Acting Adda

Acting Adda

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Improve your acting skills. Acting is not about being famous, it's about exploring the human soul.

28/12/2025

नही है तू तो इंकार कैसा,,
नफी तो तेरे होने का पता है,,,,,
अक्ल में जो घिर गया क्यों कर हुआ
जो समझ में आ गया वो खुदा क्यों कर हुआ,,
न था कुछ तो खुदा था,,
जो न कुछ होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको कुछ होने ने
न मै होता तो क्या होता
मेरे पिछले उन्वांन की पहली लाइन ही
GOD EXIST थीं
मैने जानबूझ कर DOES हटाया था
लाइन से मेरे तास्सुरात साफ थे
खुदा का वजूद है,,
इस डिबेट के लिए पिछले दो सालों से तैयारी चल रही थी ,, जावेद साहब हर बार कोई खूबसूरत बहाना बना कर निकल लेते थे (यह एक लंबी कहानी है जो फिर कभी,,)
A
पूरी डिबेट गोदी मीडिया पर करारा तमाचा थी
क्योंकि नेशनल चेनल पर कैसे मुर्गे लड़ाए जा रहे है यह सर्वविदित है
B
मुफ्ती शर्माइल के आर्ग्युमेंट (दलीलें) इस कदर पुख्ता थी जिसे नकार पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन लगने लगा था जिसके चलते जावेद साहब के हाथों में कंपकपी साफ दिखाई दे रही थी,,
C
*मदरसों पर उठती उंगलियों के मुंह बंद*
मुफ्ती शर्माइल के चंद अंग्रेजी अल्फाजों पर जावेद साहब बोल गए इट्स डिफिकल्ट इसे आसान भाषा में कर दीजिए
जैसे
मेटाफिजिकल,
कांटीजेंट
इन्फिनेट रिग्रेस ऑफ काजेस
नेसेसिटी बिंग
D
जावेद साहब इमोशनल ग्राउंड का सहारा लेते दिखे
जमीन पर गाजा में मरने वाले बच्चों पर सवाल रखा
छुरी बनाने वाला गलत नहीं उसका इस्तेमाल करने वाला गलत शैतान की रहनुमाई में चलने वाला गलत होगा
E
कमेंट बॉक्स जब मैने खंगाला तो ईमान लाने वालो के कमेंट्स से भरा पड़ा था
एक खबर को सही माने तो ४५०० से ३० हजार तक लोग ईमान में दाखिल हुवे
एक साहिबे हैसियत शेख ने मुफ्ती साहब को एक करोड़ की पेशकश की जिसे आपने मदरसों में तकसीम करने का फैसला कर दिया
F
पूरी डिबेट में दोनों पक्षों की तरफ से एक भी अल्फ़ाज़ ऐसा नहीं था जो अभद्र या शिष्टाचार विरूद्ध हो यह इस डिबेट की बड़ी खासियत रही
नो घुस्सा
नो तू तू, मै मै,,
नो गाली
नो तेवर बदलना
नो चिल्ला चोट
पूरी शालीनता सभ्यता, सौम्यता के साथ डिबेट चली
इंटलेक्चुअल तार्किक, बुद्धिजीवी डिबेट
करारा तमाचा गोदी मीडिया को
G
नो फ़िरका परस्ती
इक्का दुक्का इख़्तेफी पोस्ट आई जो कोई मायने नहीं रखती
इस मोज़ू पर लगभग सभी फ़िरके एक साथ ही खड़े मिले

कुछ पढ़ने वाले दोस्तो ने काफी की दावत देकर और भी कुछ लिखने को कहा तो दूसरी किश्त भी निष्कर्ष में लिखी गई है

इदरीस नामा

28/12/2025

कल रात यह गाना दिल के तार झनझना गया

03/11/2025

ऐक्टर_बनना_है?
अनाड़ी नहीं, प्रोफ़ेशनल ऐक्टर बनें!

अगर आप कभी-कभी इस बहस में पड़ जाते हैं कि *ऐक्टर जन्मजात या पैदाइशी* होते हैं या नहीं? और फिर भी असमंजस बाक़ी रह गया हो, तो ये पोस्ट ज़रूर पढ़ें।
यहाँ मैं इस संदर्भ में कुछ विचार रख रहा हूँ।

मेरा मानना है कि दुनिया का हर आदमी ऐक्टर है। लोग अपनी ज़िंदगी (Real Life) में भी बहुत ऐक्टिंग करते हैं। मतलब अपने मूड और सच्ची भावना को सफ़ाई से छुपाकर, ज़रूरत के अनुरूप नकली भाव पेश करते हैं। यह ऐक्टिंग है।

ऐसे भी कई लोग होते हैं, जिनके अंदाज़, हावभाव, बनना सँवरना देखकर लोग कहते हैं कि "तुम फ़िल्मों में ट्राई क्यों नहीं करते?"

