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भारत की इस हफ्ते की कूटनीति पूरी तरह यूरोप के नाम रहेगी.जर्मनी, फ्रांस और पोलैंड के शीर्ष नेता लगातार भारत आ रहे हैं, क्...
12/01/2026

भारत की इस हफ्ते की कूटनीति पूरी तरह यूरोप के नाम रहेगी.
जर्मनी, फ्रांस और पोलैंड के शीर्ष नेता लगातार भारत आ रहे हैं, क्योंकि भारत–EU मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अंतिम चरण में पहुँच चुका है.

• जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज पहली बार भारत में
• फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों की फरवरी यात्रा की तैयारी
• 2022 के बाद पहली बार पोलैंड के विदेश मंत्री का दौरा

फोकस के क्षेत्र: व्यापार, टेक्नोलॉजी, रक्षा, AI, EVs, ऊर्जा, खनन, स्किलिंग और हरित विकास.

महत्व क्यों है: इन दौरों से स्पष्ट संकेत है कि

1. यूरोप भारत को अपने सबसे विश्वसनीय आर्थिक और रणनीतिक भागीदार के रूप में देख रहा है

2. भारत–EU FTA भारत के बाजारों और यूरोपीय निवेश के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है

3. उभरते भू-राजनीतिक माहौल में भारत यूरोप की प्राथमिकता बन चुका है

सरल शब्दों में — दुनिया भारत के दरवाजे पर है, और भारत इस मौके को भुनाने के लिए तैयार है.

"अफ़ग़ानिस्तान पर नई चाल: मॉस्को फ़ॉर्मेट की बैठक में भारत-रूस-चीन ने खोली अमेरिका की पोल! 🇮🇳🇷🇺🇨🇳आज मॉस्को फ़ॉर्मेट की 7...
09/10/2025

"अफ़ग़ानिस्तान पर नई चाल: मॉस्को फ़ॉर्मेट की बैठक में भारत-रूस-चीन ने खोली अमेरिका की पोल! 🇮🇳🇷🇺🇨🇳

आज मॉस्को फ़ॉर्मेट की 7वीं बैठक में भारत, रूस, चीन, ईरान और मध्य एशियाई देशों ने एक स्वर में वह बात सामने रखी, जिसे वाशिंगटन लंबे समय से छिपाने की कोशिश करता रहा है। इस मंच ने स्पष्ट कर दिया कि अफ़ग़ानिस्तान या उसके पड़ोसी राज्यों में किसी भी देश द्वारा सैन्य ढांचे की तैनाती क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के खिलाफ है और इस कदम को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।

अमेरिका द्वारा लगातार तालिबान पर बगराम एयरबेस छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा है, और दूसरी ओर पाकिस्तान की ज़मीन पर अपने नए लॉजिस्टिक्स तथा सैन्य आधार स्थापित करने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं। इसका उद्देश्य फिर से उसी 'साउथ एशिया कार्ड' के सहारे पूरे क्षेत्र पर रणनीतिक मौजूदगी कायम करना है—इस बार चीन-रूस-भारत के गठजोड़ के दरवाजे पर।

"डोनाल्ड ट्रम्प" की दुबारा व्हाइट हाउस वापसी के बाद वाशिंगटन ने अफ़ग़ानिस्तान-सेंट्रिक नीति को पुनर्जीवित कर दिया है। ट्रम्प प्रशासन स्पष्ट मानता है कि अगर अमेरिका अफग़ानिस्तान को पूरी तरह छोड़ता है, तो चीन और रूस को वहां रणनीतिक लाभ मिलेगा। इसी वजह से अमेरिकी रक्षा विभाग और खुफिया एजेंसियां पाकिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान में ‘काउंटर-टेररिज़्म’ बेस बनाने की योजना पर नज़र बनाए हुए हैं।

"ट्रम्प" के ताज़ा बयानों से स्पष्ट हो गया है कि उनका प्राथमिक उद्देश्य आतंक से लड़ना नहीं, बल्कि रूस-चीन गठजोड़ को रोकना है। इसके लिए अमेरिका तालिबान और पाकिस्तान दोनों पर दबाव की राजनीति खेल रहा है, ताकि पाकिस्तान को फिर से रणनीतिक मोहरे के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके।

"मॉस्को" फ़ॉर्मेट वार्ता में सामने आया संयुक्त बयान क्षेत्रीय स्थिरता और संप्रभुता को लेकर गहरी कूटनीतिक चेतावनी देता है—

"अफग़ानिस्तान की ज़मीन को किसी भी अन्य देश के खिलाफ़ उपयोग नहीं किया जाएगा, और क्षेत्रीय मामलों में दख़ल केवल स्थानीय देशों के सहमति से ही होगा।"

