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Photos 14/10/2014

व्यापारियों के लिए धन प्राप्ति के विशेष प्रयोग

दीपावली का महापर्व आनेवाला है, यह पर्व महालक्ष्मी का पर्व है।दीपावली केपर्व पर विशेष रूप सेलक्ष्मी जी की पूजा अराधना की जाती है। क्योंकि लक्ष्मी जी ही धन वैभव, सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी है। जो मनुष्य अपनेजीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है.सुख, समृद्धि, ऐष्वर्य की प्राप्ति करना चाहता है,इस भौतिक युग में सभी भौतिक सुखोंकी कामना करता है उसे निश्चित ही माता लक्ष्मी की दिपावली के महापर्व पर प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए। दिपावली केदिन विशेष रूप से व्यापारियों मे उत्साह देखा जा सकता है,क्यों कि व्यापारीगण चाहतें है कि वर्ष भर माता लक्ष्मी की कृपा दृष्टि उन पर बरसती रहें और उनका व्यापार दिन दौगुनी रात चैगुनी तरक्की करता रहे। उनको वर्ष भर अपने व्यापार में आषातीत लाभ होता रहे, व्यापार कभी मन्दा ना हो। इसी उद्देष्य से दिपावली के दिन पूरे उत्साह व जोष के साथ माता लक्ष्मी की पूजा, अराधना आदि करतेहै। आप व्यापारी भाईयों को ध्यान मे रखते हुए नीचे कुछ ऐसे प्रयोग दिये जा रहे है जो विशेष रूप सेआपके लिए ढूंढ कर लाये गए है। इस दिपावली पर इन प्रयोगों को सम्पन्न किजिए और अपनेजीवन को खूषियों से भर लिजिए......।।
1. धन वृद्धि हेतु प्रयोग:- यह शाबरी उपाय बहुत प्रभावकारी है। इस टोटकेको करने से केवल धन वृद्धि होती है बल्कि सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते है। जिन भाइयों कि दूकान, प्रतिष्ठान अथवा घर में धन की आवक तो होती हो लेकिन रूकता ना हो यानि बरकत ना होती हो।तो घर के प्रमुख को एक दिव्य शंख एवं तीन हकीक पत्थर, चार गौमती चक्र एवं तांबेका सिक्का लाल कपड़े मेसाथ बांधकर व्यापारिक प्रतिष्ठान में पूजा स्थान पर रख दे।ध्यान रखें इस क्रिया को करते समय लक्ष्मी का ध्यान करतें रहें नित्य प्राप्तः इसे अगरबत्ती व धूप दे। अगली दिपावली को इस पोटली को सामग्री सहित नदी,तालाब आदि में विसर्जित कर दें और नई सामग्री को बांध कर रख दें। यह साबरी उपाय है.इसमें किसी प्रकार के जाप की आवष्यक्ता नही हैं।

