपके पास हिमालय के शुद्ध झरने के पानी की एक बोतल है। वह पानी इतना पवित्र और जीवनदायी है कि उसे पीते ही ताजगी आ जाती है।
अब सोचिए, रास्ते में कोई शरारती तत्व या आपका दुश्मन उस बोतल का ढक्कन खोलता है और उसमें गंदा नाले का पानी मिला देता है। अब वह पानी ज़हरीला हो गया।
अब अगर कोई व्यक्ति उस गंदे पानी को पीकर बीमार पड़ जाए, तो आप दोष किसे देंगे?
क्या आप हिमालय के उस शुद्ध झरने को दोष देंगे?
या उस दुष्ट व्यक्ति को दोष देंगे जिसने उस साफ़ पानी में ज़हर मिलाया था?
मनुस्मृति के साथ ठीक यही हुआ!
शुद्ध झरना = महर्षि मनु की मूल वेदसम्मत मनुस्मृति (1214 श्लोक)।
नाला का पानी = अंग्रेजों, मध्यकालीन मिलावटखोरों और वामपंथियों द्वारा मिलाए गए 1471 फर्जी श्लोक।

2. फॉरेंसिक सबूत: चोर कैसे पकड़ा गया?
अब आप पूछेंगे कि "हमे कैसे पता चले कि कौन-सा श्लोक शुद्ध झरने का है और कौन-सा नाले का?"
चलिए, इसका एक सीधा फॉरेंसिक टेस्ट देखते हैं:

टेस्ट1 (वेदानुकूलता): मनुस्मृति खुद कहती है कि 'जो वेद के विरुद्ध है, वह अमान्य है'। वेद में जात-पात और स्त्री-उत्पीड़न नहीं है, इसलिए जहाँ भी मनुस्मृति में ऐसी बात आती है, वह सीधा-सीधा नाले का पानी (मिलावट) है।

टेस्ट 2(प्रसंग-भंग): आप कोई कहानी पढ़ रहे हैं। अचानक बीच में बिना किसी संदर्भ के दो लाइनें ऐसी आ जाती हैं जिनका आगे-पीछे की कहानी से कोई लेना-देना ही नहीं है। यही 'प्रक्षिप्त श्लोक' हैं जिन्हें जबरन ठूंसा गया है।

6. वृहद तुलनात्मक : मूल मनुस्मृति बनाम औपनिवेशिक मिलावट

मनुस्मृति के मूल और उसमें समय के साथ हुई औपनिवेशिक व परवर्ती मिलावटों के अंतर को रनिंग मैटर (प्रवाहपूर्ण गद्य) में इस प्रकार समझा जा सकता है:
मूल मनुस्मृति बनाम मिलावटी संस्करण: एक तुलनात्मक विश्लेषण
मनुस्मृति के वास्तविक स्वरूप और अंग्रेजों के औपनिवेशिक काल के दौरान प्रचारित एवं मिलावटी संस्करणों के बीच मौलिक अंतर है। महर्षि मनु का मूल ग्रंथ जहाँ वेदों पर आधारित एक वैज्ञानिक मानव आचार-शास्त्र था, वहीं मिलावटी संस्करणों ने इसे एक सामाजिक विभाजन और शोषण के औजार के रूप में प्रस्तुत किया।

वर्ण व्यवस्था का आधार:
मूल मनुस्मृति में वर्ण का निर्धारण व्यक्ति के गुण, कर्म, योग्यता और स्वभाव के आधार पर होता था। यह एक गतिशील (Dynamic) व्यवस्था थी, जिसमें ज्ञान और आचरण के बल पर वर्ण परिवर्तन संभव था। इसके विपरीत, औपनिवेशिक और मिलावटी पाठ में इसे जन्म, जाति और वंश से जोड़कर एक कठोर और अपरिवर्तनीय जाति व्यवस्था (Rigid Caste System) में बदल दिया गया।

स्त्रियों का स्थान और अधिकार:
वैदिक परंपरा के अनुकूल मूल मनुस्मृति में स्त्रियों को 'गृहलक्ष्मी', परम पूजनीय और पूर्ण शिक्षा (वेदाध्ययन व उपनयन) की अधिकारिणी माना गया है। इसके विपरीत, क्षेपक (मिलावटी) श्लोकों में स्त्रियों को तंत्रहीन, दासी और जीवन भर स्वतंत्रता के अयोग्य चित्रित करने का प्रयास किया गया।

श्रम और शूद्र की अवधारणा:
मूल रचना में श्रम का सम्मान था और शूद्र समाज के आधार स्तंभ माने जाते थे। उत्तम कर्म और योग्यता अर्जित करके किसी भी व्यक्ति को ब्राह्मण पद तक पहुँचने की पूरी छूट थी। जबकि मिलावटी पाठों में शूद्रों को जन्मजात नीच, शिक्षा से वंचित और कठोरतम दंड का पात्र दर्शाया गया।

