20/03/2025
राजस्थान Gk फैक्ट 💯👍
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20/03/2025
राजस्थान Gk फैक्ट 💯👍
जय साईको विज्ञान उजागर, साईकी लोगस से भरा है सागर। विलियम वुन्ट अति विशाला, लिपजिंग मध्य खोली प्रयोगशाला। 1।
टिचनर, वुन्ट संरचनावादी, विलियम जेम्स प्रकार्यवादी। वाटसन व्यवहारवाद के ज्ञाता, कोहलर के गेस्टाल्टवाद दाता । 2 ।
थार्नडाइक सम्बन्धवाद को जाना, तत्पर अभ्यास प्रभाव बखाना । प्रयत्न भूल विधि के दाता, उद्दीपन अनुक्रिया के ज्ञाता । 3 ।
सूझ सुल्तान कोहलर ने लाया, क्रिया प्रसूत स्किनर सिखाया। प्राचीन अनुबंधन पावलव लाया, भोजन घंटी में सम्बन्ध समझाया। 4 ।
उपलब्धि अभिप्रेरण एटकिन्सन जाना, आवश्यक्ता पदानुक्रम मैसलो माना। पठन विकृति होती डिस्लेक्सिया, अधिगम विकृति बनी डिस्फेजिया। लेखन विकृति डिसग्राफिया कहलाई गणितीय विकृति डिस्केलकुलिया भाई। 5 ।
किंडरगार्डन बच्चो का बगीचा, फ्रॉबेल ने इसे फ्रेम में सींचा। बुनियादी शिक्षा गांधी भायी, प्रोजेक्ट प्रणाली किलपेट्रिक ने लायी। 6 ।
खेल विधि हेनर कुक जाना, मांटेसरी विधि मारिया बखाना। गोलमैन संवेग का सिंद्धाया,
गाल्टन ने बुद्धि कदम बढ़ाया। 7 ।
मूर्त अमूर्त सामाजिक बुद्धि, प्राप्त किये थार्नडाइक सिद्धि। प्रथम माप बिने बुद्धि का किन्हा, टर्मन बुद्धि - लब्द्धि दे दिन्हा। 8 ।
त्रियामी गिल्फोर्ड का भाई, थार्नडाईक बहुकारक लाई। गार्डनर बहुबुद्धि के दाता, वर्ट वर्जन पदानुक्रमिक के ज्ञाता। 9।
तरल ठोस बुद्धि कैटेल को जानो, तीन कारक स्पियरमैन का मानो। समूह करक थर्स्टन से पाया, पास एलॉन्ग अलेक्जेंडर ने लाया। 10 ।
बैटरी परीक्षण भाटिया दीन्हा, बिने - साइमन परीक्षण कीन्हा।। व्यक्तित्व पर्सोना से आया, हिंदी अर्थ मुखौटा बताया। 11 ।
सिग्मंड फ्रायड मनोविश्लेषी, चेतन अर्थ अचेतन अभिलेखी। इड ईगो सुपर आपबखाना, मूल प्रवृत्ति जीवन मृत्यु माना। इरोस शब्द जीवन का मूलक, थेनटास मृत्यू समूलक। 12 ।
हिप्पोक्रिटस प्रथम प्रकार बताया, शारीरिक द्रव्य में सबको पाया।
क्रेश्चमर शरीर गठन को जाना, स्थूल, कृश, पुष्ट, विशाल को माना । 13 ।
शेल्डन ने भी शरीर को गाया,
एण्डो, मिसो, एक्टोमॉर्फी बताया। मनोवैज्ञानिक युंग का जानो, अंतर्मुखी बहिर्मुखी को मानो ।14।
नैतिक विकास कोहल्बर्ग का भाई, विकासवाद लैमार्क है लायी।
मॉर्गन मूर्रे TAT अति भाया,
स्याही धब्बा रोर्शा ने लाया। 15 ।
सोलह कारक कैटेल का जानो,
CAT बेल्लाक का मानों
MPPI हाथवे का भाई, SCT टेन्ड पाइन से आयी
*◾ राजस्थान में पर्यटन :-*
*🔹 पर्यटन निदेशालय - 1955*
*🔹 पर्यटन विभाग- 1956*
*🔹 राजस्थान राज्य पर्यटन होटल निगम लिमिटेड - 7 जून,1965*
*🔹 राजस्थान पर्यटन विकास निगम (RTDC) - 1 अप्रैल 1979*
*🔹 पर्यटन को उद्योग का दर्जा - मार्च, 1989 (मोहम्मद यूनुस समिति)*
*🔹 रीटमैन की स्थापना - 29 अक्टूबर,1996*
*🔹 यूएनओ द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यटन वर्ष - 2003*
*🔹 पर्यटन को जन उद्योग का दर्जा - 2004-05*
*🔹 प्रथम पर्यटन नीति - 2001*
*🔹 नवीनतम पर्यटन नीति - 9 सितंबर,2020*
*🔹 ग्रामीण रोजगार पर्यटन नीति - 5दिसंबर,2020 (आर्थिक सर्वे के अनुसार 30 नवंबर,2022)*
*🔹 फिल्म पर्यटन प्रोत्साहन नीति - 18 अप्रैल,2022*
*🔹 राज्य की प्रथम इको ट्यूरिज्म नीति - 2010*
*🔹 नवीनतम इको टूरिज्म नीति- जुलाई 2021*
*🔹 पर्यटन को पूर्ण उद्योग का दर्जा- 18 मई 2022*
*🔹 ग्रामीण पर्यटन योजना- 5 दिसंबर 2022*
*🔹 अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन दिवस - 27 सितंबर*
*🔹 राष्ट्रीय पर्यटन दिवस- 25 जनवरी*
12/07/2024
एक छोटा सा सुझाव है ....
मेरे सभी मित्रों को ...जो तैयारी कर रहे हैं किसी न किसी भर्ती की ...
फोन को बन्द करके फैंक दें ....अगले छ माह के लिए ....
अगर आप आज किसी भी स्तर से तैयारी शुरू कर रहे हैं किसी भी परीक्षा की कर रहे हैं ...
और बिल्कुल नहीं छूट रहा है तो ...बस ओपन करने से पहले या अपनी आंखें कहीं भी गडा़ने से पहले एक विचार हर दिन कर लें कि जो देखने पढने सुनने जा रहे हैं ...मेरी तैयारी में काम आने वाला है या नहीं ...
यह एकदम सीधी लाइन है - आपके विचलन को ...कम से कम करने वाली ।
अपनी आदत का एक बहुत बड़ा हिस्सा बन चुके इस छ इंची झंझाल से मुक्ति इतनी आसान नहीं है ..पर जिसने अभ्यास करके यह कर लिया ...उसकी नौका पार है ...
तैयारी करना एक अलग विषय है ...
लेकिन आधे आधे घंटे बाद या एक एक घंटे बाद ....आराम के मोड में इसको निकालकर अपना मनोरंजन करके ...हम अपना क्षण क्षण नष्ट करने के अलावा कोई महान कार्य नहीं कर रहे हैं ...