Photos 12/10/2014

घर में चिरस्थाई लक्ष्मी कृपा के लिए फलदायी यंत्र की साधना

घर में चिरस्थाई लक्ष्मी कृपा के लिए फलदायी यंत्र की साधना यदि शुभ मुहूर्त तथा शुभ समय के साथ यंत्र की पूजा अर्चना की जाये तो चमत्कारिक फल की प्राप्ति होती है। इनमे से भूपृष्ठ, मेरूपृष्ठ, पाताल, मेरूप्रस्तर, कूर्मपृष्ठ आदि मुख्य हैं तथा शुद्धि के लिए यंत्रों में रेखा, बीज, अंक, मंत्रों आदि का प्रयोग होता है। यंत्र पर लिखने के लिए अष्टगंध, पंचगंध की स्याही बना कर या केसर, हल्दी, सिंदूर आदि का प्रयोग किया जाता है। भोजपत्र, तांबा, चांदी, सोने आदि के पत्र पर यह निर्मित होता है। अनार, चमेली, नीम, आम, आक की टहनी, पक्षियों के पंख आदि से लिखा जाता है। शुभ मुहूर्त में प्राण प्रतिष्ठित यंत्र मनोकामना पूर्ति में सहायक होने के साथ ही आपकी जिंदगी बदलने में उपयोगी साबित होता है। कुछ उपयोगी यंत्र निम्न हैं-
श्री यंत्र - श्री यंत्र आध शार्क का प्रतीक है। इसे यंत्रों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण ‘यंत्र राज’ भी कहा जाता है। इस यंत्र की अधिष्ठात्री देवी मां त्रिपुर सुंदरी हैं। रविपुष्य, गुरुपुष्य नक्षत्र या अन्य शुभ मुहूर्त में रजत, ताम्र, स्वर्ण या भोजपत्र पर इस यंत्र का निर्माण करें। तत्पश्चात् यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा कर मां त्रिपुर सुंदरी का ध्यान एवं कमल गट्टे या रूद्राक्ष की माला से निम्न मंत्र का जाप करें-
दीपावली, शरद या चैत्र नवरात्रा, पंचमी, सप्तमी, अष्टमी की रात्रि को इस यंत्र की साधना विशेष फलदायी मानी जाती है। इस यंत्र की पूजा-अर्चना से दुख, दरिद्रता दूर होकर घर में चिरस्थाई लक्ष्मी का वास होता है। व्यापार, नौकरी में मनोनुकूल फल प्राप्ति होती है। सुख, समृद्धि की प्राप्ति के साथ सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं।
व्यापार वृद्धि यंत्र - कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, रवि या गुरुपुष्य नक्षत्र में यह यंत्र भोजपत्र, तांबे, चांदी या स्वर्ण पत्र पर शुभ मुहूर्त में बनवा कर इसकी पूजा-अर्चना करें। श्वेत आसन, श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र का प्रयोग कर ‘ॐ ह्रीं श्रीं नम:’ मंत्र की एक माला का जाप 21 या 51 दिन तक करने पर यंत्र सिद्ध हो जाता है। इस यंत्र को तिजोरी, अलमारी या व्यापार स्थल पर रखने से व्यापार में वृद्धि और लाभ मिलता है।
कनकधारा यंत्र - भौतिकवादी युग में प्रत्येक व्यक्ति शीघ्र धनवान बनना चाहता है। धन प्राप्ति हेतु रवि या गुरुपुष्य नक्षत्र यजा शुभ मुहूर्त में इस यंत्र का निर्माण कर मां लक्ष्मी के समक्ष कनकधारा स्तोत्र एवं निम्न मंत्र का नित्य जाप करें- ‘ॐ वं श्रीं वं ऐं लीं श्रीं क्लीं कनकधारयै स्वाहा।’
पीड़ा शांत होकर शुभ फल प्राप्त होता है।

Photos 10/10/2014

11अक्टूबर करवा चौथ --पति की दीर्घायु के लिये

पुराणो और ग्रंथो में विभिन्न कामनाओं के लिए विभिन्न प्रकार के व्रत और उपवास बताये गए है,
इन व्रतो में सबसे श्रेष्ठ व्रत जो मनपसन्द जीवनसाथी की कामना पति की दीर्घायु और दाम्पत्य
सुख के लिये कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का व्रत है ,यह करक चतुर्थी या करवा चौथ के नाम से
जाना जाता है ,महाभारत काल में पांडवो की रक्षा हेतु द्रोपती ने यह व्रत किया था ,शास्त्रो में इस
व्रत से जुडी अनेक कथाये प्रचलित है,अपने पति के उतम स्वास्थ्य एव उसके मंगल कामनाओं के
निमित किया जाने वाला यह व्रत सुख सौभाग्य प्रदाता है,वास्तव में यह व्रत दाम्पत्य जीवन में
आ रही परेशानियों पति पत्नी के बीच चल रहे मन मुटाव व अन्य सूक्ष्म बाधाओ को दूर करने में
समर्थ है,

वर्तमान में यह व्रत हमारे देश में ही नहीं विदेश में भी किया जाता है,जो भारत वंशी हमारे देश से

दूर अमेरिका कनाडा,ऑस्ट्रेलिया,लन्दन इत्यादि देशो में रहते है वो भी अपने पति की दीर्घायु और

