18/11/2022
जयपुर के स्थापना दिवस की बधाई
जयपुर के 295 वे जन्मदिवस की बधाई।
राम राम सा ।
थाँको स्वागत हैं।
18/11/2022
जयपुर के स्थापना दिवस की बधाई
जयपुर के 295 वे जन्मदिवस की बधाई।
21/02/2021
आपणी संस्कृति न गुणा री धरोहर सूँ जुङ्योङा साचा जीवण रा गुण बाता अर मिनखपणें ने जीवता राखण रे वास्ते इण माँयङ भाषा रो जीवणो और इणरी अवैर घणी जरूरी है।
अपोंणा बुड्या बडेरा ने श्रद्धांजलि देवा रे भाव साथे आज इण मायङ भाषा ने घणी सूँ घणी बोलणे री और इणनें सदा जीवंत राखा रो प्रण लेवो !।
जय जय राजस्थान जय जय राजस्थानी। 🙏
गुळ ज्यूं मीठी भाषामावङी, थने राखु कंठ रे माय।
सदा जीवती राखुला मैं, चाहे कङका नवयुग आय।।
मारवाड़ी भाषा राजस्थानी भाषा🙏
19/01/2021
हु लड़ियों घणो , हूँ सयो घणो, मेवाडी आन बचावण ने
हूँ पछि नही राखी रण बेरिया रो खून बहावण ने....
वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप पुण्यतिथि पर सादर वंदन🙏🚩
26/12/2020
* #जयश्रीराधेगोविन्द आज दिनांक 27-12-2020 जयपुर के आराध्य देव श्री गोविन्द देवजी के मंगला झाकी के दर्शन।स्वयं दर्शन करें तथा अधिक से अधिक भक्तों को दर्शन करायें राधेगोविंद भजो राधैगोविंद पार लगादे गोविंद जय श्री राधै कृष्णा राधै कृष्णा*
*🙏🙏*
21/12/2020
राजस्थान मरुधरा री तस्वीर
राजस्थान के स्तापना दिवस की शुभकामनायें।
राजस्थानी भाषा की सामान्य विशेषताएँ निम्न हैं-
राजस्थानी में 'ण', 'ड़' और (मराठी) 'ल' तीन विशिष्ट ध्वनियाँ (Phonemes) पाई जाती हैं।
राजस्थानी तद्भव शब्दों में मूल संस्कृत 'अ' ध्वनि कई स्थानों पर 'इ' तथा 'इ' 'उ' के रूप में परिवर्तित होती देखी जाती हैं-'मिनक' (मनुष्य), हरण (हरिण), 'कमार' (कुंभकार)।
मेवाडी और मालवी में 'च', 'छ', 'ज', 'झ' का उच्चारण भीली और मराठी की तरह क्रमश: 'त्स', 'स', 'द्ज', 'ज़' की तरह पाया जाता है।
संस्कृत हिन्दी पदादि 'स-ध्वनि' पूर्वी राजस्थानी में तो सुरक्षित है, किंतु मेवाड़ी-मालवी-मारवाड़ी में अघोष 'ह्ठ' हो जाती है। जैसे हि. सास, जैपुरी-हाडौती 'सासू', मेवाड़ी-मारवाड़ी 'ह्ठाऊ'।
पदमध्यगत हिन्दी शुद्ध प्राणध्वनि या महाप्राण ध्वनि की प्राणता राजस्थानी में प्राय: पदादि व्यंजन में अंतर्भुक्त हो जाती है-हिं. कंधा, रा. खाँदो; हि. पढना, रा. फढ-बो।
राजस्थानी के सबल पुलिंग शब्द हिन्दी की तरह आकारांत न होकर ओकारांत है :-हि. घोड़ा, रा. घोड़ी, हिं. गधा, रा. ग"द्दो, हिं. मोटा, रा. मोटो।
पश्चिमी राजस्थानी में संबंध कारक के परसर्ग 'रो-रा-री' हैं, किंतु पूर्वी राजस्थानी में ये हिन्दी की तरह 'को-का-की' हैं।
जैपुरी-हाड़ौती में 'नै' परसर्ग का प्रयोग कर्मवाच्य भूतकालिक कर्ता के अतिरिक्त चेतन कर्म तथा संप्रदान के रूप में भी पाया जाता है-'छोरा नै छोरी मारी' (लड़के ने लड़की मारी); 'म्हूँ छोरा नै मारस्यूँ' (मैं लड़के को पीटूँगा;-चेतन कर्म); 'यो लाडू छोरा नै दे दो' (यह लड्डू लड़के को दे दो-संप्रदान)।
राजस्थानी में उत्तम पुरुष के श्रोतृ-सापेक्ष 'आपाँ-आपण' ओर श्रोतृ निरपेक्ष 'महे-म्हें-मे' दुहरे रूप पाए जाते हैं।
