Pt. Baijnath Sharma Prachya Vidya Shodh Sansthan

Pt. Baijnath Sharma Prachya Vidya Shodh Sansthan We are an Institute working towards scientific research on ancient Texts of Hindu literature.

The secret of scientific knowledge hidden in the glories of India’s past attracts the speculative minds not only in India but also from abroad. There cannot be two opinions about the scientific validity of the philosophical observation that the past modifies the present not by asserting its pastness but by renewing its presence in the nature and quality of the ever-growing present. But it is dishe

artening indeed, at least for a man exposed to and trained in the rational and scientific ways of research and fact-finding, that a native’s approach to the glories of the ancient past of his nation is most often emotional, and not rational and scientific. We, in India, have a tendency to look at our distant ancient glories through a quasi-scientific and a semitransparent appreciation. That allures intellectuals and even scientists to the ancient Indian books for the principles and theories of science that are either in the melting point or yet to come. The history of the development of scientific thought and research in India provide an ample evidence of serious and half serious attempts that have been made to study the ancient Indian books written in Sanskrit. These serious and half-serious studies have resulted into either an emotional appreciation of what probably was the level and extent of scientific discoveries and research in ancient India or an out and out rejection of the claim of such discoveries and research so made. In fact, both an utterly emotional appreciation on an utterly irrational rejection of the level and extent of scientific discoveries and research in ancient India are incomplete and prejudiced. What is needed in this direction is a serious effort guided by ruthless reason.

अत्युन्नतपदं प्राप्तः पूज्यान्नैवावमानयेत् ।नहुषश्शक्रतां प्राप्तश्च्युतोऽगस्त्यावमाननात् ॥अत्युन्नतपदं प्राप्तः नरः पूज...
30/04/2026

अत्युन्नतपदं प्राप्तः पूज्यान्नैवावमानयेत् ।
नहुषश्शक्रतां प्राप्तश्च्युतोऽगस्त्यावमाननात् ॥

अत्युन्नतपदं प्राप्तः नरः पूज्यान् न एव अवमानयेत्। शक्रतां देवराजपदं प्राप्तः नहुषः अगस्त्यावमाननात् च्युतः पतितो जातः।

अत्यंत ऊँचे पद को प्राप्त मनुष्य को पूज्य जनों को अपमानित नहीं करना चाहिए। इन्द्रता (देवों के राजपद) को प्राप्त हुआ नहुष, अगस्त्य मुनि के अपमान के कारण पतित हो गया।

Having attained a very high position, one should not insult honourable people. Nahusha, having attained the Indra-ness (position of the king of deities), fell because of insulting sage Agastya.

📍 क्षेमेन्द्रचारुचर्या

🌿 अथ कालाग्निरुद्रस्य तृतीयनयनोत्थिता।ज्वाला दहति तत्सर्वं निर्वाणं ब्रह्मणो यतः॥🌞 अथ कालाग्निरुद्रस्य *प्रलयाग्न्यधिष्ठ...
19/04/2026

🌿 अथ कालाग्निरुद्रस्य तृतीयनयनोत्थिता।
ज्वाला दहति तत्सर्वं निर्वाणं ब्रह्मणो यतः॥

🌞 अथ कालाग्निरुद्रस्य *प्रलयाग्न्यधिष्ठातृरुद्रस्य* तृतीयनयनोत्थिता ज्वाला तत् सर्वं दहति यतः ब्रह्मणः निर्वाणं निवृत्तिः भवति।

🌷 अब प्रलय की अग्नि के (अधिष्ठाता) रुद्र की तीसरी आँख से उठी ज्वाला तब सब कुछ जला देती है, जिससे ब्रह्मा का भी निर्वाण हो जाता है।

🌹 Then the flame rising from the third eye of *Rudra* as the (deity of) fire of annihilation, burns everything, whereby occurs the liberation of Brahma.