मंगल कामना के लिए ये व्रत रखते है

इस माह यह व्रत 11 अक्टूबर 2014 शनिवार को किया जायेगा,इस व्रत में चंद्रोदय कालीन

चतुर्थी तिथि ग्रहा की जाती है,अगर दो दिन चंद्रोदय व्यापिनी या दोनों ही दिन न हो तो पहले

दिन वाली चंद्रोदय ही लेनी चाहिए।इस व्रत को सनातन धर्म में अधिकांश स्त्रीया पति की मंगल

आयु और सुहाग की प्राप्ति के लिये करती है,

सनातनी हिन्दू स्त्रियों के लिये यह करवा चौथ का व्रत अखण्ड सुहाग को देना वाला माना गया

है, स्त्रीया चन्द्रमा की पूजा करके अर्ग्य देकर चलनी से चन्द्रमा को देखकर पति को देखती है।

और पति के हाथ से पानी पीकर ही व्रत को पूर्ण करती है।

हिन्दू संस्कृति में पति को परमेश्वर ही माना गया है,इसलिए यह व्रत पति और पत्नी दोनों के

लिये अपार प्रेम,त्याग,समर्पण का प्रतिक है,इसलिये स्त्रीया इस दिन पूर्ण सुहागिन का श्रृंगार

करके चन्द्रदेव की पूजा कर अपने अखण्ड सुहाग की प्राप्ति के लिये प्रार्थना करती है। महिलाये

सोलह श्रृंगार करके दिन भर भूखी प्यासी रहकर ईश्वर के सामने यह प्रण लेती है की मै मन

कर्म,वचन से पति के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण की भावना से रहू और मेरा सुहाग सदा अमर बना

रहे।

कार्तिक मास की चतुर्थी को केवल चन्द्रदेव की ही पूजा नहीं होती,बल्कि शिव पार्वती,भगवान

गणेश और कार्तिकेय की भी पूजा होती है। शिव पार्वती की पूजा का विधान इसलिए माना गया है

की जिस प्रकार शैलपुत्री पार्वती ने घोर तपस्या करके भगवन शंकर को प्राप्त किया वैसे ही उन्हें

भी प्राप्त हो,वैसे भी गौरी पूजन कुवारी कन्यायो और विवाहिता स्त्रियों के लिए विशेष महत्व

माना गया है।

[ कितना इंतज़ार करवायंगे चन्द्र देव ]

कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि यानि करवा चौथ को चन्द्र देव के निकलने पर और चन्द्र दर्शन होने

पर ही उपवास पूर्ण होता है। इस बार चन्द्र देव ज्यादा इंतज़ार नहीं करवायेंगे ,भारतीय स्टैण्डर्ड

टाइम के अनुसार

दिल्ली में ---- 20 .19 मिनट पर

मुम्बई में ---- 20. 50 मिनट पर

कलकता में ----19 . 41 मिनट पर

चेन्नई में ---- 20 . 28 मिनट पर

जयपुर में ---- 20 . 28 मिनट पर

लुधियाना ---- 20 . 20 मिनट पर

चण्डीगढ़ ----- 20 . 16 मिनट पर

Photos 06/10/2014

वास्तु की उत्पति वेदो से हुई है,वास्तु शास्त्र अथर्व वेद का अंग है,संस्कृत भाषा के 'वस' से 'वसु'
एव वसु से 'वास्तु ' शब्द बना,है ,वास्तु शास्त्र का उदय तथा उसकी संरचना सृष्टि के पंच
भूतात्मक सिद्धांत पर ही आधारित है, जैसे अग्नि,जल,वायु,पृथ्वी,आकाश। वास्तु के ये पांच
सिद्धांत पर ही वास्तु चलता है,हम आपको वास्तु के कुछ लक्षण बताते है जिसको सुधार कर
आप भी अपने घर में आ रही बाधाओं दूर कर सकते है.