लेकिन ज़्यादातर लोग कैमरे के सामने आते ही नर्वस हो जाते हैं, घबरा जाते हैं, शर्मा जाते हैं, सहज नहीं रह पाते, आवाज़ ही साथ नहीं दे पाती, स्पष्ट बोल नहीं पाते या बहुत ही सतही तौर पर ऐक्टिंग कर पाते हैं।

इसीलिए ऐसे लोग प्रोफ़ेशनल ऐक्टर नहीं बन पाते।

जबकि अभिनय की कुछ आधारभूत बातें और तकनीक सीख लेने के बाद वो अच्छी ऐक्टिंग कर सकते हैं। ये फ़र्क़ है।

आप ख़ुद सोचिए...जन्म से कोई भी, कुछ बनकर पैदा नहीं होता।

एक किस्सा है। एक गाँव में किसी सर्वे के दौरान ग्रामीणों से जब पूछा गया कि "क्या गाँव में कोई 'बड़ा आदमी' पैदा हुआ है?" तो ग्रामीण बोले कि "नहीं, यहाँ बड़ा आदमी तो कभी पैदा नहीं हुआ, सब छोटे बच्चे ही पैदा होते हैं :

जन्म से न कोई डॉक्टर पैदा होता है, न इंजीनियर, न नेता, न लुटेरा, न हेयर ड्रेसर, न हलवाई और न ही ऐक्टर।

ऐक्टर बनना, उस व्यक्ति की रुचि, दृढ़ इच्छा शक्ति, जुनून, पुरुषार्थ और अवसरों को भुनाने की क्षमता पर निर्भर करता है, सिर्फ़ जन्म लेने पर नहीं।

दरअसल ऐक्टिंग को लोग बहुत हल्के में लेते हैं।
जैसे अगर किसी ने डॉक्टर बनने का सोचा,
तो वो उसके लिए मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करेगा
और चयन के बाद कुछ साल डाक्टरी सीखने में लगाएगा।
कोई इंजीनियर, चार्टर्ड अकाउंटेंट, सिनेमेटोग्राफ़र, फ़ैशन डिज़ाइनर का करियर चुनता है, तो सबसे पहले यही प्लानिंग करेगा कि सीखने के लिए क्या करना है।
यहाँ तक कि हुनरवाले काम जैसे कुकिंग, कटिंग, बढ़ईगिरी, टेलरिंग, मैकेनिक, खेती-किसानी, दुकानदारी आदी के लिए भी सीखने पर सबको ज़ोर देना ही पड़ेगा।

लेकिन अफ़सोस यही है कि ऐक्टर बनने का “सोचते ही” सब ऐक्टर बन जाते हैं। जी, सिर्फ़ “सोचते ही”..... क्योंकि उन्होंने “ऐक्टर बनने का सोच लिया है” इसलिए वो ऐक्टर हैं और उन्हें सीधा किसी फ़िल्म या सीरियल में काम चाहिए। ये जन्मजात ऐक्टर पैदा होने वाली सोच है।

लेकिन सच कहूँ, ऐसे ही लोग सबसे ज़्यादा पछताते भी हैं, क्योंकि ऐसे लोग बस यही गुमान रखते हैं कि किसी डायरेक्टर की नज़र उन पर पड़ेगी और उन्हें हीरो/हीरोइन बना देगा।

ये सीधा-सीधा “मुंगेरी लाल का हसीन सपना” है।

ज़रा सोचिए... आपके पास जन्मजात पैर हैं और दौड़ना आपकी जन्मजात क्षमता है... फिर क्यों आप दौड़ने में मेडल नहीं जीतते?

ज़रा सोचिए... आपको नदी-तालाब में तैरना आता है... फिर क्यों आप ओलम्पिक खिलाड़ी (तैराक) नहीं बन पाए?

ज़रा सोचिए.... आपके पास दो-दो हाथ जन्म से हैं... फिर क्यों आप मुक्केबाज़ नहीं बने?

ज़रा सोचिए..... आपको भगवान ने जन्म से गला दिया है... फिर क्यों आप गायक नहीं बने?