बैठक के एक ऐतिहासिक पहलू में अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री "अमीर खान मुत्ताकी" ने पहली बार पूर्ण सदस्य के रूप में शिरकत की। आम तौर पर तालिबान प्रतिनिधि अतिथि के तौर पर ही बुलाए जाते थे, लेकिन इस बार उन्हें सदस्य देश की मान्यता दी गई—यह क्षेत्रीय स्वीकार्यता का स्पष्ट संकेत है।

"अमीर खान मुत्ताकी" ने बैठक में यह कहते हुए क्षेत्रीय प्रतिबद्धता जताई, कि—

“हमारी ज़मीन पर किसी भी विदेशी सैन्य ढांचे की तैनाती स्वीकार्य नहीं है। क्षेत्रीय देश अफ़ग़ानिस्तान की स्थिरता और शांति के लिए मिलकर काम करेंगे।”

अफगान प्रतिनिधिमंडल ने बाकायदा संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर भी किए, जिससे यह सिद्ध हो गया कि तालिबान सरकार अब क्षेत्रीय सहमति का खुला समर्थन करती है।

बैठक में भारत, रूस, चीन के अलावा ईरान, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के प्रतिनिधि शामिल थे।

सभी ने अफ़ग़ानिस्तान की स्वतंत्रता, एकता और स्थायित्व को अपना साझा उद्देश्य बताया। आतंकवाद के खात्मे, क्षेत्रीय समन्वय, बाहरी सैन्य हस्तक्षेप के विरोध और सभी मानवीय सहायता का बिना किसी राजनीतिक दबाव के समर्थन किया गया। साथ ही, अमेरिका की बगराम एयरबेस या अन्य सैन्य उपस्थिति संबंधी कोशिशों को पूरी तरह अस्वीकार किया गया।

दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के इस बैठक में शामिल होकर अमेरिका के खिलाफ संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने से उसका दोगलापन नेक्स्ट लेवल पर खुल कर समाने तो आ ही गया, कूटनीति के अखाड़े में भारत-चीन और रूस की तिकड़ी ने अमेरिका को जबरदस्त पटखनी दी है।

बकरा और उसकी अम्मी कब तक खैर मनाएंगे!

आज की बैठक में लोकतांत्रिक ढंग से लिया गया फैसला क्षेत्र में नये कूटनीतिक युग की शुरुआत है, जिसमें अफ़ग़ानिस्तान अपने भविष्य के फैसले बाहरी हस्तक्षेप नहीं बल्कि क्षेत्रीय सहयोग व सहमति से करेगा।

मॉस्को फ़ॉर्मेट का संयुक्त मोर्चा यह जताता है कि अब अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य पर निर्णय रीजनल कैपिटल्स में होगा, न कि वाशिंगटन या लंदन के बंद कमरों में।
यह नया समीकरण आने वाले महीनों में दक्षिण एशिया के शक्ति-संतुलन को बदल सकता है, और अमेरिका की पुरानी “फुटहोल्ड पॉलिसी” को पूरी तरह नकार सकता है।
✍️✍️Manoj Kumar

2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “Make in India” का नारा बुलंद किया, तो विपक्ष ने इसे “जुमला” करार देकर खूब मज़ा...
06/10/2025

2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “Make in India” का नारा बुलंद किया, तो विपक्ष ने इसे “जुमला” करार देकर खूब मज़ाक उड़ाया। राहुल गांधी और कांग्रेस ने इसे “फेल प्रोग्राम” कहकर खारिज किया, दावा किया कि यह सिर्फ़ शब्दों का खेल है।
लेकिन आज, 2025 में, तस्वीर पूरी तरह पलट चुकी है। दुनिया का आर्थिक नक्शा बदल रहा है, और यूरोपियन यूनियन (EU) भारत के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है, कह रहा है, “हमें Make in India का हिस्सा बनने दो!” यह सिर्फ़ बातें नहीं, बल्कि वैश्विक भरोसे की जीती-जागती मिसाल है।

6 अक्टूबर 2025 से भारत और EU के बीच फ्री ट्रेड अग्रीमेंट (FTA) की 14वीं राउंड की वार्ता ब्रुसेल्स में शुरू हो रही है। इससे पहले ही यूरोपीय कारोबारियों का उत्साह सातवें आसमान पर है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, ग्रीन एनर्जी, फार्मास्यूटिकल्स, और हाई-टेक सेक्टर—EU की नज़र भारत के हर बड़े अवसर पर टिकी है।