📍 शार्ङ्गधरपद्धतिः । ४२६५॥

02/04/2026
अत्यम्बुपानाद्विषमाशनाच्च दिवाशयाज्जागरणाच्च रात्रौ।संरोधनान्मूत्रपुरीषयोश्च षड्भिः प्रकारैः प्रभवन्ति रोगाः॥🌞 अत्यम्बुप...
29/03/2026

अत्यम्बुपानाद्विषमाशनाच्च दिवाशयाज्जागरणाच्च रात्रौ।
संरोधनान्मूत्रपुरीषयोश्च षड्भिः प्रकारैः प्रभवन्ति रोगाः॥

🌞 अत्यम्बुपानात् (अतिजलपानात्) विषमाशनात् (विषमभोजनात्) च दिवाशयात् (दिवास्वप्नात्) रात्रौ जागरणात् च मूत्रपुरीषयोः संरोधनात् च षड्भिः प्रकारैः रोगाः प्रभवन्ति।

🌷 अत्यधिक पानी पीने से और असमान भोजन करने से, दिन में सोने से और रात में जागने से, तथा मूत्र और मल को रोकने से, इन छः प्रकारों से रोग उत्पन्न होते हैं।

🌹 Sickness arises in six ways; through too much water-drinking and through eating irregularly, through sleeping by day and through staying awake by night, and through retention of urine and excrement.

📍 विक्रमचरितं दाक्षिणात्यम् । २३।७॥

नववर्ष विक्रम संवत २०८३ की आप सभी को शुभकामनाएं !
19/03/2026

नववर्ष विक्रम संवत २०८३ की आप सभी को शुभकामनाएं !

होलिका निर्णय संवत 2082 (सन 2026)--------------------------------------दृकपञ्चाङ्ग का मत :पूर्णिमा प्रारंभ : 2-Mar-26 5:...
26/02/2026

होलिका निर्णय संवत 2082 (सन 2026)
--------------------------------------

दृकपञ्चाङ्ग का मत :
पूर्णिमा प्रारंभ : 2-Mar-26 5:55 PM; पूर्णिमा समाप्ति : 3-Mar-26 5:07 PM
भद्रा प्रारंभ : 2-Mar-26 5:55 PM; भद्रा समाप्ति : 3-Mar-26 5:28 AM
भद्रा पुच्छ : 3-Mar-26 1:25 AM से 3-Mar-26 2:35 AM
भद्रा मुख : 3-Mar-26 2:35 AM से 3-Mar-26 4:30 AM
सूर्योदय : 2-Mar-26 6:44 AM; 3-Mar-26 6:43 AM
सूर्यास्त : 2-Mar-26 6:20 PM; 3-Mar-26 6:21 PM
होलिका दहन : 3-Mar-26 6:21 PM से 3-Mar-26 8:49 PM (दूसरे दिन प्रतिपदा प्रदोष में)

परदिने प्रदोषस्पर्शाभावे पूर्वदिने प्रदोषे भद्रासत्त्वे यदि पूर्णिमा परदिने सार्द्धत्रियामा ततोऽधिका वा तत्परदिने च प्रतिपद्वृद्धिगामिनी तदा परदिने प्रतिपदि प्रदोषव्यापिन्यां होलिका ।
पहले दिन प्रदोष के समय भद्रा होने और दूसरे दिन पूर्णिमा प्रदोष समय को स्पर्श न करने पर - यदि दूसरे दिन पूर्णिमा 3.5 प्रहार (10 घण्टा 30 मिनट) या उससे अधिक हो तो दूसरे दिन प्रतिपदा में प्रदोष में होलिका दहन हो ।

3-Mar-26 को पूर्णिमा सार्द्धत्रियामा ततोऽधिका नहीं है । सूर्योदय (6:43 AM) से 3.5 प्रहार (10 घण्टा 30 मिनट) 5:13 PM तक होते हैं परन्तु पूर्णिमा 5:07 PM को ही समाप्त हो जा रही है । इसके अतिरिक्त दूसरी शर्त तत्परदिने च प्रतिपद्वृद्धिगामिनी भी पूरी नहीं हो रही है क्योंकि 4-Mar-26 को प्रतिपदा 4:48 PM तक ही है (अर्थात सूर्योदय 6:42 AM से 10 घण्टा 6 मिनट तक), वृद्धि नहीं हो रही, ह्रास हो रहा है । अतः धर्मसिन्धु के उपरोक्त वाक्य को नहीं लिया जा सकता और दृकपञ्चाङ्ग के अनुसार होलिका दहन 3-Mar-26 को प्रदोष में नहीं होना चाहिए ।