हम सिर्फ इस बात को न सोचें की ये आराम का मामला है ...हमारी कर्मेंद्रियों ज्ञानेन्द्रियों की ऊर्जा का बहुत बड़ा हिस्सा इसमें निवेश होता है..फिर जब हम यहां से हटकर किताब पर जाते हैं तो एकदम डाटा फीडिंग होना तो शुरू नहीं हो जाता होगा ....और अधिक देर किताब पर टिके भी नहीं रह सकते होगें ....तो ऐसा क्या जरूरी है ...अपने भविष्य को अप्रत्यक्ष रूप से नष्ट करना अपने ही हाथों से ..
आज से पहले बहुत से लोग ...जो किसी न किसी प्रकार ...असफल हुए होंगें ....उनमें इस एक कारण से इन्कार नहीं किया जा सकता।
आप इस दुनिया पर छ महीने बाद आकर देखोगे तो इसे ऐसा ही पाओगे ...हां एक नयी चीज जो होगी वह यह है कि आपका अपना जीवन बदला हुआ होगा ...
खैर ..मैं भी पर यह सब लिखते हुए फोन का ही तो इस्तेमाल कर रहा हूं ...
पर जब खुद की तैयारी करते थे ...तब एकदम कांच की तरह साफ विजन था ...कि जो करना है बस करना ही है ...और उसके लिए भर्ती .आयेगी .....परीक्षा .होगी .....परिणाम कब आयेगा ...क्या मेरीट रहेगी ...इन सबके फेर से हमेशा दूर ही रहे।
पढ़ना है और सबसे अच्छा याद करना है बस...
23/06/2022
In the picture you can see a tomato plant, probably
Some traveler must have eaten a tomato and threw its seed from the train... This plant has come out not by tearing the chest of soil, but by tearing the stones. When it will be even smaller, then even after passing trains running faster than the storm like Shatabdi and Rajdhani, it only learned to grow and finally it gave birth to a tomato.
It has neither hands, nor feet, nor brain, and to survive, it needs at least soil and water, which it was entitled to, but this plant did without water, without soil, without Convenience raised itself. ... flourished and served the purpose of life.
People who think that we have failed in life, we cannot do anything in life, we are just ruined now, then they should learn something from this tomato plant.
The name of real life is a story of constant struggles.
02/03/2022
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Total Bhakti Sagar - YouTube All type of भक्ति स्टेट्स 🎶🙏🙏🌸🌺🌺🙏🙏🙏
महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (हिन्दी में) 1. Psychology शब्द का सबसे पहले प्रयोग किया – रुडोल्फ गॉलकाय द्वारा 1590 में 2. Psychology की प्रथम पुस्तक Psychologia लिखी – रुडोल्फ गॉलकाय ने 3. Psychology शब्द की उत्पत्ति हुई है – Psyche+Logos यूनानी भाषा के दो शब्दों से 4. विश्व की प्रथम Psychology Lab – 1879 में विलियम वुंट द्वारा जर्मनी में स्थापित 5. विश्व का प्रथम बुद्धि परीक्षण – 1905 में बिने व साइमन द्वारा * भारत का प्रथम बुद्धि परीक्षण – 1922 में सी. एच. राईस द्वारा 6. आधुनिक मनोविज्ञान का जनक – विलियम जेम्स 7. आधुनिक मनोविज्ञान के प्रथम मनोवैज्ञानिक – डेकार्टे 8. किन्डरगार्टन विधि के प्रतिपादक – फ्रोबेल 9. डाल्टन विधि के प्रतिपादक – मिस हेलेन पार्कहर्स्ट 10. मांटेसरी विधि के प्रतिपादक – मैडम मारिया मांटेसरी 11. संज्ञानात्मक आन्दोलन के जनक – अल्बर्ट बांडूरा 12. मनोविज्ञान के विभिन्न सिद्धांत/संप्रदाय और उनके जनक – गेस्टाल्टवाद (1912) – कोहलर, कोफ्का, वर्दीमर व लेविन संरचनावाद (1879)– विलियम वुंट व्यवहारवाद (1912) – जे. बी. वाटसन मनोविश्लेशणवाद (1900) – सिगमंड फ्रायड विकासात्मक/संज्ञानात्मक – जीन पियाजे संरचनात्मक अधिगम की अवधारणा – जेरोम ब्रूनर सामाजिक अधिगम सिद्धांत (1986) – अल्बर्ट बांडूरा संबंधवाद (1913) – थार्नडाईक अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत (1904) – पावलव क्रियाप्रसूत अनुबंधन सिद्धांत (1938) – स्किनर प्रबलन/पुनर्बलन सिद्धांत (1915) – हल अन्तर्दृष्टि/सूझ सिद्धांत (1912) – कोहलर 13. व्यक्तितत्व मापन की प्रमुख प्रक्षेपी विधियाँ प्रासंगिक अंतर्बोध परीक्षण (T.A.T.) बाल अंतर्बोध परीक्षण (C.A.T.) स्याही धब्बा परीक्षण (I.B.T.) वाक्य पूर्ति परीक्षण (S.C.T.) 14. व्यक्तितत्व मापन की प्रमुख अप्रक्षेपी विधियाँ अनुसूची प्रश्नावली साक्षात्कार आत्मकथा विधि व्यक्ति इतिहास विधि निरीक्षण समाजमिति शारीरिक परीक्षण स्वप्न विश्लेषण मानदंड मूल्यांकन विधि स्वंतत्र साहचर्य परीक्षण (F.W.A.T.) 15. बुद्धि के सिद्धांत और उनके प्रतिपादक – एक खण्ड का /निरंकुशवादी सिद्धांत (1911) – बिने, टरमन व स्टर्न द्वि खण्ड का सिद्धांत (1904) – स्पीयरमैन तीन खण्ड का सिद्धांत – स्पीयरमैन बहु खण्ड का सिद्धांत – थार्नडाईक समूह कारक सिद्धांत – थर्स्टन व कैली 16. बुद्धि लब्धि (I.Q.) ज्ञात करने का सूत्र – बुद्धि लब्धि (I.Q.) = मानसिक आयु (M.A.)/वास्तविक आयु (C.A.)×100 17. बुद्धि लब्धि (I.Q.) ज्ञात करने के सूत्र का प्रतिपादक – विलियम स्टर्न (1912) 18. बुद्धि लब्धि (I.Q.) ज्ञात करने के सूत्र का सर्वप्रथम प्रयोग – (1916) 19. बुद्धि लब्धि (Intelligent Quotient) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग – टरमन 20. मानसिक आयु (Mental Age) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग – बिने (1908) 21. वैयक्तिक भाषात्मक बुद्धि परीक्षण/परीक्षाएँ – बिने-साइमन बुद्धि परीक्षण – बिने & थियोडर साइमन (1905,1908,1911) स्टेनफोर्ड-बिने स्केल – स्टेनफोर्ड वि.वि. में बिने द्वारा (1916,1937,1960) 22. वैयक्तिक क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण/परीक्षाएँ – पोर्टियस भूल-भूलैया परीक्षण – एस. डी. पोर्टियस (1924) वैश्लर-वैल्यूब बुद्धि परीक्षण – डी. वैश्लवर (1944,1955) 23. सामूहिक भाषात्मक बुद्धि परीक्षण/परीक्षाएँ – आर्मी अल्फ़ा परीक्षण – आर्थर एस. ओटिस (1917) सेना सामान्य वर्गीकरण (A.G.C.T.) – (1945) 24. सामूहिक क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण/परीक्षाएँ – आर्मी बीटा परीक्षण – आर्थर एस. ओटिस (1919) शिकागो क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण – 6 वर्ष से वयस्कों की बुद्धि का मापन 25. ‘हिन्दुस्तानी क्रिया परीक्षण’ – (1922) सी. एच. राईस
