Apbhrams Sahitya Academy

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09/05/2022

अपभ्रंश भाषा का महत्व

जयपुर में स्थित अपभ्रंश साहित्य अकादमी विश्व में अकेली एक ऐसी अकादमी है जहाँ से अपभ्रंश भाषा का पत्राचार के माध्यम से अघ्ययन किया जा सकता है। वर्तमान में विद्यमान सभी क्षेत्रीय भाषाएँ किसी न किसी भाँति अपभ्रंश का ही विकसित रूप है। इन क्षेत्रीय भाषाओं को सुचारु रूप से समझने के लिए अपभ्रंश भाषा का ज्ञान होना नितान्त आवश्यक है। इतना ही नहीं यदि हमंें अपनी प्राचीन भाषा संस्कृत व प्राकृत के माध्यम से हमारी प्राचीन विरासत से अवगत होना है तो भी हमको अपभ्रंश भाषा का ज्ञान होना परम आवश्यक है।
अपभ्रंश भाषा के महत्व को हिन्दी साहित्य के प्रमुख विद्वानों ने इस प्रकार दर्शाया है -

1 अपभ्रंश के माध्यम से ही संस्कृत व प्राकृत भाषाओं की भाषागत तथा साहित्यगत विशेषताएँ हिन्दी एवं अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं को विरासत में मिली है। अतः आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की आदिकालीन स्थिति को समझने के लिए अपभ्रंश भाषा एवं साहित्य का ज्ञान होना अति आवश्यक है।

2 ंअपभ्रंश भाषा और साहित्य से ऐसी अनेक भाषागत और साहित्यगत परम्पराएँ आदिकाल व मध्यकाल के हिन्दी, गुजराती, मराठी तथा बाँगला भाषा और साहित्य में आई हैं कि इन्हें नजरन्दाज कर देना भाषा और साहित्य की प्रवहमान धारा के सही विश्लेषण में बाधक होगा।

3 19वीं सदी से पहले अपभ्रंश की जानकारी मात्र इसके नाम निर्देश तक ही सीमित थीं संस्कृत वैयाकरणों के यहां यह शब्द संस्कारहीन ग्राम्य शब्द के अर्थ में प्रचलित था। हेमचन्द्र ने अवश्य इसके नमूने शब्दानुशासन के अष्टम अध्याय के चतुर्थ पाद में देकर इस भाषा का कुछ विस्तार से विवेचन किया है।

4 वैसे देखा जाय तो अपभ्रंश का खजाना या तो गुजरात और मरुभूमि के जैन भण्डारों में और कारंजा की विन्ध्य पर्वतमालाओं के बीच छिपा हुआ था। सबसे पहले पिशेल ने इसके नमूनों का परिचय विश्व को दिया। उसके बाद तो याकोबी और आल्सदोर्फ जैसे जर्मन विद्वान ही नहीं, दलाल जैन, वैद्य, मुनिविजय, भायाणी ने अनेक अज्ञात जैन पुराणकाव्यों आदि को प्रकाश में लाकर भारतीय भाषा और साहित्य की महत्वपूर्ण अनुपलब्ध कड़ी को खोज निकाला।

5 वस्तुतः वास्तविक आधुनिकता वह है जो अतीत के प्रति जागरूक रहकर वर्तमान के प्रति पूर्ण सजग रखती है। इसके लिए हमारा प्राचीन रिक्थ हमें बहुत कुछ सिखाता है वर्ततान को गढकर भविष्य के लिए मार्ग दिखाता है। इन रिक्थों में हमारी प्राचीन भाषाएँ अमूल्य निधि है।ं इनमें भी वह अपभ्रंश भाषा है जो प्राचीन और नवीन भारतीय भाषा का सेतुबन्ध है।

6 जर्मन विद्वान डा. रिचार्ड पिशेल ने बडे दुख के साथ कहा कि जिस भाषा में हेमचंद्राचार्य द्वारा संकलित अप्रतिम दोहे हो उसका भरापूरा भंडार होना चाहिये। इसी प्रकार दूसरे विद्वान हरमन याकोबी को जब धनपाल की भविष्यत कहा मिली तो उसे देखकर वे भावविभोर हो उठे। डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी की तीव्र भावना थी कि इस अन्धकार युग को प्रकाशित करने योग्य जो भी मिल जाय उसे सावधानी से जिलाये रखना हमारा कत्र्तव्य है क्योंकि यह बहुत बडे आलोक की सम्भावना लेकर आई है। उसके पेट में केवल उस युग के रसिक हृदय की धडकन का ही नहीं और न ही केवल सुशिक्षित चित्त के संयत और वाक्पाटव का बल्कि उस युग के सम्पूर्ण मनुष्य को उद्भाषित करने की क्षमता है। साहित्य, भाषा या सामाजिक दृष्टि से उसमें किसी न किसी महत्वपूर्ण तथ्य के मिल जाने की सम्भावना है। इसकी महत्ता का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जबतक इस भाषा का साहित्य उपलब्ध नहीं था तब तक यह 600 वर्षों का समूचा काल अन्धकारयुग के नाम से सम्बोधित कर दिया गया था।

7 शंभूनाथ पाण्डेय कहते है कि पहले अपभ्रंश पढने में रूखा लगा किंतु बाद में डा.नामवर सिंह की मनोहर एवं प्रखर शैली से उसमें कुछ गति होने लगी। तब मुझे लगा कि अपभ्रंश साहित्य कागजी बादाम की भाँति अपने भीतर अद्भुत् पौष्टिक तत्व छिपाये हुए है। यह बल, वीर्य, ओज और शक्ति का संपुंज है। उन्मुक्त और स्वच्छंद प्रेम का ऐसा अक्षय भंडार है जिसमें से निकले बहुतेरे झरने इसे रिक्त नहीं कर सकते। यह भाषा धर्म, नीति, सत्व, संयम के विजयश्री की पताका फहरा रही है। यह संस्कृत की भाँति सुजन की भाषा न होकर जन की भाषा थी। यह लोकजीवन के ताजे रस से सरोबार और लोकशक्ति से ओतप्रोत थी।