EU दूत हर्वे डेल्फिन ने साफ़ कहा, “भारत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग का नया हब है।” 6,000 से ज़्यादा यूरोपीय कंपनियाँ भारत में पहले ही 30 लाख नौकरियाँ दे रही हैं, और FEBI सर्वे बताता है कि 80% कंपनियाँ FTA के बाद निवेश बढ़ाने को बेताब हैं।
EU को भारत में क्या दिख रहा है ?
एक स्थिर सरकार, जो 6-7% की रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था का आधार बनी है। 1.4 अरब लोगों का विशाल बाज़ार, जो दुनिया में बेजोड़ है। और सबसे बड़ी बात—“आत्मनिर्भर भारत” की वह ताकत, जो भारत को सिर्फ़ उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन का सिरमौर बना रही है।
EU कमीशन ने 2025 में भारत को “भविष्य का साझेदार” करार दिया है। यह कोई छोटी बात नहीं—जो भारत कभी दबाव में समझौते करता था, आज वही भारत अपनी शर्तों पर दुनिया से बात कर रहा है।
भारत को इस FTA से क्या मिलेगा?
विदेशी निवेश में उछाल (€34.7 बिलियन से ज़्यादा), Make in India को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में अग्रणी स्थान, लाखों नई नौकरियाँ, अत्याधुनिक तकनीक का हस्तांतरण, और भारत की ब्रांड वैल्यू का और बुलंद होना। सेमीकंडक्टर से लेकर ग्रीन टेक्नोलॉजी तक, भारत अब दुनिया की ज़रूरत बन चुका है। 2024-25 में FDI में 25% की वृद्धि इसका जीवंत सबूत है।

तनिक विचार करिए... जिस “Make in India” को विपक्ष ने 2014 में हँसी का पात्र बनाया, वही आज यूरोप को अपनी ओर खींच रहा है।
अंतर स्पष्ट है: मोदी जी की दूरदृष्टि ने भारत को वैश्विक मंच पर स्थापित किया है, जबकि विपक्ष कुर्सी की सियासत में ही उलझा रहा..!

राहुल गांधी ने 2025 में संसद में कहा था, “Make in India फेल है,” लेकिन EU का उत्साह और निवेश की बाढ़ उनके दावों को आईना दिखा रही है।
बेशक, FTA की राह आसान नहीं। कृषि (डेयरी और सब्सिडी), डेटा लोकलाइजेशन, और बौद्धिक संपदा जैसे मुद्दों पर निश्चित रूप से तीखी बातचीत होगी। EU का CBAM (कार्बन बॉर्डर टैक्स) और ऑटो ड्यूटीज़ जैसे दबाव भी हैं। लेकिन भारत अब वह देश नहीं, जो दबाव में झुक जाए। UK और EFTA के साथ डील्स में भी भारत ने अपनी शर्तें मनवाईं, और EU के साथ भी यही होगा।

भारत आज अपनी ज़मीन पर खड़ा है, अपनी शर्तें तय करता है, और दुनिया उसका लोहा मान रही है। EU का भारत की ओर झुकाव इस बात का ज़ोरदार सबूत है कि 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था का इंजन भारत बनने जा रहा है। “Make in India” सिर्फ़ नारा नहीं, बल्कि वैश्विक भरोसे का प्रतीक बन चुका है।
यह मोदी सरकार की वह दूरदर्शिता है, जो भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जा रही है। जो भारत पर भरोसा करता है, वही भविष्य गढ़ता है—और EU ने यह भरोसा दिखा दिया है।
भारत तैयार है, दुनिया तैयार है, अब बस इतिहास बनने और बनाने का समय है!

हमें Microsoft, Google या अन्य पश्चिमी Products का Alternative क्यों चाहिए??दो उदाहरण देता हूँ.पहला है Nayara का.... जो ...
27/09/2025

हमें Microsoft, Google या अन्य पश्चिमी Products का Alternative क्यों चाहिए??

दो उदाहरण देता हूँ.

पहला है Nayara का.... जो एक भारतीय कंपनी है.. जिसमे रूस का भी investment है. पिछले दिनों जब इस कंपनी पर अमेरिका ने Restrictions लगाए... तब अचानक से Microsoft ने अपनी सारी Cloud services बंद कर दी. कंपनी High कोर्ट गई.. Microsoft पीछे हटा और services फिर से शुरू कर दी.

अब नया मामला आया है... कि SAP जो कि जर्मन कंपनी है... जिसके ERP Solutions बहुत ज्यादा प्रचलन में हैं. Nayara के पास भी SAP का ERP solution है... जिसके द्वारा वो CRM, HR, Billing आदि का काम करते हैं.

एक दिन अचानक SAP ने उनकी Invoicing Service बंद कर दी. बिना इस service के Nayara वाले Invoices generate नहीं कर पा रहे हैं..... मतलब पैसे का लेन देन ठप्प हो गया है.

Nayara वाले कोर्ट गए हैं.... देखते हैं आगे क्या होता है.

दूसरा मामला है इजराइल का.

