04/07/2026
🌾 दुनिया की खेती – आज जो बोओगे, वही आख़िरत में काटोगे | सैय्यद अबुल आला मौदूदी (रह०)
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06/11/2025
खिलाफत आंदोलन: खलीफा की हिफाज़त और मुसलमान-हिंदू इत्तेहाद"
खिलाफत तहरीक 1919 में तुर्की के खलीफा की हिमायत में शुरू हुई थी, लेकिन 1924 में दो अहम वजहों से खत्म हो गई। पहली वजह ये थी कि तुर्की में मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क ने 1923 में नई जम्हूरी हुकूमत क़ायम की और 3 मार्च 1924 को बाकायदा खिलाफत का निज़ाम खत्म कर दिया, जिससे तहरीक का असल मकसद खत्म हो गया। दूसरी वजह हिंदुस्तान में 5 फरवरी 1922 को पेश आने वाला चौरी-चौरा वाक़िया था, जिसमें कुछ मुज़ाहिरीन ने पुलिस वालों को ज़िंदा जला दिया, जिस पर महात्मा गांधी ने असहयोग तहरीक वापिस ले ली, और क्यूंकि खिलाफत तहरीक उसी से जुड़ी थी, उसका जोश भी ठंडा पड़ गया। तारीख़दान बिपिन चंद्र अपनी किताब India’s Struggle for Independence में लिखते हैं कि खिलाफत तहरीक हिंदू-मुस्लिम इत्तेहाद की सबसे बड़ी कोशिश थी, मगर तुर्की की सियासी तब्दीलियों ने इसे बेअसर कर दिया। वहीं डॉ. इरफ़ान हबीब और रफ़ीक ज़करिया के मुताबिक, खिलाफत का खात्मा मुसलमानों के लिए सख्त सदमा था, जिसने हिंदुस्तान की सियासत का रुख़ बदल दिया। यूँ 1924 में खिलाफत तहरीक हमेशा के लिए खत्म हो गई।
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04/11/2025
ताज महल की नींव (foundation)
ताज महल की नींव (foundation) काफी मजबूत और जटिल तरीके से बनाई गई थी। इसका निर्माण यमुना नदी के किनारे किया गया था, इसलिए यहाँ की मिट्टी नरम और दलदली (marshy) थी। ऐसे स्थान पर भारी इमारत खड़ी करने के लिए विशेष तकनीक अपनाई गई।
नींव के बारे में मुख्य बातें:
1. ताज महल की नींव लकड़ी के ढांचे और पैदल खूँटे (timber piles) के ऊपर बनाई गई थी। लकड़ी को पानी में सुरक्षित रखने के लिए विशेष तरीके से दबाया गया ताकि वह सड़ न जाए।
2. इसके ऊपर चूने और गारे का मिश्रण (lime mortar) और ईंट का इस्तेमाल हुआ।
3. नींव इतनी मजबूत थी कि यह भारी संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर की दीवारों और गुंबद का वजन सह सके।
4. यमुना नदी का जलस्तर नींव को नमी देता रहा, जिससे लकड़ी लंबे समय तक सुरक्षित रही।
कुछ इतिहासकार के नाम और किताबें जिसमें उन्होंने बताया के तक महल के बारे में
1. ए. सी. एल. कार्लाइल (A. C. L. Carlyle) – आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया रिपोर्ट्स (Archaeological Survey of India Reports)
2. ई. डब्ल्यू. स्मिथ (E. W. Smith) – द मुग़ल आर्किटेक्चर ऑफ फतेहपुर सीकरी एंड आगरा (The Moghul Architecture of Fatehpur Sikri and Agra)
3. सर सैयद अहमद ख़ान (Sir Syed Ahmad Khan) – आसार-उस-सनादीद (Āthār-us-Sanādīd / آثار الصنادید)
4. पर्सी ब्राउन (Percy Brown) – इंडियन आर्किटेक्चर (इस्लामिक पीरियड) [Indian Architecture (Islamic Period)]
5. एस. आर. शर्मा (S. R. Sharma) – मुग़ल आर्किटेक्चर (Mughal Architecture)
