12/04/2026
रंगों का खेलने के साथ साथ बच्चों के व्यवहार की मूक भाषा
जहाँ पढ़ रहे बच्चों के साथ रंगों के बच्चों पर पढ़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर एक लम्बी चर्चा हुई।
परिवर्तन NGO में छात्रों के बातचीत के दौरान संदीप मतानी (स्टूडेंट्, चाइल्ड गाइडेंस & काउंसलिंग ,GJU)
जानकारी सांझी करते हुए बताया कि रंगों से संबंधित विज्ञान जिसे क्रोमोसाइकोलॉजी कहा जाता है जिसमें बच्चों या व्यक्ति द्वारा किसी खास रंग चुनना या कुछ ज्यादा ही उत्साह या हीन भावना रखना उसके अवचेतन मन की स्थिति, तनाव के स्तर, विचारों की पहचान, मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक, संज्ञानात्मक, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर एवं व्यवहार की मूक भाषा होती है जो मनोदशा के साथ किसी दबी इच्छा या कोई विकार की तरफ इशारा होता है । जिसे समय पर समझ कर माता पिता , अभिभावक एक शिक्षकों के लिए बच्चों के होने भविष्य के नुकसान से बचाया जा सके एवम सकारात्मक रूप से नियंत्रण करके देश के भविष्य की नींव को बचाया जा सके । रंगों के विभिन्न कॉम्बिनेशन करके जहां कलर कंट्रास्ट कम करके बच्चों के पढ़ाई पर फोकस को दस से पंद्रह प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है।
मुकेश (थिएटर आर्टिस्ट व आर्ट एंड क्राफ्ट टीचर ) ने समझाया कि कैसे पेंटिंग के जरिए बच्चे मन की बात उकेर सकते है जो बच्चें शब्दों से बयान नहीं कर पाते। जिस से एक जागरूक समाज अभिभावक रंगों के इस मनोविज्ञान को समझ कर एक सुखद स्वस्थ एक उत्पादक वातावरण तैयार करके देश के अच्छे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।
संस्था उमीदवार को चुनना चाहिए। याचना ने प्रेजिडेंट बनते ही बच्चों से किये वादे पुरे किए तथा शिक्षा के प्रति जागरूक किया।