🎈 #राजस्थान_के_लोकगीत -🎈
1. मोरिया
इस लोकगीत में ऐसी लड़की की व्यथा है, जिसका विवाह संबंध निश्चित हो गया है किन्तु विवाह होने में देरी है।
2. औल्यू
ओल्यू का मतलब 'याद आना' है। दाम्पत्य प्रेम से परिपूर्ण विलापयुक्त लयबद्ध गीत जिसमें पति के लिए भंवरजी, कँवरजी का तथा पत्नी के लिए मरवण व गौरी का प्रयोग किया गया है।
3. घूमर
राठौड़ राजेन्द्र सिंह कुरड़याँ
गणगौर अथवा तीज त्यौहारों के अवसर पर स्त्रियों द्वारा घूमर नृत्य के साथ गाया जाने वाला गीत है, जिसके माध्यम से नायिका अपने प्रियतम से श्रृंगारिक साधनों की मांग करती है।
4. गोरबंध
गोरबंध, ऊंट के गले का आभूषण है। मारवाड़ तथा शेखावटी क्षेत्र में इस आभूषण पर गीत गोरबंध नखरालो गीत गाया जाता है। इस गीत से ऊँट के शृंगार का वर्णन मिलता है।
5.कुरजां
यह लोकप्रिय गीत में कुरजां पक्षी को संबोधित करते हुए विरहणियों द्वारा अपने प्रियतम की याद में गाया जाता है, जिसमें नायिका अपने परदेश स्थित पति के लिए कुरजां को सन्देश देने का कहती है।
6.झोरावा
जैसलमेर क्षेत्र का लोकप्रिय गीत जो पत्नी अपने पति के वियोग में गाती है।
7. कागा
कौवे का घर की छत पर आना मेहमान आने का शगुन माना जाता है। कौवे को संबोधित करके प्रेयसी अपने प्रिय के आने का शगुन मानती है और कौवे को लालच देकर उड़ने की कहती है।
8.कांगसियों
यह राजस्थान का एक लोकप्रिय श्रृंगारिक गीत है।
9. सुवटिया
उत्तरी मेवाड़ में भील जाति की स्त्रियां पति -वियोग में तोते (सूए) को संबोधित करते हुए यह गीत गाती है।
10.जीरो
इस लोकप्रिय गीत में स्त्री अपने पति से जीरा न बोने का अनुनय-विनय करती है।
11.लांगुरिया
करौली की कैला देवी की आराधना में गाये जाने वाले भक्तिगीत लांगुरिया कहलाते हैं।
12. मूमल
यह जैसलमेर क्षेत्र का लोकप्रिय गीत है, जिसमें लोद्रवा की राजकुमारी मूमल के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है। यह एक श्रृंगारिक गीत है।
13.पावणा
विवाह के पश्चात् दामाद के ससुराल जाने पर भोजन के समय अथवा भोजन के उपरान्त स्त्रियों द्वारा गया जाने वाला गीत है।
14. सिठणें
यह विवाह के उपलक्ष्य में गाया जाने वाला गाली गीत है जो विवाह के समय स्त्रियां हंसी-मजाक के उद्देश्य से समधी और उसके अन्य सम्बन्धियों को संबोधित करते हुए गाती है।
15. हिचकी
मेवात क्षेत्र अथवा अलवर क्षेत्र का लोकप्रिय गीत दाम्पत्य प्रेम से परिपूर्ण जिसमें प्रियतम की याद को दर्शाया जाता है।
16.कामण
कामण का अर्थ है - जादू-टोना। पति को अन्य स्त्री के जादू-टोने से बचाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला गीत है।
17. पीपली
मारवाड़ बीकानेर तथा शेखावटी क्षेत्र में वर्षा ऋतु के समय स्त्रियों द्वारा गया जाने वाला गीत है।
18. सेंजा
यह एक विवाह गीत है, जो अच्छे वर की कामना हेतु महिलाओं द्वारा गया जाता है।
19.जच्चा
यह बच्चे के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला गीत है, जिसे होलरगीत भी कहते हैं।
20. चिरमी
चिरमी एक पौधा है जिसके बीज आभूषण तौलने में प्रयुक्त होते थे। चिरमी के पौधे को सम्बोधित कर नायिका द्वारा आल्हादित भाव से ससुराल में आभूषणों व चुनरी का वर्णन करते हुए स्वयं को चिरमी मान कर पिता की लाडली बताती है। इसमें पीहर की याद की भी झलक है।
21. केसरिया बालम
राजस्थान के इस अत्यंत लोकप्रिय गीत में नायिका विरह से युक्त होकर विदेश गए हुए अपने पति की याद करती है तथा देश में आने की अनुनय करती है।
22.हिण्डोल्या
राजस्थानी स्त्रियां श्रावण मास में झूला-झूलते हुए यह गीत गाती है।
23. हमसीढो
भील स्त्री तथा पुरूष दोनों द्वारा सम्मिलित रूप से मांगलिक अवसरों पर गाया जाने वाला गीत है।
24. ढोला-मारू
सिरोही क्षेत्र का यह लोकप्रिय गीत ढोला-मारू के प्रेम-प्रसंग पर आधारित है तथा इसे ढाढ़ी लोग गाते हैं।
25. रसिया
रसिया होली के अवसर पर ब्रज, भरतपुर व धौलपुर क्षेत्रों के अलावा नाथद्वारा के श्रीनाथजी के मंदिर में गए जाने वाले गीत है जिनमें अधिकतर कृष्ण भक्ति पर आधारित होते हैं।
26. इडुणी
इडुणी पानी भरने के लिए मटके के नीचे व सर के ऊपर रखे जाने वाली सज्जा युक्त वलयाकार वस्तु को कहते हैं। यह गीत पानी भरने जाते समय स्त्रियों द्वारा गाया जाता है। इसमें इडुणी के खो जाने का जिक्र होता है।
27. पणिहारी
यह पनघट से जुड़े लोक गीतों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है। पणिहारी गीत में राजस्थानी स्त्री का पतिव्रता धर्म पर अटल रहना बताया गया है। इसमें पतिव्रत धर्म पर अटल पणिहारिन व पथिक के संवाद को गीत रूप में गाया जाता है। जैसे – कुण रे खुदाया कुआँ, बावड़ी ए पणिहारी जी रे लो।
28. वर्षा ऋतु के गीत
वर्षा ऋतु से संबंधित गीत वर्षा ‘ऋतु गीत’ कहलाते है। वर्षा ऋतु में बहुत से सुन्दर गीत गाये जाते हैं। इस गीत में वर्षा ऋतु को सुरंगी ऋतु की उपमा दी गई है।
29. मोरियो
विरहनी स्त्री द्वारा मोर को सम्बोधि करते हुए गाए जाने वाले गीत को मोरिया गीत कहते है। यह प्रमुख लोकगीत है। मोरियों आछौ बोल्यौ रे ठलती रात मां...
