23/07/2025
प्रतियोगी विद्यार्थियों की बायोग्राफी
संघर्षों को जिया है मैंने,
मेरे भीतर सैलाब भरा,
जग से चाहा कभी नहीं कुछ ,
आंसू बनकर ना बही व्यथा।
कितना भी पराजित होता हूँ,
कुछ भी ना किसी से कहता हूँ,
हर रोज़ गुलाल गुनाहों के,
शिरोधार्य मैं करता हूँ।
हर रोज़ पराजय ,रोज़ विजय,
खुद ही ढांढस बंधता हूँ,
हर रोज़ हृदय के दीपक में,
घृत साहस के भरता हूँ।
वैभव विलास जीवन के रस,
विचलित करने को डटे हुए,
हर रोज़ बढ़ाता हूं हवि को,
तप और प्रखर करता हूँ।
संबंध सभी हो गए शिथिल,
अब मात्र निशाचर बाकी हैं,
जो खोज रहें मेरा जीवन,
अब मात्र निशा की झांकी है।
मेरी लौ से नफरत उनको,
उनकी नफरत से प्यार मुझे,
इस नफरत और इन दूरी से
जग अपना रोशन करता हूँ।
घर गाँव गली मुहल्ले में,
हर शय मुझको तौल २हा,
कब अपने तीर कमान धरूं,
कब मैं वापस लौट रहा।
एकांत युद्ध,एकांत सफर,
एकांत प्रतिज्ञा करता हूँ,
जय में सबकी साझेदारी ,
हार एकेले सहता हूँ।
है कौन धरा पर जिसके भीतर,
भय का कोई अंश नहीं,
है कौन धरा पर जिसके भीतर,
संशय नहीं है शेष।
सारे भय समस्त अनिश्चय का,
विषपान किया है मैंने,
मेरे समक्ष कैसा संशय ,
मैं नीलकंठ हूँ देख।
प्रारब्ध नहीं, संदिग्ध नही,
क्या अंधियारे का खेद,
कोई बंधन स्वीकार नही,
उत्साह रहे निःशेष।
नियति नियंत्रण चाह नहीं,
जो हो हाथों की रेख,
काल खड़ा विगलित करने
तो काल भी जाए चेत।
भवितव्य रहे भयभीत सदा,
मेरे कदमों को देख,
मेरे कदमों की गति से ,
उत्कीर्ण हुए अभिलेख ।
"समुद्र"
18/06/2025