18/01/2025
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This is a Community Tuition Initiative conceived and managed by The Academy for Socio- Legal Studies
This is a Community Tuition Initiative conceived and managed by The Academy for Socio- Legal Studies, Jaipur
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12/10/2024
Why so silent?
आज अचानक मेरी कविता आई मेरे पास
बड़े प्यार से पूछा उसने क्यों हूँ आज उदास
रहने वाले सदा व्यस्त क्यों आलस के आधीन ?
क्या बोलूँ जब यहाँ हो गया जीवन ही गतिहीन
बीत रही खाली दिनचर्या बिना लक्ष्य के आज
कोई भी प्रतिक्रिया नहीं है सूना पड़ा समाज
कविता बोली जान गई हूँ मैं भी यह अभिशाप
इसीलिए तो मेरा आँचल सुलग रहा चुपचाप
इस चिंगारी से ही बनता है जीवन गतिशील
इसको सदा जलाये रखना, कभी न देना ढील
राजस्थान उच्च न्यायलय ने एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है जब उसने स्वतः सज्ञान लेकर सड़क किनारे सीमेंट पाइप में अपने बच्चों के साथ रह रही महिला की दशा पर दुखी होते हुए उसके सरंक्षण के आदेश दिये हैं. यह आदेश माननीय न्यायाधीश श्री अनूप कुमार ढांड ने दिये हैं.वे हमारे आदर के पात्र हैं.
यह कैसी विडंबना है कि कोई हिन्दू वैश्य चाहे तो मुसलमान बन सकता है पर वह ब्राह्मण नहीँ बन सकता.
आज दो व्यक्तियों ने बताया कि उन्हें बाइबल पढ़ना अच्छा लगता है लेकिन सिर्फ इसी कारण धर्म परिवर्तन का आरोप लगाकर उनके साथ मारपीट की गई और दवाब डालकर पुलिस द्वारा उन्हें गिरफ्तार भी करवा दिया। मुसलमानों के साथ भी ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। मुझे अपने ट्रेड यूनियन काम का ज़माना याद आ रहा है। कारखानों में यूनियनें मज़बूत हुआ करती थीं। उनमें हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि सभी धर्मों के मज़दूर हुआ करते थे। वे आपस में कभी नहीं लड़ते थे। उनमें जबरदस्त एकता थी। कारखाने का मालिक या अन्य अधिकारी कारखाने को नुकसान पहुँचाने की झूंठी रिपोर्ट लिखाकर कुछ मज़दूरों और उनका नेता होने के कारण मुझे उनके साथ गिरफ्तार करवा देते थे। हवालात में बंदी रहते हुए मैंने खुद थाना इंचार्ज के पास कारखाने के मालिक की ओर से लिफाफे पहुँचते हुए देखे हैं। लेकिन अब हालात आश्चर्यजनक रूप से बदल चुके हैं। पूंजीपतियों ने धर्म आधारित राजनीति को अपने आधीन करने के बाद जहाँ मज़दूर यूनियनों को बेहद कमज़ोर कर दिया है वहीं अंधभक्तों द्वारा दूसरे धर्मों के लोगों पर अकारण हमले करवाने भी शुरू कर दिए हैं ताकि मज़दूरों का ध्यान अपनी समस्याओं से हटकर इन फालतू बातों पर लगा रहे और सर्वहारा की सत्ता का सपना सदा के लिए लुप्त हो जाये। अंधभक्तों के कहने पर उनका विरोध करने वाले मज़दूरों पर झूंठे मुकदमे भी बना देती है। वैसे भी पुलिस अंधभक्तों के राजनैतिक आकाओं के दवाब में हमेशा रहती ही है।
I am bewildered to see advancement of Artificial Intelligence in every field. Even literature is not out of its reach. It gives its opinion on every literary work, may be it poetry, novel, story and other forms. I can't say at this stage if it can be manipulated or not. But the question remains that whether it is advisable to use AI in a field of independent thinking and emotions ?
