10/04/2022
Hahaha
01662-233136, 01662-228872 Drawing upon his life-long experience as a teacher and later as a Principal of D.A.V.
Dayanand College, Hisar owes its existence to the dream, vision and missionary zeal of a selfless and distinguished educationist Late Lala Gian Chand Mahajan, later christened as Swami Munishwaranand. A teacher by profession, a social crusader by inclination and a saint by temperament, Lala Gian Chand Mahajan shaped the destiny of this institution for the first nine formative years as its Principa
10/04/2022
Hahaha
07/04/2022
जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा!
जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा, एकदम जर्जर बूढ़ा, तब तू क्या थोड़ा मेरे पास रहेगा? मुझ पर थोड़ा धीरज तो रखेगा न? मान ले, तेरे महँगे काँच का बर्तन मेरे हाथ से अचानक गिर जाए या फिर मैं सब्ज़ी की कटोरी उलट दूँ टेबल पर, मैं तब बहुत अच्छे से नहीं देख सकूँगा न! मुझे तू चिल्लाकर डाँटना मत प्लीज़! बूढ़े लोग सब समय ख़ुद को उपेक्षित महसूस करते रहते हैं, तुझे नहीं पता?
एक दिन मुझे कान से सुनाई देना बंद हो जाएगा, एक बार में मुझे समझ में नहीं आएगा कि तू क्या कह रहा है, लेकिन इसलिए तू मुझे बहरा मत कहना! ज़रूरत पड़े तो कष्ट उठाकर एक बार फिर से वह बात कह देना या फिर लिख ही देना काग़ज़ पर। मुझे माफ़ कर देना, मैं तो कुदरत के नियम से बुढ़ा गया हूँ, मैं क्या करूँ बता?
और जब मेरे घुटने काँपने लगेंगे, दोनों पैर इस शरीर का वज़न उठाने से इनकार कर देंगे, तू थोड़ा-सा धीरज रखकर मुझे उठ खड़ा होने में मदद नहीं करेगा, बोल? जिस तरह तूने मेरे पैरों के पंजों पर खड़ा होकर पहली बार चलना सीखा था, उसी तरह?
कभी-कभी टूटे रेकॉर्ड प्लेयर की तरह मैं बकबक करता रहूँगा, तू थोड़ा कष्ट करके सुनना। मेरी खिल्ली मत उड़ाना प्लीज़। मेरी बकबक से बेचैन मत हो जाना। तुझे याद है, बचपन में तू एक गुब्बारे के लिए मेरे कान के पास कितनी देर तक भुनभुन करता रहता था, जब तक मैं तुझे वह ख़रीद न देता था, याद आ रहा है तुझे?
हो सके तो मेरे शरीर की गंध को भी माफ़ कर देना। मेरी देह में बुढ़ापे की गंध पैदा हो रही है। तब नहाने के लिए मुझसे ज़बर्दस्ती मत करना। मेरा शरीर उस समय बहुत कमज़ोर हो जाएगा, ज़रा-सा पानी लगते ही ठंड लग जाएगी। मुझे देखकर नाक मत सिकोड़ना प्लीज़! तुझे याद है, मैं तेरे पीछे दौड़ता रहता था क्योंकि तू नहाना नहीं चाहता था? तू विश्वास कर, बुड्ढों को ऐसा ही होता है। हो सकता है एक दिन तुझे यह समझ में आए, हो सकता है, एक दिन!
तेरे पास अगर समय रहे, हम लोग साथ में गप्पें लड़ाएँगे, ठीक है? भले ही कुछेक पल के लिए क्यों न हो। मैं तो दिन भर अकेला ही रहता हूँ, अकेले-अकेले मेरा समय नहीं कटता। मुझे पता है, तू अपने कामों में बहुत व्यस्त रहेगा, मेरी बुढ़ा गई बातें तुझे सुनने में अच्छी न भी लगें तो भी थोड़ा मेरे पास रहना। तुझे याद है, मैं कितनी ही बार तेरी छोटे गुड्डे की बातें सुना करता था, सुनता ही जाता था और तू बोलता ही रहता था, बोलता ही रहता था। मैं भी तुझे कितनी ही कहानियाँ सुनाया करता था, तुझे याद है?