[वास्तु दोष के प्रमुख लक्षण ]


> कारखाना,स्टॉल,होटल,आदि का ईशान कोण ऊँचा होना ,

> कारखाने के ईशान कोण को छोड़कर अन्य दिशा में जल का संग्रह होना

> ईशान कोण की दीवार में त्रुटि,दरार,गड्डा,या अनावशयक सामान का होना

> घर या कार्यस्थल में ईशान कोण में शौचालय,रसोई,या भारी सामान होना

> ईशान कोण में जुटे चप्पल,झाड़ू,आदि का होना,

> मुख्य दरवाजे के सामने कांटेदार वृक्ष का होना।

> पूजा घर पश्चिम या दक्षिण दिशा में होना।

> जानवर,बैलगाड़ी,चार पहिये का वाहन आदि ईशान या पूर्व में तथा दक्षिण में होना।

> दक्षिण दिशा में नीची दिवार,दरवाजे,खिड़किया आदि होना।

> दो मकानो का प्रवेश द्धार एक होना।

> घर के दरवाजे खोलने और बंद करने पर आवाज उत्पन होना।

> घर के मुख्य दरवाजे के सामने खंडहर,टुटा हुआ घर आदि होना।

> घर के आस पास ख़राब वहां का होना।

> मुख्य बिजली बोर्ड का घर के अग्नि कोण में न होना।

> शयन कक्ष दक्षिण या अग्नि कोण में होना।

> गृह निर्माण का के समय अच्छे मुहूर्त का न होना।

बहेड़ा,पीपल,बरगद,गूलर,कंटक,केथ,जला हुआ वृक्ष आदि की लकड़ी का घर में उपयोग करना।

[घर और कार्यस्थल पर ध्यान देने योग्य बाते ]

घर या कार्यस्थल पर हिंसक या युद्ध की तस्वीरें न लगाये। फेंग्सुई के अनुसार भी हिंसक पेंटिंग

या तस्वीरें घर में नहीं होनी चाहिये,खासकर घर के नेत्रत्य कोण में तो बिलकुल नहीं,क्योकि ये

तस्वीरें घर में तनाव का माहौल पैदा करती है। महाभारत का चित्र और अस्त्र शस्त्र का घर की

साज सजा में प्रदर्शन लड़ाई -झगडे और अनबन का कारण बनते है।

> वास्तु के अनुसार फल फूल और बच्चो की तस्वीरें जीवन शक्ति के प्रतिक है,और इन्हे घर की पूर्व और उतर की की दीवारो पर लगाना चाहिये।

> पर्वत आदि प्राकृतिक द्रश्य दर्शाती तस्वीरों को दक्षिण या पश्चिम दिशा में लगाना

चाहिये,नदियों और झरनो के नज़ारे उतर और पूर्व दिशा में लगाने चाहिये।फेंग्सुई के अनुसार भी

पानी के झरनो,बहती हुई नदियो के चित्र उत्तर दिशा में लगाने चाहिये। तालाब,सुखी नदिया,या

झील के चित्र सुबह नहीं होते,क्योकि क्योकि ये गतिहीनता और निष्क्रियाता के सूचक होते है।

> उजड़े हुए शहर,खंडहर और वीरान दृश्य काँटों वाले और सूखे ठूंठ वृक्ष तथा अवसाद,विषाद

उतपन्न करने वाले चित्र घर में न लगावे।

> घर में खेलते बच्चो,हंस,सुन्दर बाग बगीचो और बसंत ऋतू के चित्र उत्तम रहते है,शुभ के

प्रतिक चिन्ह जैसे स्वस्तिक मंगल कलश,ॐ इत्यादि के चित्र लगाने से सुख शांति और

मंगलकारी प्रभाव उतपन होते है,

> दक्षिण दिशा पर मृत्यु के देवता यम का अधिकार है। इसलिये वास्तु के अनुरूप अपने पूर्वाजो

के चित्र हमेशा दक्षिण दिशा में लगाने चाहिये। पूर्वजो के चित्रो को मन्दिर में ,देव प्रतिमायों के

साथ न रखे। पूर्वज पूज्य जरूर हो सकते है,पर देवतुल्य नहीं।

> बाघ,शेर,कौआ,उल्लू,भालू ,लोमड़ी,चिल,गीध आदि के चित्र अशुभ होते है,जिन पशुओं की

तस्वीरें या प्रतिमाये घर में शुभ होती है वे है -- जीवन शक्ति और पौरुष शक्ति का प्रतिक

घोडा,समर्धि की प्रतिक गाय,और शक्ति निरन्तर कार्यक्षमता का प्रतिक हाथी,फेंग्सुई के अनुसार