इजराइल की सेना IDF का एक Suvilliance Center है... जहाँ 24 घंटे फिलिस्तीन में हो रही घटनाओं पर नज़र रखी जाती है..... उनके जासूस जो इनपुट देते हैं.... जो इनपुट्स Spy Drones से मिलते हैं.. Satellites से मिलते हैं..... सब इसी सेंटर में Analysis के लिए आते हैं.. यही Cloud पर यह data store किया जाता है......... और फिर इन्हे Actionable Intel में बदला जाता है... जिसके बाद IDF वाले Target पर अटैक करते हैं.

अब जाहिर है.... यहां भी हजारों Laptops Desktops लगे होते हैं... जाहिर है Cloud Service भी है.. Microsoft Azure की.

जहाँ यह सारा Data Store होता है.

अब खबर आई है कि Microsoft ने इजराइली सेना की Cloud Services बंद कर दी है. आरोप लगाया है कि इजराइल की सेना फिलिस्तीन के लोगों की खुफिया जानकारी collect करती है और उन्हें Microsoft के Cloud पर store करती है.
अब इजराइल की सेना और Microsoft आपस में सींग भिड़ाये बैठे हैं.

क्या ऐसा भारत में हो सकता है??

बिलकुल हो सकता है.

मुझे नहीं पता कि RAW और IB वाले कौन सी Cloud Service इस्तेमाल करते हैं.

लेकिम क्या हो... अगर microsoft वाले ऐसा ही उनके साथ कर दें.. और कहें कि आप पाकिस्तानी नागरिकों (आतंकवादी) की रिकॉर्डड कॉल्स, GPS coordinates, वीडियो हमारे Cloud पर नहीं रख सकते.

ऐसे में आप क्या कर लेंगे?

इजराइल ही क्या कर पा रहा है.. जबकि वो तो सबसे High Tech देशों में से एक है.

इसका एक ही Solution है..... Operating System, Softwares, Datacenter और Cloud Service.... सब हमारी हो.... सब हमारे ही नियंत्रण में हो.

मैं नहीं कहता कि एकदम से शिफ्ट करो... लेकिन धीरे धीरे भारत के products पर move कीजिये.

समय लगेगा.... लेकिन कुछ सालों में स्थिति सुधरेगी.

लेख साभार मनीष शर्मा

27/09/2025

#लेखा_जोखा
पिछले हफ्ते हुई घटनाओं का

#सोनम_वांगचुक की गिरफ्तारी
3 idiots वाले फुंसुंग़ वांगडू असल में उतने अच्छे नहीं हैं
बेफज़ूल माँगो को लेकर हिंसा भड़काकर उन्होंने अपना असली चेहरा दिखा दिया
जिससे सरकार के लिए उनपर एक्शन लेना आसान हो गया

में चल रहे भाषण
किसी गाँव के स्कूल में चल रही भाषण प्रतियोगिता की तरह लग रही है
बड़े लोग उस मंच का मजाक उड़ा रहे है और छोटे देश उसे सीरियस ले रहे हैं
क्योंकि सबको पता है कि भाषणबाजी के अलावा ये संगठन अब किसी काम का नहीं है

#स्वदेशी_कैंपेन
इसे 1 महीने नहीं बल्कि सालों तक चलाना चाहिए
एक राष्ट्रीय पागलपन-जूनून और मिशन की तरह
ताकि हम सही मायने में आर्थिक रूप से आज़ाद हो सकें
और केवल यही हमें 2047 में विकसित बना सकता है
इसमें हमें चीन से बहुत कुछ सीखने की जरुरत है

H-1B #वीजा की फीस बढ़ना
विकसित भारत बनाने का सुनहरा मौका
देश का सबसे बेहतरीन टैलेंट अभी अमेरिका को ग्रेट बनाने में लगा था
अमेरिका का दरवाज़ा छोटा होते ही दुनिया का हर महत्वाकांक्षी देश अब इन भारतीयों पर डोरे डालेगा
जरुरत है अब उन्हें भारत में रोकने की
ताकि उनकी स्किल्स/एक्सपोजर का इस्तेमाल हम भारत को विकसित बनाने में कर सकें

#बिहार_चुनाव की उठापटक
RJD लोगों के गुस्से पर सवार है,कांग्रेस बैक सीट पर बैठकर मलाई खाने के मूड में हैं
BJP बड़े बड़े सपने बेच रही है
और प्रशांत किशोर गाँव गाँव जाकर सबको समझा रहे हैं कि किसी के झांसे में मत आना
PK जीतने से तो रहे पर किसी की हार का कारण जरूर बनेंगे