एक दिन आएगा जब बिस्तर पर पड़ा रहूँगा, तब तू मेरी थोड़ी देखभाल करेगा? मुझे माफ़ कर देना यदि ग़लती से मैं बिस्तर गीला कर दूँ, अगर चादर गंदी कर दूँ, मेरे अंतिम समय में मुझे छोड़कर दूर मत रहना, प्लीज़!
जब समय हो जाएगा, मेरा हाथ तू अपनी मुट्ठी में भर लेना। मुझे थोड़ी हिम्मत देना ताकि मैं निर्भय होकर मृत्यु का आलिंगन कर सकूँ। चिंता मत करना, जब मुझे मेरे सृष्टा दिखाई दे जाएँगे, उनके कानों में फुसफुसाकर कहूँगा कि वे तेरा कल्याण करें। तुझे हर अमंगल से बचायें। कारण कि तू मुझसे प्यार करता था, मेरे बुढ़ापे के समय तूने मेरी देखभाल की थी।
मैं तुझसे बहुत-बहुत प्यार करता हूँ रे, तू ख़ूब अच्छे-से रहना। इसके अलावा और क्या कह सकता हूँ, क्या दे सकता हूँ भला। ■
_____________
(यह रचना बांग्लादेश निवासी मुहम्मद शुभ द्वारा मूलतः बांग्ला में लिखी गई है। जिसका हिंदी अनुवाद उत्पल बनर्जी ने किया है)
🌺🙏🌺
कहाँ गुम हो गए संयुक्त परिवार
एक वो दौर था जब पति,
अपनी भाभी को आवाज़ लगाकर
घर आने की खबर अपनी पत्नी को देता था ।
पत्नी की छनकती पायल और
खनकते कंगन
बड़े उतावलेपन के साथ
पति का स्वागत करते थे ।
बाऊजी की बातों का.. ”हाँ बाऊजी"
"जी बाऊजी"' के अलावा
दूसरा जवाब नही होता था ।
आज बेटा बाप से बड़ा हो गया,
रिश्तों का केवल नाम रह गया
ये "समय-समय" की नही,
"समझ-समझ" की बात है
बीवी से तो दूर, बड़ो के सामने
अपने बच्चों तक से बात नही करते थे
आज बड़े बैठे रहते हैं
हम सिर्फ बीवी से बात करते हैं!
दादाजी के कंधे तो मानो,
पोतों-पोतियों के लिए
आरक्षित होते थे, काका ही
भतीजों के दोस्त हुआ करते थे ।
आज वही दादू - दादी
वृद्धाश्रम की पहचान है,
चाचा - चाची बस
रिश्तेदारों की सूची का नाम है ।
बड़े पापा सभी का ख्याल रखते थे
, अपने बेटे के लिए जो खिलौना खरीदा
वैसा ही खिलौना परिवार के
सभी बच्चों के लिए लाते थे ।
'ताऊजी'
आज सिर्फ पहचान रह गए
और,......
छोटे के बच्चे
पता नही कब जवान हो गये..??
दादी जब बिलोना करती थी,
बेटों को भले ही छाछ दे
पर मक्खन तो
केवल पोतों में ही बाँटती थी।
दादी ने
पोतों की आस छोड़ दी
क्योंकि,...
पोतों ने अपनी राह
अलग मोड़ दी ।
राखी पर बुआ आती थी,
घर मे नही
मोहल्ले में,
फूफाजी को
चाय-नाश्ते पर बुलाते थे।
अब बुआजी,
बस दादा-दादी के
बीमार होने पर आते है,
किसी और को
उनसे मतलब नही
चुपचाप नयननीर बरसाकर
वो भी चले जाते हैं ।
शायद मेरे शब्दों का
कोई महत्व ना हो,
पर कोशिश करना,
इस भीड़ में
खुद को पहचानने की,
कि,.......
