14/03/2023
पुरातन काल से ही अहीरों का शस्त्रों व सेना से अटूट नाता रहा है i
"अहीर" शब्द संस्कृत के "आभीर " शब्द का बिगड़ा हुआ स्वरुप है जिसका अर्थ है - निर्भीक i यादव वीरों और उनकी अजेयी नारायणी सेना ने महाभारत के युद्ध में अपना बेजोड़ शौर्य प्रदर्शित किया था i
प्राचीन समय में तो कई राज्यों में सेनापति का पद सिर्फ अहीरों के लिए ही आरक्षित था i
नर्मदा के तट पर सर्वप्रथम समुद्रगुप्त की विजयवाहिनी को रोकने वाले वीर अहीर ही तो थे i
फिर दासता का युग आया - तुर्कों का शासनi लेकिन अहीर फिर भी अपनी तलवारों का शौर्य दिखलाते रहे i
करनाल के युद्ध में वो शेर का बच्चा शमशेर बहादुर राव बालकिशन , अपने 5000 अहीर रणबांकुरों के साथ उस लूटेरे नादिरशाह से जूझ गया i
नादिरशाह ने अहीरवाल की तलवारों की दिल खोल कर प्रशंसा की दिल्ली के बादशाह के समक्ष i इस के बाद फिरंगियों का युग आया i
1803 में एंग्लो - मराठा युद्ध में अहीरवाल राव तेज़ सिंह जी के नेतृत्व में अपने भाई मराठों के साथ खड़ा था लेकिन मराठा पराजय ने अहीर रियासत को अंग्रेजो का बैरी बना दिया i
फिर , सन 1857 में समस्त हिन्द में बदलाव की उम्मीद ने अंगडाई ली i अहीरों की तलवारे फिर चमकी रणखेतों में i राव किशन सिंह जी की "मिसरी" चारण - भाटों के वीर रस के स्वरों में समा गयी i वीर अहीर एक बार फिर नसीबपुर में रणभूमि को लाल लहू से रंगने को तैयार थे i नसीबपुर में अहीरवाल की तलवारें विजय हासिल करने ही वाली थी कि एक अनहोनी हो गई i राव किशन सिंह जी फिरंगी सेनापति जेर्राद को काट कर बैरी से जूझते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए i
हिन्द के गद्दार फिरंगियों से मिल गए i नसीबपुर की पराजय अहीरों को लील गई i वीर अहीरवाल को खण्डित कर दिया गया और सेना में अहीरों की भर्ती पर विराम लगा दिया गया i
अंग्रेजो ने 1857 के बाद जाति आधारित फौज का गठन किया जिस की वफादारी सिर्फ अंग्रेजो और जाति विशेष के प्रति थी न की मादरे वतन के लिए i अहीरों की जगह कुछ अंग्रेजपरस्त जातियों को फौज में स्थान मिला i
अहीरवाल बिखर गया क्योंकि इस अर्ध - मरुस्थल व जल - विहीन भूमि में अहीर अपनी तलवार का खाते थे i पर प्रथम विश्व - युद्ध में जब अंग्रेजो को सैनिको की जरुरत पड़ी तो फिर उन्हें अहीर कौम की याद आयी i
प्रथम विश्व - युद्ध ने अहीर सैनिक परम्परा को प्राणवायु प्रदान करी i प्रथम विश्व -युद्ध में अहीरों ने अपने शौर्य का ऐसा जलवा बिखेरा कि दितीय विश्व -युद्ध में करीब 40 हज़ार यदुवंशी मोर्चे पर थे जो कि किसी भी हिन्दू जाति की संख्या व उसके सैनिको के अनुपात में सर्वाधिक थे i
बर्मा के मोर्चे पर अहीर कौम के शौर्य का परचम लहरा दिया -उमराव सिंह जी , विक्टोरिया क्रॉस नेi लेकिन , 1940 में सिंगापुर में अहीर सैनिको के विद्रोह ने अंग्रेजो के मन में इस जंगजू कौम का खौफ पैदा कर दिया और इस वजह से पृथक अहीर रेजिमेंट का गठन ना हो सका i
15 अगस्त 1947 में गुलामी की जंजीरे टूटी व नये भारत का उदय हुआ i फिर से अहीरों में उम्मीद जगी कि शायद अब न्याय होगा और उनकी रेजिमेंट बनेगी i
1948 में कश्मीर मोर्चे पर अहीरों ने माँ भारती को अपने खून का तिलक किया i
फिर आया 1962 , रेजांगला - 18 नवम्बर दीवाली के महीने में , रणबांकुरे अहीरों ने खून की होली खेली i हिमालय की सफ़ेद बर्फ को अपने और अपने दुश्मनों के लहू से लाल रंग दिया i पर देखिये दुर्भाग्य , जब स्वर -सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने मुल्क के शहीदों के लिए "ए मेरे वतन के लोगों" गीत गाया तो उस में "कोई सिख, कोई जाट, मराठा तो थे" लेकिन "अहीर" नहीं थे i इस अपमान की वजह साफ़ थी - जब तक पृथक अहीर रेजिमेंट नहीं होगी , तब तक अहीर शौर्य को उचित सम्मान नहीं मिल सकता , जब तक कंधे पर "अहीर " नहीं लिखा होगा , तब तक कौम का इतिहास अन्धकार में ही रहेगा i
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II वीर भोग्या वसुन्धरा II
II राष्ट्र-रक्षा परम धर्म है,अहीर रेजिमेंट राष्ट्र-रक्षा हेतु बलिदान के लिए II ..........................
Er.PUSHPENDRA YADAV KAZIPURIYA
रेवाड़ी, अहीरवाल ।