29/01/2023
सनातन भारती
''सनातन'' का अर्थ है - शाश्वत या 'हमेशा बन?
सनातन धर्म हिन्दू धर्म का वास्तविक नाम है।
सनातन धर्म की गुत्थियों को देखते हुए इसे प्रायः कठिन और समझने में मुश्किल धर्म समझा जाता है। हालांकि, सच्चाई ऐसी नहीं है, फिर भी इसके इतने आयाम, इतने पहलू हैं कि लोगबाग इसे लेकर भ्रमित हो जाते हैं। सबसे बड़ा कारण इसका यह कि सनातन धर्म किसी एक दार्शनिक, मनीषा या ऋषि के विचारों की उपज नहीं है। न ही यह किसी ख़ास समय पैदा हुआ। यह तो अनादि काल से प्रवाहमान और
29/01/2023
20/11/2021
स्वामी सूर्यदेव जी की पोस्ट:
आगे सिर्फ इनकी केंचुलियाँ ही बचेंगी,,,
#वामपंथी या अंग्रेजों या #क्रिश्चियनो का लिखा इतिहास पढ़ो तो सब बातें दो ढाई हजार साल में सिमट जाती हैं,,,
क्रिश्चियन और वामपंथी जीसस से पहले कुछ मान ही नहीं सकते,,,
ज्यादा ही मारा मारी होगी तो 4 से 5 हज़ार साल पीछे तक मान लेंगे,,
लेकिन उससे ज्यादा कह दिया तो उनके प्राण निकलने को तैयार हो जाते हैं,,,
जबकि सनातन वैदिक धर्म कहता है कि #ब्रह्म का दिन होता है और रात्रि भी,, दिन को ही सृष्टि कहते हैं और #प्रलय को ही रात्रि,,,
तो ब्रह्म का जो दिन है वह होता है चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष का,, यानी सृष्टि की आयु,,
लेकिन #ब्रह्मकुमारी से लेकर तमाम नवोदित सम्प्रदाय तो बस कुछ दिनों में प्रलय होगी यह राग अलापते रहते हैं,, वास्तव में सत्य क्या है??
तो देखिए बन्धु,,
जब हम लोग यज्ञ करते हैं तो संकल्प करते हैं,,
मैंने अपना पहला संकल्प गुरुकुल में जब किया तब-- #एकवृन्दषणणवतिकोटि अष्टलक्षत्रिपंचाशतसहस्र त्रयोदशउत्तरशततमे बोला था,,,यानी एक अरब,,96 करोड़,, आठ लाख 53 हजार 113 साल हो चुके हैं सृष्टि में,,,
होता यह है कि जब सृष्टि की शुरुआत में किसी ने प्रथम यज्ञ किया होगा तब प्रथम: बोला होगा,,,फिर दूसरे दिन द्वितीय: तीसरे दिन तृतीय:,, ऐसे ही यज्ञ होते गए संकल्प पाठ में दिन जुड़ते गए,,,
आज मैंने सुबह हवन किया तो -- #द्वविंशतीउत्तरशततमे--122 साल बोला,,यानी जब मैंने पहली बार यज्ञ किया तब सृष्टि को एक अरब,,96 करोड़,8 लाख,53 हजार 113 साल हुए थे,,,आज 122 वां साल लग गया,,,
आप या हम चाहे कितने ही दिन में यज्ञ करें, महीने में, साल में या कई साल में एक बार,, उस दिन वही तिथि और वार बोला जाएगा जो था,, और हम प्रतिदिन करें न करें कहीं न कहीं संसार में हमेशा यज्ञ होते रहते हैं और संकल्प पाठ बोला जाता है,, तिथियाँ जुड़ती रहती हैं,,जब तक सृष्टि रहेगी यज्ञ होते रहेंगे,, कहीं शादी के, कहीं पूर्णिमा #अमावस्या के, कहीं जन्मदिन के, कहीं भूमिपूजन के,,
कहीं #उदघाटन के, कहीं चुनाव विजय के, कहीं होली दीपावली के,, कहीं सक्रांति या शिवरात्रि के अवसर पर,, तिथियाँ जुड़ती रहेंगी,,, लगभग आधा दिन ही व्यतीत हुआ है अभी तो ब्रह्म का,, यानी आधी सृष्टि अभी बाकी है,,,
इतना वैज्ञानिक #केलकुलेशन और दृष्टिकोण संसार में अन्य किसी के पास न है जो वैदिक धर्मियों को उपहार में मिला है,,, बस उसकी कदर करें,, थोड़ा अध्धयन करें,,
अपने धर्म,, अपनी संस्कृति के संवाहक बनें,, अपने #धर्मग्रंथों अपने पूर्वजों को मान दें,, अपने देवताओं को प्रसन्न करें,,, पूजा उपासना से,, ध्यान धर्म से,,जिस भी तरीके से सम्भव हो कीजिए,,, अपने ज्ञान विज्ञान पर गर्व कीजिए,,, आप हम सबसे #सुसंस्कृत और #सुशिक्षित संस्कृति के हिस्से हैं,,, डटकर जवाब दीजिए लिब्रान्दुओ को,, खदेड़ दीजिए,,पलटकर हमला कीजिए,,,