निर्णयसागर पञ्चाङ्ग का मत :
पूर्णिमा प्रारंभ : 2-Mar-26 5:56 PM; पूर्णिमा समाप्ति : 3-Mar-26 5:08 PM
भद्रा प्रारंभ : 2-Mar-26 5:56 PM; भद्रा समाप्ति : --
भद्रा पुच्छ : -- से --
भद्रा मुख : -- से --
सूर्योदय : 2-Mar-26 7:04 AM; 3-Mar-26 7:03 AM
सूर्यास्त : 2-Mar-26 6:36 PM; 3-Mar-26 6:35 PM
होलिका दहन : 2-Mar-26 6:36 PM से 3-Mar-26 9:00 PM (पहले दिन भद्रा रहते प्रदोष में)

इदं चद्रग्रहणसत्त्वे वेधमध्येऽपि कार्यम् । ग्रस्तोदये परदिने प्रदोषे पूर्णिमा सत्त्वे ग्रहणमध्य एव कार्यम् । अन्यथा पूर्वदिने ।
यह चंद्रग्रहण रहते वेध में भी करना । ग्रस्तोदय में दूसरे दिन प्रदोष में पूर्णिमा के रहने पर ग्रहण के मध्य में ही करे, और जो प्रदोष के समय पूर्णिमा न हो तो पहिले दिन करे ।

यह वाक्य संदिग्ध है, यहाँ सन्दर्भ भोजन करने या होलिकापूजन का है यह स्पष्ट नहीं है ।
उपरोक्त के अनुसार 3-Mar-26 को ग्रस्तोदय चंद्रग्रहण होने से और उस दिन प्रदोष से पहले ही पूर्णिमा समाप्त हो जाने से 2-Mar-26 को प्रदोष में होलिका दीपन होना चाहिए ।

जयादित्य पञ्चाङ्ग का मत :
पूर्णिमा प्रारंभ : 2-Mar-26 5:45 PM; पूर्णिमा समाप्ति : 3-Mar-26 4:59 PM
भद्रा प्रारंभ : 2-Mar-26 5:45 PM; भद्रा समाप्ति : 3-Mar-26 5:25 AM
भद्रा पुच्छ : 3-Mar-26 1:16 AM से 3-Mar-26 2:25 AM
भद्रा मुख : -- से --
सूर्योदय : 2-Mar-26 6:56 AM; 3-Mar-26 6:55 AM
सूर्यास्त : 2-Mar-26 6:24 PM; 3-Mar-26 6:25 PM
होलिका दहन : 3-Mar-26 1:16 AM से 3-Mar-26 2:25 AM (भद्रा पुच्छ) या 3-Mar-26 5:19 AM से 3-Mar-26 6:55 AM (भद्रा समाप्ति और सूर्योदय के बीच में)

यदि प्रतिपदो ह्वासस्तदा पूर्वदिने भद्रापुच्छे वा भद्रामुखमात्रत्यक्त्वा भद्रायामेव वा होलिकादीपनम्‌ ।
और जो पूर्व कहे विषय में प्रतिपदा घट गयी हो तो पहले दिन भद्रा पुच्छ में या भद्रा के मुखमात्र को छोड़कर भद्रा में ही होलिकादाह करे ।

जैसा हमने ऊपर देखा प्रतिपदा 4-Mar-26 को ह्रास हो रही है, अतः उपरोक्त वाक्य के अनुसार भद्रा के पुच्छ में होलिका जलानी है, या मात्र भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा में कभी भी होलिका दाह करना है । इसके अनुसार होलिका दहन 3-Mar-26 1:16 AM से 3-Mar-26 2:25 AM (भद्रा पुच्छ) में करना ठीक है ।
इसी के अनुसार नारद का भी वाक्य है - प्रदोषव्यापिनी चेत्स्याद्यदा पूर्वदिने तदा । भद्रामुखं वर्जयित्वा होलिकाया प्रदीपनम् ।
इसी को पुष्ट करता एक और वाक्य है - परदिने प्रदोषस्पर्शाभावे पूर्वदिने यदि निशीथात्प्राक्‌ भद्रासमाप्तिस्तदा भद्रावसानोत्तरमंव होलिकादीपनम्‌ । निशीथोत्तरं भद्रासमाप्तो भद्रामुखं त्यक्त्वा भद्रायामेव ।
और जो दूसरे दिन प्रदोषव्यापिनी पूर्णिमा न हो और पहिले दिन अर्द्धरात्रि से पूर्व ही भद्रा समाप्त होजाय तब तो भद्राके अन्त में ही होलीका का दाह करना । और जो अर्द्धरात्रि से पीछे भद्राकी समाप्ति हो तो
भद्रा के मुख को त्यागकर भद्रामें ही होलीका दीपन करना । यह वाक्य भी भद्रा पुच्छ में (3-Mar-26 1:16 AM से 3-Mar-26 2:25 AM) होलिका दीपन बताता है ।