आनुवांशिक (Genetic) गुण भी तभी काम आ सकते हैं जब बाक़ायदा तालीम ली जाए, वरना वो नष्ट हो जाता है। इसीलिए सारे ऐक्टर्स के बच्चे भी ऐक्टर नहीं बन पाते।

कुछ भी बनने के लिए आपको उस पेशे या कला से सम्बंधित बारीकियाँ और तकनीक सीखनी ही होगी, तब जाकर आप सँवर पाएंगे और काम करने लायक हो पाएंगे।

हालाँकि फ़िल्म या सीरियल डायरेक्टर कई बार अनाड़ी लोगों से भी ऐक्टिंग का काम करा लेते हैं। लेकिन इसका मतलब नहीं कि वे लोग ऐक्टर बन गए। उनको पता नहीं होता कि उनसे कोई बात कैसे और उसी अंदाज़ में क्यों कहलवाई गई।

आजकल शूटिंग का ख़र्च बहुत बढ़ गया है।
आपका एक भी रीटेक फ़िल्म की लागत बढ़ा देता है। इसलिए शूटिंग के दौरान कोई भी आपको
ग़लती कर-कर के सीखने का मौक़ा नहीं दे सकता।
वहाँ प्रोफ़ेशनल एक्टर चाहिए, जो डायरेक्टर की मरज़ी के मुताबिक तुरंत काम कर दें।

इसीलिए अब ऐक्टर नहीं, बल्कि 'प्रोफ़ेशनल ऐक्टर्स' की ज़रूरत है।
इसके लिए आपको अपनी भाषा और अपनी आवाज़ पर काम करना होगा।
अपने शरीर को चुस्त-फ़ुर्त और लचीला (Flexible) बनाने पर काम करना होगा। कैरेक्टर की आवश्यकता के अनुरूप भावनाओं (Emotions) को सच्चाई से पेश करना सीखना होगा।
कैमरे के लिए ऐक्टिंग कैसे की जाती है, ये सीखना होगा।
किस तरह हर इमोशन को आसानी से पेश किया जा सके,
किस तरह उस कैरेक्टर में उतरकर उसके साथ एकाकार हुआ जा सके,
किस तरह लम्बे-चौड़े स्क्रिप्ट को याद किया जाएं,
किस तरह शूटिंग के दौरान ब्लॉकिंग
और साथी कलाकारों का ध्यान रखना है.... आदि बातें सीधे सेट पर अब कोई नहीं सिखाएगा।

डायरेक्टर सिर्फ़ डायरेक्टर होते हैं, वे ट्रेनर नहीं होते।
वो आपको सेट पर ट्रेनिंग नहीं देने बैठेंगे। वास्तविकता ये है कि अनाड़ी लोग उन डायरेक्टर्स तक पहुँच भी नहीं पाते हैं।

प्रोफ़ेशनल ऐक्टर बनना है तो आपको पहले से ही तैयारी करनी होगी। आजकल तो कई जगह सेट भी नहीं होते, सबकुछ क्रोमा के सामने शूट होता है। ऐसे में अनाड़ी ऐक्टर कैसे इस नई तकनीक के साथ तालमेल बैठा सकता है? ये सब ट्रेनिंग के दौरान सीखा जा सकता है।

जो भी जुनून से सीखेगा, अमल करेगा, वही ऐक्टर बनेगा।

इदरीस खत्री
khatry

20/10/2025

गोवर्धन ठाकुरदास असरानी अलविदा
चरित्र अभिनेता/कॉमेडियन/निर्देशक
जनवरी १९४१ में जयपुर,राजस्थान में जन्म हुआ था
पिता की साड़ियों की एक दुकान थी यह दुकान आज भी कायम है जिसे इनके भाई के बच्चे चला रहे है लक्ष्मी साड़ी - राजमंदिर के पास
कुल ७ भाई बहन - जिसमें ४ भाई ३ बहने
सेंट जेवियर्स स्कूल से पढ़ाई की बहुमुखी प्रतिभाओं से भरे असरानी स्कूल में डांस/ ड्रामा/संगीत में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते थे,
स्कूल दिनों में ही १९५५ में जयपुर आकाशवाणी की स्थापना हुई थी,
खबर लगी के बच्चों के ड्रामे के लिए एडिशन चल रहा है तो पहुंच गए
एक अधिकारी ने यह कह कर भगा दिया कि नाखून काट साफ सुधरे कपड़े पहन कर आओ
अगले दिन नाखून काटकर साफ कपड़े पहन कर पहुंचे तो उसी अधिकारी ने बोला
"काम ही पूजा है" यह लाइन इनके जहन में छप गई
पहला एडिशन पास सिलेक्शन
पहला रेडियो नाटक जिसमें किरदार मिला जॉर्ज का जिसका काम था हर काम में टांग अड़ाना या चोंच मारना,
यह ड्रामा इतना प्रसिद्ध हुआ के रेडियो के बाद इसके मंचन भी होने लगे थे जिसका पारितोषक ५ रुपया मिलता था और स्कूल फीस थी १ रुपया,
मंच पर काम करते करते वह समर्पित होते गए और इसी समर्पण ने इन्हें, १९६०- १९६२तक साहित्य कला भाई ठक्कर से अभिनय की शुरुआती शिक्षा ली, फिर पिता के विरोध के बावजूद यह बॉम्बे पहुंचे,
फिर उन्होंने अपने काम को पूजा की तरह लिया और आज अमर हो चुके है