न्याय विधान और दंड नीति:
मूल मनुस्मृति की न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा नियम यह था कि जितना बड़ा पद और ज्ञान, अपराध करने पर उतना ही बड़ा दंड। उदाहरण स्वरूप, यदि किसी अपराध के लिए सामान्य जन को छोटा दंड मिलता था, तो उसी अपराध के लिए ब्राह्मण को सबसे कठोर और बहुगुणित दंड दिया जाता था। इसके विपरीत, औपनिवेशिक काल में उभारे गए मिलावटी पाठों में जाति देखकर न्याय करने और निचली जातियों को क्रूर सजा देने का झूठा आख्यान जोड़ा गया।

ग्रंथ का मूल चरित्र:
निष्कर्षतः, मूल मनुस्मृति (जो लगभग 1214 वेदसम्मत श्लोकों पर आधारित है) मानव जीवन के संचालन का एक वैज्ञानिक, न्यायपूर्ण और नैतिक आचार-शास्त्र है। वहीं 1471 से अधिक फर्जी/मिलावटी श्लोकों के माध्यम से इसे भारत में सामाजिक फूट डालने और औपनिवेशिक शासन को मजबूत करने वाले कानून के रूप में प्रस्तुत किया गया।

7. निष्कर्ष
मनुस्मृति पर उठने वाले तमाम विवाद, नफ़रत और भ्रम महर्षि मनु के विचारों का परिणाम नहीं हैं, बल्कि वे औपनिवेशिक षड्यंत्र, मध्यकालीन मिलावट और वामपंथी इतिहास-लेखन की ज़हरीली पैदावार हैं।
अंग्रेजों ने भारतीय समाज को तोड़ने के लिए मनुस्मृति में मिलावट वाले अंशों को कानून बनाया।
वामपंथियों ने सनातन संस्कृति को कटघरे में खड़ा करने के लिए इस मिलावटी संस्करण को असली बताकर प्रचारित किया।
लेकिन फॉरेंसिक लिंग्विस्टिक्स और तर्कशास्त्र का सत्य यह है कि जिस 54% हिस्से पर आज उंगली उठाई जाती है, वह महर्षि मनु का लिखा हुआ ही नहीं है!
अब समय आ गया है कि भारत अपनी ज्ञान-परंपरा पर लगे इस औपनिवेशिक मैल को धो डाले। मूल मनुस्मृति अनुशासन, योग्यता और मानव चेतना के विकास का ग्रन्थ है, जिसे अंग्रेजों के झूठे नैरेटिव से मुक्त कराना हर विचारशील भारतीय का धर्म है।

"लेकिन रुकिए... कहानी अभी यहाँ खत्म नहीं हुई है!
अगर मनुस्मृति का 54% हिस्सा मिलावटी था, तो फिर वह कौन-सी गुप्त विद्या थी जिसे छिपाने के लिए अंग्रेजों ने भारत के गुरुकुलों को रातों-रात गैर-कानूनी घोषित कर दिया? 1858 में लॉर्ड मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में खड़े होकर भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में जो सीक्रेट रिपोर्ट सौंपी थी, उसमें ऐसा क्या लिखा था जिसने ब्रिटेन के हुक्मरानों के होश उड़ा दिए थे?

'प्रयाग फाइल्स' के अगले अध्याय में हम खोलने जा रहे हैं—'गुरुकुल विनाश का मैकाले कोड'! तैयार रहिए उस ऐतिहासिक सच को जानने के लिए जिसने भारत को ज्ञान के वैश्विक शिखर से धकेल कर मानसिक गुलामी के दलदल में धकेल दिया..."

"ग्रंथों में मिलावट करके जिन्होंने इतिहास की दिशा बदली थी, आज फॉरेंसिक सत्य की रोशनी में उनके सारे झूठ बेनकाब हो चुके हैं!"

आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ......। अगली कड़ी जल्द....।
साभार from

अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज

25/07/2026

यूनिवर्सिटी बनी भ्रष्टाचार का अड्डा। मैंने सिस्टम के अंदर जाकर देखा और महसूस किया। मैने अर्थात् LLB के तीन वर्षीय कोर्स में एडमिशन के लिए अप्लाई किया और 15 जुलाई को एंट्रेंस टेस्ट दिया। जैसी वीडियोग्राफी और रिपोर्टिंग की जा रही थी और अभ्यर्थियों की जिस प्रकार तलाशी ली जा रही थी उससे यूनिवर्सिटी की कार्यशैली पर विश्वास हुआ। अभ्यर्थियों से मोबाइल और अन्य सामग्री परीक्षा भवन से बाहर रखवा दी गई। बहुत से अभ्यर्थियों के पास घड़ी नहीं थी और होती भी तो वो भी बाहर रखवा ली जाती। आशा थी परीक्षा भवन में वॉल क्लॉक तो होगा क्योंकि एंट्रेंस एग्जाम में समय का बहुत महत्व होता है। लेकिन पहला ही shock ये लगा कि पेपर किस समय दिए गए और किस समय लिए गए इसका पता नहीं चल पाया क्योंकि परीक्षा भवन में समय को बताने वाली कोई घड़ी या उपकरण न था और न ही कोई वार्निंग बेल बजाई गई जिससे समय का अंदाजा हो सके, न कोई ऑफिशियल अनाउंसमेंट हुई। ये यूनिवर्सिटी की तरफ से एक गंभीर चूक थी जिसका असर परीक्षार्थी की परफोर्मेंस पर पड़ना निश्चित था। परीक्षार्थियों से रोल न स्लिप, question booklet और OMR Sheet collect कर ली गई।

खैर जैसे तैसे अंदाजे से और हड़बड़ी में परीक्षा दी गई। समय का आभास न होने के कारण , जल्दी जल्दी में कुछ ऐसे प्रश्न गलत हो गए जो सही हो सकते थे। उसी दिन रात को MDU की साइट पर प्रश्न पुस्तिका और उत्तर पंजिका डाल दी गई। प्रश्नों का मिलान किया गया तो sixty nine Answers सही थे। अर्थात् 100 में से 69 अंक। अगले दिन मेरिट सूची लगी। वहां ये देखकर शौक लगा कि मेरे sixty eight answers ठीक थे। और मेरिट में मेरा 97 की जगह 100 वा कर दिया गया। फिर भी मैने सोचा शायद एडमिशन हो जाएगा क्योंकि कुल 220 सीट थी। जिनमें ओपन कैटिगरी की 100 से अधिक सीट थी। 23 जुलाई को काउंसलिंग थी। काउंसलिंग में जितने भी कैंडिडेट परीक्षा में appear हुए थे अर्थात 1123 सबको कॉल कर लिया गया। ये जानबूझकर किया गया कृत्य था। #शिक्षामंत्री जी इस भ्रष्टाचार पर नकेल खींचिए ।
समझिए तंत्र की चालाकी।

1 MDU law department और गुरुग्राम लॉ सेंटर दोनों के लिए आवेदन मांगे गए। दोनों में अलग अलग सीटें और अलग अलग ऑप्शन थे। लेकिन एंट्रेंस टेस्ट एक जगह कराया गया। कोई बात नहीं। यहां तक तो ठीक था, लेकिन जब अलग केंद्रों के लिए अलग आवेदन लिए थे तो मेरिट इकट्ठी क्यों बनाई गई और फिर मान लीजिए मेरिट इकट्ठी बना भी ली तो अलग अलग सेंटर के लिए अलग अलग काउंसलिंग क्यों की गई। इसका एकमात्र कारण था पारदर्शिता को छुपाना और भ्रष्टाचार पर लीपा पोती करना। शिक्षा मंत्री जी कर्मचारी आपकी सरकार को बदनाम कर रहे हैं। सरकार की पॉलिसी बताकर मनमानी कर रहे हैं। इससे आपकी सरकार की छवि धूमिल होती है।

ऐसे अवसर पर #विद्यार्थी_संगठन या अन्य जैसे NSUI भी मौन रहते हैं। या उन्हें इनकी चालाकियों का पता नहीं चल पाता।

कारण सिर्फ ये था कि भीड़ इकठ्ठा करके विद्यार्थियों को परेशान करो। जब पता है दोनों केंद्रों की सीट 240 हैं तो सबको पहली काउंसलिंग में बुलाने का क्या अभिप्राय था। केवल करना, शायद। जब आपने मेरिट बना ली है तो उसी में से अंकों के हिसाब से हर कैटिगरी के कैंडिडेट को बुलाया जा सकता था और समय पर काउंसलिंग खत्म करके रिक्त पदों के लिए दूसरी काउंसलिंग के लिए कैंडिडेट को बुलाना था या एक मिनिमम कट ऑफ मेरिट रखकर काउंसलिंग के लिए बुलाना था। परन्तु अपने ऐसा नहीं किया #वीसी_डॉमिलापपुनिया जी इस खेल को समझिए। आप सही हैं लेकिन नीचे तंत्र में बैठे लोग मनमानी कर रहे है। इससे यूनिवर्सिटी की शाख गिरती है। क्योंकि ये डिपार्टमेंट में बैठे लोग अपने ने चहेतों के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
2.
दूसरी बात आपने सबकुछ किया। मनमानी की। 23 तारीख की काउंसलिंग का रिजल्ट MDU की साइट पर क्यों नहीं लगाया?

