06/10/2014
वास्तु की उत्पति वेदो से हुई है,वास्तु शास्त्र अथर्व वेद का अंग है,संस्कृत भाषा के 'वस' से 'वसु'
एव वसु से 'वास्तु ' शब्द बना,है ,वास्तु शास्त्र का उदय तथा उसकी संरचना सृष्टि के पंच
भूतात्मक सिद्धांत पर ही आधारित है, जैसे अग्नि,जल,वायु,पृथ्वी,आकाश। वास्तु के ये पांच
सिद्धांत पर ही वास्तु चलता है,हम आपको वास्तु के कुछ लक्षण बताते है जिसको सुधार कर
आप भी अपने घर में आ रही बाधाओं दूर कर सकते है.
[वास्तु दोष के प्रमुख लक्षण ]
> कारखाना,स्टॉल,होटल,आदि का ईशान कोण ऊँचा होना ,
> कारखाने के ईशान कोण को छोड़कर अन्य दिशा में जल का संग्रह होना
> ईशान कोण की दीवार में त्रुटि,दरार,गड्डा,या अनावशयक सामान का होना
> घर या कार्यस्थल में ईशान कोण में शौचालय,रसोई,या भारी सामान होना
> ईशान कोण में जुटे चप्पल,झाड़ू,आदि का होना,
> मुख्य दरवाजे के सामने कांटेदार वृक्ष का होना।
> पूजा घर पश्चिम या दक्षिण दिशा में होना।
> जानवर,बैलगाड़ी,चार पहिये का वाहन आदि ईशान या पूर्व में तथा दक्षिण में होना।
> दक्षिण दिशा में नीची दिवार,दरवाजे,खिड़किया आदि होना।
> दो मकानो का प्रवेश द्धार एक होना।
> घर के दरवाजे खोलने और बंद करने पर आवाज उत्पन होना।
> घर के मुख्य दरवाजे के सामने खंडहर,टुटा हुआ घर आदि होना।
> घर के आस पास ख़राब वहां का होना।
> मुख्य बिजली बोर्ड का घर के अग्नि कोण में न होना।
> शयन कक्ष दक्षिण या अग्नि कोण में होना।
> गृह निर्माण का के समय अच्छे मुहूर्त का न होना।
बहेड़ा,पीपल,बरगद,गूलर,कंटक,केथ,जला हुआ वृक्ष आदि की लकड़ी का घर में उपयोग करना।
[घर और कार्यस्थल पर ध्यान देने योग्य बाते ]
घर या कार्यस्थल पर हिंसक या युद्ध की तस्वीरें न लगाये। फेंग्सुई के अनुसार भी हिंसक पेंटिंग
या तस्वीरें घर में नहीं होनी चाहिये,खासकर घर के नेत्रत्य कोण में तो बिलकुल नहीं,क्योकि ये
तस्वीरें घर में तनाव का माहौल पैदा करती है। महाभारत का चित्र और अस्त्र शस्त्र का घर की
साज सजा में प्रदर्शन लड़ाई -झगडे और अनबन का कारण बनते है।
> वास्तु के अनुसार फल फूल और बच्चो की तस्वीरें जीवन शक्ति के प्रतिक है,और इन्हे घर की पूर्व और उतर की की दीवारो पर लगाना चाहिये।
> पर्वत आदि प्राकृतिक द्रश्य दर्शाती तस्वीरों को दक्षिण या पश्चिम दिशा में लगाना
चाहिये,नदियों और झरनो के नज़ारे उतर और पूर्व दिशा में लगाने चाहिये।फेंग्सुई के अनुसार भी
पानी के झरनो,बहती हुई नदियो के चित्र उत्तर दिशा में लगाने चाहिये। तालाब,सुखी नदिया,या
झील के चित्र सुबह नहीं होते,क्योकि क्योकि ये गतिहीनता और निष्क्रियाता के सूचक होते है।
> उजड़े हुए शहर,खंडहर और वीरान दृश्य काँटों वाले और सूखे ठूंठ वृक्ष तथा अवसाद,विषाद
उतपन्न करने वाले चित्र घर में न लगावे।
> घर में खेलते बच्चो,हंस,सुन्दर बाग बगीचो और बसंत ऋतू के चित्र उत्तम रहते है,शुभ के
प्रतिक चिन्ह जैसे स्वस्तिक मंगल कलश,ॐ इत्यादि के चित्र लगाने से सुख शांति और
मंगलकारी प्रभाव उतपन होते है,
> दक्षिण दिशा पर मृत्यु के देवता यम का अधिकार है। इसलिये वास्तु के अनुरूप अपने पूर्वाजो
के चित्र हमेशा दक्षिण दिशा में लगाने चाहिये। पूर्वजो के चित्रो को मन्दिर में ,देव प्रतिमायों के
साथ न रखे। पूर्वज पूज्य जरूर हो सकते है,पर देवतुल्य नहीं।
> बाघ,शेर,कौआ,उल्लू,भालू ,लोमड़ी,चिल,गीध आदि के चित्र अशुभ होते है,जिन पशुओं की
तस्वीरें या प्रतिमाये घर में शुभ होती है वे है -- जीवन शक्ति और पौरुष शक्ति का प्रतिक
घोडा,समर्धि की प्रतिक गाय,और शक्ति निरन्तर कार्यक्षमता का प्रतिक हाथी,फेंग्सुई के अनुसार
कुछ दिव्य पशु पक्षियों के चित्र जैसे ड्रेगन,पूर्व दिशा में,फिनिक्ष दक्षिण में,कछुआ उतर में,शेर
पश्चिम में शुभ होते है,
> सुख समृद्धी कर्क माँ लक्ष्मी और कुबेर की तस्वीर उतर दिशा में श्रेष्कर है,
> आजकल पलंगों के सिरहनो के तरह तरह के नमूने बनाये जाते है। यह ध्यान रखे की पलंग के
सिर की और शुभ आकृतिया अंकित हो। जहा तक संभव हो सौम्य,आकर्षक,और रम्य आकृति
अंकित करवाना शुभ है।
> शयन कक्ष में सुन्दर,आकर्षक सौंदर्य प्रधान एव कलात्मक वस्तुये और तस्वीर ही लगनी
चाहिये,जंगली जानवरो,या खुंखार जानवरो की तस्वीरें या मुर्तिया नहीं लगनी चाहिये। शयन कक्ष
में फालतू वस्तुओं का जमाव,कबाड़,अत्यादि नहीं होना चाहिये,पूजा का स्थान और पूर्वजो के चित्र
शयन कक्ष में न रखे।