24/09/2022
Gumbal Astrology Research Centre
Free Astrology by Dalip Gumbal
24/09/2022
Shani ki Sade Sati : अप्रैल 2022 में मकर से कुंभ राशि में आएंगे शनि, जानिए प्रभाव और उपाय
Shani ki Sade Sati : अलगे साल 2022 में शनि देव राशि परिवर्तन करेंगे। मौजूदा समय में शनि मकर राशि में विचरण कर रहे हैं जिसके चलते कई राशियों पर शुभ व अशुभ प्रभाव देखने को मिल रहा है। इस दौरान कुछ राशियों पर शनि की साढे साती (shani ki sade sati 2021) चल रही है तो कुछ राशियों पर शनि की ढैय्या चल रही है। शनि को न्याय का देवता माना गया है। यानी शनि के प्रभाव के कर्मों के फल को भोगना ही पड़ता है। शनि का अगला राशि परिवर्तन कब होगा और इसका अन्य राशियों पर क्या असर होगा? आइए जानते हैं-
शनि की राशि परिवर्तन का राशियों पर प्रभाव-
ज्योतिषाचार्यां के अनुसार, शनि जब मकर राशि में है तो ऐसे समय में मकर, धनु और कुंभ राशियों के जातकों को पर शनि की साढ़े साती मानी जाती ही। शनि की साढ़े साती होने पर पीड़ित राशि वालों को मानसिक कष्ट, शारीरिक कष्ट और गृह-क्लेश का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सलाह है कि इन तीन राशियों के लोग गृह-क्लेश से बचें और वाहन प्रयोग में सावधानी वर्तने के साथ ही ज्यादा उलझनों में न पड़ें। शनि एक राशि में ढाई साल तक रहते हैं।
अप्रैल 2022 में शनि बदलेंगे राशि-
29 अप्रैल 2022 को शनि मकर से निकलकर जब कुंभ राशि में भ्रमण करेंगे तब मीन, कुंभ और मकर राशि पर शनि की साढ़ेसाती रहेगी। इस दौरान इन तीनों राशियों के जातकों को मानसिक कष्ट व गृह-क्लेश का सामना करना पड़ सकता है।
शनि देव के उपाय :
यदि आपकी राशि में शनि की साढ़े साती चल रही है तो इसके प्रभावों को कम करने के लिए ज्योतिषशास्त्र में उपाय भी बताए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, शनि की साढ़े साती का असर कम करने के लिए शनिवार के दिन पीपल के पेड़ की पूजा करना चाहिए। सुबह स्नान करके जल चढ़ाने के साथ ही शाम को उसके नीचे दिया भी जलाना चाहिए जिससे कि शनि का बुरा प्रभाव कम हो सके। इसके अलावा कबूतर को दाना डालने व काली गाय को रोटी आदि खिलाने से भी शनि का असर कम होता है। शनि की साढ़े साती व ढैय्या को लेकन अपने पंडित से भी उपाय पूछ सकते हैं।
15/11/2021
जय तुलसी माता
Jai Tulsi Mata
*तुलसी कौन थी?*
```तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था.
वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.
एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा``` -
स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर``` आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प
नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये।
सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता ।
फिर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।
भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे
ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?
उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।
सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे
सती हो गयी।
उनकी राख से एक पौधा निकला तब
भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से
इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में
बिना तुलसी जी के भोग```
```स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में```
```किया जाता है.देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है !```
*इस कथा को कम से कम दो लोगों को अवश्य सुनाए आप को पुण्य अवश्य मिलेगा। या चार ग्रुप मे प्रेषित करें।*
सभी माता के भक्तों को जय माता दी
कल माता लगाने का शुभारंभ6:33 से लेकर10:17तक है
09/04/2021
Navratra starts
05/04/2021
Jai Jai Shree Ram
30/08/2020
Shrad starting on 02-Sep-2020
21/08/2020
Jai Shri Ganesh
Happy Ganesh chaturthi
भारत के हर कोने में गणेशोत्सव की धूम कल से शुरु हो जाएगी। साल गणेश चतुर्थी 22 अगस्त से लेकर 1 सितंबर तक चलेगी। हालांकि कोरोना की वजह से इस साल बप्पा का आगमन थोड़ा-फीका पड़ गया है। 10 दिन चलने वाले इस त्यौहार में पूजा-पाठ का विशेष महत्व है। हालांकि इस दौरान चांद को देखने और तुलसी का इस्तेमाल वर्जित माना जाता है।
गणेश चतुर्थी का शुभ मुहूर्त:
मध्यान्ह गणेश पूजन मुहूर्त - 10:46 सुबह से 1:57 दोपहर तक
इस समय न देखें चांद - 8:47 रात से 9:22 रात तक
चतुर्थी तिथि आरंभ - 21 अगस्त की रात 11:02 बजे से।
चतुर्थी तिथि समाप्त - 22 अगस्त की रात 7:56 बजे तक।
गणेश विसर्जन - मंगलवार 1 सितंबर 2020
गणेश जी की मूर्ति कहां स्थापित करें
आप घर के मंदिर या देव स्थान में गणेश प्रतिमा स्थापित कर सकते हैं। पूजा स्थल की अच्छी तरह साफ-सफाई करके चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और चावल रखें। इसके बाद मूर्ति स्थापना करके दूर्वा, गंगाजल और पान के पत्ते स्नान करें। भगवान गणेश को पीले वस्त्र या मोली बांधें। इसके बाद भगवान को रोली-तिलक, फल-फूल, प्रसाद चढ़ाए और आरती करके पूजा करें।
भगवान गणेश को जो दूर्वा चढ़ा रहे हैं उसे रोजाना बदलें। इसके साथ ही उनके चरणों में 5 हरी इलायची और 5 कमलगट्टे रखें। पूजा खत्म होने के बाद लाल कपड़े में कमलगट्टे बांधकर तिजोरी में रख दें और इलायची को प्रसाद के साथ बांट दें। इससे आपकी सभी परेशानियां दूर होंगी।...
Jai Shri Ganesh
11/08/2020
Krishna Janmashtami 2020:
जन्माष्टमी (Janmashtami) हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है. इस त्योहार को देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है. हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक, सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्णु (Lord Vishnu) के आठवें अवतार श्रीकृष्ण (Lord Krishna) के जन्मदिन को श्रीकृष्ण जयंती या फिर जन्माष्टमी (Janmashtami 2020) के रूप में मनाया जाता है. हालांकि, पिछले साल की तरह इस साल भी लोगों इस उलझन में हैं कि जन्माष्टमी 11 अगस्त को मनाई जाएगी या फिर 12 अगस्त को मनाई जाएगी.
दरअसल, माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद यानी कि भादो माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था. ऐसे में अगर कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को देखा जाए तो जन्माष्टमी 11 अगस्त की होनी चाहिए, लेकिन अगर रोहिणी नक्षत्र की मानें तो फिर 12 अगस्त को कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जानी चाहिए. बता दें कि कुछ लोगों के लिए अष्टमी तिथि का महत्व अधिक होता है तो वहीं कुछ अन्यों के लिए रोहिणी नक्षत्र का महत्व होता है.
ऐसे में मथुरा में जन्माष्टमी 12 अगस्त को मनाई जा रही है. वहीं नंदलाल के गांव ब्रज में 11 अगस्त को धूमधाम से जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाएगा.
Jai Shri Krishna
Gumbal Astrology Research Centre
07/08/2020
Jai jai shree Ram
07/08/2020
Jai Jai Shri Ram
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