हम "ज़िंदा है"
या
बस "जी रहे" हैं"
अंग्रेजी ने अपना स्वांग रचा दिया,
"शिक्षा के चक्कर में
संस्कारों को ही भुला दिया"।
बालक की प्रथम पाठशाला परिवार
पहला शिक्षक उसकी माँ होती थी,
आज
परिवार ही नही रहे
पहली शिक्षक का क्या काम...??
"ये समय-समय की नही,
समझ-समझ की बात है!
कुछ साल बाद
हम दो ,हमारे दो के चक्कर में
परिवार खत्म हो जाएगा ।
मामा रहेगा, तो मौसी नही होगी
मौसी होगी तो मामा नही होगा
चाचा होगा तो बुआ नही होगी
बुआ होगी तो चाचा नही होगा ।
काका ,काकी ,बड़े पापा बड़े मम्मी
बुआ ,फूफा ,मामा मामी
मौसी मौसा ,ताऊ ताई जी
न जाने ऐसे कितने रिश्तों के
संबोधन के लिए तरसेंगे ।।
हम कितनें मासूम हैं..
#जो लॉक डाउन की खबर सुनते ही गुटके की कीमत ₹5 से ₹7 कर देते हैं..🙄
#जो डॉक्टरों द्वारा विटामिन सी अधिक लेने की कहने पर 50 रुपये प्रति किलो का नींबू 150 रुपये प्रति किलो बेचने लगते हैं..🙄
#जो 40-50 रुपए का बिकने वाला नारियल पानी ₹100 का बेचने लगते हैं..🙄
#जो मरीजों के लिए ऑक्सीजन की कमी सुनते हैं, तो ऑक्सीजन की कालाबाजारी शुरू कर देते हैं..🙄
#जो दम तोड़ते मरीजों की दुर्दशा देखते हैं तो रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी करनी शुरू कर देते हैं..🙄
#जो अपना ईमान बेच कर इंजेक्शन में पैरासिटामोल मिलाकर बेचने लगते हैं..🙄
#जो डेड बॉडी लाने के नाम पर पानीपत से फरीदाबाद तक के ₹36000 मांगने लगते हैं..🙄😢😢🙏
#जो मरीज को दिल्ली गाजियाबाद मेरठ नोएडा स्थित किसी हॉस्पिटल में पहुंचाने की बात करते हैं तो एंबुलेंस का किराया 10 से 15 हजार किराया मांगने लगते हैं..🙄
क्या वास्तव में हम बहुत मासूम हैं.. या लाशों का मांस नोचने वाले गिद्ध...
गिद्ध तो मरने के बाद अपना पेट भरने के लिए लाशों को नोचता है पर हम तो अपनी तिजोरियां भरने के लिए जिंदा इंसानों को ही नोच रहे हैं, कहाँ लेकर जाएंगे ऐसी दौलत या फिर किसके लिए ?..😢
कभी सोचा है आपने?? एक बार सोचना जरूर..🤔
एक दिन हिसाब सबको देना पड़ेगा, जनता की अदालत में नहीं तो ईश्वर की अदालत में...😢🙏🙏🙏
हिंदुस्तान को आज कोरोना नहीं मार रहा
इंसान इंसान को मार रहा है
26/04/2021
from the wall of shyam .
देश के गाँवों में बहुत बड़ी आपदा आने वाली है, मैं अपने गाँव में आया हुआ हूँ हर आदमी के बदन दर्द और बुख़ार जैसा है लेकिन लोग इसे साधारण फ़्लू की तरह देख रहे हैं और कह रहे हैं कि ये तो सब को हो रहा है। कोरोना अभी गाँव आना शुरू हुआ है, जब इसका असर देखने को मिलेगा तब लाशें गिनना मुश्किल होगा.
