Student Career Counseling

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समाज सेवा ही हमारा धर्म है।

22/11/2022

19/11/2022

12/06/2021

जिसने सारी जिंदगी खुद जल कर लोगों को रोशनी दी.. उसी को ही लोग मेंटल कह्ते हैं।

25/04/2021

Verified

दिल्ली में अगर किसी मरीज को एडमिट कराना हो तो अक्षरधाम मंदिर के पास कॉमनवेल्थ स्टेडियम कैंपस में 500 बेड की व्यवस्था की गई है जहां पर निशुल्क इलाज पेशेंट मरीज का हो रहा हैं

अगर किसी व्यक्ति को हॉस्पिटल में बेड नही मिल रहा तो कॉमनवेल्थ स्टेडियम अक्षरधाम मंदिर के पास भेज सकते हैं,

सेवा भारती
दिल्ली
01123345014/15
शेयर करें दिल खोलकर। कोई परेशानी से बच जाएगा। 🙏

22/08/2020

मेरठ के एक गोदाम से 50 करोड़ रु की NCERT की Illegally printed किताबें पकड़ी गई हैं ।
15 Aug से पहले high alert में निगरानी के दौरान इस गोदाम में संदिग्ध हलचल देखी गयी ।
MI बोले तो military Intelligence ने raid किया तो देखा कि गोदाम में NCERT की books भरी हुई हैं ।
जांच हुई तो पाया गया कि ये अवैध प्रकाशन है ....... गोदाम के मालिक फिलहाल फरार हैं ........

मैं हमेशा से सरकारी संस्थानों को , सरकारी कर्मचारियों को और सरकारी ढर्रे को पानी पी पी के गरियाता हूँ ....... सरकारी कर्मचारी दिन रात रोते हैं कि मोदी सरकारी संस्थानों को बेच के विनिवेश कर रहा , privatisation कर रहा ......
इस देश के सबसे निकम्मे संस्थानों में कोई है तो ये NCERT ..... इसको मैं पिछले 35 साल से भोग रहा हूँ ........ इसके जैसा निकम्मा कामचोर और भ्रष्ट संस्थान इस धरती पे नही ....... ये साले आज तक कभी अपनी किताबों की आपूर्ति समय से नही कर पाए .......35 साल से तो मैं देख रहा हूँ ...... 1990 में जब हमने गांव में स्कूल शुरू किया तो NCERT पढ़ाते थे ...... माहपुर से 50 km दूर जाते । 10 चक्कर लगाते । पर कभी सब किताबें नही मिली । एक बार तो मुझे इलाहाबाद जा के किताबें लानी पड़ी।
इतना बड़ा शहर बनारस ......जो कम से कम 5 जिलों का trade का center है , उस जमाने मे सिर्फ एक दुकान थी पूरे बनारस में , कमच्छा पे , अरुणोदय नाम से .......वो अकेले विक्रेता थे ......5 जिले से लोग वहां आते थे ....... कभी समय से किताब मिली ही नही ......
NCERT कभी छाप ही नही पाई ...... छप गयी तो देश के हर कोने में पहुंचा ही नही पाई .......

NCERT के निकम्मेपन के कारण ही private प्रकाशन पनपे ....... जो किताब NCERT एक गरीब बच्चे को 50 - 60 रु में उपलब्ध करा सकता था उसे ये pvt प्रकाशन 400 में छाप के बेच रहे और डाकू pvt स्कूल वाले चला रहे ।
Pvt स्कूल को ये pvt प्रकाशन सीधे सीधे 50% कमीशन देते हैं ।

हमारे जैसे स्कूल जो अडिग हैं कि NCERT ही चलाएंगे वो कैसे कैसे भोगते हैं हमही जानते हैं । अव्वल तो कोई book seller NCERT की किताब बेच के नही राजी ।
पीछे से आपूर्ति ही नही आती बेचे क्या ***
ऊपर से एक्को पइसा बचत नही ।
सिर्फ 10% मार्जिन होता है NCERT बुक्स में .......10 बार जालंधर जाएगा तो भी पूरी किताबें नही मिलेंगी ।

इसलिये एक समय बाद विक्रेता हाथ खड़े कर देता है ।
अब parents परेशान ...... वो बेचारा भाग भाग के जालंधर जाता है किताब खोजने ......
हम लोग जब अंततः तंग आ गए तो हमने दिल्ली के एक विक्रेता से संपर्क किया । उसे फोन कर देते , वो transport से भेज देता । पैसा account में transfer कर देते । बाद में पता चला कि ऐसे विक्रेता NCERT के अवैध printers से किताब ले के supply करते हैं ।
हमने पाया कि इन so called अवैध प्रकाशक की किताबों की printing और binding दोनों NCERT की original किताब से बेहतर थी .......