आप देखेंगे कि वे जो नाग की तरह फुफकारते हैं हमारी परम्पराओं मान्यताओं को लेकर,,एकदिन उनकी सिर्फ #केंचुलियाँ बच जाएंगी,,,
आखिर कालिया मर्दन करने वाले की संताने हैं हम,,, समुद्र पार जाकर राक्षसों का वध करने वाले #देवताओं का रक्त है हममें,,,
मित्रों को नूतनवर्ष की शुभकामनाएं, मंगलकामनाएं,,
#हिन्दूराष्ट्र विजयतां
*सूर्यदेव*
द्वापर मे हुये धर्मयुद्ध महाभारत पर बहुत कुछ आपको मालूम है...लेकिन भीष्म और श्रीकृष्ण के बीच हुआ यह वार्तालाप आपको झझकोर देगा और अंतिम भाग प्रत्येक सनातनी को उसके मूल दायित्वों की याद जरूर दिला देगा....पढ़ियेगा जरूर!
____________________
धर्मयुद्ध महाभारत समाप्त हो चुका था...
युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र,मुकुट,टूटे शस्त्र,टूटे रथों के चक्के,छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायु मण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी..विलाप करती विधवायें...और चीखते गिद्ध!!!
गिद्ध,कुत्ते,सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा "देवव्रत" (भीष्म पितामह) शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था,वो भी बिल्कुल अकेला..!
तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची,"प्रणाम पितामह"...!!
महाबली भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी....वो बोले.........आओ देवकीनंदन..स्वागत है तुम्हारा....!!
वास्तव मे मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था !!
तब कृष्ण बोले!!क्या कहूँ पितामह!
अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप?
भीष्म कुछ देर चुप रहे, फिर कुछ क्षण बाद बोले,पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव?????
उसका ध्यान रखना,महाभारत के समाप्त हो जाने के बाद और परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रसाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है!!
कृष्ण चुपचाप सुनते रहे ...!
भीष्म ने पुनः कहा,कुछ पूछूँ केशव?
बड़े अच्छे समय से आये हो !
प्रश्न केवल इसलिये कि सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे विचलित मन मे चल रहें अनेक भ्रम समाप्त हो जाये!!
कृष्ण बोले--नि:संकोच कहिये न पितामह!!
भीष्म बोले..एक बात बताओ प्रभु..तुम ही तो ईश्वर हो न.?
कृष्ण ने बीच में ही टोका नहीं पितामह!!
मैं ईश्वर नहीं ...मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह ...
ईश्वर नहीं ....!!
भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े ....
बोले , अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण...इसलिये नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा...किंतु अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया,
कम से कम अब तो ठगना छोड़ दे रे..!
कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले ...."कहिये पितामह ..!"
भीष्म बोले....."एक बात बताओ कन्हैया....
इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या ..?"
कृष्ण पूछे.."किसकी ओर से पितामह ....?