कुछ दिव्य पशु पक्षियों के चित्र जैसे ड्रेगन,पूर्व दिशा में,फिनिक्ष दक्षिण में,कछुआ उतर में,शेर

पश्चिम में शुभ होते है,

> सुख समृद्धी कर्क माँ लक्ष्मी और कुबेर की तस्वीर उतर दिशा में श्रेष्कर है,

> आजकल पलंगों के सिरहनो के तरह तरह के नमूने बनाये जाते है। यह ध्यान रखे की पलंग के

सिर की और शुभ आकृतिया अंकित हो। जहा तक संभव हो सौम्य,आकर्षक,और रम्य आकृति

अंकित करवाना शुभ है।

> शयन कक्ष में सुन्दर,आकर्षक सौंदर्य प्रधान एव कलात्मक वस्तुये और तस्वीर ही लगनी

चाहिये,जंगली जानवरो,या खुंखार जानवरो की तस्वीरें या मुर्तिया नहीं लगनी चाहिये। शयन कक्ष

में फालतू वस्तुओं का जमाव,कबाड़,अत्यादि नहीं होना चाहिये,पूजा का स्थान और पूर्वजो के चित्र

शयन कक्ष में न रखे।

Photos 24/09/2014

25 सितम्बर गुरूवार 2014 सम्वत 2071 को शारदीय नवरात्र प्रारम्भ होंगे,इस दिन शुक्र कन्या राशि में प्रवेश कर सूर्य तथा राहु के साथ युति बनायेंगे,नवरात्र के नौ दिन में हिन्दू धर्मावलम्बी देवी दुर्गा -भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा आराधना करते है,वाही दूसरी और योगी ध्यान साधना करते है तो तांत्रिक लोग तंत्र साधना और यन्त्र सिद्धि करते है,माँ की पूजा में लाल वस्त्र पहने जाते है,तथा बंगलामुखी की पूजा में पीले रंग के वस्त्र पहने जाते है तथा पीले पुष्प ही चढ़ाने का विधान है,पूजा में साधक को ऊनि कम्बल या कुशा के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ मुँह करके बैठना चाहिये,निम्न मन्त्र से आचमन करे

ॐ केशवाय नमः ॐ माधवाय नमः
ओम नारायणाय नमः।
आचमन के बाद निम्न मन्त्र पढ़कर हाथ ढोले

' ओम हृषीकेशाय नमः।

नवरात्रा में माँ दुर्गा की आराधना और पूजा में मंगलघट यानि कलश की स्थापना की जाती है,इसमें शुद्ध जल भरा जाता है,कलश स्थापना करते समय इस मन्त्र को पढ़े -

ओम स्था स्थी स्थिरो भव। ॐ भूर्भव स्वः भौ वरुण।
यहघच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि।

इस मन्त्र के साथ कलश को स्थापना करे। अब आप इस कलश पर स्वस्तिक बनाये। स्वस्तिक बनाकर कलश पर मोली बन्ध दे,निम्न मन्त्र पढ़ते हुए रोली मोली पुष्प चावल चढ़ावे।

कलशये मुखे विष्णु कण्ठे रूद्र समाश्रित।
मुले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा स्मृता।
ऋग्वेदोत्थ यजुर्वेद सामवेदो हथवार्ण।
करतेन अनने पूजनेन कलशे
वरुणाधावहित देवताः प्रियन्ता न मम।