30. वन्याक (विनायक)
गणेशजी (विनायक) मांगलिक कार्यो के देवता है। अत: मांगलिक कार्य एवं विवाह के अवसर पर सर्वप्रथम विनायक जी का गीत गाया जाता है।
31.बना-बनी
राजस्थानी संस्कृति के अनुसार जिस युवक व युवती की शादी होने वाली होती है, उस युवक को बना तथा युवती को बनी कहा जाता है। विवाह के अवसर बना-बनी बनकर जो गीत गाये जाते है, वे ‘बना-बनी’ कहलाते है।
32. धुडला
मारवाड़ क्षेत्र का लोकप्रिय गीत है, जो स्त्रियों द्वारा घुड़ला पर्व पर गाया जाता है। गीत है -'घुड़लो घूमै छै जी घूमै छै।' यह गाते समय स्त्रियाँ अपने सर पर मिट्टी का छेद वाला छोटा घड़ा रखती है जिसमें दीपक जला होता है।
33.जलो और जलाल
विवाह के समय वधू पक्ष की स्त्रियां जब वर की बारात का डेरा देखने आती है तब यह गीत गाती है।
34. जकडि़या
पीरों की प्रशंसा में गाए जाने वाले गीत जकडि़या गीत कहलाते है।
35.दुप्पटा
विवाह के समय दूल्हे की सालियों द्वारा गया जाने वाला गीत है।
36. हरजस
हरजस का अर्थ है हरि का यश अर्थात हरजस भगवान राम व श्रीकृष्ण की भक्ति में गाए जाने वाले भक्ति गीत है।
37. पपीहा
यह पपीहा पक्षी को सम्बोधित करते हुए गाया जाने वाला गीत है। जिसमें प्रेमिका अपने प्रेमी को उपवन में आकर मिलने की प्रार्थना करती है।
38. बिच्छुड़ो
यह हाडौती क्षेत्र का लोकप्रिय गीत जिसमें एक स्त्री जिसे बिच्छु ने काट लिया है और उसे मृत्यु तुल्य कष्ट होता जिस कारण वह पति को दूसरा विवाह करने का संदेश देती है।
39. पंछीडा गीत
हाडौती तथा ढूढाड़ क्षेत्र का लोकप्रिय गीत जो त्यौहारों तथा मेलों के समय गाया जाता है।
40. लावणी
लावणी से अभिप्राय बुलावे से है। नायक द्वारा नायिका को बुलाने के सन्दर्भ में लावणी गाई जाती है।
41. पीठी
'पीठी' गीत विवाह के अवसर पर विनायक स्थापना के पश्चात् भावी वर वधू को नियमत: उबटन (पीठी) लगाते समय गाया जाता है - 'मगेर रा मूँग मँगायो ए म्हाँ री पीठी मगर चढ़ावो ए'।
42. मेहँदी
विवाह होने के पूर्ववाली रात को यहाँ 'मेहँदी की रात' कहा जाता है। उस समय कन्या एवं वर को मेहँदी लगाई जाती है और मेहँदी गीत गाया जाता है - 'मँहदी वाई वाई बालड़ा री रेत प्रेम रस मँहदी राजणी।
43. बधावा
विवाह के अवसर पर बधाई के लिए गाये जाने वाले गीत।
44. झाडूलो
'झाडूलो' मुंडन के गीतों को कहते हैं।
45. सेवरो
विवाह में वर के माथे पर मौर बाँधते समय 'सेवरो' (सेहरा) गाया जाता है - 'म्हाँरे रंग बनड़े रा सेवरा'।
46. भात व माहेरा
भात भरना राजस्थान की एक महत्वपूर्ण प्रथा है। इसे 'माहेरा या मायरा' भी कहते हैं। जिस स्त्री के घर पुत्र या पुत्री का विवाह पड़ता है वह घर की अन्य स्त्रियों के साथ परात में गेहूँ और गुड़ लेकर पीहरवालों को निमंत्रण देने जाती है। इसको 'भात' कहते हैं। मेवाड़ में इसे बत्तीसी कहते हैं। मूल रूप में भात भाई को दिया जाता है। भाई के अभाव में पीहर के अन्य लोग'माहेरा' स्वीकार कर वस्त्र तथा धन सहायता के रूप में देते हैं। इस अवसर पर भात गीत की तरह अनेक गीत गाए जाते हैं।
47. राती जगो
जब बारात ब्याह के लिए चली जाती है तो वर पक्ष की स्त्रियाँ रात के पिछले पहर में 'राती जागो' नामक गीत गाती हैं। देवी देवताओं के गीतों में 'माता जी', 'बालाजी' (हनुमान जी),भेरूँ जी, सेड़ल माता, सतीराणी, पितराणी आदि को प्रसन्न करने की भावना छिपी है। सबके अलग अलग गीत होते हैं। इसके अलावा विशेष अवसर पर देवों को प्रसन्न करने के लिए भी रात भर जागरण करके महिलाओं द्वारा राती जगो के गीत गाये जाते हैं।
48. पंखेरू गीत
राजस्थानी अंचल में कई अत्यंत प्रिय एवं प्रसिद्ध पंखेरू गीत गाये जाते हैं, जैसे- ‘आड,कबूतर, कमेड़ी, काग, कागली, काबर, काळचिड़ी, कुरजां, कोचरी, कोयल, गिरज, गेगरी,गोडावण, चकवा-चकवी, चमचेड़, टींटोड़ी, तिलोर, तीतर, दौडो, पटेबड़ी, पीयल, बइयो,बुगलो, मोर, सांवळी, सारस, सुगनचिड़ी, सूवो, होळावो आदि । इनमें से कुछ अंचल विशेष तक सीमित है और कुछ सार्वभौम स्वरूप् लिए हुए है। विषय वस्तु की दृष्टि से इन पंखेरू गीतों को इन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है -1. वर्णनात्मक गीत, 2. शकुन गीत और3. प्रेम भरे सम्बोधन गीत ।
49. बारेती
प्रातःकाल 4 बजे जब शीतकाल में किसान बैलों की सहायता से पानी निकालते हैं तो वह गीत गाया करते हैं । इन्हें ‘बारेती’ गीत कहते हैं । इन गीतों में भक्ति से संबंधित गीत भी होते हें । बारेती गीतों में नीति तथा श्रृंगार आदि के दोहे से होते हैं।
50. धमार/ धमाल
‘धमाल’ या ‘धमार’ एक गायन शैली है, जिसको होली के दिनों में ही गाने की प्रथा है, चाहे वह लौकिक हो अथवा शास्त्रीय । धमाल के गीतों में नृत्य तत्व होने से लोग इन गीतों की लय के अनुसार नाचते भी हैं । शेंखावाटी क्षेत्र में ‘धमाल’ गाने की परंपरा है जिसमंे ‘डफ’ बादन की संगति की जाती है।
51. नारंगी
गर्भावस्था में खट्टी वस्तुएं पसंद होती है इसी तथ्य पर आधारित गीत।
52. हरणी
मेवाड़ में बालकों द्वारा दीपावली के पूर्व नवरात्रि के दिनों से प्रारंभ होकर दीपावली तक गाँव के प्रत्येक द्वार-द्वार जा कर गाये जाने वाले गीतों को हरणी कहते है। जिस घर के बाहर हरणी गायी जाती है उस घर वाले इन बच्चों को अनाज आदि उपहार देते हैं।
