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The Poem Nest
�शब्दों से दिलों तक |��
� कविता | व्यंग्य | अनमोल विचार |
� शायरी | गज़ल | नए लेखकों का मंच |
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🔸परवीन शाकिर वो एहसास थीं🌹💫
🔹जो लफ़्ज़ों में ढलकर भी ख़ामोशी बोल जाती थीं।
🔸उनकी शायरी में औरत की नज़ाकत भी है
🔹और टूटकर भी मुस्कुराने की हिम्मत भी।
🔸इश्क़ उनके यहाँ सिर्फ़ चाहत नहीं,
🔹एक तहज़ीब है —
🔸जो दर्द को भी ख़ूबसूरत बना देती है।
🔹परवीन शाकिर को पढ़ना
🔸ख़ुद से मुलाक़ात करने जैसा है…
🔹धीरे, गहराई से, और बहुत सच्चाई के साथ।👼💫
🔸जब सच लिखना बग़ावत कहलाने लगे,✍️💫
🔹तो समझ लेना दौर बीमार है।
🔸जब गाँव–गाँव ज़ख़्मी हों,
🔹हवा में ज़हर हो,
🔸दवा मुनाफ़े की भेंट चढ़ जाए
🔹और ग़रीबी एक सज़ा बन जाए—
🔸तो सवाल उठना ज़रूरी हो जाता है।
🔹ये पंक्तियाँ किसी एक कुर्सी के ख़िलाफ़ नहीं,
🔸पूरे उस निज़ाम के ख़िलाफ़ हैं
🔹जो आवाम की जेब से
🔸अपनी तिजोरियाँ भरता है।
ये शायरी मनोरंजन नहीं,
जवाब माँगने की ज़िद है।
देश की तबाही का हिसाब दीजिए।
— मंज़र भोपाली
🔸हर दौर को आईना दिखाने वाले क़लमकार को नमन।
🔹जन्मदिन मुबारक जावेद अख़्तर साहब 🌹💫
🔸सोचने वाले लोग नास्तिक इसलिए होते हैं क्योंकि –
🔹वो बस सवाल करना जानते हैं।
🔸अंधविश्वास से नहीं, तर्क से रास्ता चुनते हैं,
🔹और सच की तलाश में खुद से भी टकरा जाते हैं।
🔸ईश्वर को नकारना उनका मक़सद नहीं होता,
🔹बस बिना सोचे मान लेना उन्हें मंज़ूर नहीं
नदी की हर लहर का जवाब, प्रेम और प्रकृति की गहराई में छुपा है। 🌊✨
🔸तुम कितनी देर जिए – जावेद अख़्तर 👼
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हल चला कर खेतो को
मैंने ही सजाया रे
गेंहूं चावल मक्के के
दानो को उगाया रे
चूल्हा भी बनाया रे
धान को पकाया रे
सोयूं क्यों भूखे पेट रे
के मेरे लिए काम नहीं ...(२)
मिटटी की खुदाई की
भट्टी को जलाया रे
ईटों को पकाया है
बंगला बनाया है
संसद का हर एक खम्बा
मैंने ही उठाया रे
सोयूं क्यों फूट पाथ पे
के मेरे लिए काम नहीं .... (२)
धागे को बनाया मैंने
मिलों को चलाया रे
ताना बाना जोड़ के
कपडा बनाया रे
सपनो के रंगों से
उनको सजाया रे
मुझे कफ़न नहीं रे
की मेरे लिए काम नहीं ..... (२)
रेल को बनाया मैंने
सड़क को बिछाया रे
हवा मे उड़ाया रे
चंदा से मिलाया रे
नाव को बनाया मैंने
पानी पे चलाया रे
मेरी न ज़िन्दगी चले की
मेरे लिए काम नहीं....(२)
शाहजहाँ के ताज को
मैंने ही बनाया रे
मंदिरों को मस्जिदों को
मैंने ही सजाया रे
बांसुरी सितार को
माडल को बजाय रे
कहाँ संगीत मेरा रे
की मेरे लिए काम नहीं ...(२)
सपने सजायेंगे ज़िन्दगी बनायेंगे
उँगलियों को मोड़ के
हाथों को उठाएंगे...... (२)
आसमा को छूएंगे
जिंदाबाद गायेंगे
गायेंगे तब तक रे
के जब तक काम नहीं...(२)
लड़ेंगे तब तक रे
जब तक काम नहीं ... (२)
उस ने कहा
सुन
अहद निभाने की ख़ातिर मत आना
अहद निभाने वाले अक्सर
मजबूरी या महजूरी की थकन से लौटा करते हैं
तुम जाओ
और दरिया दरिया प्यास बुझाओ
जिन आँखों में डूबो
जिस दिल में उतरो
मेरी तलब आवाज़ न देगी
लेकिन जब मेरी चाहत
और मिरी ख़्वाहिश की लौ
इतनी तेज़ और इतनी
ऊँची हो जाए
जब दिल रो दे
तब लौट आना
– अहमद फ़राज़
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