हिन्दी की तरह राजस्थानी के वर्तमानकालिक क्रिया रूप सहायक क्रियायुक्त शतृप्रत्ययांत विकसित रूप न होकर शुद्ध तद्भव रूप हैं। 'मूँ जाऊँ छूँ' (मैं जाता हूँ)।
सहायक क्रिया के रूप पश्चिमी राजस्थानी में 'हूं-हाँ-हो-है' (वर्तमान) और 'थो-थी-था' (भूतकाल) हैं, किंतु पूर्वी राजस्थानी में 'छूँ-छाँ-छो-छै' (वर्तमान) और 'छो-छी-छा' (भूतकाल) हैं।
राजस्थानी में तीन प्रकार के भविष्यत्कालिक रूप पाए जाते हैं :-जावैगो, जासी, जावैलो। इनमें द्वितीय रूप संस्कृत के भविष्यत्कालिक तिङंत रूपों का विकास हैं-'जासी' (यास्यति), जास्यूँ (यास्यामि)।
राजस्थानी की अन्य पदरचनात्मक विशेषता पूर्वकालिक क्रिया के लिए 'र' प्रत्यय का प्रयोग है : -'ऊ-पढ़-र रोटी ख़ासी' (वह पढ़कर रोटी खाएगा)।
राजस्थानी की वाक्यरचनागत विशेषताओं में प्रमुख उक्तिवाचक क्रिया के कर्म के साथ संप्रदान कारक का प्रयोग है, जबकि हिन्दी में यहाँ 'करण या अपादान' का प्रयोग देखा जाता है। 'या बात ऊँनै कह दो' (यह बात उससे कह दो)। पूर्वी राजस्थानी में हिन्दी के ही प्रभाव से संप्रदानगत प्रयोगके अतिरिक्त विकल्प से कारण-अपादानगत प्रयोग भी सुनाई पड़ता है-'या बात ऊँ सूँ कह दो'।
04/09/2019
आपणे जैपर राजस्थान की आन बान शान आपणों सिटी पैलेस
28/08/2019
राजस्थानी हेंडीक्राफ्ट बैकग्राउंड वॉलपेपर
28/08/2019
राजस्थानी गावाळी पैन्टिन्ग.
जिकी भासा में आपां माँ सू बात करा, जिकी भासा में आपना सगळा संस्कार हुवे, जिकी भासा आपांरी रु-रु में बसियोडी है...
आ ही तो है आपणी मात्रभासा..
माँ, मायड भासा अर मायड भूम रो दर्जो स्वर्ग सु भी ऊँचों हुवे।
आपणी मात्रभासा ने भूलन आळी कौम ख़त्म हो जावे अर वी कौम रो कोई भविष्य कोनी होवे।
आपणी मात्रभासा "राजस्थानी" ने यथोचित आदर सम्मान मिले आ हर राजस्थानी री चाह हे।
इ रे वास्ते आज सु ही प्रण करो कि आपणी भासा "राजस्थानी" ने पूर्ण व्यवहार में लासा।
अमेरिका रा भाषा-विद्वान (अमेरीकन कांग्रेस ऑफ लाईब्रेरीज) दुनियां री 13 समृद्ध भाषावां में राजस्थानी भाषा नै भी एक समर्थ भाषा मानी है।
राजस्थान में करीब 72 बोलियां बोली जावै है।
कैबत है 'तीन कोस पर पाणी बदळै, 12 कोस पर बोली।'
राजस्थान मरुधर देस है, बीं री परम्परा अर संस्कृति भारत रै अन्य प्रदेशां सूं बिलकुल अलग है।
राजस्थान रा लोकदेवता, लोकगीत, लोक-गाथावां, खान-पान-पहराण री आपरी अलग विशेषता है।
राजस्थान रा पसु-पाखी, बठै रा रूंख सब अलग हैं।
इण री सही अभिव्यक्ति राजस्थानी में ही सम्भव है।
राजस्थान री प्रेम-कथावां दूजै साहित्य में कोनी।
भारत रै इतिहास में राजस्थान आप री न्यारी पिछाण राखै है।
राजस्थानी भाषा नै मान्यता मिले बिना राजस्थान री महान परम्परावां नै, अनूठी संस्कृति नै टाबर किंया जाणसी?
टाबरियां नै किंया हुवैलो, निज धरती रो ज्ञान।
राख्यां चावो जड़ां जीवती, द्यो मायड़ नै मान॥
जय मारवाड़ जय राजस्थान ।।
27/08/2019
राजस्थान म पाणी भरणे खातिर लुगायां न के करणा पड़ ह.
जय मारवाड़ जय राजस्थान