बढ़ते आंदोलन
देश दुनिया और खुद से बेखबर और सोचने समझने में अक्षम पीढ़ी किसी भी सोशल मीडिया हैशटैग को फॉलो कर सड़क पर उतर जाती है
ताकि बाद में उन्हें FOMO ना हो
उनके लिए प्रोटेस्ट और कॉन्सर्ट में कोई फर्क नहीं है
इसलिए जरुरत है सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी की
ताकि डीप स्टेट एजेंट्स हमारी इस पीढ़ी को हमारे खिलाफ इस्तेमाल ना कर सकें


ये एलेजेड नेपाली विरोध प्रदर्शन किसी Gen Z का स्वाभाविक गुस्सा नहीं लगते, उनके लिए तो फोन से बाहर निकलना ही बड़ी बात है,...
09/09/2025

ये एलेजेड नेपाली विरोध प्रदर्शन किसी Gen Z का स्वाभाविक गुस्सा नहीं लगते, उनके लिए तो फोन से बाहर निकलना ही बड़ी बात है, ये सीधा सीधा बांग्लादेश दोहराने की कोशिश है.

ये असली आंदोलन नहीं, बल्कि संगठित हमले हैं जो विरोध के नाम पर हो रहे हैं, ज़रा निशाने पर नज़र डालिए:

1. तत्कालीन प्रधानमंत्री के निवास पर हमला
2. प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) पर हमला (खबरें अभी मिश्रित और अपुष्ट)
3. संसद भवन पर हमला
4.पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी को जिंदा जलाने की घटना
5. वर्तमान उप-प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री पर हमला
6. और अन्य अहम सरकारी इमारतों व ठिकानों पर हमले

साफ़ है, कोई और इस पूरे खेल की स्क्रिप्ट लिख रहा है और बिल में चार्जेज़ बढ़ाता जा रहा है. लेकिन आख़िरकार भुगतान तो नेपाली जनता को ही करना पड़ेगा, और वो भी इन तरीकों से: अपनी कुर्बानियों और मेहनत से, कड़े और दर्दनाक फैसलों से और सबसे बढ़कर, पैसे से

क्योंकि अंत में बात हमेशा पैसे और सत्ता पर नियंत्रण पर ही आकर टिकती है.

 #चीन_के_मंसूबे चीन के भारत के प्रति विशेष व्यवहार, वक्तव्य आदि को लेकर कुछ भावुक भारतीय 'ब्रिक्स', 'रिक्स' के नये गठबंध...
03/09/2025

#चीन_के_मंसूबे

चीन के भारत के प्रति विशेष व्यवहार, वक्तव्य आदि को लेकर कुछ भावुक भारतीय 'ब्रिक्स', 'रिक्स' के नये गठबंधन की संभावनाये जता रहे हैं।

भारत में कई विशेषज्ञ भी चीन के वर्तमान व्यवहार को लेकर तनिक उलझन में हैं।

कुछ आशावादी उत्साही विश्लेषकों का मानना है कि भारत के पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है और अमेरिकी दादागिरी से मुक्ति का रास्ता बीजिंग से होकर जाता है।

उनके विचार का आधार राष्ट्रपति शी का वह बयान है जिसमें उन्होंने कहा था कि हाथी और ड्रैगन को साथ-साथ आना चाहिए।

दूसरे निराशावादी विश्लेषकों का मानना है कि हमारे पास चीन को बेचने के लिए कच्चे माल के अलावा कुछ है ही नहीं क्योंकि अमेरिकी टैरिफ के कारण जो माल डंप हो रहा है वह माल तो चीन स्वयं ही बनाता है जबकि उसके रेयर अर्थ मिनरल, भारी मशीन व अन्य उपकरणों के लिए हम उस पर ही निर्भर हैं।

इस विषय में मेरा भी मानना यह है कि चीन का उद्देश्य फिलहाल अर्थव्यवस्था में भारत को सपोर्ट करना नहीं बल्कि उसे अमेरिका से अलग करना है।

वस्तुतः वह अमेरिका को एशिया में अलग थलग कर देना चाहता है।

मेरे इस विचार की पुष्टि इस बात से भी होती है कि ऑस्ट्रेलिया के पुनः आर्थिक संबंध बहाल करने के बाद चीन ने जापान से भी अच्छे संबंध बनाने शुरू कर दिए हैं।

चीन की इस नीति के पीछे एक महत्वपूर्ण घटना और उसका पुराना उद्देश्य छिपा है।

घटना है --पाकिस्तान में अमेरिकी न्यूक्लियर मिसाइल अड्डे की संदिग्ध उपस्थिति व असीम मुनीर द्वारा ईरान को धोखा देकर अमेरिका को हवाई आक्रमण की फैसलिटी देना और उद्देश्य है -- ताईवान का चीन में विलय।

इसीलिये मैंने बीस दिन पहले टू लाइनर पोस्ट में लिखा था कि 27 अगस्त को भारत पर टैरिफ का फैसला नहीं होगा बल्कि ताईवान की किस्मत का फैसला होगा, जिसे कई मित्रगण समझ नहीं पाए और पोस्ट की आलोचना की।