स्पष्ट है यदि सिलेक्टेड कैंडिडेट का रिजल्ट साइट पर अपलोड होता तो आपकी #पोल खुल जाती। आप #शिक्षा के नाम पर भ्रष्टाचार फैला रहे है।आप संस्थाओं में मनमानी कर रहे हैं। आज तक भी रिजल्ट नहीं लगा है और आप से अपने चहेतों को भर रहे हो या पैसे ऐंठ रहे हो। हो सकता है मेरा आंकलन गलत हो परंतु यही शंकाएं हर उस कैंडिडेट के मन में थी जो मेरिट में RESPECTABLE पोजीशन पर था. यदि काउंसलिंग सही है तो साइट पर लिस्ट अपलोड क्यों नहीं की जा रही। दाल में काला है, तभी ऐसा हो रहा है।
मैने केवल एक डिपार्टमेंट का नाम लिया जो मैने शुरू से आखिर तक आंखों से देखा है। अन्य डिपार्टमेंट में भी ऐसा हो रहा होगा, इसी मेरी शंका है।
#भ्रष्टाचार_मुक्त_भारत






आप से request है इसकी तथ्यपूर्वक #जांच कराएं

01/02/2026
27/09/2025

मुख्यमंत्री एवं शिक्षा मंत्री के नाम एक पत्र

सेवा में,
मुख्यमंत्री जी,
हरियाणा सरकार।

एवं

शिक्षा मंत्री जी,
हरियाणा सरकार।

विषय - हरियाणा की टीचर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स (DIET) में जेबीटी कोर्स बंद होने के कारण सरप्लस हुए पीजीटी एवं टीजीटी अध्यापकों को विद्यालयों में एडजस्ट करने बारे।

श्रीमान् जी,
नमस्ते!
सर्वप्रथम मैं आपको बधाई देना चाहूंगा कि आप हरियाणा की प्रगति के लिए दिन रात कड़ी मेहनत कर रहे हैं तथा हर वर्ग और तबके के विकास के लिए #प्रगतिशील योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में अग्रसर हैं। आप भेदभाव एवं जाति पाती से ऊपर उठकर सर्ववर्ग सम्भाव , सबका साथ और विकास की भावना से कार्य कर रहे हैं। आपका व्यक्तित्व एवं वाणी बेजोड़ है। आप एक युवा की तरह #ऊर्जावान एवं गतिशील हैं। आपने एवं आपसे पूर्ववर्ती मनोहरलाल खट्टर ने हरियाणा की शिक्षा के स्तर को उच्चतर बनाने में निरंतर प्रयास किया है। आपने प्रधानमंत्री की PM श्री विद्यालयों की अवधारणा को मजबूती दी है। आज हरियाणा के सरकारी विद्यालयों में डिजिटल बोर्ड्स, डिजिटल लैब्स, लाइब्रेरी, TABS आदि इन्फ्रास्ट्रक्चर विश्व स्तर की हैं । आपने हर ब्लॉक में मॉडल संस्कृत विद्यालयों को स्थापित किया है । कहने का अभिप्राय ये है कि आपने शिक्षा के स्तर को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आपने अध्यापकों की नियुक्ति करके खाली पोस्ट को भरने का सराहनीय कार्य किया है। टेंपरेरी VACANCY को HKRNL से रिक्रूट करके काफी हद तक वैकेंसी को नियंत्रित किया है लेकिन फिर भी अनेक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी रह जाती है क्योंकि समय समय पर सेवानिवृति और पदोन्नति होती रहती है।
आपने बहुत प्रयास किए फिर भी कुछ ऐसा रह जाता है जिसकी तरफ ध्यान नहीं जाता। मैं उसी तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं और आशा करता हूं कि आप शीघ्रातिशीघ्र इस समस्या का समाधान करेंगे। जैसा कि आपको पता है कि वर्ष 2021/22 में हरियाणा से जेबीटी कोर्स को बंद कर दिया गया था । हरियाणा की जेबीटी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में पीजीटी और टीजीटी अध्यापक ट्रेनिंग देने का काम करते थे। अब चूंकि लगभग तीन चार साल से ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में ट्रेनिंग का कार्य बंद है तो वहां जो अध्यापक कार्य कर रहे थे वे सरप्लस हो गए हैं। ऐसी स्थिति में वे या तो इंस्टीट्यूट में जाते ही नहीं और जाते हैं तो खाली बैठकर आ जाते हैं। दूसरी तरफ ऐसे बहुत से स्कूल हैं जहां सेवानिवृति होने या पदोन्नति होने के कारण पद खाली हो गए हैं। अतः आप से अनुरोध है कि जेबीटी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट अर्थात् डाइट में निठल्ले बैठे इन अध्यापकों को जिले के स्कूलों में खाली पड़े पदों पर तुरंत एडजस्ट करें। इसके लिए जिले के जिला शिक्षा अधिकारी या डायरेक्टर सेकेंडरी एजुकेशन को निर्देशित करके तुरंत इसी सत्र में एडजस्ट कराएं ताकि विद्यार्थियों को लाभान्वित किया जा सके। इसके अतिरिक्त ये अध्यापक अपने विषय में निपुण होने के कारण शिक्षार्थियों के लिए काफी लाभदायक सिद्ध होंगे। जेबीटी कोर्स शुरू हो जाएं तो इन्हें तथा अन्य अध्यापकों को फिर से ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में भेजा जा सकता है।

