सरकारी स्कूलों के अध्यापक आराम से घर बैठे हैं फिर भी उन्हें पूरा वेतन मिल जाएगा। प्राईवेट स्कूलों के शिक्षक दिन रात मेहनत कर रहे हैं कि कहीं बच्चों की पढ़ाई खराब ना हो फिर भी उन्हें शायद ही वेतन मिले क्योंकि अभिभावकों को प्राइवेट स्कूल लुटेरे लगते हैं और वह फीस देने से बच रहे हैं। सरकार का एक फैसला आया की निजी विद्यालय अप्रैल महीने की फीस ले सकते हैं लेकिन उसके साथ साथ इतनी बातें जोड़ दी कि उनको वर्णित करते-करते लोगों ने यह धारणा बना ली की अप्रैल माह की फीस निजी विद्यालय ले नहीं सकते जबकि ऐसा नहीं है। सरकार इस पर कोई भी स्पष्टीकरण नहीं दे रही है। सरकार को चाहिए या तो अभिभावकों को कहे की अप्रैल माह की फीस जमा करवाएं या निजी विद्यालय के अध्यापकों को भी सरकारी विद्यालय के अध्यापकों के समान वेतन सरकार की तरफ से दिया जाना चाहिए इसके बाद चाहे सरकार तीन की बजाय 6 महीने की फीस माफ कर दे।
यहां यह बात ध्यान देने योग्य है की सरकार ने बैंकों की किस्त माफ नहीं की है सिर्फ यह कहा है कि यह किस्त आगे जमा करवा दीजिएगा जबकि उस किस्त पर अतिरिक्त ब्याज लगेगा जिसका भोज लोन लेने वालों के ऊपर ही आएगा। सरकार ने इस आपदा के समय भी जो बिल्कुल जरूरी सामान है उसको भी कर मुक्त नहीं रखा उसके ऊपर भी समान रूप से कर लगता रहा हूं। इसके बावजूद सरकार लोगों से मदद की गुहार लगाती है और एक अच्छी खासी रकम प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा हो जाती है। जिन अभिभावकों के बच्चे प्राइवेट विद्यालयों में पढ़ते हैं वह भी इस कोष में बढ़-चढ़कर राशि जमा करवाते हैं और उसकी रसीद फेसबुक व्हाट्सएप आदि पर शेयर करते हैं। यह तो वह बड़े दानवीर बन जाते हैं लेकिन जो शिक्षक उनके बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं और भविष्य के लिए तैयार कर रहे हैं उनके लिए इन अभिभावकों के पास फीस देने के लिए भी पैसे नहीं है।
जो लोग यह कहते हैं की प्राइवेट सेक्टर, प्राइवेट विद्यालय लुटेरे हैं वह इस बात पर ध्यान दें कि जब भी उन्हें अच्छी सड़कें चाहिए तो वहां पर उन्हें टोल टैक्स देना पड़ता है जबकि वे लोग रोड टैक्स पहले ही दे चुके होते हैं। जब भी उन्हें अच्छा राशन लेना होता है तो वह राशन डिपो पर नहीं मिलता बल्कि उसके लिए उन्हें बढ़िया राशन की दुकान पर जाना पड़ता है और वही से वह अपनी जरूरत का सामान खरीदते हैं। राशन डिपो पर तो वह सिर्फ कंकड़ पत्थर की बात करते रह जाते हैं। शिक्षा के नाम पर जब सरकारी स्कूल है और अभिभावकों को चाहिए कि वह बिना फीस के अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं निजी विद्यालय में आना ही नहीं चाहिए क्योंकि सरकार ने ऐसे बच्चों के लिए सरकारी विद्यालय बना रखे हैं।
इस कथन से मेरा अभिप्राय किसी भी व्यक्ति के भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है लेकिन मैं यह बात आप सभी के संज्ञान में जरूर लाना चाहता हूं की जो हालत सरकारी स्कूल की है और जितना फंड उनके पास सालाना आता है इतने में एक अच्छा खासा प्राइवेट स्कूल बढ़िया तरीके से चलाया जा सकता है। सरकारी अध्यापक जो कि सरकार द्वारा ही चुन्नत होते हैं वह बच्चों को पढ़ाने में असमर्थ दिखाई देते हैं। स्वयं उनके बच्चे प्राइवेट विद्यालय में पढ़ते हुए दिखाई देते हैं तो इतने अच्छे अध्यापकों के बाद भी प्राइवेट विद्यालयों की जरूरत कहां है। हकीकत यह है कि यदि प्राइवेट सेक्टर और प्राइवेट विद्यालयों को तस्वीर से हटा लिया जाए तो शायद ही आधुनिक भारत की तस्वीर सामने आ सके।
आधुनिक भारत के निर्माण में प्राइवेट सेक्टर का बहुत बड़ा हाथ है। इसकी अनदेखी ना करें और सरकार मेरी बात का संज्ञान ले। ऐसा ना हो की प्राइवेट अध्यापक लोग डाउन की मर्यादा को तोड़ते हुए सड़कों पर आ निकले क्योंकि जब उनके घर में खाने के लिए कुछ ना होगा तो उनके पास और कोई रास्ता भी ना होगा।
Private Teachers Association Haryana
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18/04/2020
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