एक अभिनेता जिन्होंने शुरुआत की रेडियो से
बेशुमार मददगार किरदार, हास्य किरदार,
अंग्रेजों के जमाने के जेलर - असरानी
असरानी उनका उपनाम था, उन्होंने इसी नाम से पहचान भी बनाई,,,

जयपुर से स्नातक तक की पढ़ाई की जयपुर रेडियो पर वॉइस ओवर आर्टिस्ट भी काम किया,
मुंबई आकाशवाणी पर भी काम किया
मुंबई में मुलाकात किशोर साहू और ऋषिकेश मुखर्जी से हुई जिन्होंने अभिनय सीखने की सलाह दी
तब १९६४- ६६ तक पुना फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टीट्यूट से अभिनय की पहली बेच में अभिनय की बारीकियों को सिखा,
१९६६ में एक फिल्म हम कहा जा रहे है में एक कालेज बॉय का किरदार मिला,
तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी FTTI आई तो असरानी और साथियों ने शिकायत की के कोई हमें काम तो क्या कोई समय भी नहीं देता
तब इंदिरा गांधी ने फिल्म इंडस्ट्री से अनुरोध किया के FTTI के स्टूडेंट्स को काम दीजिए,

पर मुंबई सपने तोड़ने में माहिर शहर है, संघर्ष का समय शुरू हो चला,
१९७० में हरे कांच की चूड़ियां फिल्म में अभिनय किया हीरो थे विश्वजीत
किरदार का नाम था त्रिपाठी जो हीरो का दोस्त था,,
इसी साल इन्होंने गुजराती फिल्में भी की,, फिल्म बावर्ची (१९७९) के किरदार ने पैर जमा दिए, फिल्म नमक हराम, मेरे अपने/परिचय - में गुलज़ार साहब ने मौका दिया,
गुलज़ार की फिल्म कोशीश (१९७२) में नकारात्मक भूमिका निभाई- पर दोस्तो ने सलाह दी के नेगेटिव रोल की जगह हस्ते हंसाते रोल हीं करो,

१९७० में मंजू बंसल से विवाह हुआ मंजू ने कुछ फिल्मों में बतौर अभिनेत्री भी साथ काम किया,
लगभ ३५० फिल्मों में अभिनय किया,
१९७२ से १९९१ तक राजेश खन्ना के साथ लगभग ७ से ८ फिल्मों में काम किया,,

राजेश के साथ बावर्ची के दौरान अच्छी दोस्ती हो चली जिसके चलते राजेश ने कई फिल्में दिलाई इस बात का स्वयं असरानी ने खंडन किया के ऐसा कुछ नहीं हुआ,,,
चला मुरारी हीरो बनने और सलाम मेमसाब में बतौर मुख्य अभिनेता काम किया,
१९७२ से १९८२ तक गुजराती फिल्मों में बतौर हीरो काम भी किया,,
१९७४ से १९९७ तक लगभ ६ फिल्मों का निर्देशन भी किया,
पहली गुजराती फिल्म बतौर निर्देशन अ हमदाबाद तो रिक्शा वालो(१९७४),
मां बाप (१९७७),
बतौर लेखक - निदेशक फिल्म चला मुरारी हीरो बनने (१९७७)
बतौर हीरो गुजराती फिल्में -
संसार चक्र, सात कैदी, पाखीनो मानो, छैल छबीला गुजराती,जुगल जोड़ी,
शोले फिल्म के किरदार जेलर आज तक तरोताजा ही है,,
७० के दशक में लगभग १०१ हिंदी फिल्मों में काम किया
८० के दशक में लगभग १०७ फिल्मों में अभिनय किया
नमक हराम, रफू चक्कर, चुपके चुपके, बिदाई के किरदार यादगार थे थे,