कायदान NCERT का काम सिर्फ और सिर्फ किताब और कोर्स design करना होना चाहिए ......
प्रकाशन , मुद्रण और वितरण private parties को दे देना चाहिए , देश भर में हरेक राज्य में zones बना के printing और distribution का काम अन्य pvt parties को दे देना चाहिए ।
इसके अलावा NCERT को ये करना चाहिए कि भैया य्ये ल्लो किताब ....... छापो और बेचो ..... कोई Copyright नही ...... बस बेचनी 60 रु की है .......
.......खुद साले छापेंगे नही , आपूर्ति करेंगे नही ....... अगला उसी 60 रु में इनसे बेहतर किताब छाप के पूरे देश मे बेच ले रहा , उसको काम नही करने देंगे ...... मानो किताब ना हुई Currency हो गयी .......

किताब में क्या वैध क्या अवैध ???????
NCERT की किताब को सरकारी चंगुल से मुक्त करो ।

21/07/2020

उर्वशी की शादी गुरुग्राम के एक अमीर घर में हुई थी. उनके पति अमित यादव एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में अच्छी नौकरी करते थे. घर में पैसों को कोई कमी नहीं थी. उर्वशी अपने परिवार के साथ गुरुग्राम में एक आलिशान जिंदगी जीती थीं. उन्हें कभी एहसास भी नहीं हुआ था कि इस आलिशान जिंदगी में ऐसा बदलाव आएगा कि उनके परिवार को पाई-पाई का मोहताज होना पड़ेगा.

31 मई 2016 के दिन गुरुग्राम में उर्वशी के पति अमित का एक एक्सीडेंट हो गया. यह एक्सीडेंट इतना खतरनाक था कि अमित को कई सर्जरी से गुज़रना पड़ा. डॉक्टरों ने अमित की सर्जरी तो कर दी थी, पर उनकी चोट काफी गहरी थी. अपनी इस चोट के कारण वो काम नहीं कर सकते थे. इस कारण उन्हें नौकरी भी छोड़नी पड़ी. अमित के नौकरी छोड़ने के बाद से ही परिवार में सब बदलना शुरू हो गया.

उनके परिवार में अमित की नौकरी के सिवा कोई और कमाई का जरिया नहीं था. बैंक में जमा सारा पैसा धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा था. अमित की दवाइयां, बच्चों की स्कूल फीस और घर के राशन में ही इतना पैसा लग गया कि आगे के दिन गुज़ारने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचा था. अचानक हुई पैसों की इस तंगी ने पूरे परिवार का जीवन बदलकर रख दिया था

बिन पैसे के एक-एक दिन काटना मुश्किल हो रहा था. अमित के ठीक होने में अभी बहुत वक़्त था. ऐसे में अपने परिवार और बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाते हुए उर्वशी ने काम करने की इच्छा जाहिर की. उन्हें नौकरी करने का कोई अनुभव नहीं था. ऐसे में उन्हें कोई ऐसा काम ढूंढना था, जिससे वो आसानी से कर सकें.

उर्वशी अंग्रेजी जानती थीं. इसके चलते उन्हें एक नर्सरी स्कूल में टीचर की नौकरी मिल गई. पैसे कम थे पर उस समय एक-एक पाई भी उनके लिए जरूरी थी. कुछ समय तक उर्वशी ने टीचर की नौकरी की पर उससे कमाया पैसा पर्याप्त नहीं था. खर्चे बहुत ज्यादा थे, इसलिए उन्हें कुछ ऐसा करना था जिससे अधिक से अधिक पैसा कमाया जा सकें.

अंग्रेजी के बाद खाना बनाने की कला ही एक ऐसी चीज़ थी, जिसे उर्वशी अपना सकती थीं. हालांकि, उनके पास इतना भी पैसा नहीं था कि अपनी एक छोटी सी दुकान खोल सकें. इसके चलते उन्होंने आखिरी में फैसला किया कि दुकान ना सही पर वो एक छोटा सा ठेला जरूर लगा सकती हैं.

अपने इस आईडिया के बारे में जब उर्वशी ने परिवार में बताया तो सबने उनका विरोध किया. उनसे कहा गया कि वो पढ़ी-लिखी हैं और अच्छे घर से हैं, उनका यूं ठेला लगाना परिवार की प्रतिष्ठा के लिए ठीक नहीं है. हर कोई उनके खिलाफ था, पर उर्वशी जानती थीं कि परिवार की प्रतिष्ठा से उनके बच्चों का पेट नहीं भरेगा. इसलिए उन्होंने किसी की एक नहीं सुनी और छोले-कुलचे का ठेला खोलने का फैसला किया.

जो महिला कभी AC के बिना नहीं रही. जो महिला गाड़ियों में सफ़र किया करती थी. जो महिला बड़े रेस्तरां में खाया करती थी, आज वो गुरुग्राम के सेक्टर 14 की कड़ी धूप में खड़ी थी. चूल्हे की आग और तेल से निकलते धुएं के बीच उन्हें खाना बनाना था. छोले-कुलचे का ये ठेला चलाना उनके लिए आसान नहीं था.