आपका शुभचिंतक
एक जागरूक नागरिक एवं शिक्षक

#मुख्यमंत्री_हरियाणा
#नायबसैनी
#शिक्षामंत्री

#शिक्षा_ही_जीवन_का_आधार

21/06/2025

इजरायल V / ईरान युद्ध और भारतीय विदेश नीति की दुविधा

भारत ने विश्व मंचों पर अनेक बार जोर देकर कहा है कि भारत हर प्रकार के आतंकवाद और कट्टरवाद के खिलाफ है। जो देश आतंकवाद का पोषण करते हैं , या निजी हितों के लिए प्रयोग करते हैं भारत कदापि उनके साथ नहीं आ सकता। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अनेक बार कहा है कि यह समय युद्ध का नहीं अपितु बुद्ध का है अर्थात् भारत शांति का पक्षधर रहा है और रहेगा। भारत की संस्कृति ही विश्व बंधुत्व और वसुधैव कुटुम्बकम् का समर्थन करती है। भारत एक ऐसा देश है जहां हर धर्म संप्रदाय और जाति के लोग सहअस्तित्व के सिद्धांत और परस्पर सहयोग की भावना से रहते हैं। भारत हिन्दू बहुल होते हुए भी सभी धर्मों का सम्मान करते हुए उन्हें हिंदुओं से भी अधिक अधिकार देता है। संविधान में अन्य धर्मों को अल्पसंख्यक का दर्जा देकर अतिरिक्त अधिकार देता है।
अब बात करते हैं इजरायल की। इजरायल भी भारत की तरह ही आतंकवाद के खिलाफ है और पीड़ित भी। जिस प्रकार भारत अलकायदा, जैस ए मोहम्मद, हक्कानी, और पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित और पोषित अनेक आतंकवादी संगठनों से पीड़ित है, उसी प्रकार #इजरायल भी हमास, हिजबुल्ला, हुईती आदि अनेक आतंकवादी संगठनों से पीड़ित है जिनका पोषक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लेबनान, यमन और ईरान हैं। जिस प्रकार 7 अक्टूबर 2023 को हमास के आतंकवादियों ने इजरायल के नागरिकों को बंधक बनाया और महिलाओं और बच्चों यौन शोषण किया और बलात्कार किया, उसी प्रकार से 22 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान पोषक आतंकवादियों ने #पहलगाम में सैलानियों का नरसंहार किया और धर्म पूछ पूछ कर केवल #हिन्दू सैलानियों को मारा। पूरे विश्व ने इन आतंकवादी घटनाओं की निंदा की। लेकिन क्या ईरान ने निंदा की? नहीं। क्या ईरान ने आतंकवादियों को नष्ट करने के भारत के संकल्प का साथ दिया? नहीं। क्या ईरान ने #ऑपरेशन_सिंदूर का समर्थन किया? नहीं।
क्या 1999 में #कारगिल युद्ध में भारत का समर्थन किया?
फिर उत्तर है नहीं।
क्या पाकिस्तान के साथ हुए 1971 के युद्ध में भारत का साथ दिया? नहीं।
क्या ईरान ने किसी भी मंच पर चीन या पाकिस्तान के विरुद्ध भारत का समर्थन किया? उत्तर वही है _ नहीं नहीं नहीं।
उपरोक्त सभी घटनाओं में इजरायल का भारत के प्रति दृष्टिकोण क्या रहा?
इजरायल ने सबसे पहले ऑपरेशन सिंदूर में भारत के साथ होने का बयान दिया और आतंकवादियों को नेस्तनाबूद करने में अपने विशेषज्ञ भी भेजे। इजरायल ने हमेशा आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का साथ निभाया। इजरायल ने एक सच्चे दोस्त की तरह भारत का साथ निभाया है।
अतः हम स्पष्ट रूप से कह सकते है कि भारत के हित इजरायल के साथ हैं ईरान के साथ नहीं। अब चूंकि ईरान और इजरायल के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया है तो ऐसे अवसर पर भारत को अपने मित्र के समर्थन में खुलकर आना चाहिए।
ईरान इजरायल के बेकसूर नागरिकों और आबादी वाले शहरों जैसे तेलअवीव, हाइफा आदि पर सुपरसोनिक मिसाइल से हमला करके युद्ध अपराध कर रहा है। जहां इजरायल सैन्य ठिकानों पर हमले कर रहा है वहीं ईरान कायराना हरकत करके बेकसूर नागरिकों और अस्पतालों को निशाना बना रहा है। ईरान कट्टरपंथ का पोषण करता है। वहां 1979 से लगातार एक ही व्यक्ति अयातुल्ला अल खुमैनी ने सत्ता पर कब्जा किया हुआ है। इतिहास जानने वालों को पता होगा कि किस प्रकार #1979 में ईरान के शासक #रजा_पहलवी का तख्ता पलटकर खुमैनी ने सत्ता को कब्जाया था और ईरान के शाह को विदेश में शरण लेनी पड़ी थी। 1979 से पहले ईरान एक खूबसूरत देश था जहां सब नागरिकों विशेषकर महिलाओं को समान अधिकार थे। लेकिन खुमैनी के कट्टर शासन में महिलाओं का शोषण होता है उन पर अत्याचार होता है और कोई सुनने वाला नहीं है। ईरानी महिला राबिया की कहानी तो अपने सुनी होगी कि किस प्रकार एक धनी पचास वर्षीय बूढ़े ने उसका शोषण किया और फिर जब उसने कोर्ट में केस किया तो कट्टरपंथी जज ने जिसे काजी कहते हैं, राबिया को ही फांसी की सजा सुना दी क्योंकि शरिया कानून में यदि महिला के साथ यौन शोषण होता है तो महिला को सिद्ध करना पड़ता है वरना उसी महिला को फांसी दे दी जाती है।
आज राजा पहलवी का परिवार विदेश में शरण लिए हुए है और अत्याचारी शासक के अंत का इंतजार कर रहा है।
जब भारत के दो दुश्मन ईरान के समर्थन आ गए है तो भारत को भी खुलकर अपने मित्र इजरायल के पक्ष में आ जाना चाहिए। यहां दुविधा है तो केवल यह कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में भारत का चिरपरिचित और भरोसेमंद मित्र रूस ईरान के पक्ष में है।
Disclaimer _
(उपरोक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं, इनसे सहमत या असहमत होना व्यक्तिगत विवेक पर निर्भर करता है।)