53. संतान उत्पत्ति के गीत
बच्चे के जन्म के बाद जच्चा गीत, पीपली, सूरज-पूजा, जलमा आदि गीत गाये जाते हैं।
54. बिनोलो
विवाह से पूर्व वर या वधू को अपने सम्बन्धियों द्वारा भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता है जिसे बिनोला या बिन्दौरा कहते हैं। इस समय गाये जाने वाले गीतों को बिनोलो कहते हैं।
55. परभातिया
विवाह के अवसर पर प्रातःकाल में ब्रह्म मुहूर्त में गाये जाने वाले गीत।
56. घडलियो
मेवाड़ क्षेत्र में बालिकाओं द्वारा दीपावली के पूर्व नवरात्रि के दिनों से प्रारंभ होकर दीपावली तक गाँव के प्रत्येक द्वार-द्वार जा कर गाये जाने वाले गीतों को घडलियो कहते है। जिस घर के बाहर घडलियो गाया जाता है उस घर वाले इन बालिकाओं को आदि उपहार देते हैं। बालिकाओं में एक बालिका के सिर पर मिट्टी का छेद वाला छोटा घड़ा रखती है जिसमें दीपक जला होता है, इसे ही घडलिया कहते है।
चिंतन का अर्थ, परिभाषा, प्रकृति एवं प्रकार
By- TR Monu Saini
चिंतन का अर्थ
अपनी दैनिक बातचीत में हम चिंतन शब्द का प्रयोग कई मनोवैज्ञानिक क्रियाओं के लिए करते है। उदाहरण स्वरूप अपना अनौपचारिक परिचय देते हुए जब मैं यह कहता हूँ कि मैं उन दिनों के बारे में सोच रहा हूँ जब मैं कालेज में विद्यार्थी था। तो यहॉ में सोच (चिंतन) शब्द का प्रयोग मनोवैज्ञानिक क्रिया याद के लिए कर रहा हूँ। इसी प्रकार जब बच्चा कहता है कि मैं उस बंगले के बारे में सोच रहा हूँ जो मैं अपने लिए बनाऊँगा तो वस्तुत: वह कल्पना कर रहा है। इसी प्रकार दूर से आती हुई किसी अस्पष्ट चीज को देखकर यदि कोई व्यक्ति कहता है मैं यह सोचता हूँ कि वह टैक्सी है तो वह केवल अपने प्रयक्षीकरण की ही व्याख्या कर रहा है।
चिंतन की परिभाषा
रॉस- चिंतन मानसिक क्रिया का भावनात्मक पक्ष या मनोवैज्ञानिक वस्तुओं से संबंधित मानसिक क्रिया है।
गैरेट- चिंतन एक प्रकार का अव्यक्त एवं अदृश्य व्यवहार होता है जिसमें सामान्य रूप से प्रतीकों (बिम्बों, विचारों, प्रत्यय) का प्रयोग होता है।
मोहसिन- चिंतन समस्या समाधान संबंधी अव्यक्त व्यवहार है।
चिंतन की उपरोक्त सभी परिभाषाओं को मुख्य रूप से दो वर्गो में विभाजित करके समझा जा सकता है।
प्रथम वर्ग में वे परिभाषाएं आती है जिनके अनुसार चिंतन को एक ऐसी प्रक्रिया माना जाता है जिसमें बाहृय घटनाओं (भूत, वर्तमान तथा भविष्य की) का आन्तरिक या मानसिक चित्रण किया जाता है। हम उस वस्तु या घटना के बारे में भी सोच सकते है जिसे हमारे द्वारा कभी देखा तथा अनुभव न किया गया हो।
दूसरे वर्ग में ये परिभाषाएं पहले वर्ग की परिभाषाओं से अधिक व्यवहारात्मक मानी जाती है क्योंकि ये चिंतन को एक ठोस क्रियात्मक आधार प्रदान करती हैं, उसे महज मानसिक क्रियाओं तथा अनुभूतियों का खिलौना न मानकर एक ऐसा साधन मानती है जिसके सहारे विभिन्न प्रकार के समस्या समाधान व्यवहार को दिशा और गति प्रदान करने का कार्य किया जा सकता है। चिंतन के इस स्वरूप का अध्ययन और मापन भी संभव हैं क्योंकि किसी का चिंतन कितना सार्थक है यह उसके समस्या समाधान व्यवहार के संदर्भ में अच्छी तरह जाना जा सकता है। परन्तु अगर गहराई से और अधिक विश्लेषण किया जाए तो चिंतन की इन दोनों प्रकार की परिभाषाओं में कोई सैद्धान्तिक अन्तर नजर नहीं आता। दोनों का लक्ष्य एक ही है। मानसिक चित्रण और अनुभूति समस्या समाधान व्यवहार में सहायक होती है और समस्या समाधान व्यवहार मानसिक चित्रण या अनुभूतियों को जन्म देने वाला सिद्ध होता है। जब भी हम कोई समस्या हल करते हैं तो उसका विश्लेषण उसे ठीक से समझना तथा उसके हल के बारे में परिकल्पनाएं बनाकर समाधान का रास्ता ढूंढना- ये सभी बातें हमारे मन और मस्तिष्क में आंतरिक रूप से चलती रहती है।
हम विचारों के द्वारा वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं, प्रक्रियाओं आदि को अपने मन और मस्तिष्क में बिठाकर इधर-उधर इस तरह शतरंज की गोटियों की तरह आदान-प्रदान करते रहते हैं, ताकि हमारी समस्या के समाधान का कोई रास्ता निकल आए। इस तरह मानसिक चित्रण या मानसिक खिलवाड़ की प्रक्रिया और उसके द्वारा समस्या समाधान या और किसी प्रकार का प्रतिफल ये दोनों बातें अन्त: संबंधित है। इसलिए चिंतन की प्रक्रिया और उसके प्रतिफल को एक दूसरे का अभिन्न अंग ही समझा जाना चाहिए तथा उनका मूल्यांकन चिंतन के परिणामस्वरूप होने वाले सम्पूर्ण लाभी के रूप में ही किया जाना चाहिए। होता भी ऐसा ही है। कोई क्या सोच रहा है या क्या सोच रहा था इसका पता उसके द्वारा बाहृय रूप से किए जाने पर उसकी व्यवहार क्रियाओं द्वारा ही लगाया जा सकता हैं इस तरह समस्या समाधान या व्यवहार क्रियाओं के रूप में किसी के द्वारा क्या किया गया और इसके लिए उसके मन और मस्तिष्क में पहले क्या कुछ घटित हुआ इन दोनों बातों का समन्वय ही चिंतन के मनोवैज्ञानिक अर्थ एवं प्रकृति को समझने में किया जाना चाहिए। इस दृष्टि से चिंतन की एक व्यावहारिक परिभाषा के बारे में सोचा जाय तो उसमें चिंतन संबंधी मानसिक और आन्तरिक व्यवहार तथा इस व्यवहार का प्रतिफल इन दोनों ही बातों का समन्वय होना चाहिए।