कड़ी धूप में, बिना किसी की मदद के उन्हें ये काम करना था. उर्वशी जानती थीं कि परेशानियां कई आएंगी, पर अपने परिवार के लिए उन्हें हर परेशानी का सामना करना था. उर्वशी के परिवार का मानना था कि वह कुछ ही दिनों में ये सब बंद कर देंगी, लेकिन कुछ ही महीनों में उर्वशी का यह ठेला पूरे इलाके में प्रसिद्ध हो गया.

लोग ना सिर्फ़ उर्वशी के स्वादिष्ट छोले-कुलचे से, बल्कि उनके लहज़े से भी प्रभावित थे. उन्होंने पहले किसी इंग्लिश बोलने वाली महिला को यूं ठेला लगाते नहीं देखा था. उर्वशी इतनी प्रसिद्ध हो गई थी कि अब गुरुग्राम के दूसरे इलाकों से भी लोग उनके पास आने लगे थे. शुरुआती दिनों में ही उन्होंने दिन में 2500 से 3000 रूपए कमाने शुरू कर दिए थे.

उर्वशी की मेहनत रंग लाने लगी थी. कुछ वक़्त बाद उनके परिवार ने भी उनका पूर्ण सहयोग दिया. अकेले अपने दम पर उर्वशी ने घर का खर्च उठा लिया था. उनकी इस कहानी ने कई लोगों का ध्यान खींचा. सोशल मीडिया पर जैसे ही उर्वशी की कहानी आई तो उनके पास ग्राहकों की लंबी कतार लग गई. उनका यह ठेला अब एक सफल बिजनेस का रूप ले चुका था. वह प्रति माह इतना पैसा कमा रही थीं कि अपने पति के ठीक होने तक घर की सारी ज़िम्मेदारी उन्होंने अपने कंधों पर उठाए रखी. एक बार जैसे ही उनके पति ठीक हुए तो घर के आर्थिक हालात फिर स्थिर होने लगे. जैसे ही सब ठीक हुआ तो उर्वशी ने इस छोटे से ठेले को एक रेस्तरां का रूप दे दिया.

आज उनके रेस्तरां में कई और भी पकवान हैं पर उनके छोले-कुलचे आज भी लोगों के दिल और जुबां पर छाए हुए हैं. उर्वशी ने दुनिया को बताया कि अगर खुद में विश्वास हो तो आप हर परिस्तिथि से खुद को बाहर निकाल सकते हैं।

05/06/2020

बची प्रकृति और पर्यावरण को बचाने और जीवनोपयोगी बनाने के लिए भारतीय जीवन दर्शन को पढ़ें, जानें । समझें और इसे अपनाएँ । विश्व पर्यावरण दिवस का देश के लोगों के लिए यही महत्वपूर्ण और उपयोगी सन्देश है ।

05/04/2020

ज्योति से ज्योति जलाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो।

05/04/2020

Wonderful message of leading a fulfilling life.

04/04/2020

दोनों हाथों से वंचित, पेशे से ग्राफिक डिज़ाइनर और शौक ड्राइविंग का

मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जिसमें अपनी इच्छा शक्ति को पूरा करने की क्षमता होती है। बस जरूरत है एक जूनून की, एक ज़िद की। फिर चाहे वो शारीरिक रूप से चाहे कितना भी बेबस क्यों न हो, अपनी मुश्किल से मुश्किल मंज़िल को पा ही लेता है।

केरल के इडुक्की जिले की जिलोमोल मैरिएट थॉमस एक ऐसे ही जूनून की जीती जागती मिसाल हैं जो जन्म से ही Bilateral Amelia रोग के कारण अपने दोनों हाथों से वंचित होते हुए भी आज पेशे से एक ग्राफिक डिज़ाइनर हैं और साथ ही ये एशिया की पहली ऐसी महिला हैं जिन्हें ड्राइविंग लाइसेंस मिला है।

जिलोमोल अपने दोनों हाथों के बिना ही अपनी दिन चर्या बड़ी ही आसानी से पूरी कर लेती हैं। जीवन की इस विषम परिस्थिति में भी इन्होंने ग्राफिक डिज़ाइनर के रूप में अपना प्रोफेशनल करियर बनाया। अपने दोनों हाथों के न होते हुए भी इन्हें बचपन से ही इच्छा थी की ये कार चलाएं। ये काम वैसे तो बेहद मुश्किल था लेकिन इनके दृढ़ विश्वास के आगे प्रकृति ने भी अपने घुटने टेक दिए। यहाँ तक की इन्होंने अपने जूनून के बल पर प्रशासनिक अड़चनों को भी दूर कर दिया और आज अपने ड्राइविंग कौशल से ये सभी को अचंभित कर देती हैं। अपनी सकारात्मक सोच और अपने अटूट विशवास को ही जिलोमोल इस अभूतपूर्व सफलता का श्रेय देती हैं।

We Salute Ms. Jilumol Mariet Thomas
Mobile : 9415629995

04/04/2020

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