15/02/2026
Shivratri ki Hardik shubhkamnayein
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
आज हमारा हिन्दू धर्म एक ऐसा धर्म बन गया है जहा हिन्दू एक दुसरे का ही गला काटने में आगे रह रहे हैं, पहले कुछ पाखंडियों और नेताओ जो किसी न किसी धर्म विशेष के पालनहार बने फिर रहे थे उनकी बातो में आकार बँटे और कमोबेश आज वो स्थिति और भी भयावह हो चुकी है जो घृणा का बिज कल बोया गया था आज उस बिज ने एक विकराल पेंड का रूप ले लिया है.....पूरा हिन्दू समाज इतना बिखर गया है की उसको बटोरना बहुत ही मुश्किल हो र
15/02/2026
Shivratri ki Hardik shubhkamnayein
12/02/2026
हम जल्द ही आपकी सेवा में उपस्थित होंगे
कृपया ये विडिओ अधिक से अधिक शेयर कीजिए ओर इन राजनेताओ तक ये विडिओ पहुचाए वर्ण व्यवस्था क्यों आवश्यक है ओर जाती ओर वर्ण क्यों बनाए गए थे हमारी सनातन व्यवस्था , ये एक प्रकर्ति ओर समाज मैं संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था है , आज सवर्ण के सब अधिकार छीन कर ये लोग प्रकर्ति ओर समाज का विनाश कर रहे हैं ॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।
Jai Maa
राधे राधे बोल ।।
19/04/2025
# # गीता में कर्मयोग
गीता में कर्मयोग, जीवन जीने का एक ऐसा मार्ग है जो कर्म के प्रति समर्पण और फल की आसक्ति से मुक्ति पर बल देता है। यह योग हमें सिखाता है कि हम अपने कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करें, कर्म के परिणाम की चिंता किए बिना। यह योग हमें सांसारिक बंधनों से मुक्त होने और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
**कर्मयोग के मुख्य सिद्धांत:**
* **निष्काम कर्म:** कर्मयोग का मूल सिद्धांत निष्काम कर्म है। इसका अर्थ है कर्म करना केवल कर्तव्य समझकर, फल की इच्छा के बिना। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि कर्म करना हमारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर नहीं। फल ईश्वर के हाथ में है।
* **कर्मबंधन से मुक्ति:** फल की आसक्ति ही हमें कर्मबंधन में बांधती है। निष्काम कर्म से हम इस बंधन से मुक्त हो सकते हैं और मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।
* **समर्पण भाव:** कर्मयोग में समर्पण भाव का विशेष महत्व है। सभी कर्म ईश्वर को समर्पित करके करने से अहंकार कम होता है और मन शांत रहता है।
* **स्थितप्रज्ञता:** कर्मयोगी सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समभाव से रहता है। वह परिस्थितियों से विचलित नहीं होता और अपने कर्मपथ पर अडिग रहता है।
* **कर्तव्य पालन:** कर्मयोग हमें अपने धर्म का पालन करने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें सिखाता है कि हमारा कर्तव्य ही हमारी पूजा है।
**कर्मयोग के लाभ:**
* **मानसिक शांति:** निष्काम कर्म से मन शांत और स्थिर रहता है। चिंता और तनाव से मुक्ति मिलती है।
* **आत्म-विकास:** कर्मयोग आत्म-विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। यह हमें अपनी क्षमताओं को पहचानने और उन्हें विकसित करने में मदद करता है।
* **मोक्ष प्राप्ति:** गीता के अनुसार, कर्मयोग मोक्ष प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण साधन है।