इस प्रकार की परिस्थिति में निष्कर्ष रूप से चिंतन को निम्न ढंग से परिभाषित करना हमारी दृष्टि से उपयुक्त सिद्ध हो सकता है: चिंतन से तात्पर्य हमारी उन व्यवहार क्रियाओं के प्रारूप से है जिसमें हम वस्तुओं, व्यक्तियों तथा घटनाओं का समस्या विशेष के समाधान हेतु अपने-अपने ढंग से मानसिक चित्रण या क्रियान्वयन (चिन्ह, प्रतीक आदि के रूप में) करते रहते हैं।
चिंतन की प्रकृति
चिंतन के अर्थ और उसकी परिभाषाओं के उचित विश्लेषण के माध्यम से हमें चिंतन की प्रकृति और उसके स्वरूप के बारे में निम्न निष्कर्ष निकालने में सहायता मिल सकती है।
चिंतन सभी प्रकार से एक संज्ञानात्मक व्यवहार क्रिया है।
चिंतन किसी उद्देश्य या लक्ष्य की प्राप्ति की ओर अग्रसर रहता है। इसका अर्थ यह है कि दिवास्वप्न या कल्पना आदि उद्देश्यहीन संज्ञानात्मक क्रियाए चिंतन की परिधि में नहीं आती।
चिंतन समस्या समाधान संबंधी व्यवहार हैं, आरम्भ से लेकर अन्त तक इसमें कोई न कोई समस्या विद्यमान रहती है। समस्या तब खड़ी होती है जब कोई निश्चित व्यवहार मनुष्य की अनुकूल आवश्यकताओं को संतुष्ठ नहीं कर सकता। ये समस्याए चिंतन को उत्पन्न करती है और चिंतन उसके समाधान में सहायता प्रदान करता है।
परन्तु समस्या समाधान संबंधी प्रत्येक व्यवहार चिंतन में नहीं आता जैसा कि मोहसिन ने अपनी परिभाषा में कहा है। चिंतन केवल आन्तरिक ज्ञानात्मक व्यवहार से संबंधित है। जब हम किसी स्थिति में कोई काम करके समस्या के समाधान का प्रयास करते है, उस समय हम चिंतन नहीं कर रहे होते हैं। चिंतन के समय बाहरी गत्यात्मक क्रियाए बन्द हो जाती है। यह एक अव्यक्त क्रिया है जो व्यक्ति के भीतर होती है।
चिंतन में मानसिक खोज होती है, गत्यात्मक खोज नहीं। मान लो मुझे ताला खोलने के लिए चाबी की जरूरत पड़ गई। मैं अपनी जेब देखूॅगा जहॉ प्राय: चाबी रखी रहती है। परन्तु मुझे वहॉ चाबी नहीं मिलती। अब मैं यदि इधर-उधर दौड़ता हू तो यह गत्यात्मक खोज होगी। परन्तु यदि मैं मौन भाव से बैठकर सोचता हू कि मैंने उसे कहॉ रख दिया होगा तो यह मानसिक खोज होगी। समस्या समाधान में चिंतन का यही काम है। इससे समय और श्रम में बचत होती है।
चिंतन जैसा कि गैरट ने अपनी परिभाषा में कहा है कि एक प्रतीकात्मक क्रिया है। चिंतन में समस्या का मानसिक समाधान सोचा जाता है। चिंतन में ठोस चीजों की बजाय प्रतीकों का प्रयोग होता है। उदाहरणस्वरूप किसी बिल्डिंग के निर्माण की योजना में इन्जीनियर प्रत्यन एवं भूल का बाहृय साधन नहीं अपनाता। वास्तव में वह अपनी चिंतन-क्रिया में विभिन्न मानसिक बिम्बों तथा प्रतीकों का प्रयोग करता है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुॅच सकते है कि चिंतन एक आन्तरिक ज्ञानात्मक प्रक्रिया है। उसका कोई निश्चित उद्देश्य होता है। इसमें किसी समस्या का समाधान निहित होता है। समस्या समाधान के लिए इसमें गत्यात्मक खोज नहीं होती, बल्कि विषयों, क्रियाओं तथा अनुभूतियों को मानसिक स्तर पर प्रयुक्त किया जाता है।
चिंतन के साधन
चिंतन की प्रक्रिया से जुड़े हुए तत्वों तथा काम में आने वाले साधनों को इन रूप में समझा जा सकता है-
बिम्ब-
प्राय: बिम्ब चिंतन साधन के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं। मानसिक चित्रों के रूप में बिम्बों में व्यक्ति के उन वस्तुओं, दृश्यों तथा व्यक्तियों से संबंधित वयक्तिगत अनुभव सम्मिलित होते हैं जिन्हें वास्तविक रूप में देखा हो या जिनके बारे में सुना या अनुभव किया हो। कई स्मृति बिम्ब होते हैं जो इन ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त अनुभवों पर आधारित होते हैं। कई कल्पना बिम्ब होते हैं जो कल्पनाओं पर आधारित होते है। अत: बिम्ब वास्तविक वस्तुओं, अनभूतियों तथा क्रियाओं के प्रतीक होते हैं।
संप्रत्यय-
संप्रत्यय भी चिंतन का एक महत्वपूर्ण साधान है। संप्रत्यय एक सामान्य विचार है जो किसी सामान्य वर्ग के लिए प्रयेफकत होता है और जो उसी सामान्य वर्ग की सभी वस्तुओं या क्रियाओं की किसी सामान्य विशेषता का प्रतिनिधित्व करता है। संप्रत्यय निर्माण या सामान्यीकरण से हमारे चिंतन प्रयासों में मितव्ययिता आती हैं। उदाहरणस्वरूप जब हम बन्दर शब्द सुनते हैं तो तत्काल हमारे मन में बन्दरों की सामान्य विशेषताएॅ ही नहीं घूम जाती बल्कि बन्दरों के संबंध में अपने व्यक्तिगत अनुीाव भी हमारी चेतन पटल पर आ जाते हैं और हमारे चिंतन को आगे बढ़ाते हैं।
प्रतीक एवं चिन्ह-
प्रतीक एवं चिन्ह वास्तविक विषयों, अनुभूतियों तथा क्रियाओं का प्रतिनिधित्व करते है। टे्रफिक की बत्तियॉ, रेल्वे सिग्नल, स्कूल की घंटियॉ, गीत, झण्डा, नारे-सभी प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियॉ है। चिंतन में संप्रत्यय भी प्रतीकों एवं चिन्हों द्वारा अभिव्यक्त होते हैं। इन प्रतीकों एवं चिन्हों से चिंतन को बढ़ावा मिलता है। इनकी सहायता से तत्काल ज्ञान हो जाता है कि क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए- जैसे हरी झण्डी का हिलाना हमें बता देता है कि गाड़ी चलने वाली है और हमें गाड़ी में बैठ जाना चाहिए। इस प्रकार गणित में (+) का निशान बता देता है कि हमें क्या करना है। बोरिग लांगफील्ड तथा वैल्ड ने इस संबंध में महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला है, प्रतीक एवं चिन्ह मोहरे एवं गोटियॉ है जिसमें द्वारा चिंतन का महान खेल खेला जाता है। इसके बिना यह खेल इतना अभूतपूर्व और सफल नहीं हो सकता।