लेकिन सरकार गाँव के हेल्थ सिस्टम से एकदम ग़ायब है. यहाँ न महामारी को लेकर कोई प्रचार है, न टेस्टिंग है न ट्रेसिंग है. ऊपर से पंचायत चुनाव शुरू हो चुके हैं. मेरे घर के सामने से हर मिनट कोई न कोई निकल रहा है जिसके समर्थक नारे लगा रहे हैं “फलाने भैया जीतेगा”.
बात केवल मेरे गाँव की नहीं है, बल्कि मेरे दोस्तों ने बताया कि उनके भी गाँव में भी कोरोना को लेकर लापरवाही बरती जा रही है और सरकार इन जगहों पर एकदम अनुपस्थित है. अभी तक हमने शहरों को मरते देखा, शहरों में टूटा फूटा ही सही लेकिन स्वास्थ्य सिस्टम तो है, लेकिन गाँव में क्या होगा?
गाँव के लिए ये वो समय है जिस समय के खो जाने पर शहर वाले पीछे से लाठी पीट रहे हैं. जो हम आज बात कर रहे हैं कि तैयारी वाले समय में शहरों में तैयारियाँ नहीं कीं गईं, गाँव के मामले में ये वही वाला समय है, यानी रोकने का समय, युद्ध स्तर पर तैयारी का समय. लेकिन सरकार इस ओर आँख मूँदे हुए है. अगले कुछ महीने बाद देखने को मिलेगा जो हालत आज दिल्ली, लखनऊ, रायपुर, कानपुर, पुणे, जयपुर, मुंबई है कि वो हर गाँव की होगी, पर इस देश में चिल्लाते रहो, चिल्लाते रहो, सुनता कौन है इस देश में.
*दवाइयां इंजेक्शन और ऑक्सीजन ब्लैक* करने वाले सुन लो ।
कच्छ भूकंप के दौरान की एक घटना हैं।
पुलिस राहत कार्य कर रही थी। एक बूढ़ा आदमी एक सुंदर घर के मलबे के बाहर बैठा था। मकान ढह गया। पुलिस आई, उस के पुत्रवधू का शव मलबे से निकला ..शरीर पर हर जगह गहने थे .. पुलिस ने कहा "ये गहने रख लो, आप को काम आयेंगें !
फटी आँखों वाले उस आदमी ने कहा .. ले लो .. सब कुछ ... जो करना है करो .. लेकिन, मुझे यह गहने नहीं चाहिए उस बुड्ढे ने कहा, जब मोरबी का डैम टूटा था, तब मैंने ये सारे गहने मृत्य लोगो के गले से लूट के अपने घर ला कर अपने पुत्र वधु को पहनाए थे।
*आज मेरी बहू ने वो ही गहने पहने हुये है जो में लूट के लाया था, "मुझे कुछ नहीं चाहिए, सर!" वह रोया। आप लै लिजिये......कच्छ की इस कहानी को ध्यान में रखें, और कोरोना के इस संकट के समय में मनुष्य की मजबूरी का लाभ ना उठाएं
A request to all +45 , pl get vaccination in next 10 days without giving any second thought.
Once it gets open for +18 then it will be very much difficult to get appointments and waiting time can be for few hours instead of few minutes which is now a days.
Just act take ur dose now and protect urself and families!!!
30/03/2021
Mera bharat mahaan..
🔥🔥👇
निजीकरण 👇👇
मात्र 20 वर्ष पहले बोलिविया देश ने निजीकरण की रफ्तार पकड़ी थी, सब कुछ निजी क्षेत्र को दिया जाने लगा. आखिरकार वहाँ की सरकार ने पानी का भी निजीकरण कर दिया, 1999 में एक मल्टीनेशनल कंपनी को पानी के सर्वाधिकार बेच दिए गए, पानी के रेट इतने बढ़ गए कि हाहाकार मच गया, औसतन प्रति मास आधा वेतन पानी के लिए ही खर्च होने लगा, लोग नहरों से पीने का पानी भर कर लाने लगे तो नहरों नदियों पर फ़ौज व पुलिस की तैनाती करवा दी गई.