चीन को भली भांति पता है कि उत्तर पश्चिम में उसके गले की नस है मुस्लिम बहुल सिक्यांग जहाँ चीन-अमेरिकी संघर्ष के दौरान अमेरिका पाकिस्तान व तालिबान के सहयोग से मुस्लिम मिलिशिया का गठन कर सकता है और उसके पीछे-पीछे गिलगित-बाल्टिस्तान के रास्ते स्वयं घुस सकता है जैसे कि भारत ने 1971 में बांग्लादेश में मुक्ति वाहिनी के द्वारा किया और स्वयं अमेरिका ने 2001 में तालिबान के विरुद्ध नॉर्दर्न एलायेंस द्वारा किया था।

उधर दूसरी कमजोर नस है मलक्का जहाँ से चीन की 70% ऑयल सप्लाई गुजरती है और इसका प्रभावी ब्लॉकेज भारत के अंडमान स्थिति नौ सैनिक अड्डे के बिना संभव नहीं है।

यही कारण है कि वह भारत के पक्ष में बढ़ चढ़कर बयानबाजी कर रहा है।

उसका सोचना है कि किसी तरह भारत को पूरी तरह अमेरिका का शत्रु बना दिया जाना चाहिए और इसीलिये विश्व भर में चीन प्रेरित व पोषित एजेंसीज मोदीजी को लाइम लाइट में रख रही हैं ताकि ट्रम्प जैसे आत्ममुग्ध मूर्ख को भड़काकर भारत अमेरिकी संबंध को बदतर किया जा सके।

मोदी जी भारत के आंतरिक मामलों में भले उतने प्रभावी नजर न आते हों लेकिन विश्वराजनीति में उनकी समझ और कलाबाजियाँ बेजोड़ हैं जबकि पुतिन घर और बाहर दोनों जगह के समान रुप से माहिर खिलाड़ी हैं।

उन्हें अच्छे से पता है कि यूक्रेन से निबटने के बाद भी रूस की आर्थिक स्थिति चीन ही नहीं भारत से भी खराब रहेगी और ऐसे में चीन विश्व में नंबर एक के पद पर स्थापित होगा जिसकी तपिश भारत ही नहीं रूस को भी झेलनी होगी।

यह तो अधिकांश लोग जानते हैं कि चीन की दृष्टि वियेतनाम सागर को पूरा हड़पकर पूर्वी एशियाई देशों को अपना बंधक बनाने पर है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि चीन की दृष्टि पूरे पामीर जो तजिकिस्तान के क्षेत्रफल का पैंतीस प्रतिशत है, को हड़पने पर भी है ताकि पूरे मध्य एशिया पर अपना दबदबा बनाकर सीधे पश्चिम एशिया के अरब देशों से जुड सके और यूरोप को अपने गन प्वाइंट पर रख सके।

और अगर आपको यह कोरी कल्पना लगती है तो साहिबान आपके होश यह जानकर उड़ जाएंगे कि चीन पामीर का दस प्रतिशत भाग हड़प भी चुका है जिसे दिलवाया है रूस ने मजबूरी में क्योंकि चीनी पूँजी तो रूस को भी चाहिए।

आप यह भी जान लें कि पामीर को ही हिंदू पुराणों में 'सुमेरु' कहा गया है जहाँ हमारी 'देव सभ्यता' जन्मी थी और अखंड आर्यावर्त का उत्तरी क्षेत्र था।

आपको यह जानकर और भी आश्चर्य होगा कि चीन ने रूस के पूर्वी बंदरगाह शहर 'ब्लादीवोस्तोक' पर भी दावा ठोक रखा है और विडंबना यह है कि रूस के पास इस शहर में बसाने के लिए रूसी नहीं हैं। इसीलिये अपुष्ट खबर के अनुसार रूस ने एक बार इसके संचालन के लिए भारत से मदद मांगी थी।

अब आपको समझ आया क्या कि क्यों पुतिन मोदी को अपनी कार में लेकर डेढ़ घंटे घूमते रहे?

