16/06/2024
मुझ में जीवित मेरे पिता – जयबोध पाण्डेय
आज अचानक मुझे लगा जैसे
पिता जीवित हैं मुझ में अब भी
संचलित करते मेरी सोच , मेरे कार्यकलाप और मेरी दिनचर्या को ॥
जब तुलना की मैंने उनसे अपनी
तो भौंचक्का सा रह गया मैं ॥
अरे ! कितना कुछ बन गया हूँ मैं उन जैसा
तर्कपूर्ण सोच है उन जैसी
रचनात्मकता भी तो है मेरी वैसी
स्पष्टवादिता, दृढ़ता है जहां उन जैसी
मिलनसारिता भी तो है मेरी वैसी
जुझारूपन है जहां उनके जैसा
स्वाभिमान भी तो है मेरा वैसा
सफलताएं जहां पाईं मैंने, उन जैसी
वहीं झेली भी हैं नाकामियाँ मैंने वैसी
जहां संघर्ष थे बिल्कुल अलग हमारे
वहां गिर गिर कर बार बार उठ खड़े होने का हौसला मेरा है उन जैसा ॥
जीवन का फलसफा, लोगों से अलग उनका था , और है अलग मेरा भी
घुमक्कड़ी का शौक भी तो है मेरा, उनके ही जैसा
बहुत कुछ आदतें भी , हो गईं हैं अब उन जैसी
इतनी समानताएं देख उन से, चकित हो गया मैं॥
अरे ! हुआ यह सब कैसे
बन गया हूँ मैं उनकी प्रतिकृति सा जैसे ॥
था मैं विद्रोही, आक्रोश से भरा, सब कुछ बदलने को आतुर तब,
थे जीवित मेरे पिता जब ॥
करता नहीं था वो अधिकतर, करने को वो कहते जब
उठो जल्दी, नहीं उठना
करो कसरत , नहीं करनी ॥
थी सोच अलग मेरी उनसे
और था तब नजरिया भी मेरा अलग उनसे ॥
आदतें थीं अलग मेरी उनसे
और थे सपने भी मेरे अलग उनसे ॥
सवाल उठा ज़हन में अचानक मेरे
बना कैसे मैं उन जैसा ?
उनसे जो था विरोध करूँ उसे कैसे परिभाषित
था क्या वह विद्रोह पुरानी पीढ़ी के खिलाफ
या थी वह छटपटाहट उन जैसे बटवृक्ष की छाया से निकलने की
या थी वह झुंझलाहट व्यवस्था के शिकंजे से ना निकल पाने की
था क्या आक्रोश मेरे अंदर का , पुरानेपन के खिलाफ
या थी वह अकुलाहट खुद की ज़मीन पाने की ॥
जो भी हो , बन गया मैं स्वतः ही उन जैसा अनजाने में ॥
अहसास होती है , कभी कभी मुझे अपनी पीठ पर उनके हाथों की थपथपाहट
मेरे कानों में धीरे से यह बोलते
पुत्रक अच्छा किया , आगे भी और बहुत कुछ है तुम्हें करना
गर्व है बहुत , मुझे तुम पर, हौसला रखो अभी लंबी डगर पर, तुम्हें है चलना
रहूँगा मैं तुम में सदा, पाओगे तुम सदा मुझे अपने में
आऊँगा कभी कभी मैं तुम्हारे सपने में
चलूँगा मैं कठिन सफर में तुम्हारे साथ
चलता था जैसे, मैं बचपन में, पकड़कर तुम्हारा नन्हा सा हाथ ॥
तो क्या माता पिता हम में सदा हैं रहते
जैसे उनके दिए रक्त कण हमारी शिराओं में हैं बहते ॥