इस मन्त्र से कलश पर जल छिड़के। गंध ,अक्षत ,पुष्प चढादे,तथा कलश तथा जल के देवता वरुण को नमस्कार,कलश स्थापना का अपना एक अलग ही महत्त्व है,शास्त्रो में ,वैदिक साहित्य के विराट काल पुरुष के लघु प्रतिक के रूप में कलश स्थापना किये जाने का विस्तृत वर्णन है,इसीलिए सभी मांगलिक कार्यो में कलश स्थापना करना अत्यंत शुभ माना गया है,कलश स्थापना से सारे कार्ये निर्विघ्न पूर्ण हो जाते है,मंगलघट में काम आने वाला कलश ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है,और जल तो है ही जीवन दायक,नारियल का महहतव भी आप समय समय पर समझ आता है,घाट स्थापना में आम की पत्तिया का में ली जाती है जो की उन्नति और समृद्धि कारक है,आम के वृक्ष को सदाबहार वृक्ष मन गया है,इसलिए इसकी पतिया भी शुभ मणि गयी है,लाल वस्त्र मंगल का प्रतिक माना गया है,शुभ कार्य में कलश की स्थापना ब्रह्मा ,विष्णु,महेश इन तीन देवो के रूप में भी की जाती है,इसलिये कलश स्थापना को पूजा या वैदिक अनुष्ठानो में सबसे महत्वपूर्ण कार्य मन जाता है,इसके बाद श्री गणेशजी के प्रतिक एक साबुत सुपारी पर मोली लपेटकर चौंकी पर चावल रखकर उस पर गणेश जी स्वरूप सुपारी को स्थापित करे,इस बीच पवित्रीकरण तथा स्वातिवचन करले,इसके बाब गणेश जी के दाहिनी और माता की फोटो या मूर्ति स्थापित करे,ये ध्यान जरूर रखे की शुद्ध मिट्टी की वेदी बनाकर उसमे जौ बोने के बाद ही माता की मूर्ति के पास चौकी पर कलश स्थापित करे,ये कलश ही मंगल घट का आधार माना जाता है,

घट स्थापना के बाद पूजा से पूर्व शुद्ध देशी घी [अगर गाय का हो तो अति उतम ] का अखण्ड दीपक जलाये,दीपक जलाते समय इस मन्त्र का प्रयोग करे --

अखण्ड दीपकदेव्या प्रियते नवरात्रकम्।
उज्ज्वलये अहोरात्रमेक चितोघर्ट व्रत।

देवी की पूजा के प्रारम्भ में उनका ध्यान ,स्मरण,आह्वान करे। तथा आसन समर्पित करे,पूजा के समय कोई अन्य धवनि या आवाज़ से विघ्र नही होना चाहिये,घर का पूरा वातावरण शांत,स्थिर मंगलमय होना चाहिये।अगर पूजन के समय सभी मन्त्र याद ना हो तो

' ॐ श्री मन्महादुर्गाय नमः ' इस मन्त्र से माँ दुर्गा का षोडशोपचार पूजन करे जैसे -

' ॐ श्री मन्महादुर्गाय नमःआसन निवेदयामि।
' ॐ श्री मन्महादुर्गाय नमःपद्ध समर्पयामि।
' ॐ श्री मन्महादुर्गाय नमःअधर्य समर्पयामि।

इसी प्रकार से आचमन ,वस्त्र,गंध,आभुसन,पुष्प,धुप,अक्षत,दीपक,नैवेद्य,श्रीफल,ताम्बूल,दक्षिणा समर्पित करे,इसके पश्चात कपूर आरती करे,पुष्पांजलि अर्पित करे,तथा दंडवत प्रणाम करे अंत में क्षमा प्रार्थना करे

ॐ जयंती मंगला काली भद्र काली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोअस्तुते।


[ कब करे घट स्थापना ]

25 सितम्बर 2014 आश्विन शुक्ल पक्ष संवत 2071 शक 1936 बृहस्पतिवार के दिन प्रतिपदा तिथि दोपहर 01 बजकर 22 मिनिट तक रहेगी,अतः घट स्थापना दोपहर तक ही मान्य रहेगी।
प्रातः 06 .31से 8 बजे तक शुभ का चौघड़िया,दोपहर 12. 05 से 12 29 तक अभिजीत मुहूर्त
तथा दोपहर 12.31 से 01. 22 तक लाभ का चौघड़िया रहेगा। इसमें आप अपने सुविधानुसार घट स्थापना कर सकते है,