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02/11/2025
बादशाह जहांगीर का शराब और अफ़ीम के बारे में इकरार
जहांगीर ने तुज़्क-ए-जहांगीरी में खुद लिखा है कि:
> “मैंने जवानी में शराब पीनी शुरू की। पहले दिन में चार जाम लेता था, फिर यह आदत बढ़ती गई। जब नुकसान महसूस हुआ तो मैंने इसे कम कर दिया।”
वह आगे लिखता है कि एक वक़्त ऐसा आया जब हकीमों ने उसे मना किया, तो उसने शराब छोड़ने की कोशिश की — लेकिन पूरी तरह छोड़ नहीं पाया।
उसने लिखा कि:
> “मैंने शराब छोड़नी चाही मगर जिस्म इस का आदी हो चुका था, इसलिए कम करके पीने लगा। फिर मैं अफ़ीम लेने लगा ताकि शराब की तलब कम हो।”
कई इतिहासकार जैसे सर जदुनाथ सरकार और हावर्ड गाइल्स ने भी इसकी पुष्टि की है कि जहांगीर ने अपनी किताब में खुद अपनी शराबख़ोरी और अफ़ीम के इस्तेमाल का ज़िक्र किया है।
31/10/2025
फिरोज़ शाह कोटला की कहानी
दिल्ली के बीचों-बीच फिरोज़ शाह कोटला है, 1354 में सुल्तान फिरोज़ शाह तुग़लक ने बनवाया। इतिहासकार कहते हैं कि ये महलों, मस्जिदों और बावड़ियों का बड़ा किला था।
लेकिन यहाँ का सबसे खास हिस्सा है “जिन बाबा”। कहते हैं कि किले के खंडहरों में जिन्नात रहते हैं, और जिन बाबा की दरगाह के पास लोग अपनी मनोकामनाएँ मांगने आते हैं। रात में यहाँ भूत और अजीब आवाज़ें भी सुनाई देती हैं। लोग मानते हैं कि जिन बाबा की मौजूदगी से यहाँ की हवाएँ और दीवारें भी जादुई हो जाती हैं।
इतिहास और लोककथाओं का ये संगम, फिरोज़ शाह कोटला को सिर्फ़ पुराना किला नहीं, बल्कि रहस्यमय और रोमांचक जगह बना देता है।
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30/10/2025
मुग़लई खाना” एक तरह से बनाया हुआ नाम है
Sohail Hashmi के मुताबिक, जो खाना आज हम “मुग़लई खाना” कहते हैं, वो असली मुग़ल बादशाहों के ज़माने के खाने से काफी अलग था। उनका कहना है कि “मुग़लई” या “मुग़लिया” जैसे नाम ज़्यादातर लोगों ने अपनी परंपरा और मार्केटिंग के लिए मशहूर कर दिए, जबकि इतिहास के हिसाब से ये पूरी तरह सही नहीं है। Sohail Hashmi बताते हैं कि मुग़ल दरबार में जो खाना खाया जाता था, वो आज की तरह सजा-धजा और बनावट वाला नहीं होता था। उनके मुताबिक, आज की बिरयानी, कबाब, हलवा और बाकी जो चीज़ें हम “मुग़लई” कहते हैं, उनमें वक्त के साथ लोकल स्वाद और रिवाज़ों का असर मिल गया है।
उन्होंने ये भी कहा कि ये ग़लतफ़हमी इसलिए हुई क्योंकि लोग इतिहास को आज के स्वाद और खाने के नज़रिए से देखते हैं। Sohail Hashmi का कहना है कि “मुग़लई खाना” एक तरह से बनाया हुआ नाम है, जो बिज़नेस और परंपरा से जुड़ा है, न कि पूरी तरह सच्चा इतिहास। इसलिए जब हम मुग़लों के खाने की बात करते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि असली मुग़ल खाना क्या था और आज जो “मुग़लई खाना” कहा जाता है, वो क्या है। उनका कहना है कि इतिहास को नामों और परंपराओं से नहीं, बल्कि सबूतों और असली बातों के आधार पर समझना चाहिए।
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