दरअसल विश्व राजनीति बहुत अस्थिर है और इसमें दो मित्र केवल वही हो सकते हैं जिनके हित एक दूसरे से जुड़े हों और जिनका आपस में सीमा विवाद सहित अन्य कोई कटु विवाद न हो वरना गच्चे तो रूस ने भी बहुत दिए हैं और मदद अमेरिका ने भी भारत की बहुत की है।

लेकिन वर्तमान स्थिति ऐसी हो चुकी है कि भारत के साथ-साथ रूस भी , अमेरिका और चीन दोनों से ही आशंकित हैं और इसीलिये रूस भारत का साथ चाहता है कि आगे चलकर दोनों चीन को हावी होने से रोक सकें।

अस्तु! संतोष की बात यह है कि चीन व अमेरिका में मित्रता नहीं हो सकती और अमेरिका हो या चीन या रूस, किसी का काम फिलहाल भारत के बिना नहीं चल सकता है और इस स्थिति में भारत को लाने का श्रेय निःसंदेह मोदी जी के अर्थनीति, विदेशनीति व रक्षानीति के संयुक्त सफल संयोजन को जाता है।

✍️ देवेन्द्र सिकरवार

भारत बना चिप पॉवर: 35 स्वदेशी प्रोटोटाइप चिप्स तैयारनई दिल्ली, 2 सितम्बर 2025 – भारत ने आज इतिहास रच दिया है. भारत सेमीक...
02/09/2025

भारत बना चिप पॉवर: 35 स्वदेशी प्रोटोटाइप चिप्स तैयार

नई दिल्ली, 2 सितम्बर 2025 – भारत ने आज इतिहास रच दिया है. भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत हमारे वैज्ञानिकों ने 35 स्वदेशी प्रोटोटाइप चिप्स तैयार कर लिए हैं. यह वही लक्ष्य है, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी और 15 अगस्त के लालकिले से अपने संबोधन में दोहराते हुए कहा था कि अब भारत केवल मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स का उपभोक्ता नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया को चिप्स भी सप्लाई करेगा.

इस वक्त देशभर में 6 सेमीकंडक्टर प्लांट तेजी से बन रहे हैं और सरकार ने हाल ही में ₹4,594 करोड़ की भारी निवेश राशि चार नए संयंत्रों के लिए दी है.

भारत की यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है जब नई दिल्ली में सेमिकॉन इंडिया 2025 (2–4 सितम्बर) चल रहा है. दुनिया की बड़ी कंपनियां और विशेषज्ञ इस मंच पर भारत के साथ साझेदारी की संभावनाएँ तलाश रहे हैं. अब तक सेमीकंडक्टर उद्योग पर ताइवान और दक्षिण कोरिया का दबदबा रहा है, लेकिन भारत की एंट्री से हालात बदलने वाले हैं.

गौरतलब है कि 50–60 साल पहले भी भारत ने इस क्षेत्र में कदम बढ़ाने की कोशिश की थी, मगर तब प्रयास सफल नहीं हो सके. लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है. तकनीकी आत्मनिर्भरता का यह नया अध्याय भारत को वैश्विक AI चिप मार्केट में भी बड़ी ताक़त बना सकता है। मैकिंज़ी की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक यह बाज़ार 2030 तक 6.8% की रफ्तार से बढ़ेगा.

विशेषज्ञों का कहना है – यह सिर्फ एक औद्योगिक कदम नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति, तकनीकी नेतृत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा की दिशा में भारत की बड़ी छलांग है.

ट्रम्प परिवार, पाकिस्तानी सेना के फंड और आतंकी फाइनेंसिंग की खतरनाक तिकड़ीपिछले कुछ महीनों में अमेरिका और पाकिस्तान के र...
23/08/2025

ट्रम्प परिवार, पाकिस्तानी सेना के फंड और आतंकी फाइनेंसिंग की खतरनाक तिकड़ी

पिछले कुछ महीनों में अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते असामान्य तेजी से सुधरे हैं. यह सुधार सामान्य कूटनीतिक पहल नहीं, बल्कि एक बेहद संदिग्ध समझौते का नतीजा है. इसके केंद्र में है क्रिप्टो डील, जो पाकिस्तान की सैन्य "स्लश फंड" व्यवस्था, ट्रम्प परिवार की क्रिप्टो कम्पनी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम क्रिप्टो मंच Binance को जोड़ती है. इस सौदे ने न सिर्फ अमेरिका–पाक रिश्तों को नई गर्माहट दी है, बल्कि आतंक वित्तपोषण और मनी लॉन्ड्रिंग को वैध रास्ता भी उपलब्ध कराया है.

इस पूरी कहानी का नायक है एक युवा ब्रिटिश-पाकिस्तानी उद्यमी—बिलाल बिन साक़िब.

15 अप्रैल 2025 को ट्रम्प परिवार की क्रिप्टो कम्पनी World Liberty Financial (WLF) ने बिलाल को अपना सलाहकार नियुक्त किया. इसके तुरंत बाद, पाकिस्तान ने उन्हें Pakistan Crypto Council (PCC) का सीईओ और प्रधानमंत्री का "विशेष सहायक (ब्लॉकचेन)" बना दिया.

यानि वही शख्स जो पाकिस्तान के हितों का प्रतिनिधि है, वही ट्रम्प परिवार की कम्पनी के हितों का पहरेदार भी है.