फिल्म बालिका वधू और आज की ताजा खबर फिल्म के लिए बेस्ट कॉमेडियन अवार्ड भी मिले

*इदरीस खत्री*

22/08/2025

राजेश खन्ना साहब के जीवन में अनिता आडवाणी नामक एक महिला भी थी। अनिता आडवाणी काका के आखिरी दौर में साथ थी। एक दफ़ा अनिता आडवाणी ने ये दावा भी किया था कि काका ने उनसे गुपचुप विवाह भी किया था। अनिता आडवाणी ने राजेश खन्ना के जीवन पर एक किताब भी लिखी थी। हालांकि वो किताब विवादों में आ गई। और अब जल्दी से वो किताब मिलती भी नहीं है। अनिता आडवाणी ने हाल ही में एक यूट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में बताया है कि राजेश खन्ना जब खाने की टेबल पर आते थे तो उन्हें कम से कम दस तरह के पकवान चाहिए होते थे। अगर इतने पकवान ना हों तो उन्हें गुस्सा आ जाता था। और वो कहते थे कि हम कोई रिफ़्यूजी हैं क्या?

अनिता आडवाणी ने ये भी कहा कि वैसे तो राजेश खन्ना के यहां एक कुक काम करता था। मगर वो भी उनके लिए कभी-कभी खाना बनाया करती थी। राजेश खन्ना जी के यहां छह-सात कर्मचारी नौकरी करते थे। अनिता आडवाणी के मुताबिक राजेश खन्ना को छोले-भटूरे बहुत पसंद थे। इसलिए राजेश खन्ना जी के लिए अनिता आडवाणी ने छोले-भटूरे बनाना सीखा। राजेश खन्ना खाने के बहुत शौकीन थे। और डोसा तो वो रोज़ खाते थे। राजेश खन्ना को पराठा भी बहुत पसंद था। और वो कभी भी स्टाफ़ को ऑर्डर दे देते थे कि आज आलू, मूली व गोभी का पराठा उनके लिए बनाया जाए। स्टाफ़ कई बार परेशान हो जाता था उनकी आदतों से।

बकौल अनिता आडवाणी, इतना खाना बनवाने के बावजूद वो सब पकवानों को थोड़ा-थोड़ा ही चखते थे। खाने के शौकीन थे। मगर खुराक ज़्यादा नहीं थी उनकी। बचा हुआ खाना उनका स्टाफ़ खाता था। स्टाफ को अलग से खाना बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी अपने लिए। यानि खाना बिल्कुल भी बर्बाद नहीं होता था।

09/07/2025

गुरूदत्त जी एक्टिंग से ज़्यादा डायरेक्शन पर फ़ोकस करना चाहते थे। मगर कई बार ऐसा हुआ जब उन्हें मजबूरी में एक्टिंग करनी पड़ी थी। जैसे, प्यासा फ़िल्म में काम करने के लिए उन्होंने दिलीप कुमार से बात की थी। लेकिन ऐन वक्त पर दिलीप साहब ने प्यासा में काम करने से इन्कार कर दिया था। ऐसे में गुरूदत्त ने तय किया कि वो खुद ही प्यासा में एक्टिंग भी करेंगे।

ठीक ऐसे ही साहिब बीबी और गुलाम फ़िल्म के लिए गुरूदत्त शशि कपूर जी को लेना चाहते थे। मगर शशि कपूर जी(जो हालांकि न्यूकमर ही थे तब) के पास डेट्स की कमी थी। और गुरूदत्त उनसे बल्क में डेट्स लेना चाहते थे। क्योंकि वो मीना कुमारी की सभी डेट्स ले चुके थे। और साहिब बीबी और गुलाम फ़िल्म के लिए एक अच्छा-खासा बड़ा सेट तैयार करा चुके थे।

इसलिए जब शशि कपूर जी ने इन्कार कर दिया तो साहिब बीबी और गुलाम फ़िल्म में भूतनाथ का किरदार गुरूदत्त ने खुद निभाने का फ़ैसला किया। एक और बात, साहिब बीबी और गुलाम में भूतनाथ का किरदार निभाने के लिए तो उन्होंने एक्टर बिस्वजीत से भी बात की थी। लेकिन उनके साथ भी गुरूदत्त की बात नहीं बनी। आखिरकार गुरूदत्त को ही भूतनाथ का किरदार जीना पड़ा।