14/02/2025

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस और अमेरिका की यात्रा और विश्व राजनीति पर इसका प्रभाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस और अमेरिका की यात्रा को विश्व राजनीति के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। फ्रांस और अमेरिका के राष्ट्रपतियों द्वारा नरेंद्र मोदी का भव्य स्वागत इस बात का प्रतीक है कि भारत एक आर्थिक और राजनीतिक ताकत के रूप में उभर रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बात करते हुए मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत विश्व की राजनीति में न्यूट्रल नहीं है बल्कि शांति का पक्षधर है। नरेंद्र मोदी जी ने रसियन प्रधानमंत्री पुतिन के साथ हुई वार्ता को पुनः दोहराते हुए कहा कि यह समय युद्व का नहीं है। युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है। समस्या का समाधान आमने सामने बैठकर, आंखों में आंखे डालकर और एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करते हुए निकaला जा सकता है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि विश्व नेताओं को अहंकार त्यागकर विश्व कल्याण के लिए कदम उठाने चाहिएं। उन्हें गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और आतंकवाद के उन्मूलन के लिए कार्य करना चाहिए।

मोदी ने कहा कि विश्व नेताओं को किसी भी प्रकार के आतंकवाद को खत्म करने के लिए कदम उठाने चाहिएं। एक सभ्य समाज में आतंकवाद के लिए कोई स्थान नहीं है।
इसके अतिरिक्त भारत में पूंजी निवेश, विज्ञान और तकनीकि, सामरिक साझेदारी आदि अनेक विषयों पर चर्चा हुई।

21/08/2024
किसान आंदोलन और उसकी प्रासंगिकता नंबर 2021 में तीन कृषि कानूनों को वापिस लेते समय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा ...
25/02/2024

