05/09/2026
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गोगा पीर,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कबीरा सोई पीर है,जो जाने पर पीर।
जो पर पीर न जान हीं,सो काफिर बेपीर।।
कबीर द्वारा दी गई पीर की इस परिभाषा पर खरा उतरा गोगाराणा।
आज से लगभग 1100 वर्ष पूर्व भारतीयों में वर्तमान की ही तरह आडंबर और पाखण्ड इतना हावी हो चुका था कि,विदेशी आक्रान्ताओं को भारत को लूटने का खुला रास्ता मिल गया। वे आते और बेखटके यहाँ आकर अकूत सम्पदा लूटकर ले जाते।मठों में पाखण्ड का नंगा नाच होता था। व्याभिचार तथाकथित धर्माधिकारियों प्रिय शगल था।भोले-भाले धर्मभीरू लोगों को लोक-परलोक का भय दिखाकर इस कुकृत्य में शामिल होने के लिए बाध्य किया जाता था।महिला-पुरूष इस क्रियाकलाप का हिस्सा बनकर स्वयं को धन्य समझते थे।
इस समय इस धरती पर एक महापुरुष का जन्म होता है ,जो था "गुरू गोरखनाथ "।गुरू गोरखनाथ ने डूबती मानवता और भारत को उबारने का दृढ संकल्प लिया और कूद पड़ा बागी बनकर।स्वच्छ भारत अभियान का आरम्भ अपने ही घर से किया ।"जाग मछंदर गोरख आया" कहकर सबसे पहले अपने गुरू मछंदरनाथ को वासना के दलदल से निकालकर सन्मार्ग दिखाया। गोरखनाथ शायद प्रथम शिष्य होगा जिसने गुरू को मुक्ति का मार्ग दिखाया।इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि,गोरखनाथ का व्यक्तित्व कितना विराट और वंदनीय रहा होगा।
हँसिबो खेलिबो गाइबो गीत।
दृढ करि राखिबो अपनो चीत।।
के मूलमंत्र का प्रचार-प्रसार करते हुए गोरखनाथ ने भारत भ्रमण करते हुए भारतीयता का शुद्धिकरण करते हुए हजारों शिष्य बनाए और उन्हें उनकी क्षमताओं के अनुरूप काम सौंपे ।शिष्यों ने भी गुरू के आदेश का अक्षरश: पालन किया, उन्हीं शिष्यों में से एक महान शिष्य हुआ "राणा गोगा चौहान"।
इतिहासकार तो नहीं मानते लेकिन जनमानस का मत है कि,पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने मोहम्मद गौरी से 17 युद्ध लड़े। दरअसल ये 17 युद्ध गौरी और चौहान के बीच नहीं बल्कि, महमूद गजनवी और गोगाजी चौहान के बीच हुए थे।कालान्तर में लेखकों ने पृथ्वीराज और गौरी से इसका समीकरण कर दिया।पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच केवल दो युद्ध हुए थे, जिन्हें तराइन का प्रथम एवं द्वितीय युद्ध कहा जाता है।कहीं विषयान्तर ना हो जाए इसलिए आइए चलते हैं मूल विषय पर।
गोगाजी चौहान चूरू जिले की राजगढ तहसील के "ददरेवा " के शासक जेवर सिंह चौहान के पुत्र थे।जो कि, जेवर सिंह की नीति परायण और विदुषी राणी बाँछलदे से आज ही के दिन 946 ई में उत्पन्न हुए थे। माँ की शिक्षा में पले-बढे गोगा में मूल भारतीय संस्कार कूट-कूटकर भरे थे।गोगा कोई 10-12 साल का था कि, उधर गोरखनाथ का आगमन हुआ।गोरखनाथ ने एक तालाब और सुरम्य टीला देखकर अपना आसन जमाया।गोरखनाथ के आगमन की सूचना चारों तरफ फैली लोग आने लगे तो गोगा चौहान भी अपनी माँ के साथ पहूँचा।
गोगा चौहान के व्यक्तित्व को देखकर गोरखनाथ को अपार संभावनाएँ नजर आई और गोगा को अपने पास ही रख लिया।तीन साल किशोर गोगा को अपने पास रखकर शिक्षित कर नाथ सम्प्रदाय में दिक्षित किया तथा उस रेगिस्तानी क्षेत्र में अपना संकल्प पूरा करने का जिम्मा सौंपा।