Photos 08/08/2014

सभी ध्यान दे:-रक्षाबंधन पर्व -10 अगस्त
astrologer govind jyotishi +91 9803243333

भद्राकाल में रक्षासूत्र बंधवाने से होती है हानी शास्त्र कहते है: "जैसे शनि की क्रुरद्रर्ष्टि हानि करती है,ऐसे ही शनि की बहन भद्रा,उसका प्रभाव भी नुकसान करता है ! अत: भद्राकाल में रक्षासूत्र नहीं बांधना चाहिए !
रावण ने भी भद्राकाल में सुप्रणखा से रक्षासूत्र
बंधवा लिया,परिणाम यह हुआ कि उसी वर्ष में
उसका कुलसहित नाश हुआ ! इस काल में कोई
बहन अपने भाई को राखी न बाँधे ! भद्राकाल
की कुदर्ष्टि से कुल में हानि होने
की सम्भावना की बढती है! इस बार 10 अगस्त
को दोपहर 1: 38 मिनट तक भद्राकाल में
है,इसके बाद ही राखी बाँधे !
सभी भाई - बहन इस सुचना को अधिक से
अधिक लोगो में फैलाये
रक्षाबंधन पर्व -10 अगस्त

Photos 02/08/2014

शिवालय में और वहां से लौटकर शुभ फल प्राप्ति के लिए करे ये मंगलकारी उपाय।

सावन के महीने में बहुत से लोग शिवजी के दर्शन और उनकी पूजा के लिए शिव मंदिर जाते है। लोग शुभ फल प्राप्ति के लिए धार्मिक विधि विधान और भक्ति भाव से वहा शिव की पूजा करते हे. शिव भक्ति और शिव की पूजा भक्तो के मन में जगत कल्याण की प्रेरणा और भाव पैदा करती है। लेकिन आजकल इस भागदौड़ भरे जीवन में शिव भक्ति को कई लोग मंदिर में पूजा करके लौटते ही फिर से आज कल की सांसारिक परिस्थितियों में उलझ कर भूल जाते हैं। इसका कारण यह है कि कई भक्त शिवालय में पूजा पाठ की सामग्री चढ़ाकर ही उसे शिव की सही भक्ति मान लेते है , जबकि शिव की पूजा और भक्ति तथा उसके शुभ फल के लिए शिव मंदिर के कुछ विशेष पहलूओं को ध्यान में रखना बहुत आवश्यक है। यदि कोई धार्मिक नजरिए से इन बातो को नजरअंदाज करता हे तो शिव उपासना निरर्थक हो जाती है। शिवालय में आप जब भी पूजा पाठ के लिए जाते हे तो वहां हमेशा देखते है की शिवलिंग के अलावा शिव के परिवार और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा भी विराजित होती हैं। क्या आपने कभी धर्म भाव के साथ यह सोचा हैं कि शिव मंदिर में स्थापित ये मूर्तियां और इनके दर्शन मात्र हमारे व्यावहारिक जीवन के लिए कितने शुभ होते हैं? जानिए शिवमंदिर से जुडी ये दिलचस्प बाते –
शिवालय में जाते ही हमें सर्व प्रथम शिव के वाहन नंदी के दर्शन होते हैं। नंदी को पुरुषार्थ का प्रतीक मानागया है। नंदी की यह मुख्य विशेषता होती है कि शिवालय में उसका मुख हमेशा शिवलिंग की ओर देखते हुए होता है।इस तरह नंदी हमें यह संदेश देता है कि जिस तरह वह शिवजी का वाहन है, उसी तरह हमारा शरीर भी हमारी आत्मा का वाहन है। जिस प्रकार नंदी की नजर शिव जी की ओर उन्हें देखते हुए होती है, उसी तरह हमारी नजर भी हमारी आत्मा की ओर होनीचहिये। कहने का तात्पर्य यही हे की हर व्यक्ति को अपने व्यावहारिक, मानसिक, और अपनी वाणी के गुण व दोषो की परख हमेशा करते रहनी चाहिए। और अपने मन में हमेशा देवता शिव जो सबका मंगल और कल्याण करते हे उन की ही तरह दूसरों के लिए भलाई, हित और परोपकार का भाव रखना चाहिए। नंदी ये इशारा देता हे की शरीर का ध्यान आत्मा की और होगा तो व्यक्ति अपने चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकेगा। इसे आम भाषा में मन का साफ होना भी कहा जाता हैं। ऐसा करने से शरीर स्वस्थ होता है और शरीर यदि निरोग रहता है तो मन भी स्थिर, शांत, और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस तरह स्वस्थ शरीर और संतुलित मन व्यक्ति को हर कार्य में सफलता के करीब ले जाते है।