मैं हिंदी में सोचता हूँ , हिंदी में कविता, कहानी , उपन्यास आदि लिखता हूँ और यदि मज़बूरी न हो तो हिंदी में ही बात करता हूँ। लेकिन मेरे मित्रगण आश्चर्य करते होंगे कि फेसबुक पर मेरी अधिकांश टिप्पणियां व समीक्षा अंग्रेजी में क्यों होती हैं। मैं लज्जित भी होता हूँ लेकिन यह मेरी विवशता है। काफी कोशिश करने के बाद भी मुझे हिंदी में टाइप करना नहीं आया। आता तो अंग्रजी का टाइप भी अच्छी तरह नहीं है , अभी तक एक उंगली से करता हूँ पर काम चला लेता हूँ। अगर हिंदी में लिखना होता है जैसे कि अब लिख रहा हूँ तो पहले गूगल इनपुट टूल्स में लिखना पड़ता है फिर कॉपी पेस्ट करना पड़ता है। आशा है मेरे मित्र मेरी विवशता को समझ लेंगे।
सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
सन 1977 की जनवरी में जयपुर में हाई कोर्ट की बेंच ने काम शुरू किया था। मैंने अन्य कोर्टों का काम अपने ऑफिस के साथियों को सौंप कर हाई कोर्ट के काम में ही अपना सारा समय देना शुरू कर दिया। मैं केवल श्रमिकों और कर्मचारियों की और से उनके सेवा संबंधी केसों में ही पैरवी करता रहा हूँ। 1977 से 2020 तक 46 वर्षों में ( बीच के 5 वर्ष छोड़कर जब मैं सुप्रीम कोर्ट में प्रेक्टिस करने दिल्ली रहा था ) मेरे द्वारा पैरवी किये गए लगभग 6000 केसों में निर्णय हुए थे। मुझे यह कहते हुए ख़ुशी होती है कि इनमे लगभग 80 प्रतिशत केसों में श्रमिकों कर्मचारियों के पक्ष में निर्णय हुए थे। इत्तफाक से उन दिनों हाई कोर्ट में न्यायाधीश भी संवेदनशील थे। वे गरीब श्रमिकों और कर्मचारियों की परेशानियाँ समझकर उनके केसों को प्राथमिकता भी देते थे। दुर्भाग्य से 2020 में ही कोरोना काल शुरू हुआ। अदालतों में काम बंद सा हो गया। ऑनलाइन काम ढंग से हो नहीं पाया। कोरोना काल के बाद जब काम दोबारा शुरू हुआ तो स्थिति ही बदल गई। अब हर कोर्ट में रोज़ लगभग 1000 केस लिस्ट होते हैं। अधितर केसों का नंबर ही नहीं आ पाता। पहले की तरह प्राथमिकता भी नहीं मिलती। जो हाल कोर्ट के अंदर का है वैसा ही बाहर का है। इतनी कारें आती हैं कि पार्किंग की जगह ही नहीं मिलती। गेट बंद हो जाते हैं। दूर बाहर सड़क पर कार खड़ी करनी पड़ती है। गरीब और पीड़ित मेरे मुवक्किल निराश,परेशान होते हैं सो अलग।
I have keenly noted that a number of women Facebook friends are posting their beautiful and touchy poems. But each poem is either romantic or concerning their bitter sweet relationship. I wonder, are they totally ignorant of so many social problems like hunger, discrimination, rising every type of offences, unemlpoyment, atrocities etc. Why their conscience is not effected by such situation.
Yesterday a young lady came to meet me and to have some talks on some burning issues of today. Her name is Sahiba Parveen. She is one of my latest Facebook friend. I have been telling law interns who have been coming to me through PUCL or otherwise that the new generation is much more talented than our generation and if they use their talent in right way a new shining and conscientious world will be created. While listening to Sahiba I felt as if a foremost representative of the talented new generation of my dreams is sitting before me. I was very much impressed by her way of expression, her knowledge, sincerity and commitment. I wish her all progress in life. Age wise she is like my grand daughter, so I convey my heartfelt blessings to her .