गोगा चौहान अपने गुरू के संकल्प को पूरा करने के निमित्त अब अपने पिता की प्रजा के बीच रहकर लोगों के सुख-दुःख दूर करने के हरसंभव प्रयत्न करता। उधर जेवर सिंह के भाई घेवर सिंह और कांछलदे के लाडले और गोगा के मौसेरे/चचेरे भाई अरजन-सरजन प्रजा पर अत्याचार करते ।बागड़ के लोगों को अरजन-सरजन के दुष्टतापूर्ण व्यवहार से मिले दुखों को गोगा दूर करने का प्रयास करता धीर-धीरे गोगा दलितों और किसानों का जननेता बन चुका था।जन हित के अभियान में गोगा को स्वयं जैसे ही सद्व्रती दो मित्र और मिल गये जो थे "मेघवाल भज्जू कोतवाल" और "ब्राह्मण नृसिंह पाण्डे "।
अर्जन पर और सरजन सत्ता के मद में अंधे होकर अनाचार की हदें पार चुके थे तो गोगा ने जनता को अत्याचार से मुक्त कराने की शपथ ले रखी थी।जेवर सिंह अपना उत्तराधिकारी अरजन को घोषित कर दिया था,लेकिन लोगों ने अपना रिछपाळ गोगा को घोषित किया। इन मायनों में गोगा प्रजातंत्र का संस्थापक माना जा सकता है।गोगा प्रथम शासक था जिसे प्रजा ने चुना। क्रोधित होकर अरजन-सरजन ने सिंध के सूमरा की मदद लेकर एक विशाल सेना के साथ बागड़ की जनता को सबक सिखाने के लिए किसानों की गायें और धन लूटना प्रारम्भ किया ।गोगा ने भी भज्जू कोतवाल और नृसिंह पाण्डे के नेतृत्व में किसानों और दलितों की एक सेना का गठन किया और टूट पड़े सूमरा के दल पर ,,इस युद्ध में अरजन-सरजन मारे गये और सूमरा जान बचाकर भागा।इन्हीं दिनों महमूद गजनवी ने मुलतान पर आक्रमण कर दिया जिससे गोगाजी ने अपने किसानों की अवैतनिक सेना लेकर छापामार लड़ाइयाँ चालू कर दी और भागने पर मजबूर कर दिया।गोगाजी ने पंजाब-हरियाणा और बागड़ को महमूद गजनवी के आक्रमणों से सुरक्षित रखा।गजनवी को भारत पर हर आक्रमण में गोगाजी की छापामार लड़ाइयों का सामना करना पड़ता। गजनवी भारत में किसी का खौफ खाता था वो था राणा गोगा चौहान।सोमनाथ गुजरात पर गजनवी के भारत में अंतिम आक्रमण के समय गोगाजी 80 वर्ष के थे। सोमनाथ पर आक्रमण से क्रोधित होकर गोगाजी ने आमने-सामने युद्ध करने की ठानी और भारतभर में बीड़ा फेरा जिसमें गोगाजी की सेना का सहयोग केवल उत्तरप्रदेश के पूरबियों ने किया। गोगाजी ने 80 वर्ष की उम्र में अद्भुत वीरता दिखाई। कहते हैं कि,सिर कटने पर भी युद्ध लड़ते रहे तब महमूद गजनवी ने कहा।" वाह गोगा तू तो जाहिर पीर है" (वाह गोगा तू साक्षात देवता है)।।
इस युद्ध में गोगाजी चौहान अपने 47 पुत्रों और 52 भतिजों सहित वीरगति को प्राप्त हुए। महमूद गजनवी ने ससम्मान दफनाकर उनका अंतिम संस्कार किया और गोगाजी की मजार बनवाई । कालान्तर में गोगाजी की 17 वीं पीढी के वंशज कर्मसिंह चौहान (कायमखान) ने उस मजार पर भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।जो आज भी गोगामेड़ी धाम के नाम से करोड़ों भारतीयों के आस्था के केन्द्र हैं।।गोगाजी एकमात्र हिन्दू देवता हैं जिनका पुजारी मुस्लिम भी होता है।ये मुस्लिम पुजारी गोगाजी के ही वंशज चाहिल चौहानों से परिवर्तित "कायमखानी " होते हैं।इस पुजारी को आज भी "चाहिलजी" कहा जाता है।
रेगिस्तानी क्षेत्र के हर गाँव में सबसे ऊँचे टीले पर गोगामेड़ी बनाई जाती है,जिसके पुजारी मेघवाल/बळाई जाति के होते हैं।
आप सभी को गोगा नवमी के पावन पर्व की हार्दिक बधाई।
गजेन्द्र सिंह कविया "गजेन"