इस तरह अब जब भी आप शिव मंदिर में जाएं शिव के साथ नंदी की भी पूजा करे और कल्याण भाव को मन में सोच कर ही वापस आएं। सही तरीके से शिवतत्व को जीवन में उतारना इसे ही कहा जाता है।

02/08/2014

शिवालय में और वहां से लौटकर शुभ फल प्राप्ति के लिए करे ये मंगलकारी उपाय।

सावन के महीने में बहुत से लोग शिवजी के दर्शन और उनकी पूजा के लिए शिव मंदिर जाते है। लोग शुभ फल प्राप्ति के लिए धार्मिक विधि विधान और भक्ति भाव से वहा शिव की पूजा करते हे. शिव भक्ति और शिव की पूजा भक्तो के मन में जगत कल्याण की प्रेरणा और भाव पैदा करती है। लेकिन आजकल इस भागदौड़ भरे जीवन में शिव भक्ति को कई लोग मंदिर में पूजा करके लौटते ही फिर से आज कल की सांसारिक परिस्थितियों में उलझ कर भूल जाते हैं। इसका कारण यह है कि कई भक्त शिवालय में पूजा पाठ की सामग्री चढ़ाकर ही उसे शिव की सही भक्ति मान लेते है , जबकि शिव की पूजा और भक्ति तथा उसके शुभ फल के लिए शिव मंदिर के कुछ विशेष पहलूओं को ध्यान में रखना बहुत आवश्यक है। यदि कोई धार्मिक नजरिए से इन बातो को नजरअंदाज करता हे तो शिव उपासना निरर्थक हो जाती है। शिवालय में आप जब भी पूजा पाठ के लिए जाते हे तो वहां हमेशा देखते है की शिवलिंग के अलावा शिव के परिवार और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा भी विराजित होती हैं। क्या आपने कभी धर्म भाव के साथ यह सोचा हैं कि शिव मंदिर में स्थापित ये मूर्तियां और इनके दर्शन मात्र हमारे व्यावहारिक जीवन के लिए कितने शुभ होते हैं? जानिए शिवमंदिर से जुडी ये दिलचस्प बाते –
शिवालय में जाते ही हमें सर्व प्रथम शिव के वाहन नंदी के दर्शन होते हैं। नंदी को पुरुषार्थ का प्रतीक मानागया है। नंदी की यह मुख्य विशेषता होती है कि शिवालय में उसका मुख हमेशा शिवलिंग की ओर देखते हुए होता है।इस तरह नंदी हमें यह संदेश देता है कि जिस तरह वह शिवजी का वाहन है, उसी तरह हमारा शरीर भी हमारी आत्मा का वाहन है। जिस प्रकार नंदी की नजर शिव जी की ओर उन्हें देखते हुए होती है, उसी तरह हमारी नजर भी हमारी आत्मा की ओर होनीचहिये। कहने का तात्पर्य यही हे की हर व्यक्ति को अपने व्यावहारिक, मानसिक, और अपनी वाणी के गुण व दोषो की परख हमेशा करते रहनी चाहिए। और अपने मन में हमेशा देवता शिव जो सबका मंगल और कल्याण करते हे उन की ही तरह दूसरों के लिए भलाई, हित और परोपकार का भाव रखना चाहिए। नंदी ये इशारा देता हे की शरीर का ध्यान आत्मा की और होगा तो व्यक्ति अपने चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकेगा। इसे आम भाषा में मन का साफ होना भी कहा जाता हैं। ऐसा करने से शरीर स्वस्थ होता है और शरीर यदि निरोग रहता है तो मन भी स्थिर, शांत, और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस तरह स्वस्थ शरीर और संतुलित मन व्यक्ति को हर कार्य में सफलता के करीब ले जाते है।

इस तरह अब जब भी आप शिव मंदिर में जाएं शिव के साथ नंदी की भी पूजा करे और कल्याण भाव को मन में सोच कर ही वापस आएं। सही तरीके से शिवतत्व को जीवन में उतारना इसे ही कहा जाता है।

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