भाषा-
भाषा केवल पारस्परिक सम्पर्क बनाने का ही साधन नहीं बल्कि चिंतन का भी साधन है। इनमें शब्द होते हैं जो प्रतीकात्मक होते हैं। कई बारे हम शब्दों के स्थान पर इशारों का प्रयोग करते हैं। अंगूठा दिखाना, मुस्कुराना, भौहें चढ़ाना, कन्धे झठकना- आदि महत्वपूर्ण अर्थ रखते हैं। चिंतन प्रक्रिया के लिए भाषा एक सशक्त एवं अत्यन्त विकसित साधन है।
चिंतन के प्रकार
प्रत्यक्ष बोधात्मक या मूर्त चिंतन
संप्रत्यात्मक या अमूर्त चिंतन
विचारात्मक या तार्किक चिंतन
सृजनात्मक चिंतन
अभिसारी चिंतन
अपसारी चिंतन
क्रांतिक चिंतन
प्रत्यक्ष बोधात्मक या मूर्त चिंतन-
यह चिंतन का अत्यन्त सरल रूप है। प्रत्यक्ष बोध या अप्रत्यक्षीकरण ही इस प्रकार के चिंतन का आधार है। प्रत्यक्षीकरण व्यक्ति की संवेदनात्मक अनुभूमि की व्याख्या है। यदि एक बच्चे को सेब दिया जाए तो वह एक क्षण के लिए सोचता है और उसे लेने से इन्कार कर देता है। इस समय इसका चिंतन प्रत्यक्ष बोध पर आधारित है वह अपनी पूर्व अनुभूति के आधार पर संवेदना की व्याख्या कर रहा है। उसे हरे सेब के स्वाद की याद आ रही है जो उसे कुछ दिन पहले दिया गया था।
संप्रत्यात्मक या अमूर्त चिंतन-
प्रत्यक्ष बोधात्मक चिंतन की भॉति इसमें वास्तविक विषयों या क्रियाओं के बोध की आवश्यकता नहीं होती। इसमें संप्रत्ययों एवं सामान्यीकृत विचारों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार के चिंतन के विकास में भाषा का बहुत बड़ा हाथ होता है। यह चिंतन प्रत्यक्ष बोधात्मक चिंतन से बढ़िया माना जाता है, क्योंकि इससे समझने में सुविधा होती है तथा खोज एवं आविष्कारों में सहायता मिलती है।
विचारात्मक या तार्किक चिंतन-
यह ऊँचे स्तर का चिंतन है जिसका कोई निश्चित लक्ष्य होता है। सरल, चिंतन तथा इसमें पहला अन्तर तो यह है कि इसका उद्देश्य सरल समस्याओं की अपेक्षा जटिल समस्याओं को हल करना होता है। दूसरे, इसमें अनुभूतियों को सरलतापूर्वक एक दूसरे के लाभ जोड़ने की अपेक्षा समस्त संबंधित अनुभूतियों का पुनर्गठन करके उनमें से स्थिति का सामना करने के लिए या बाधाओं को दूर करने के लिए नए रास्ते निकाले जाते है। तीसरे विचारात्मक चिंतन में मानसिक क्रिया प्रयत्न एवं भूल का यान्त्रिक प्रयास नहीं करती। चौथे विचारात्मक चिंतन में तर्क को सामने रखा जाता है। सभी संबंधित तथ्यों को तर्कपूर्ण क्रम में कठित करके उनसे प्रस्तुत समस्या का समाधान निकाला जाता है।
सृजनात्मक चिंतन-
इस चिंतन का मुख्य उद्देश्य किसी नई चीज का निर्माण करना है। यह वस्तुओं, घटनाओं तथा स्थितियों की प्रकृति की व्याख्या करने के लिए नएं सम्बन्धों की खोज करता है। यह पूर्व स्थापित नियमों से बाध्य नहीं होता। इसमें व्यक्ति स्वयं ही समस्या पैदा करता है और फिर स्वतन्त्रतापूर्वक उसके समाधान के साधन ढूॅढता है। वैज्ञानिकों तथा अनुसन्धानकर्ताओं का चिंतन इसी प्रकार का होता है।
अभिसारी चिंतन-
अभिसारी चिंतन की सर्वप्रथम व्याख्या पॉल गिलफर्ड ने की। अभिसारी चिंतन में किसी मानक प्रश्न का उत्तर देने में किसी सृजनात्मक योग्यता की आवश्यकता नहीं होती। विद्यालयों में होने वाले अधिकांश कार्यो, बुद्धि आदि के परीक्षण में बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर देने में अभिसारी चिंतन का प्रयोग होता है। इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति एक पदानुक्रमिक ढंग से अनुसरण करते हुए चिंतन करता है। वस्तुत: यह चिंतन परंपरागत प्रकार की क्रमबद्ध विचार प्रक्रिया का परिणाम होता है, इसके द्वारा व्यक्ति अपनी सरल समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास करता है।
अपसारी चिंतन-
किसी समस्या के विभिन्न समाधानों या कार्य को करने के विभिन्न प्रयत्नों में से किसी एक उत्तम समाधान या प्रयत्न को चुना जाना अपसारी चिंतन है, अपसारी चिंतन अभिसारी चिंतन के विपरीत होता है क्योंकि अभिसारी चिंतन में किसी समस्या के समाधान के लिए कुछ निश्चित संख्या में समाधान उपस्थित होते हैं जबकि इस प्रकार के चिंतन में विभिन्न प्रकार के अनेकों समाधान होते हैं। अपसारी चिंतन में सृजनात्मकता तथा खुले प्रकार के प्रश्न तथा सृजनात्मकता सम्मिलित होती है।
क्रांतिक चिंतन-
क्रांतिक चिंतन, चिंतन का एक प्रकार होता है जिसमें किसी विषय-वस्तु, विषय या समस्या के समाधान में कौशलयुक्त संश्लेषण मूल्यांकन तथा पुर्नसंरचना सम्मिलित होते हैं। क्रांतिक चिंतन स्वनिर्देशित, स्व-अनुशासित, सुनियोजित प्रकार का चिंतन होता है।
चिंतन शक्ति का विकास