साथियों आज महान गुरूदत्त साहब का सौंवा जन्मदिवस है। गुरूदत्त अगर ज़िंदा होते तो आज सौ साल के हो जाते। 9 जुलाई 1925 गुरूदत्त साहब का जन्म हुआ था। गुरूदत्त जैसा फ़िल्मकार अभी तक तो कोई दूसरा आया नहीं है फ़िल्म इंडस्ट्री में। वैसे भी गुरूदत्त जिस ज़माने के फ़िल्मकार थे, उस ज़माने में फ़िल्में लोग मन से बनाते थे। तब कंटेंट को महत्व दिया जाता था। सिर्फ़ पैसे को नहीं। भारतीय सिनेमाई इतिहास में गुरूदत्त अमर रहेंगे।
गुरुदत्त भारतीय सिनेमा के सम्पूर्ण कलाकारों की फेहरिस्त में सबसे आगे नजर आते है

06/07/2025

संजीव कुमार और विनोद मेहरा, हिंदी सिनेमा के दो उल्लेखनीय कलाकार, जो यहां एक स्पष्ट ऑफ-स्क्रीन क्षण में देखे गए हैं, एक ऐसे युग को दर्शाता है जब अभिनय में गहराई और सहज आकर्षण ने सितारों की एक पीढ़ी को परिभाषित किया है। संजीव कुमार, जो अपनी असाधारण रेंज और गहराई से मानवीय चित्रण के लिए जाने जाते हैं, ने कोशिश, आंधि, मौसम और अंगूर की भूमिकाओं में अविस्मरणीय बारीकियां लाए, एक शांत अनुग्रह के साथ गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करते हुए जिसने उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित अभिनेताओं में से एक स्थान बना दिया। विनोद मेहरा, अपनी कम लालित्य और भावनात्मक स्क्रीन उपस्थिति के साथ, अनुराग, घर और बेमिसल जैसी फिल्मों में दर्शकों को जीता, अक्सर ईमानदारी और गर्मी के साथ संवेदनशील हर व्यक्ति की भूमिका निभाते हैं। अनुभव और स्वर्ग नारक जैसी फिल्मों में उनके सहयोग ने उनकी पूरक अभिनय संवेदनाओं को प्रदर्शित किया - एक विधि में आधारित, दूसरा प्राकृतिक सहजता से चमक रहा है। स्क्रीन से परे, दोनों अभिनेता अपनी विनम्रता और शिल्प के प्रति समर्पण के लिए जाने जाते थे, जो एक ऐसे युग में समृद्ध योगदान देते थे जिसने कहानी कहने और चरित्र को नाटक पर बहुमूल्य बनाया। यह दुर्लभ तस्वीर दो कलाकारों के बीच एक शांत दोस्ताना तस्वीर को कैप्चर करती है जो वॉल्यूम से नहीं बल्कि प्रदर्शन की शक्ति से अलग थे।

25/05/2025

राम बलराम (1980) के सेट से यह कैंडिड शॉट अमजद खान, धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन और निर्देशक विजय आनंद की विशेषता वाले एक यादगार पल को कैप्चर करता है। एक्शन से भरपूर थ्रिलर फिल्म में दो भाइयों-राम और बलराम की कहानी सुनाई गई है- जो धर्मेंद्र और अमिताभ द्वारा अभिनीत हैं- जो भाग्य से अलग हो जाते हैं और बाद में एक आम दुश्मन से लड़ने के लिए फिर से एकजुट होते हैं। मुख्य भूमिका में जीनत अमन और रेखा के साथ, फिल्म में नाटक, भावनाओं और एक्शन का सही मिश्रण था, जो बॉलीवुड के स्वर्ण युग की विशिष्ट थी। शानदार विजय आनंद द्वारा निर्देशित, अपनी स्टाइलिश कहानी कहने के लिए जाने जाते हैं, राम बलराम बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी सफलता थी। अमजद खान, जो अपनी शक्तिशाली स्क्रीन उपस्थिति के लिए जाने जाते हैं, ने अपने प्रदर्शन के साथ गहराई और यह तस्वीर न केवल प्रतिष्ठित सितारों को एक फ्रेम में दिखाती है बल्कि रचनात्मक भावना और सौहार्द को भी दर्शाती है जो 1980 के दशक की सबसे लोकप्रिय फिल्मों में से एक बनाने में चली गई।