पांडवों की ओर से ....?"
भीष्म बोले--"कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया..
पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था...?
#आचार्य #द्रोण का #वध,
#दुर्योधन की #जंघा के नीचे #प्रहार,
#दुःशासन की #छाती का चीरा जाना,
#जयद्रथ के साथ हुआ #छल,
#निहत्थे #कर्ण का #वध..
सब ठीक था क्या?
यह सब उचित था क्या?
कृष्ण बोले कि अब इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह...इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ...!!
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम...
उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन ...
मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह ...!!
मुस्कराते हुये गंगा पुत्र बोले कि अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण.अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है..किंतु मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है ....
इसीलिये मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण ....!
बस इसके बाद यशोदानंदन बोले कि...
तो सुनिए पितामह कुछ बुरा नहीं हुआ,कुछ अनैतिक नहीं हुआ ...वही हुआ जो हो होना चाहिए ...!
भीष्म बोले--यह तुम कह रहे हो केशव ....
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ....
यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा,फिर यह उचित कैसे हो गया.....?
यशोदनंदन ने मुस्करा कर जवाब दिया...
कि इतिहास से शिक्षा जरूर ली जाती है पितामह.......
पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है..हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है...
राम त्रेता युग के नायक थे.......
मेरे भाग में द्वापर आया था..
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह!
तब देवव्रत ने प्रश्नवाचक दृष्टि से पूछा...
नहीं समझ पाया कृष्ण...जरा समझाओ तो सही.... !
तब नारायण ने कहा कि राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह राम के युग में खलनायक भी रावण जैसा शिवभक्त होता था..........
तब रावण जैसी नकारात्मक आसुरी शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे.................
तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे......
उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था....
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया ....
किंतु पितामह मेरे युग के भाग मे कंस,जरासन्ध,दुर्योधन,दुःशासन,शकुनी,जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं...उनकी समाप्ति के लिए हर तरह का छल उचित है पितामह..लक्ष्य इतना ही है कि पाप का अंत आवश्यक है पितामह.....वह चाहे जिस विधि से हो .... और अभिमन्यु का वध,द्रौपदी का चीरहरण,एकलव्य का अंगूठा काटने जैसे जाने कितनी कुटिल घटनायें दृष्टांत आप कैसे भुला बैठे गंगापुत्र...!"
भीष्म बोले-----तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव...क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुसरण नहीं करेगा....और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ..... ??
तब नि:संकोच द्वारिकाधीश ने कहा कि भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह....कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा.....वहाँ सनातनधर्मी को द्वापर के कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा.....नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा ........क्योंकि जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए उस पर आक्रमण कर रही हों तो आदर्श,शुचिता और नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह...........तब महत्वपूर्ण होती है विजय,विजय और केवल विजय.....पितामह..सनातनधर्मियो को अपना भविष्य बचाने के लिये नीति के इन सिद्धांतो को यह सीखना ही होगा.... !!
भीष्म अभी भी संशय मे थे..तभी तो पूछा कि क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव..और यदि धर्म का नाश होना ही है....तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ..... ?
यशोदानंदन तब गंभीर होकर कहे कि...सब कुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह ....
ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता वो केवल मार्ग दर्शन करता है...असल मे सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है.आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न....तो बताइए न पितामह कि मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या सब पांडवों को ही करना पड़ा न ....
यही प्रकृति का नियम है...
युद्ध के प्रथम दिन यही तो विराट रूप मे मैने अर्जुन से कहा था...यही परम सत्य है ...!!
इस संवाद के बाद भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे.
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी...
उन्होंने कहा--चलो कृष्ण!!यह इस धरा पर मेरी अंतिम रात्रि है.कल सम्भवतः चले जाना हो ...
अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण ..!
तब योगीराज ने मन ही मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले किंतु युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुकाथा.कि ैतिक_और_क्रूर_शक्तियाँ_सत्य_और_धर्म_का_विनाश_करने_के_लिए_आक्रमण_कर_रही_हों!