8 अपभ्रंश अपनी अन्तर्निहित विशेषताओं के कारण ही देशी-विदेशाी विक्षनों के आकर्षण का केन्द्र बन गई।

13/08/2021

अपभ्रंश भाषा एवं साहित्य का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए सर्वप्रथम हम 15 दिन व्याकरण सीखेंगे उसके बाद हम अपभ्रंश सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम में निर्धारित साहित्य के अंश का अध्ययन व्याकरण के माध्यम से करेंगे। अपभ्रंश साहित्य के महत्वपूर्ण काव्यों के कुछ अंशों को यहाँ लिया जाएगा ताकि हम अपभ्रंश साहित्य से परिचित होकर अपनी रुचि के अनुसार आगे समस्त काव्य का स्वतन्त्र रूप से अध्ययन कर सकेंगे। मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है अपभ्रंश भाषा एवं साहित्य का ज्ञान आपके लिए सब तरह से उपयोगी सिद्ध होगा।
अपभ्रंश भाषा की व्याकरणात्मक ईकाइयों में हम सर्वप्रथम अपभ्रंश भाषा में प्रयुक्त होनेवाले स्वर व व्यंजन का ज्ञान करेंगे।
1. स्वर - अपभ्रंश में अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ स्वर होते हैं। हिन्दी के ऋ, ऐ, औ स्वर यहाँ नहीं होते।
2. व्यंजन- अपभ्रंश में -
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ´
ट ठ ड ढ ण
त थ द ध न
प फ ब भ म
य र ल व
स ह
। ं . ॅ व्यंजन होते हैं।
अपभ्रंश में ङ और ´ का प्रयोग नहीं पाया जाता। इनके स्थान पर अनुस्वार (ं ं ) का प्रयोग होता है।

11/08/2021

नमस्कार ! जय जिनेन्द्र !
भारतीय भाषाओं में यदि हम अपभ्रंश भाषा की चर्चा करें तो सबसे पहले हम कहेंगे कि यह प्राचीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अपभ्रंश के माध्यम से ही संस्कृत, प्राकृत आदि प्राचीन भाषाओं की भाषागत एवं साहित्यिक विशेषताएँ हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती ,मराठी, ब्रज, अवधी, सिंधी आदि आधुनिक भाषाओं को विरासत में मिली है। भारतीय भाषाओं के एतिहासिक विकास को क्रमशः देखें तो हमको सबसे पहले यह समझना होगा कि प्रत्येक युग में साहित्यिक भाषा के समानान्तर कोई न कोई लोकभाषा अवश्य रही है और यह लोक भाषा ही साहित्यिक भाषा की एक तरह से जन्मदाता रही है। प्राचीनतम छान्दस अर्थात् वेद की भाषा से पूर्व लोकभाषा के रूप में प्राकृत प्रचलित थी जो स्वभाविक रूप से बोलचाल की भाषा थी। इसी लोकभाषा से वैदिक साहित्य की रचना हुई और इसकी भाषा को ही छान्दस भाषा कहा गया। इस छान्दस ने एक तरफ संस्कृत का रूप ग्रहण किया तो दूसरी ओर प्राकृत के रूप में ढली। प्राकृत भी लोकभाषा की सहायता से आगे बढ़ी जिससे अपभ्रंश भाषा उत्पन्न हुई। अपभ्रंश से हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती ,मराठी, ब्रज, अवधी, सिंधी आदि आधुनिक भाषाओं का विकास हुआ।
आपको यह जानकर हर्ष होगा कि 1993 से इस अपभ्रंश भाषा का अध्यापन पत्राचार के माध्यम से अपभ्रंश साहित्य अकादमी के द्वारा किया जा रहा है। यह पाठ्यक्रम 1 जनवरी से प्रारंभ होता है और दिसम्बर माह में परीक्षा के बाद उत्तीर्ण अध्ययनार्थियों को सर्टिफिकेट दिया जाता है। अपभ्रंश साहित्य की महत्ता को देखते हुए मैनें अपभ्रंश पाठ्यक्रम को बहुत सरल एवं क्रमबद्ध रूप से पढाने का विचार बनाया है। सदि आप लोग उत्सुक हो तो हम यहाँ अध्ययन कर अपभ्रंश साहित्य अकादमी से परीक्षा देकर सर्टिफिकेट प्राप्त कर सकते हैं। प्रवेश आवेदन पत्र, परीक्षा आवेदनपत्र एवं माँडलपेपर आप ंचंण्रंपदंचंण्वतह वेबसाइट से निकाल लें।

11/03/2021

सुप्रभात🙏🙏आज का सुविचार- चित्त की विशुद्धता ही शांति का परम कारण है। चित्त की विशुद्धता के साथ व्यक्ति जो उसे उचित लगता है करे, जहाँ उसे उचित लगता है जाए। चित्त की विशुद्धता व्यक्ति की प्रत्येक क्रिया को सार्थक बनाकर चित्त को शान्त रखती है। चित्त शुद्धि के अभाव में की गई क्रिया अशान्ति का कारण बन जाती है।🙏🙏परमात्मप्रकाश मोक्ष अधिकार, दोहा सं -70

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