दुखी जनता बारिश का इंतजार कर रही थी तो नया आदेश आ गया कि कोई भी आदमी बारिश का पानी इकठ्ठा न करे ये इस कम्पनी का है। पानी इकठ्ठा करने पर चोरी का केस दर्ज होगा.
खैर लोगो के आंखों की पट्टी खुली तो जमकर विरोध हुआ। अनेको लोगो को गोलियों से भून दिया गया।
For details
कर सकते हैं Bolivia waterwar.
22/11/2020
रूपा के ससुर जी की अकस्मात् मृत्यु के बाद रूपा की सास को रूपा अपने साथ ले आयी थी। वैसे भी अकेले उम्र के इस पड़ाव में उनका गाँव में रहना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं था।
रूपा और उसके पति विनय दोनों ही अच्छी जॉब में थे। उन दोनों की एक दस साल की बेटी थी सलोनी। दिल्ली में अपना फ्लैट था। साल में एक दो बार गाँव भी आते जाते रहते थे। रूपा और विनय के कई बार कहने पर भी रूपा के सास-ससुर दिल्ली उनके पास रहने नहीं आये जबकि विनय इकलौता बेटा था उनका। उन्हें अपनी गाँव की आबो-हवा और खुले वातावरण के आगे महानगर के फ्लैट में बंद होना नहीं पसंद था।
दो दिन भी बीमारी में ही रूपा के ससुर जी चल बसे कोई कुछ समझ या कर ही नहीं पाया। सारा कर्म कांड होने के बाद घर पे ताला लगा विनय अपनी माँ (राधा ) को ले कर दिल्ली आ गया।
बेटे के घर अपनी पोती के साथ राधा जी का मन बहल जाता, समय निकल रहा था। एक दिन सब की छुट्टी थी तो विनय ने बाहर खाना खाने का प्लान बना दिया। सब तैयार हो निकले रेस्टोरेंट के लिये। रेस्टोरेंट के बाहर बहुत से आइसक्रीम और गुब्बारे वाले भी खड़े थे। जब तक रूपा और विनय कार पार्क कर के आते, सलोनी गुब्बारे के लिये मचलने लगी।
“दादी एक गुब्बारा दिला दो प्लीज। मम्मा नहीं दिलाती मुझे गुब्बारे, आप दिलाओगी तो वो गुस्सा भी नहीं होंगी प्लीज दादी मान जाओ।”
राधा जी परेशान हो गईं। पैसे तो थे ही नहीं उनके पास जो वो अपनी पोती की इस छोटी सी ख्वाईश पूरी कर पातीं।
जब तक पति थे उनसे पैसे ले लेती थीं खर्चों के लिये। लेकिन यहाँ दिल्ली आने के बाद सारे खर्च रूपा या विनोद करते थे। पति साधारण किसान थे तो कोई पेंशन भी नहीं थी। राधा जी आँखों में आंसू झलक उठे। आज पति के जाने के बाद पहली बार खुद को इतना लाचार महसूस कर रही थीं।
बेटा बहु से कुछ मांगने में उन्हें शर्म आती और जरुरत की सारी चीज़ें वे लाते ही थे। किसी बात को कोई कमी ना होने देते दोनों, लेकिन हाथ खाली थे उनके। इतने पैसे भी नहीं थे कि अपनी ख़ुशी से अपनी पोती को कुछ दिला सकती थीं। बहुत शर्म भी आ रही थी कि बच्ची ने एक गुब्बारा माँगा वो भी ना दे पायी। क्या सोचेगी कैसी दादी है मेरी?