#तो_नैतिकता_का_पाठ_आत्मघाती_होता_है।
बहरहाल पोस्ट का मूल भाव समझ तो गये ही होंगे...
तो फिर उठिये,खड़े होइये और मनसा,वाचा,कर्मणा जुट जाइये अपने सनातन और अपने राष्ट्र की सुरक्षा,संरक्षा के लिये..!!
#वंदेमातरम्
मनु और शतरूपा ने
जब अपनी पुत्री देवहूति का हाथ
कर्दम ऋषि के हाथ में देने की इच्छा प्रकट की तो
कर्दम ने कहा-
'मैं भोग-विलास के लिये नहीं,
परंतु पत्नी के साथ नित्य सत्संग करके
आत्मसुख प्राप्त करने के लिये ही
विवाह करना चाहता हूँ।
मुझे भोगपत्नी नहीं, धर्मपत्नी चाहिये।
हमारा सम्बन्ध संसार का उपभोग करने के लिये नहीं, बल्कि नाव और नाविक की तरह
संसार-सागर पार करने के लिये होगा।
अत: एक पुत्र की प्राप्ति के बाद मैं संन्यास ले लूँगा।
क्या आपको स्वीकार्य है?'
मनु-शतरूपा बड़ी उलझन में पड़े,
किंतु देवहूति ने तपस्वी की सेवा स्वीकार कर ली
और वल्कल वस्त्र पहन लिये।
विवाह के बाद दम्पती ने
बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन किया
और पत्नी ने पति-सेवा के व्रत का निर्वाह किया।
सेवा से प्रसन्न होकर
कर्दम ने पत्नी की इच्छा को पूर्ण करना चाहा तो
पत्नी ने कहा,
'और दूसरी वस्तु क्या माँगूँ ?
हाथ पकड़कर लाये हो
तो हाथ पकड़कर प्रभु के दरबार में भी पहुँचा दीजिये।'
ऐसे दिव्य दाम्पत्य के द्वार पर ही
भगवान् कपिल पुत्ररूप में पधारे।
विवाह के बारे में कैसी सुन्दर जीवन-दृष्टि है!
संकलित...
Chakradhar Jha
भारत ने जो महान गुरु पैदा किए हैं,
नागार्जुन उनमें से एक थे।
उनमें एक दुर्लभ प्रतिभा थी।
सच तो यह है कि
बौद्धिक तल पर सारी दुनिया में वे अतुलनीय हैं।
ऐसी तीक्ष्ण और प्रगाढ़ प्रतिभा
कभी-कभी ही घटित होती है।
नागर्जुन एक नगर से गुजर रहे थे।
वह राजधानी है।
नागार्जुन सदा नग्न रहते थे।
उस राज्य की रानी को नागार्जुन के प्रति बहुत प्रेम था, बहुत श्रद्धा थी,
बहुत भक्ति थी।
नागार्जुन भोजन मांगने राजमहल आए।
उनके हाथ में लकड़ी का भिक्षापात्र था।
रानी ने उनसे कहा कि
आप कृपा कर मुझे यह भिक्षापात्र दे दें।
मैं इसे आपकी भेंट समझूंगी
और इसकी जगह मैंने आपके लिए
दूसरा भिक्षापात्र निर्मित कराया है।
नागार्जुन ने भेंट स्वीकार कर ली।
दूसरा भिक्षापात्र सोने का बना था
और उसमें बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे।
वह बहुत कीमती था।
लेकिन नागार्जुन ने कुछ नहीं कहा।
सामान्यत: कोई संन्यासी उसे नहीं लेता,
वह कहता कि मैं सोना नहीं छूता हूं।
लेकिन नागार्जुन ने उसे ले लिया।
अगर सच में सोना मिट्टी है तो भेद क्या करना?