16/05/2025

किसी अन्य की तरह एक फिल्म, जाने भी दो यारो अंधेरे हास्य और तीखे व्यंग्य का एक शानदार मिश्रण है जो रिलीज के बाद भी एक पसंदीदा दशक बना हुआ है। कुंदन शाह द्वारा निर्देशित और एनएफडीसी द्वारा समर्थित, 1983 का यह क्लासिक भारत में राजनीति, व्यापार, मीडिया और नौकरशाही में भ्रष्टाचार पर एक मजाकिया लेकिन घिनौनी नज़र रखता है।

नसीरुद्दीन शाह, रवि बसवानी, ओम पुरी, पंकज कपूर, सतीश शाह, सतीश कौशिक, भक्ति बर्वे, और नीना गुप्ता सहित एक तारकीय कलाकार की विशेषता है, कहानी दो फोटोग्राफरों का अनुसरण करती है जिन्होंने गलती से एक हत्या का खुलासा किया - और जो सामने आता है वह एक प्रफुल्लित करने वाला लेकिन घटनाओं की एक परेशान करने वाली श्रृंखला है।

अपने प्रतिष्ठित महाभारत स्टेज सीन से लेकर अविस्मरणीय कॉमिक टाइमिंग तक, यह फिल्म उन क्षणों से भरी हुई है जो मजेदार और विचारोत्तेजक दोनों हैं। जाने भी दो यारो,
भारतीय सिनेमा में एक मील का पत्थर बना हुआ है - स्मार्ट, बोल्ड, और अपने समय से बहुत आगे।

29/03/2025

एडवांस बुकिंग/ओवरसीज आकलन के आधार पर फ़िल्म
भारत मे 300 करोड़ के आसपास जा सकती है
इदरीस खत्री

12/08/2024

अनिल कपूर को जब पता चला कि सुभाष घई खलनायक फिल्म बनाने की प्लानिंग कर रहे हैं तो वो सुभाष घई से मिलने उनके घर आए और उन्होंने खलनायक में काम करने की ख्वाहिश जताई। अनिल किसी से खलनायक की स्क्रिप्ट सुन चुके थे। और उन्हें कहानी बहुत अच्छी लगी थी। अनिल ने सुभाष घई से कहा कि अगर उन्हें इस रोल के लिए गंजा होना पड़ा तो वो कोई गुरेज़ नहीं करेंगे। लेकिन सुभाष घई ने उनसे कहा कि ये फिल्म उनके लिए नहीं है। क्योंकि ये कैरेक्टर अनिल की पर्सनैलिटी पर शूट नहीं करेगा। इस तरह अनिल के हाथ से खलनयाक फिल्म निकल गई।

वैसे, अनिल से भी पहले, जब खलनायक की स्क्रिप्ट का पहला ड्राफ्ट रेडी हुआ था तब सुभाष घई ने नाना पाटेकर को इस फिल्म में काम करने का ऑफर दिया था। नाना पाटेकर को भी कहानी पसंद आई थी और वो इस फिल्म में काम करने को तैयार थे। लेकिन सुभाष घई के कुछ मित्रों ने उन्हें सलाह दी कि चूंकि खलनायक अब एक कॉमर्शियल स्क्रिप्ट हो चुकी है तो नाना पाटेकर को इस फिल्म में लेना सही नहीं रहेगा। किसी ऐसे एक्टर को लेना चाहिए जिसकी कमर्शियल वैल्यू ज़्यादा हो। तब सुभाष घई को संजय दत्त का ख्याल आया था। संजय के साथ वो काफी पहले विधाता फिल्म में काम कर चुके थे।

संजय की बड़ी-बड़ी आंखें। मासूम सा दिखने वाला चेहरा और एक्शन स्किल्स सुभाष घई को खलनायक के बलराम प्रसाद उर्फ बल्लू के किरदार के लिए एकदम सटीक लगे। सुभाष घई ने संजय दत्त को अपने घर मिलने के लिए बुलाया। उन्होंने संजय दत्त को पूरी कहानी सुनाई और संजय से कहा कि अगर तुम इस फिल्म में काम करना चाहते हो तो तुम्हें मेरी शर्त पर काम करना होगा। तुम्हें इस फिल्म के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। चूंकि संजय दत्त को भी खलनायक की कहानी, खासतौर पर बल्लू का किरदार बहुत पसंद आए थे तो उन्होंने हामी भर दी। और वाकई में संजू ने सुभाष घई को निराश नहीं किया।