**कर्मयोग का अभ्यास:**
कर्मयोग का अभ्यास अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे कार्यों से शुरू किया जा सकता है। हर काम को कर्तव्य समझकर, फल की चिंता किए बिना करना ही कर्मयोग का पहला कदम है। ध्यान, योग और सत्संग भी कर्मयोग के अभ्यास में सहायक होते हैं।
**निष्कर्ष:**
गीता में वर्णित कर्मयोग जीवन जीने की एक व्यावहारिक और प्रभावी पद्धति है। यह हमें कर्म के महत्व को समझाते हुए, फल की आसक्ति से मुक्त होने और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। इस योग को अपनाकर हम एक संतुलित, सार्थक और आनंदमय जीवन जी सकते हैं।
19/04/2025
# # तत्व ज्ञान: एक संक्षिप्त परिचय
तत्व ज्ञान, जिसे तत्वमीमांसा या आंटोलॉजी भी कहा जाता है, दर्शनशास्त्र की एक शाखा है जो अस्तित्व की प्रकृति, वास्तविकता की संरचना, और अस्तित्व के विभिन्न प्रकारों के बीच संबंधों का अध्ययन करती है। यह उन मूलभूत श्रेणियों और अवधारणाओं की पड़ताल करता है जो हमें दुनिया को समझने और उसका वर्णन करने में मदद करती हैं, जैसे कि वस्तुएँ, गुण, संबंध, घटनाएँ, समय, स्थान, और कारणता।
**तत्व ज्ञान के कुछ प्रमुख प्रश्न:**
* क्या वास्तविक है? क्या केवल भौतिक वस्तुएँ वास्तविक हैं, या अमूर्त अवधारणाएँ जैसे संख्याएँ और विचार भी वास्तविक हैं?
* अस्तित्व के विभिन्न प्रकार क्या हैं? क्या केवल एक प्रकार का अस्तित्व है, या कई प्रकार हैं?
* वस्तुओं, गुणों, और संबंधों के बीच क्या संबंध है? क्या गुण वस्तुओं से स्वतंत्र रूप से मौजूद हो सकते हैं?
* परिवर्तन की प्रकृति क्या है? क्या वस्तुएँ समय के साथ अपनी पहचान बनाए रखती हैं, या वे पूरी तरह से नई वस्तुओं में बदल जाती हैं?
* समय और स्थान की प्रकृति क्या है? क्या वे स्वतंत्र संस्थाएँ हैं, या वे वस्तुओं और घटनाओं से जुड़ी हुई हैं?
* कारणता की प्रकृति क्या है? एक घटना दूसरे घटना का कारण कैसे बनती है?
**तत्व ज्ञान के विभिन्न दृष्टिकोण:**
* **भौतिकवाद:** यह दृष्टिकोण मानता है कि केवल भौतिक पदार्थ ही वास्तविक है।
* **आदर्शवाद:** यह दृष्टिकोण मानता है कि वास्तविकता मूल रूप से मानसिक या आध्यात्मिक है।
* **द्वैतवाद:** यह दृष्टिकोण मानता है कि वास्तविकता दो मूलभूत प्रकार के पदार्थों से बनी है, जैसे कि मन और पदार्थ।
* **बहुलवाद:** यह दृष्टिकोण मानता है कि वास्तविकता कई मूलभूत प्रकार के पदार्थों से बनी है।
**तत्व ज्ञान का महत्व:**
तत्व ज्ञान का अध्ययन हमें दुनिया के बारे में हमारे मूलभूत मान्यताओं को समझने और उनका मूल्यांकन करने में मदद करता है। यह हमें अधिक स्पष्ट और सुसंगत तरीके से सोचने और तर्क करने में भी मदद करता है। इसके अलावा, तत्व ज्ञान का अन्य विषयों पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, जैसे कि विज्ञान, धर्म, नैतिकता, और राजनीति।
**आगे की पड़ताल:**
तत्व ज्ञान एक जटिल और बहुआयामी विषय है। अधिक जानकारी के लिए, आप निम्नलिखित विषयों का अध्ययन कर सकते हैं:
* प्लेटो का आदर्शवाद
* अरस्तू का पदार्थवाद
* देकार्त का द्वैतवाद
* कांट की आलोचनात्मक दर्शन
* हाइडेगर की अस्तित्ववादी आंटोलॉजी
यह एक संक्षिप्त परिचय मात्र है। आपको अपनी रूचि के अनुसार और गहराई से इस विषय का अध्ययन करना चाहिए।