रानी को यह बात अच्छी नहीं लगी।
उसने सोचा कि इतने बड़े संत हैं,
उन्हें इनकार करना चाहिए था।
स्वयं नग्न रहते हैं,
पास में कुछ संग्रह नहीं रखते,
फिर उन्होंने इतना कीमती भिक्षापात्र कैसे स्वीकार किया! और अगर नागार्जुन इनकार करते तो
रानी उन पर लेने के लिए जोर डालती
और तब उसे अच्छा लगता।
लेकिन नागार्जुन उसे लेकर चले गये।
एक चोर ने नगर से उन्हें गुजरते हुए देखा।
उसने सोचा कि
यह आदमी ऐसा बहुमूल्य भिक्षापात्र
अपने पास नहीं रख सकेगा,
कोई न कोई जरूर इसकी चोरी कर लेगा।
एक नंगा आदमी कैसे उसकी रक्षा कर सकता है?
और वह चोर नागार्जुन के पीछे हो लिया।
नागार्जुन नगर के बाहर एक मठ में रहते थे
और अकेले रहते थे।
वह मठ जीर्ण—शीर्ण था।
नागार्जुन उसके भीतर गए।
उन्होंने
अपने पीछे आते हुए इस आदमी की पदचाप सुनी।
वे समझ गये कि वह किस लिए पीछे—पीछे आ रहा है, वह मेरे लिए नहीं इस भिक्षापात्र के लिए आ रहा है।अन्यथा
इस जरा—जीर्ण मठ में कौन आता!
नागार्जुन मठ के अंदर गये
और चोर बाहर दीवार के पीछे खड़ा हो गया।
यह देखकर कि चोर बाहर ताक में खड़ा है,
नागार्जुन ने भिक्षापात्र को दरवाजे से बाहर फेंक दिया।
चोर तो चकित रह गया,
उसको कुछ समझ में नहीं आया।
यह कैसा आदमी है!
नंगा है,
इसके पास इतना कीमती पात्र है
और यह उसे बाहर फेंक देता है।
चोर ने नागार्जुन से कहा ,
”क्या मैं अंदर आ सकता हूं
क्योंकि मुझे एक प्रश्न पूछना है।”
नागार्जुन ने कहा ,
”मैंने पात्र को इसीलिए बाहर फेंक दिया कि
तुम अंदर आ सको।
मैं अभी अपनी दोपहर की नींद लेने जा रहा हूं।
तुम भिक्षापात्र लेने अंदर आते,
लेकिन मुझसे तुम्हारी मुलाकात नहीं होती।
तुम अंदर आ जाओ।”
चोर अंदर गया।
उसने पूछा कि
ऐसी बहुमूल्य वस्तु को आपने फेंक कैसे दिया?
मैं चोर हूं।
लेकिन आप ऐसे संत हैं कि
आपसे मैं झूठ नहीं बोल सकता।
नागार्जुन ने कहा ,
”चिंता मत करो, हर कोई चोर है।
तुम अपनी बात निस्संकोच कहो।
फिजूल की बातों में वक्त मत खराब करो।”
चोर ने कहा ,
”कभी—कभी आप जैसे व्यक्ति को देखकर
मेरे मन में भी कामना उठती कि काश,
इस स्थिति को मैं भी उपलब्ध होता।
लेकिन चोर हूं और यह स्थिति मेरे लिए असंभव है। लेकिन मेरी आशा और प्रार्थना रहेगी कि
किसी दिन मैं भी ऐसी कीमती चीज फेंक सकूं।
बड़ी कृपा होगी यदि आप मुझे उपदेश करें।
मैं अनेक संतों के पास गया हूं।
वे मुझे जानते हैं,
क्योंकि मैं एक नामी चोर हूं।
वे सब यही कहते हैं कि
तुम पहले अपने धंधे को छोड़ो,
तभी तुम्हें ध्यान में गति मिल सकती है।
लेकिन यह मेरे लिए असाध्य मालूत होता है।
मैं चोरी का धंधा छोड़ नहीं सकता।
क्या मेरे लिए ध्यान नहीं है?
नागार्जुन ने उत्तर में कहा कि
अगर कोई कहता है कि
पहले चोरी छोड़ो और तब ध्यान करो,
तो उसे ध्यान के बारे में कुछ भी पता नहीं है।
ध्यान और चोरी के बीच संबंध क्या है?
