थार कृषि ज्ञान

थार कृषि ज्ञान agriculture news

27/08/2025
27/08/2025

तिल में लगने वाले रोग एवं उनके उपाय
1.अल्टरनेरिया पत्ति धब्बा रोग
इस रोग से संक्रमित पत्तियों पर संकेंद्रित वलय वाले छोटे, गोलाकार लाल-भूरे रंग के धब्बे बन जाते है।
इसके अलावा डंठल, तने और कैप्सूल पर गहरे भूरे रंग के घाव हो जाते है। जैसे - जैसे रोग आगे बढ़ता है पत्तियों झुलसना कर झड़ना शुरू हो जाती है। फलियों पर संक्रमण होने पर बीज सिकुड़े हुए बनते है और फलियां फटना शुरू हो जाती है।

रोग नियंत्रण के उपाय
जिस खेत में ये रोग आता हो उसमें कम से कम 2 साल तक फसलचक्र अपनायें।
इस रोग से बचाव के लिए बुवाई के लिए प्रभावित व स्वस्थ बीज का चयन करना चाहिये।
बुवाई से पहले बीज उपचार करना चाहिए जिसके लिये ट्राइकोडर्मा विरडी 5 ग्राम प्रति किग्रा. बीज दर से उपयोग करना चाहिये।
खड़ी फसल में रोग को नियंत्रित करने के लिए मैंकोजेब की 400 ग्राम प्रति मात्रा की प्रति एकड़ स्प्रे करें।
2. फायलोडी रोग
इस रोग को फायलोडी रोग के नाम से भी जाना जाता है यह रोग माईकोप्लाज्मा के द्वारा होता है एवं इस रोग में पुष्प के विभिन्न भाग विकृत होकर पत्तियों के समान हो जाते हैं। संक्रमित पौधों में पत्तियाँ गुच्छों में छोटी-छोटी दिखाई देती हैं और पौधों की वृद्धि रुक जाती है। ये रोग एक पौधे से दूसरे पौधे में जैसिड द्वारा फैलाया जाता है।
रोग नियंत्रण के उपाय
सबसे पहले इस रोग वेक्टर को नियंत्रित करने के लिए, एनएसकेई @ 5% या नीम तेल @ 2% का छिड़काव करें जिससे की संक्रमित पौधे से रोग स्वस्थ पौधे में ना फैले और पैदावर हानि ना हो।
इमिडाक्लोप्रिड 600 एफएस @ 7.5 मि.ली./कि.ग्रा. की दर से बीज उपचार करें।
खड़ी फसल में रोग का संक्रमण दिखाई देने पर वेक्टर को नियंत्रण करे के लिए क्विनालफोस 25 ईसी 800 मिली/एकड़ या थियामेथोक्साम 25डब्ल्यूजी @ 40 ग्राम/एकड़ या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल @ 40 मिली/एकड़ का छिड़काव करें।
तिल के साथ अरहर की खेती करके इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है।

3.जड़ गलन रोग
इस रोग के लक्षण सबसे पहले पुरानी पत्तियों पर दिखाई देते है। पत्तियों का पीला होकर गिरना इस रोग के प्रमुख लक्षण है। संक्रमित पौधे की जड़े पूरी तरह से गल जाती है और पौधे को आसानी से मिट्टी से निकाला जा सकता है। इस रोग से संक्रमित पौधों की फलियाँ समय से पहले खुल जाती हैं।
रोग नियंत्रण के उपाय
जिस खेत में रोग का अधिक प्रकोप होता हो उस खेत में तिल की फसल ना लगाए।
रोग से बचाव के लिए समय से फसल बुवाई करें।
खड़ी फसल में रोग को नियंत्रित करने के लिए कार्बेन्डाजिम 50 WP को 1 ग्राम प्रति लीटर की दर से पौधे की जड़ो में डालें।
4.पाउडरी मिल्डयू
ये रोग कवक के द्वारा होता है इस रोग के लक्षण पत्तियों पर दिखाई देते हैं। इस रोग में पौधों की पत्तियों के ऊपरी सतह पर पाउडर जैसा सफेद चूर्ण दिखाई देता है। इस रोग का संक्रमण फसल में 45 दिन से लेकर फसल पकने तक होता है।
रोग नियंत्रण के उपाय
रोग के नियंत्रण के लिए wettable सल्फर 80 WP 500 ग्राम को प्रति एकड़ हर 15 दिनों में संक्रमित फसल में डालें। इसके आलावा इस रोग को नियंत्रित करने के लिए 10 किलोग्राम sulphur dust को प्रति एकड़ के हिसाब से में डालें।
5. फाइटोफ्थोरा अंगमारी
यह मुख्यतः फाइटोफ्थोरा पैरसिटिका नामक कवक से होता है सभी आयु के पौधों पर इसका हमला हो सकता है। इस रोग के लक्षण पौधों की पत्तियो एवं तनों पर दिखाई देते हैं। इस रोग में प्रारम्भ में पत्तियों पर छोटे भूरे रंग के शुष्क धब्बे दिखाई देते हैं ये धब्बे बड़े होकर पत्तियों को झुलसा देते हैं तथा ये धब्बे बाद में काले रंग के हो जाते हैं। रोग ज्यादा फैलने से पौधा मर जाता है।

रोग नियंत्रण के उपाय
रोग से बचाव के लिए लगातार एक खेत में तिल की बुवाई ना करें।
खड़ी फसल में रोग दिखने पर रिडोमिल 5 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।