किसान आंदोलन और उसकी प्रासंगिकता

नंबर 2021 में तीन कृषि कानूनों को वापिस लेते समय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कृषि कानून किसानों के हित में लाए गए थे और देश हित में वापिस लिए जा रहे हैं। यह घोषणा तब की गई थी जब एक साल से अधिक दिन तक किसान आंदोलन चला था और लगभग समाप्त हो गया था। उस समय भी किसानों से अनेक वार्ताएं हुई लेकिन सरकार और किसानों की हठधर्मिता के कारण कोई निष्कर्ष नहीं निकल सका। किसान तीन कृषि कानूनों को काले कानून बताकर विरोध कर रहे थे जबकि सरकार कह रही थी कि ये कृषि कानून किसान की स्थिति को सुधारने का काम करेंगे । किसान स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करने तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी पर अड़े हुए थे। खैर, सरकार ने नए कृषि कानून वापिस ले लिए थे और गतिरोध खत्म हो गया था। उस वर्ष आश्चर्यजनक ढंग से सरसों के भाव बाजार में सरकारी भाव से लगभग दोगुना हो गए थे क्योंकि सरकार ने पामोलिव तेल के आयात पर रोक लगा दी थी जिस के कारण सरसों के तेल की मांग बढ़ी तथा खुले बाजार में सरसों के भाव तीव्र गति से बढ़ने लगे और किसानों को बहुत लाभ हुआ। करीब दो वर्ष तक सरसों के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से लगभग दोगुना रहे। इसके अतिरिक्त सरकार ने किसानों को छः हजार रूपए की डीबीटी के द्वारा मदद करने का काम भी किया।
अब वर्तमान में किसान फिर से msp की गारंटी तथा स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने पर अड़े हुए हैं। स्वामीनाथन रिपोर्ट 2006 में आई तब से ही किसान इसे लागू करने के लिए प्रयासरत तथा आंदोलनरत हैं लेकिन कोई भी सरकार इस स्थिति में नहीं कि वह एमएसपी की गारंटी दे दे क्योंकि सरकारों को WTO (विश्व व्यापार संगठन) की शर्तों को मानना पड़ता है। विश्व व्यापार संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में अब भी धान, गेहूं ,दलहन और तिलहन के भाव विश्व के सब देशों से ज्यादा हैं जिस पर विश्व व्यापार संगठन कई बार आपत्ति दर्ज करा चुका है। फिर भी मान लें कि सरकार एमएसपी के लिए तैयार हो भी जाए तो छोटे किसान को इसका अधिक लाभ नहीं मिलेगा, उल्टे इससे महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा होगा जिसका प्रतिकूल असर किसान और मजदूर पर ही होगा। एमएसपी का लाभ बड़े बड़े जमीदारों या व्यापारियों को ही मिलेगा। छोटा किसान तो केवल इतना ही उगा पाता है कि साल भर उसके परिवार और पशुओं को भरपेट भोजन मिल सके और थोड़ा बहुत अनाज व्यापारी को बेचकर घर के अन्य खर्च निकाल सके।
भारत में लगभग 15 करोड़ किसान हैं जिनमे से अधिकतर दो तीन एकड़ की कृषि करने वाले हैं। केवल दो या तीन प्रतिशत किसान ही बड़े जमींदार हैं जो सैंकड़ों या हजारों एकड़ जमीन पर कृषि करते हैं। एमएसपी लागू होने का मतलब है केवल दो या तीन प्रतिशत किसानों को लाभ पहुंचाना। इसके अतिरिक्त एमएसपी तो केवल चोबीस फसलों पर ही लागू है। तो फिर बाकी की फसल करने वाले अधिकतर किसान तो एमएसपी की बात ही नहीं करते क्योंकि वे अपनी उपज पर एमएसपी से अधिक कीमत लेते हैं।
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फिर एक और बात संदेह पैदा करती है कि किसान आंदोलन हर बार पंजाब से ही क्यों जन्म लेता है? क्या इसके पीछे राजनीतिक दलों या विदेशी संगठनों का हाथ है? क्या देश को अस्थिर करने का षड्यंत्र है? या कनाडा ब्रिटेन और अमेरिका में बैठे भारत विरोधी संगठनों के कुकृत्य? प्रश्न बहुत हैं, पर उत्तर कहीं नहीं।
पंजाब के इन आंदोलन कारी किसानों को देखकर नहीं लगता कि ये वास्तव में किसान हैं। इनका पहनावा, महंगी गाडियां, पोकलेन मशीन, जेसीबी मशीनें, ड्रोन को गिराने के तरीके, आंसू गैस से निपटने की तैयारी और ट्रैक्टर ट्रॉली में एसी कमरे की तरह आधुनिक फिटिंग आदि से लगता है कि इनका आंदोलन प्रायोजित है। एक किसान नेता ने तो यहां तक कह दिया कि ये आंदोलन मोदी के ग्राफ को नीचे गिराने के लिए है।
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अब प्रश्न उठता है कि जब आम चुनाव नजदीक हैं और लोकसभा कार्यवाही भी नहीं चल रही तो इस आंदोलन का क्या औचित्य है। यदि किसान वास्तव में कुछ चाहते थे तो संसद सत्र के समय यह आंदोलन करना चाहिए था, या उससे पहले ।लेकिन मकसद पवित्र नहीं, केवल राजनैतिक है। सरकार के लिए मुसीबतें पैदा करना है, सरकार के ग्राफ को नीचे गिराना है। लेकिन शायद किसान अपने लक्ष्य में कामयाब नही होंगे क्योंकि लोग सब जानते हैं। सरकार भी इस बात को जानती है। हो सकता है कुछ फीसदी वोट कम हो जाएं परंतु सरकार तो बीजेपी की ही बनने की संभावनाएं हैं। प्रधान मंत्री जी भी बहुत अप्रत्यासित फैसले लेने के लिए जाने जाते हैं। हो सकता है मार्च में आचार संहिता लागू होने से पहले मोदी किसानों के पक्ष में कुछ घोषणाएं कर जाएं।