निर्णयसिंधु में भी - अत्र चेच्चन्द्रग्रहण तदा ततोर्वागनिशि भद्रावर्जं पौर्णमास्यां होलिकादीपनम् । अथ परेह्निग्रस्तोदयस्तदा पूर्वदिने भद्रावर्जं रात्रौ चतुर्थभागे विष्टिपुच्छे वा होलिकाकार्या ।
अर्थात् दूसरे दिन ग्रस्तोदित चन्द्रग्रहण में, पहले दिन भद्रा छोड़कर या भद्रापुच्छ में होलिका दाह करना ।

दूसरा एक और वाक्य इसी सम्बन्ध में मिलता है - यदा तु प्रदोषे पूर्वदिने भद्रा भवति परदिने चास्तात्पूर्वमेव पञ्चदशी समाप्यते तदा सूर्योदयात्पूर्वं भद्रान्तं प्रतीक्ष्य होलिका दीपनीया ।
अर्थात यदि पहले दिन प्रदोष में भद्रा हो और दूसरे दिन सूर्यास्त से पहले ही पूर्णिमा समाप्त हो जाए तो अगले दिन सूर्योदय से पहले भद्रा की समाप्ति कि प्रतीक्षा करके होलिका जलानी चाहिए ।

-----------------------------------------------------------
इस सब विश्लेषण के आधार पर पं. बैजनाथ शर्मा पञ्चाङ्ग अनुसार -
पूर्णिमा प्रारंभ : 2-Mar-26 5:56 PM; पूर्णिमा समाप्ति : 3-Mar-26 5:07 PM
भद्रा प्रारंभ : 2-Mar-26 5:56 PM; भद्रा समाप्ति : 3-Mar-26 5:28 AM
भद्रा पुच्छ : 3-Mar-26 1:25 AM से 3-Mar-26 2:35 AM
भद्रा मुख : 3-Mar-26 2:35 AM से 3-Mar-26 4:30 AM
सूर्योदय : 2-Mar-26 6:41 AM; 3-Mar-26 6:40 AM
सूर्यास्त : 2-Mar-26 6:18 PM; 3-Mar-26 6:19 PM
भद्रा पुच्छ में (3-Mar-26 1:25 AM से 3-Mar-26 2:35 AM) या भद्रा समाप्ति और सूर्योदय के बीच में (3-Mar-26 5:28 AM से 3-Mar-26 6:40 AM) में होलिका दीपन प्रशस्त है ।

ध्यातव्य : ग्रस्तोदित चन्द्रग्रहण के लिए सूतक 4 याम (4 प्रहर = 12 घण्टे) पहले से लगते हैं अतः 3-Mar-26 को प्रातः 6:46 AM से लगेंगे । चन्द्रस्य ग्रस्तोदये तु यामचतुष्टय वेधात् पूर्वं दिवा न भुञ्जीत ।

-आचार्य अलंकार शर्मा Baijnath Sharma Prachya Vidya Shodh Sansthan

नमामीशमीशान निर्वाणरूपम् 🙏🙏
15/02/2026

नमामीशमीशान निर्वाणरूपम् 🙏🙏

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं !!
26/01/2026

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं !!

 #होली के बारे में आचार्य पं.  #अलंकार शर्मा द्वारा शास्त्रोचित परम्परा पर -इस को पढ़ कर पता लगेगा कि आज का होली का पर्व ...
13/03/2025

#होली के बारे में आचार्य पं. #अलंकार शर्मा द्वारा शास्त्रोचित परम्परा पर -
इस को पढ़ कर पता लगेगा कि आज का होली का पर्व कई परम्पराओं का मिश्रण है ।

1. #फाल्गुन की पूर्णिमा मन्वादि कहाती है, अर्थात इस दिन से मन्वन्तर प्रारम्भ होता है ।