कोई संबंध नहीं है।
तुम जो भी करते हो किये जाओ।
और मैं तुम्हें विधि देता हूं तुम उसका प्रयोग करो।”
चोर ने कहा ,
” ऐसा लगता है कि
आपके साथ मेरा तालमेल बैठ सकता है।
क्या सच ही मैं अपना धंधा जारी रख सकता हूं?
कृपया जल्दी अपनी विधि बतायें।”
नागार्जुन ने कहा,
“तुम सिर्फ होश रखो, बोध बढ़ाओ।
जब चोरी करने जाओ तो उसके प्रति भी सजग रहो, होशपूर्ण रहो।
जब सेंध लगाओ
तब जानते रहो कि मैं सेंध लगा रहा हूं पूरे होश में रहो। जब खजाने से कुछ निकालो तब भी जागरूक रहो,
होश के साथ निकालो।
तुम क्या करते हो इससे मुझे लेना—देना नहीं है,
लेकिन जो भी करो बोधपूर्वक करो।
और पंद्रह दिन बाद मेरे पास आना।
लेकिन यदि इस विधि का अभ्यास न कर सको तो
मत आना।
पंद्रह दिन निरंतर अभ्यास करो।
जो भी जी में आये करो, लेकिन पूरे सजग होकर करो।”
चोर तीसरे ही दिन वापस आया
और उसने नागार्जुन से कहा,
“पंद्रह दिन का समय बहुत है, मैं आज ही आ गया।
आप बड़े चालाक आदमी मालूम होते हैं।
आपने ऐसी विधि बताई कि मेरा धंधा चलना मुश्किल है। पूरा होश रखकर मैं चोरी नहीं कर सकता हूं।
पिछली तीन रातों से मैं राजमहल जा रहा हूं।
मैं खजाने तक गया, उसे खोल भी लिया।
मेरे सामने बहुमूल्य हीरे—जवाहरात थे,
लेकिन मैं तभी पूरी तरह सजग हो गया।
और सजग होते ही मैं बुद्ध की मूर्ति की तरह हो गया,
मैं कुछ भी नहीं कर सका।
मेरे हाथों ने हिलने से इनकार कर दिया
और सारा खजाना व्यर्थ मालूम पड़ने लगा।
तीन रातों से मैं लौट—लौटकर राजमहल जाता हूं।
समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं!
आपने तो कहा था कि
इस विधि में धंधा छोड़ने की शर्त नहीं है,
लेकिन ऐसा लगता है कि
विधि में ही कोई छिपी प्रक्रिया है।”
नागार्जुन ने कहा,
“दुबारा मेरे पास मत आना।
अब चुनाव तुम्हें करना है।
अगर चोरी जारी रखना चाहते हो तो
ध्यान को भूल जाओ।
और अगर ध्यान चाहते हो तो चोरी को भूल जाओ। चुनाव तुम्हें करना है।”
चोर ने कहा,
“आपने तो मुझे बड़े धर्म संकट में डाल दिया।
इन तीन दिनों में मैंने जाना कि मेरे अंदर भी आत्मा है, और जब मैं राजमहल में कुछ चोरी किए बिना
वापस आया तो
पहली दफा मुझे लगा कि मैं सम्राट हूं चोर नहीं।
ये तीन दिन इतने आनंदपूर्ण रहे हैं कि
मैं अब ध्यान नहीं छोड़ सकता।
आपने मेरे साथ चालाकी की।
अब आप मुझे दीक्षा दें औरअपना शिष्य बना लें।
और अधिक प्रयोग की जरूरत नहीं है,
तीन दिन काफी हैं।”
कुछ भी विषय हो,
यदि तुम सजग रहो तो सब कुछ ध्यान बन जाता है। तादात्म्य को जागरूक होकर प्रयोग में लाओ,
तब वह ध्यान बन जाएगा।
बेहोशी में किया गया तादात्म्य पाप है।
तंत्र-सूत्र
ओशो
Via via... चक्रधर झा, Ajai Singh, Pramod Shukla
Click here to claim your Sponsored Listing.
Location
Category
Contact the school
Address
J. P. Jangid
Jaipur
302001
28/05/2022