मई 2025 में पाकिस्तान सरकार और WLF के बीच आधिकारिक क्रिप्टो समझौते पर दस्तख़त हुए. दिलचस्प यह है कि यह वही दौर था जब भारत–पाक रिश्तों में तनाव चरम पर था. इस "डील" के तुरंत बाद, बिलाल वाशिंगटन पहुंचे और जून 2025 में उन्होंने दर्जनों अमेरिकी सांसदों, सीनेटरों, व्हाइट हाउस सलाहकारों और यहां तक कि न्यूयॉर्क के मेयर एरिक एडम्स से मुलाकात की. उनका मक़सद था—पाकिस्तान का "क्रिप्टो विज़न" बेचना.

पाकिस्तान–WLF सौदे में तीसरा अहम चेहरा है क्रिप्टो मंच Binance का संस्थापक, चांगपेंग झाओ (CZ). नवंबर 2023 में अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ), ट्रेज़री और CFTC ने बाइनेंस पर 4.3 अरब डॉलर का ऐतिहासिक जुर्माना ठोका.

आरोप थे कि बाइनेंस ने हमास, अल-कायदा और आईएसआईएस तक फंडिंग पहुँचने दी, ईरान के साथ लेन-देन कर अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन किया, और मनी लॉन्ड्रिंग रोधी नियमों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया.

खुद CZ ने गुनाह कबूल किया और उन्हें 4 महीने की जेल की सज़ा हुई. लेकिन जेल से बाहर आते ही वही CZ पाकिस्तान क्रिप्टो काउंसिल का "स्ट्रैटेजिक एडवाइज़र" नियुक्त हो गए. और इतना ही नहीं—वह ट्रम्प परिवार की WLF के साथ भी सक्रिय दिखने लगे.

यानी एक तरफ CZ का आपराधिक रिकॉर्ड और चीन से नज़दीकियाँ हैं, दूसरी तरफ पाकिस्तान और ट्रम्प परिवार की आर्थिक–राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ.

बिलाल बिन साक़िब की कंपनियों की परतें भी उतनी ही रहस्यमयी हैं. उनकी कई कम्पनियाँ एक ही पते पर पंजीकृत हैं. न वेबसाइट, न वित्तीय विवरण—साफ संकेत कि ये शेल कम्पनियाँ हैं.

उनकी बहन मिनाहिल की कम्पनी Tayaba UK सीधे जुड़ी है Al Mustafa Trust (AMT) से। AMT एक तथाकथित चैरिटी है, लेकिन दरअसल यह पाकिस्तानी सेना का छुपा हुआ फंड है. इसे रिटायर्ड सैन्य अफसर चलाते हैं और यह फौज की "मिलबज़" व्यवस्था (Military Business) का हिस्सा है—यानि सेना का वह आर्थिक तंत्र जो आधिकारिक रक्षा बजट से बाहर रहकर फौजी अफसरों को लाभ पहुँचाता है.

इस तरह बिलाल परिवार का कारोबारी जाल सीधे पाकिस्तानी सेना की काली कमाई से जुड़ता है.

मई 2025 में अमेरिका–पाकिस्तान के बीच क्रिप्टो डील साइन होने के बाद रिश्तों में चमत्कारी सुधार देखा गया. सेना प्रमुख असीम मुनीर ने दो महीने में दो बार अमेरिका का दौरा किया. कई अन्य आर्थिक और सुरक्षा समझौते भी साइन हुए और पाकिस्तान ने डोनाल्ड ट्रम्प को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित कर दिया.

यह सब एक ही सवाल खड़ा करता है, क्या अमेरिका और पाकिस्तान के बीच सुधरते रिश्तों की असली वजह यही "क्रिप्टो डिप्लोमेसी" है?

एक तरफ है ट्रम्प परिवार की क्रिप्टो कम्पनी, जो अमेरिकी राजनीति और वित्तीय हितों का नया औज़ार है. दूसरी तरफ है पाकिस्तान की सेना, जो दशकों से आतंकवाद और छुपे हुए फंड से चलने वाली "मिलबज़" व्यवस्था का लाभ उठाती है. और तीसरी तरफ है CZ और Binance, जिनका इतिहास मनी लॉन्ड्रिंग और आतंक फंडिंग से भरा पड़ा है.

तीनों के बीच यह गठजोड़ केवल वित्तीय डील नहीं है यह एक वैश्विक सुरक्षा ख़तरे का नया रूप है, ये एक आतंकी फंडिंग को प्रायोजित करता है, दूसरा उस अपराध का दोषी ठहराया जा चुका है, और तीसरा दोनों से नज़दीकियाँ बढ़ा रहा है.

नतीजा: “क्रिप्टो डिप्लोमेसी” आज दुनिया के सामने आतंक और वित्तीय अपराध की सबसे खतरनाक साझेदारी बनकर उभर रही है.

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