2. भविष्य पुराण के अनुसार सत्ययुग में #ढुंढा नाम की राक्षसी भगवान शिव से वर पाकर प्रतिदिन बालकों को पीड़ित किया करती थी । भयभीत प्रजा ने राजा रघु से कहा । राजा ने जब पुरोहित से उसके नाश का उपाय पूछा तो पुरोहित ने कहा - "सञ्चयं शुष्ककाष्ठानामुपलानां च कारयेत् । तत्राग्नि विधिवद् हुत्वा रक्षोघ्नैर्मन्त्रविस्तरै । ततः किलकिलाशब्दैस्तालशब्दैर्मनोरमै । तत्राग्निं त्रिः परिक्रम्य गायन्तु च हसन्तु च । तेन शब्देन सा पापा होमेन च निराकृता । भयेन तेन सा रण्डा पलायैल्लजिता सती । मरिष्यति न सन्देहो भस्मीभूता तु पूतना ।"

अर्थात् सूखी #लकड़ी और उपलों को इकट्ठा करके उससे रक्षा मंत्रों के साथ विधिवत अग्नि जलाए । फिर मनमानी ध्वनि, ताली, हंसी, किलकारी की ध्वनि करे । उस अग्नि की 3 परिक्रमा करके सभी गाएं और हँसें । इस ध्वनि से वह पापिनी वहाँ से भाग जाएगी और भस्म हो कर मर जाएगी ।

इस परम्परा को हम होलिका दहन के समय देखते हैं, हँसना-गाना, चीखना-चिल्लाना, अपशब्द बोलना इसी इतिहास के रूप हैं ।

3. उपरोक्त में ही आगे आया है कि "ततः प्रभृति लोकेस्मिन् होलिका ख्यातिमागतः । सर्वदुष्टापहो होमः सर्वरोगोपशान्तिदः। क्रियतेस्यां द्विजैः पार्थ तेन सा होलिका स्मृता । अस्यां निशागमे पार्थ संरक्ष्याः शिशवो गृहे । गोमयेनोपलिप्ते च सुचतुष्के गृहाङ्गणे । आकारयैच्छिशुपायान बहुव्यग्रकरान्नरान् । ते काष्ठखङ्गैः संस्पृश्य गीतहास्यकरैः शिशून् । रक्षन्ति तेभ्यो दातव्यं गुडपक्वान्न्मेव च । एवं ढुण्ढेति राक्षस्याः स दोषः प्रशमं व्रजेत् । बालानां रक्षणं कार्यं तस्मात्तस्मिन्निशागमे ।

अर्थात ऐसे ही इस लोक में #होलिका प्रसिद्ध है । इस दिन हुआ होम (अग्नि) सभी दुष्टों से रक्षा करने वाला और सभी रोगों से शांति देने वाला है । इस दिन रात्रि के प्रारम्भ में घर में बच्चों को बचाने के लिए घर के आँगन में गोबर से लीप कर चौकोर में अग्नि जलाए और लकड़ी की तलवार को छू कर बच्चों के लिए गीत और हास्य करे । उन्हें मीठे पके अन्न दे तो उनकी रक्षा होती है । इस प्रकार ढुंढा राक्षसी का दोष नहीं होता और वो दूर चली जाती है । इस प्रकार बालकों के लिए सायंकाल में रक्षा का कार्य करे ।

4. इसी क्रम में विष्णु पुराण में #हिरण्यकश्यप-कयाधु के पुत्र #प्रह्लाद और होलिका की कथा आती है । इसमें भी बालक प्रह्लाद को मारने लिए होलिका प्रपञ्च करती है परन्तु विष्णु कृपा से होलिका जल जाती है और भक्त प्रह्लाद की रक्षा होती है । ढुंढा राक्षसी भी बच्चों को ही पीड़ित करती है तो ये दोनों कथाएं परस्पर जुड़ती हैं ।

5. इस दिन #नवसस्येष्टि भी मनाई जाती है, जो कि नई सस्य (फसल) के आने पर अग्नि में उसकी आहुति दे कर इष्टि मनाने की परम्परा है । हविष्यान्न को ही खाना वेदों में बताया गया है । होलिका की अग्नि में नए आए गेंहू की बालियों को भूनना इसी परम्परा का भाग है ।

6. अब इस पर्व की विधि और पूजा कैसे करनी है ?