चिंतन सीखने-सिखानें की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण तत्व है। हमारी सीखने की योग्यता हमारे ठीक चिंतन की योग्यता पर आधारित है। केवल वह व्यक्ति समाज में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है जो स्पष्ट, सावधानीपूर्ण एवं क्रमिक चिंतन कर सकता है। परन्तु व्यक्ति जन्म से चिंतक नहीं होता, व्यक्ति को चिंतन करना सीखना पड़ता है। चिंतन करना सीखना कोई आसान काम नहीं। इसके लिए उचित चिंतन की शैलियों तथा अभ्यास का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। यद्यपि प्रभावशाली तथा ठीक चिंतन करना सिखाने से संबंधित समस्त साधनों का उल्लेख करना कठिन है परन्तु फिर भी निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान देकर चिंतन प्रक्रिया को विकसित किया जा सकता है।
ज्ञान एवं अनुभूतियों की पर्याप्तता-
चिंतन बिना कोई पूर्वाधार के नहीं होता। चिंतन चिंतक के पूर्व ज्ञान तथा पूर्व अनुभवनों पर आधारित होता है। जितना अधिक ज्ञान होगा, उतना ही अधिक चिंतन होगा। गलत ज्ञान गलत चिंतन का कारण बन सकता है। अत: हमें पर्याप्त एवं उचित ज्ञान तथा अनुभूतियॉ ग्रहण करनी चाहिए। यह इन साधनों द्वारा किया जा सकता है:
ज्ञान एवं अनुभव, संवेदनाओं तथा प्रत्यक्षीकरण से प्राप्त होते हैं। अत: यह महत्वपूर्ण है कि हम ठीक संवेदना ग्रहण कर उनकी ठीक तरह से व्याख्या कर सकें। अत: हमें ठीक निरीक्षण तथा ठीक व्याख्या करने का अभ्यास करना चाहिए।
पर्याप्त ज्ञान प्राप्त करने के अवसर प्राप्त करने चाहिए। हमें स्वाध्याय, विचार-विमर्श तथा स्वस्थ एवं अभिप्रेरणात्मक क्रियाओं में भाग लेने हेतु सदैव तत्पर रहना चाहिए।
अभिप्रेरणा तथा लक्ष्य की निश्चितता-
चिंतन उद्देश्यपूर्ण क्रिया है। जब तक सुनिश्चित लक्ष्य सामने न हो तब तक चिंतन ठीक रास्ते पर नहीं चल सकता। यह समस्या संबंध व्यवहार है जिसका लक्ष्य अनुभूत आवश्यकताओं को संतुष्ट करना होता है। प्रत्येक चिंतन के पीछे कोई न कोई लक्ष्य होता है। इससे चिंतन शक्ति संगठित करने में सहायता मिलती है। इससे चिंतन में रूचि उत्पन्न होती है और चिंतन में कुशलता आती है। अत: सुनिश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही चिंतन करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। हमें जिन समस्याओं का समाधान ढूॅढना हो, वे समस्याए हमारी आवश्यकताओं के साथ संबंधित होनी चाहिए। निरूद्देश्य चिंतन पर नियंत्रण होना चाहिए और अपनी शक्ति निर्माणात्मक चिंतन पर ही केन्द्रित करने का प्रयत्न सदैव हमारे द्वारा होना चाहिए।
पर्याप्त लचीलापन-
अनावश्यक बाधाए खड़ी होने तथा चिंतन के क्षेत्र के संकीर्ण हो जाने से चिंतन प्रक्रिया में बाधा पड़ती है। परन्तु इसका अर्थ यह कभी नहीं कि हम अपने आपको पूरी स्वतंत्रता प्रदान करके कल्पना के संसार में अनावश्यक रूप से विचरने दें। यदि समस्या समाधान में पूर्व अनुभवनों से सहायता न मिलती हो तो हमें नए संबंधें तथा नई संभावनाओं के प्रयोग की ओर ध्यान देना चाहिए।
इनक्यूबेशन-
चिंतन प्रक्रिया में प्रगति के लिए इनक्यूबेशन की क्रिया अत्यन्त सहायक सिद्ध हो सकती है। जब हम बहुत कोशिश करने पर भी किसी समस्या के समाधान में सफल नहीं होते तो उसे कुछ समय के लिए एक तरफ रख कर आराम करना चाहिए या किसी अन्य क्रिया में लग जाना चाहिए। इस दौरान हमारा अवचेतन उस समस्या पर विचार करता रहता है। जिस प्रकार इनक्यूबेशन से अंडे सेने का काम होता है, उसी प्रकार हमारे अवचेतन मन के प्रयासों द्वारा हमारी समस्याओं का समाधान निकल आता है। इस इनक्यूबेशन द्वारा हम अपने चिंतन में नया जीवन पैदा कर सकते हैं और थकान को दूर कर सकते हैं।
बुद्धि एवं विवेक-
उचित चिंतन की योग्यता बुद्धि में निहित है। उचित चिंतन के लिए बुद्धि का उचित विकास अत्यन्त आवश्यक है। विवके चिंतन प्रक्रिया को जारी करने का प्रभावशाली साधन है। यह समस्या समाधान के लिए अन्तदर्ृष्टि प्रदान करता है। अत: उचित चिंतन का विकास करने हेतु हमें सदैव बुद्धि विवके को इस कार्य हेतु एक आवश्यक साधन के रूप में अपनाना चाहिए।
संप्रत्ययों तथा भाषा का उचित विकास-
यह तो पहले ही कहा जा चुका है कि संप्रत्यय, प्रतीक, चिन्ह, भाषा आदि चिंतन के महत्वपूर्ण साधन हैं। उनके उचित विकास के बिना चिंतन प्रभावशाली नहीं हो सकता। इन साधनों के विकास से चिंतन-प्रक्रिया को प्रेरणा मिलती है। गलत-संप्रत्ययों के अनुचित विकास से न केवल चिंतन की प्रगति में बाधा पड़ती है बल्कि अशुद्ध चिंतन एवं अपूर्ण धारणाओं का जन्म होता है। अत: हमें भाषा विकास में उचित संप्रत्ययों तथा भाषात्मक योग्यताओं के निर्माण की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए तथा इन्हें चिंतन हेतु समुचित उपयोग में लाने का अभ्यास करना चाहिए।
तर्क प्रक्रिया का ठीक होना-
तर्क प्रकिन पर प्रभाव पड़ता है। तर्कहीनता अशुद्ध चिंतन को जन्म देती है। तक शुद्ध चिंतन का विज्ञान है। अत: हमें सदैव तर्कपूर्ण चिंतन करने की आदत डालनी चाहिए।
उपर्युक्त बातों की ओर ध्यान देने के अतिरिक्त हमें अपने आपको ऐसे तत्वों से बचाने का भी प्रयास करना चाहिए जो चिंतन की प्रगति में बाधा डालते हैं। उनमें से एक तत्व हैं-भावात्मक उत्तजेना के प्रभाव में व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठता है। संकीर्ण भावनाएॅ, भ्रम तथा अन्धविश्वासों के कारण चिंतन में बाधा पड़ती है। ठीक चिंतन के लिए इन तमाम बाधक तत्वों पर नियंत्रण रखना अत्यन्त आवश्यक है तभी हम उचित चिंतन की ओर प्रगति कर सकते हैं।