तब तक रूपा और विनय भी आ गए। सलोनी अपने पापा को देख उनसे गुब्बारे दिलाने की ज़िद करने लगी। सलोनी को गुब्बारे दिला सबने खाना खाया। रूपा को राधा जी थोड़ी उदास सी लग रहीं थीं।
‘माँ उदास सी क्यों लग रही है? शायद बाबूजी की याद आ गई होगी।’ ये सोच रूपा ने उस वक़्त कुछ पूछना उचित ना समझ चुप रह गई।
घर लौटते लेट हो गया, “चलो सलोनी जल्दी से कपड़े बदल सोने चलो। आज तुम्हारा बैग मैं सेट कर देती हूँ नहीं तो कल नींद नहीं खुलेगी”, इतना कह रूपा ने सलोनी को उसके रूम में भेज दिया और खुद जल्दी से कपड़े बदल सलोनी का बैग सेट करने लगी।
“मम्मा एक बात पूछूं?”
“हाँ पूछो बेटा, लेकिन जल्दी से पूछ कर सोने चलो।”
“दादी बहुत कंजूस हैं। एक गुब्बारा नहीं दिलाया मुझे। उल्टा गुब्बारा नहीं दिलाना पड़े, इसलिए रोनी सूरत बना ली। मेरी तो नानी कूल हैं, जो बोलो वो झट से दिला देती हैं और कितने गिफ्ट्स भी देती हैं। दादी तो कुछ भी नहीं देती।”
दस साल की बच्ची के मुँह से ये सुन रूपा को बहुत गुस्सा आया, “बिहेव योर सेल्फ सलोनी। वो दादी हैं तुम्हारी और जरुरी नहीं जो नानी करें वही दादी भी करें तुम्हें।”
“तुम्हें नानी का गिफ्ट याद है, लेकिन दादी का प्यार नहीं दिखता? दो लोगों की तुलना कभी नहीं करते, चलो सो जाओ अब और आइंदा ये मैं नहीं सुनना चाहती।”
अपनी मम्मा को गुस्सा करते देख सलोनी ने झट से सॉरी बोला और सोने चली गई। रूपा की नींद उड़ चुकी थी सारा माजरा अब वो समझ चुकी थी और अपने बेवकूफी पर बहुत शर्मिंदा भी थी।
अगले दिन विनय और सलोनी को स्कूल और ऑफिस भेज रूपा भी ऑफिस के लिये रेडी हो गई और जाते वक़्त राधा जी के हाथों में कुछ पैसे दे बोली, “ये रख लीजिये माँ। कहीं कुछ जरुरत पड़े तब काम आयेंगे।”
“लेकिन मुझे क्या जरुरत होगी बहु? सब कुछ तो है घर में”, राधा जी सकुंचा के बोलीं।
“फिर भी माँ। कुछ नहीं तो सलोनी को आइसक्रीम खिला दीजियेगा या फिर शाम को अपने पार्क की सहेलियों के साथ चाय पार्टी कर लीजिएगा।”
“लेकिन बहु मैं… ”
“क्यों माँ विनय देते तो भी आप माना करतीं क्या? नहीं ना? फिर मैं भी तो आपकी बेटी हूँ और आपकी बहु भी कमाती है माँ। अपनी माँ को एक बेटी अपने पैसे तो दे ही सकती है। अब मना मत कीजियेगा माँ, नहीं तो मुझे बहुत दुःख होगा।”
कांपते हाथों से राधा जी ने पैसे ले लिये और अपनी बहु को गले लगा ढेरों आशीर्वाद दे दिये उनके दिल की बात जो उनका बेटा ना समझ सका आज उसे बहु ने जान लिया था।
प्रिय पाठक, हाथखर्च की जरुरत तो इंसान को हर उम्र में होती है। अपने पोते पोती को एक चॉकलेट भी जब दादी नानी खुद से दिलाती है तो एक अलग ही आनंद का अनुभव होता है। पति के जाने के बाद अगर पेंशन भी ना हो तो एक औरत ले लिये बहुत कठिन हो जाता है, जैसे राधा जी के लिये हो गया लेकिन उनकी बहु ने उनकी दिल की बात भांप लिया और बात संभाल ली। लेकिन राधा जी जैसी सब की किस्मत नहीं होती।
आशा है कहानी पसंद आयी होगी अपना प्यार लाइक, कमेंट करके दे किसी भी त्रुटि के लिये माफ़ी चाहूंगी।