अथ पूजाविधिः - देशकालौ संकीर्त्य "सकुटुम्बस्य मम दुंढाराक्षसीप्रीत्यर्थ‍ं तत्पीडापरिहारार्थं होलिकापूजनमहं करिष्ये" इति संकल्प्य शुष्काणां काष्ठानां गोमय पिंडानां च राशिं कृत्वा वह्विना प्रदीप्य तत्र -
अस्माभिर्भयसंत्रस्तेः कृता त्वं होलिके यतः । अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव ।” इति पूजामन्त्रेण होलिकामावाहयामीत्यावाह्य होलिकायै नमः इति मन्त्रेणासनपाद्यादिषोडशोपचारान्दत्त्वा -
प्रार्थनामन्त्रः - वन्दितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शंकरेण च । अतस्त्वं पाहि नो देवि भूते भूतिप्रदा भव” इति प्रार्थयेत्‌ । तत्राग्निं त्रिः परिक्रम्य गायन्तु च हसन्तु च जल्पतु स्वेच्छया लोका निःशंका यस्य यन्मतम्‌ ।

अर्थात् देशकालका स्मरण करके कुटुम्ब सहित मेरे ऊपर दुंढा राक्षसी की प्रीति के लिये और उसको जो कुछ पीड़ा है, उसके नाशके लिये में होलिका का पूजन करता हूं । इस प्रकार संकल्प करके सूखी लकड़ी और कंडा इनकी राशि (ढेर) करके और उसको अग्नि से जलाकर ओर उस जलती हुई में इस मन्त्र से कि, भय से त्रास को प्राप्त हुए हमने हे होलिके ! तुझे रची है, इससे तेरा पूजन करते हें । हे भूते ! तू हमको भूति (धन आदि) दे । होलिका को नमस्कार है, मैं होलिका का आह्वान करता हूं । इस प्रकार आह्वान करके फिर होलिकायै नमः इस मन्त्र से आसन, पाद्य आदि षोडश उपचारों को देकर इस मंत्र से प्रार्थना करे कि, हे देवि ! सुरेन्द्र ब्रह्मा, शंकर ये तुझको नमस्कार करते हैं इससे हे देवि ! तू हमारी रक्षा कर और भूति को दे। फिर उस अग्नि की तीन परिक्रमा करके जिसका जो मत है वह उसी प्रकार गाएं, हंसें, निशंक होकर बोलें और जो मनचाहा हो वह कहें । अगले दिन प्रातः इस होली की भस्म को प्रणाम करे ।

यहाँ 2 -3 बातें और,

पहली "चांडालसूतिकागेहाच्छिशुहारितवह्निना" इसी परम्परा में अग्नि के लिए लकड़ी/ उपले की चोरी का भी विधान है, विशेषकर #चांडाल और सोबर वाले घर से लकड़ी/ उपले की चोरी ।

दूसरी बात "गीतवाद्यस्तथा नृत्यै रात्रिः सा नीयते जनैः । तमाग्नि त्रिः परिक्रम्य शब्दैलिंगभगांकितैः। तेन शब्देन सा पापा राक्षसीतृप्तिमाप्नुयात्‌ ।" उस रात्रि को मनुष्य गाना, बजाना, नाचना, इनसे व्यतीत करें । और उस अग्नि की तीन परिक्रमा करके लिंग ओर भग के वाचक शब्द ( #अपशब्द/ गालियां) जिनमें हों ऐसे शब्द को उच्चारण करें, क्योंकि, वह पापिनी राक्षसी इन शब्दों से तृप्ति को प्राप्त होती है ।

तीसरी बात "एवं रात्रौ होलिकोत्सवं कृत्वा प्रातः प्रतिपदि यः श्वपचं स्पृष्टा स्नानं कुर्यात्‌ । न तस्यः दुष्कृतं किचित्ताधयो व्याधयोऽपि च ।" अर्थात् इस रात्रिमें होली के उत्सव को करके प्रातःकाल प्रतिपदा को #चाण्डाल (भंगी) से स्पर्श करके सचैल (कपड़ों सहित) स्नान कर ले । फिर उस मनुष्य की पाप, आधि वा व्याधि सब निवृत्त हो जाती हैं ।

इत्यलम् !

- आचार्य पं. अलंकार शर्मा
फाल्गुन चतुर्दशी वि. सं. २०८१ (चन्द्रोरगखाक्ष), होलिका दहन पर्व

Address

Naveepur Road
Hathras
204101

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Pt. Baijnath Sharma Prachya Vidya Shodh Sansthan posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The School

Send a message to Pt. Baijnath Sharma Prachya Vidya Shodh Sansthan:

Shortcuts

Share