कोई भी किसानों के विरुद्ध नहीं। किसान अन्नदाता है और दुनिया का पेट भरता है। इसीलिए सभी को किसानों से सहानुभूति है और लोग चाहते हैं कि वह खुशहाल हो, समृद्ध जो। परंतु मात्र एमएसपी की गारंटी किसान के लिए खुशहाली नहीं ला सकती। इसके लिए उसे गैर परंपरागत खेती करनी होगी, उन फसलों को उगाना होगा जो अधिक मूल्य दें। उत्पादन की गुणवत्ता को भी बढ़ाना होगा। रासायनिक उर्वरक के स्थान पर जैविक खाद के प्रयोग को प्रोत्साहित करना होगा।कृषि में आधुनिकीकरण को अपनाना होगा। मात्र सब्सिडी या एमएसपी की रट लगाने से कुछ भला नहीं होने वाला। फूड प्रोसेसिंग कारखानों को बढ़ावा देना होगा। ऐसे स्टोरेज बनाने होंगे जिनमें खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखा जा सके। किसान आज भी इतनी अधिक मात्रा में फल और सब्जियां उगाता है कि उन्हें बेचना मुश्किल हो जाता है। अतः सरकार को स्टोरेज अर्थात् भंडारण के आधुनिक तरीके अपनाकर किसान की फसल को खरीदने का प्रबंध करना होगा। किसान को भी यह मांग सरकार से करनी चाहिए कि उनकी फसल को खरीदने का प्रबंध हो। कुछ हद तक किसान को बाजार की आवश्यकता को खुद समझना होगा। मांग और आपूर्ति के सिद्धांत के अनुसार भाव तभी मिलेगा जब वस्तु की मांग होगी। यदि किसान बाजार की नब्ज पकड़ ले तो वह खुश हाल हो सकता है। उसे सरकार पर परजीवी न होकर आत्म निर्भर बनना होगा, अपने रास्ते खुद तलाशने होंगे। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। यदि किसान चाहता है कि वह कुछ भी पैदा करे और सरकार उच्च मूल्य पर उसे खरीद ले तो यह संभव नहीं।

क्या उद्योगपति के सम्पूर्ण उत्पाद को सरकार खरीदती है? यदि कपड़ा मिल का मालिक आवश्यकता से अधिक कपड़ा उत्पादन करे और सरकार द्वारा खरीदने की गारंटी मांगे तो क्या संभव है? शायद नहीं। किसी भी उत्पाद पर सरकार का नियंत्रण होता है, इसी प्रकार अनाज उत्पादन पर भी। जरूरत के हिसाब से किए गए उत्पादन पर ही कीमत मिलती है।
सरकार को चाहिए की किसान आंदोलन को शीघ्र खत्म करे। किसानों को भी हठधर्मिता त्यागकर मध्य मार्ग अपनाना चाहिए। यदि किसान अपने हठ को त्यागकर मध्यमार्ग अपनाने को तैयार हो जाता है तो यह देश और समाज हित में होगा। कोई नही चाहता की हमारे देश के जवानों की ऊर्जा सड़कों पर बर्बाद हो। किसानों को शांति से सरकार के साथ समझोता करके आंदोलन को तुरंत वापस लेना चाहिए। ऐसा न हो कि पिछले आंदोलन की तरह सैंकड़ों किसानों की जान जाए। सरकार को आश्वासन देना चाहिए कि वह उनकी एमएसपी की मांग पर विचार करेगी और किसानों की खुशहाली के लिए नई पारी में काम करेगी। किसान खुशहाल होगा तो देश भी खुशहाल होगा। जयहिंद!

( ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं, यदि आप सहमत हैं तो लाइक करें)

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