24/08/2025

कहां कहां बारिश हो रही है

31/01/2025

जीरे की फ़सल में लगने वाली बीमारियां और उनका इलाज:
विल्ट रोग
यह एक गंभीर फ़ंगस जनित बीमारी है. यह रोग फ़्यूजेरियम ऑक्सिसपोरोम नाम के फ़ंगस की वजह से होता है. यह रोग जीरे के पौधों की जड़ों और तनों पर हमला करता है.
पाउडरी मिल्ड्यू रोग
यह एक फ़ंगस जनित रोग है. यह रोग जीरे के पौधों की पत्तियों, तनों, और फूलों पर सफ़ेद पाउडर जैसी परत बनाता है.
झुलसा रोग
यह रोग जीरे की फ़सल को काफ़ी नुकसान पहुंचाता है. इस रोग की वजह से फ़सल की उपज में 80% तक की कमी आ सकती है.
छाचया रोग
यह रोग जीरे की फ़सल को नुकसान पहुंचाता है. इस रोग की वजह से पौधों का उपरी हिस्सा झुक जाता है और पत्तियों और तनों पर भूरे धब्बे बन जाते हैं |

23/01/2025

ककड़ी की खेती के लिए जलवायु व मिट्टी
ककड़ी की खेती के लिए गर्म और शुष्क जलवायु अच्छी मानी जाती है। इसके पौधे के अच्छे विकास के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस के बीच के तापमान की ज़रूरत होती है। आपको बता दें कि ककड़ी की खेती बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। इस तरह की मिट्टी में ककड़ी की फसल से काफ़ी अच्छी उपज मिलती है। एक और खास बाद कि ककड़ी की खेती के लिए बहुत अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है, इसलिए जलभराव जैसी समस्या से फसल को बचाने के लिए खेतों में जल निकासी की उचित व्यवस्था ज़रूर करें।

कैसे करें खेत की जुताई व बुवाई
ककड़ी की खेती के लिए खेतों में 3 से 4 जुताई की आवश्यकता होती है। बुवाई करने से पहले खेत की हल्की सिंचाई करें और नमी वाली मिट्टी में ककड़ी के बीजों की बुवाई करें। मिट्टी में नमी होने से बीजों का अंकुरण और विकास अच्छा होता है।

ककड़ी की खेती

आपको बता दें कि ककड़ी फसल की बुवाई को कतारों में की जाती है। बुवाई करते समय किसान साथी ध्यान रखें कि कतार से कतार के बीच की दूरी 1.5 से 2 मीटर तक हो। वहीं एक और ज़रूरी बात का ध्यान रखें कि खेत में बीज बोने से पहले उसे मिट्टी जनित रोगों से होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए बविस्टिन से बीजों का उपचार करें।

सिंचाई

ककड़ी की फसल को अन्य फसलों की तुलना में ज़्यादा सिंचाई की ज़रूरत नहीं होती है, क्योंकि इसकी बुवाई फरवरी से मार्च के महीने में की जाती है। इन महीनों में गर्मी अधिक नहीं होती है, इसलिए सिंचाई की ज़रूरत कम पड़ती है। इस तरह किसान साथी नमी को देखते हुए ज़रूरत पड़ने पर ही फसल की सिंचाई करें। वहीं गर्मी में ककड़ी की फसल में 5 से 7 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहें।

तुड़ाई

बुवाई के 60 से 70 दिन बाद ककड़ी के फल तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं। प्रति हेक्टेयर उपज की बात करें तो ककड़ी की फसल से किसान साथी 200 से 250 क्विंटल तक की उपज ले सकते हैं। ये उपज खेती के तरीके, किस्म, उर्वरक, जलवायु व देखरेख पर निर्भर करती है। ककड़ी के फल जब फल हरे और मुलायम हों, तब ही तुड़ाई कर लें, क्योंकि ज़्यादा देर से तुड़ाई करने पर फल कड़े हो जाएंगे, और बाज़ार में इसका उचित मूल्य नहीं मिलेगा।

21/01/2025

जनवरी का महीना भिंडी की अगेती फसल लगाने के लिए बेहद ही उपयुक्त माना जाता है. जनवरी में लगाई हुई भिंडी फरवरी महीने में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है. लेकिन भिंडी की फसल लगाते समय किसानों को कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए. जनवरी महीने में तापमान कम होता है. ठंड के दिनों में भिंडी में कई वायरस जनित रोग आते हैं. जिनकी रोकथाम के लिए उपाय बुवाई के समय ही कर लेने चाहिए. अगर किसान वैज्ञानिक विधि से भिंडी की फसल लगाते हैं तो कम लागत में अच्छा उत्पादन मिल सकता है.

वैज्ञानिक विधि से भिंडी की खेती करने से लागत कम आती है. उत्पादन अच्छा मिलता है. खास बात यह है कि पैदा होने वाली उपज की गुणवत्ता बेहतर होती है. जिसकी वजह से किसानों को बाजार में अच्छा भाव मिलता है. जरूरी है कि किसान भिंडी की फसल से अच्छा उत्पादन लेने के लिए बुवाई के समय से ही जरूरी बातों का ध्यान रखें

जनवरी महीने में तापमान कम रहता है. जिसकी वजह से भिंडी का जमाव प्रभावित हो सकता है. बेहतर जमाव के लिए भिंडी के बीज को 4 से 6 घंटे के लिए भिगो दें. किसान भिंडी के बीज को रात भर के लिए भिगो सकते हैं और सुबह भिंडी को तैयार किए हुए खेत में लगा सकते हैं जिससे जमाव प्रतिशत बढ़ जाएगा.

Address

Jaipur
302015

Telephone

+918949114527

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when थार कृषि ज्ञान posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The School

Send a message to थार कृषि ज्ञान:

Shortcuts

Share