आज खलनायक फिल्म को रिलीज़ हुए 31 साल हो गए हैं दोस्तों। 06 अगस्त 1993 के दिन खलनायक रिलीज़ हुई थी। तकरीबन ढाई करोड़ रुपए के बजट में बनी खलनायक ने साढ़े बारह करोड़ रुपए का नेट कलेक्शन किया था और सुपरहिट साबित हुई थी। उस साल कमाई के मामले में खलनायक दूसरे नंबर पर रही थी। जबकी उस साल पहले नंबर पर थी गोविंदा और चंकी पांडे की आंखें जिसने तकरीबन छह करोड़ रुपए के बजट में 14 करोड़ रुपए का नेट कलेक्शन किया था। तीसरे नंबर पर थी शाहरुख खान की डर जिसने 3 करोड़ 25 लाख रुपए के बजट में 10 करोड़ 75 लाख रुपए नेट कलेक्शन किया था।

खलनायक का आईडिया सुभाष घई को तब आया था जब वो अमेरिका में थे। सुभाष वहां अपने एक दोस्त अशोक अमृतराज के यहां ठहरे थे। अशोक अमृतराज किसी ज़माने में भारत के नामी टेनिस प्लेयर हुआ करते थे। बाद में वो हॉलीवुड में फिल्म प्रोड्यूसर बन गए। अशोक अमृतराज ने सुभाष घई से कहा कि क्यों ना तुम एक फिल्म यहां बनाओ। तब सुभाष घई ने उन्हें खलनायक का आईडिया सुनाया जो कि कुछ ही दिन पहले, अमेरिका में रहने के दौरान ही उनके दिमाग में आया था। अशोक अमृतराज को वो आईडिया पसंद आया। उन्होंने फौरन उस कहानी को अमेरिका की राइटर्स असोसिएशन में रजिस्टर्ड करा लिया। और फिर दो बड़े एक्टर्स को काम करने का ऑफर भी भिजवा दिया।

खलनायक में संजय दत्त ने जो किरदार निभाया है वो पहले हॉलीवुड एक्टर एडी मर्फी को ऑफर किया था। जबकी जैकी श्रॉफ वाले रोल में तब ओमर शरीफ को लेने की प्लानिंग की गई थी। उस वक्त फिल्म का टाइटल था बी निगेटिव। एडी मर्फी और ओमर शरीफ, दोनों को ही कहानी पसंद आई थी। सुभाष घई ने हॉलीवुड के राइटर्स के साथ स्क्रीनप्ले पर काम भी शुरू कर दिया था। एडी मर्फी और ओमर शरीफ से सुभाष घई की बातचीत चल ही रही थी कि दो-तीन महीनों बाद सुभाष घई को अहसास हुआ कि वो हॉलीवुड कलाकारों के साथ काम नहीं कर सकेंगे। क्योंकि हॉलीवुड का काम करने का स्टाइल मुंबईया फिल्म इंडस्ट्री से एकदम अलग है। सुभाष उस हॉलीवुड फिल्म को ड्रॉप करके भारत वापस लौट आए।

भारत लौटकर सुभाष घई ने उस आईडिया पर फिर से काम शुरू कर दिया। उस समय सुभाष घई चाहते थे कि इसे एक छोटे बजट की आर्ट फिल्म के तौर पर पेश किया जाए। उन्होंने स्क्रीनप्ले लिखना शुरू किया। और जो किरदार निकलकर सामने आए वो उन किरदारों से एकदम अलग थे जो हमने और आपने खलनायक फिल्म में देखे हैं। उस वक्त सुभाष घई ने ये कहानी एक ढोलक वाले को सेंटर में रखकर लिखी थी जो पुणे की यरवदा जेल से बाहर आकर मुंबई जाता है। और फिर वहां तमाम घटनाक्रमों के बाद वो अपनी मां से मिलता है। इसी किरदार के लिए सुभाष घई नाना पाटेकर को लेना चाहते थे।

सुभाष घई जब हॉलीवुड स्टार्स एडी मर्फी और ओमर शरीफ के साथ ये फिल्म बनाना चाहते थे तब इसमें मां का कोई किरदार नहीं था। उस वक्त तो ईशा नामक एक जापानी लड़की का किरदार उन्होंने रखा था। लेकिन जब सुभाष ने हिंदी कहानी पर काम शुरू किया तो जापानी लड़की के किरदार को मां से बदल दिया। खलनायक के हॉलीवुड वर्ज़न में तो कोई हीरोइन भी नहीं थी। पर चूंकि किसी भी कमर्शियल हिंदी फिल्म में हीरोइन का होना ज़रूरी होता है तो जब सुभाष घई हिंदी स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे तब उन्होंने गंगा का किरदार इस कहानी में एड किया था।

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