Bhagwan Shree Bharat Ek Sanatan Yatra

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https://youtu.be/OVPtS3vwgMo*पारदर्शिता/Transparency**शांति से क्रांति की ओर**संवाद एक प्रयास* *भाग - 4**Bhagwan Shree R...
09/08/2023

https://youtu.be/OVPtS3vwgMo

*पारदर्शिता/Transparency*

*शांति से क्रांति की ओर*
*संवाद एक प्रयास* *भाग - 4*

*Bhagwan Shree Rajneesh*
*युवक क्रांति दल*
*BSR युक्रांद*

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*भगवान श्री रजनीश की जय*
*नव-संन्यास आन्दोलन की जय*
*युवक क्रांति दल की जय*

*भगवान श्री रजनीश*
*शिक्षा में क्रांति*
*प्रवचन 6 के मुख्यांश*

*युक्रांद क्या है?*

*सीखने को तत्पर,*
*जीवित साहस,*
*अकेले होना,*
*विवेक का जन्म,*
*बुद्धिमत्ता का विकास,*
*विद्रोह धार्मिक क्रत्य,*
*मूवमेंट फॉर मेडिटेशन,*
*व्यक्ति को शांति,*
*समाज को क्रांति,*
*सांस्कृतिक क्रांति।*

*जय भगवान।*
*जय युक्रांद।*

*संपर्क:- [email protected]*
*+919927222799*

*YouTube Channel Link:-*
https://youtube.com/-YUKRAND

Importance of transparency in Bhagwan's world and need of hour to create a platform to address the issue and gapLink to Google form to get the responses from...

https://youtu.be/GGaAA4iJGNU*शांति से क्रांति की ओर**संवाद एक प्रयास**मीडिया का महत्व* *भाग - 2**Bhagwan Shree Rajneesh*...
30/07/2023

https://youtu.be/GGaAA4iJGNU

*शांति से क्रांति की ओर*
*संवाद एक प्रयास*
*मीडिया का महत्व* *भाग - 2*

*Bhagwan Shree Rajneesh*
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*नव-संन्यास आन्दोलन की जय*
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*भगवान श्री रजनीश*
*शिक्षा में क्रांति*
*प्रवचन 6 के मुख्यांश*

*युक्रांद क्या है?*

*सीखने को तत्पर,*
*जीवित साहस,*
*अकेले होना,*
*विवेक का जन्म,*
*बुद्धिमत्ता का विकास,*
*विद्रोह धार्मिक क्रत्य,*
*मूवमेंट फॉर मेडिटेशन,*
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*समाज को क्रांति,*
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Improtance of media in Bhagnwan shree Rajneesh's world and how transparency is need of time

25/11/2021
02/07/2021
11/05/2021

भारत के मन में—वह जो विशाल भारत की जनता है उसके मन में—ध्यान की जगह और चीजों ने ले रखी है। धन में उसे रस है, पद मग उसे रस है, प्रतिष्ठा में उसे रस है। और आज पश्चिम में ध्यान के प्रति विराट रस पैदा हुआ है।

संन्यासियों ने जो कम्यून अमरीका में खड़ा किया था, उसके अमरीका की सरकार के मिटाने के पीछे और कोई राज नहीं, सिर्फ एक राज था। और वह यह था कि कम्यून अमरीका की प्रतिभा को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। जितने प्रतिभाशाली लोग थे, वे किसी न किसी रूप में कम्यून के प्रति आकर्षित हो रहे थे। और कम्यून—एक भय अमरीका की सरकार के मन में पैदा करने लगा कि अगर लोग इस तरह बैठकर शांत ध्यान करने लगे तो तीसरे महायुद्ध का क्या होगा? अगर लोग ध्यान से भर कर प्रेम से भर गये तो वह जो अमरीका का साम्राज्य सारी दुनिया में फैला हुआ है, उसका क्या होगा? अगर लोगों के मन में पद, प्रतिष्ठा और धन की दौड़ न रही, तो अमरीका की जो आज ताकत है, डालर, वह हवा में विलीन हो जाएगा। एक छोटी सी कम्यून पांच हजार लोगों की, उनके लिए इतनी ज्यादा कष्टप्रद हो गई कि उसे हर हालत में मिटाना है, उसे बिलकुल नेस्तनाबूद कर देना है। बुलडोजर चलवा कर, जहां कम्यून था वहां पुराना रेगिस्तान वापस ले आना है। रेगिस्तान को हमने पांच साल मेहनत करके एक मरूद्यान बना दिया था। उस मरूद्यान को मिटा देना है।

जिस दिन मैं कम्यून में पहले दिन पहुंचा था, वहां एक पक्षी नहीं था। ऐसा प्रतीत होता है कि पक्षी और जानवर आदमी से ज्यादा समझदार हैं। धीरे—धीरे पक्षी आने शुरू हो गए। धीरे—धीरे हिरणों के झुंड के झुंड आने शुरू हो गए। और हिरण तुमने भी देखे होंगे। मैंने भी देखे हैं। लेकिन कम्यून में हिरणों ने जो समझ दिखलाई, वह हैरानी की थी। बीच रास्ते पर खड़े होंगे, तुम कार का हार्न बजाए जाओ, वे हटने वाले नहीं। उन्हें मालूम है कि ये उन लोगों की जमात है, जो किसी को चोट नहीं पहुंचाते। उतरो नीचे गाड़ी से, धक्के दो उनको, तब वे रास्ता छोड़ेंगे। और चूंकि अमरीका में हिरणों को मारने के लिए हर साल दस दिन के लिए छुट्टी मिलती है। उन दस दिनों में जितने हिरण तुम्हें मारने हो, मार सकते हो। तो आसपास जितने दूर—दूर से हिरण आ सकते थे, वे सब कम्यून में आ गए। कम्यून के पास जगह थी। कोई १२६ वर्गमील जगह थी। हजारों हिरण अपने आप चले आए। जैसे कोई आंतरिक संदेश है। कि यहां कोई फिकर नहीं। यहां उन्हें कोई पत्थर भी मारने वाला नहीं है। यहां उन पर गोली नहीं चलेगी।

कम्यून ने अमरीका का कोई भी नुकसान नहीं किया था। सिर्फ एक मरुस्थान को जीवित मरूद्यान बनाया। लेकिन यही तकलीफ की बात हो गई, क्योंकि जो लोग वहां थे, वे ध्यान के लिए इकट्ठे हुए थे। और अगर ध्यान अमरीका की प्रतिभा को पकड़ ले—और निश्चित पकड़ लेना, कम्यून के मिटने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि अमरीका ठीक उस अवस्था में है, जो हमसे उल्टी है। उन्होंने धन के शिखर छू लिए हैं। अब धन में वहां आकर्षण नहीं है। इसलिए ऊपर से तुम्हें दिखाई पड़ता है कि उनके पास इतना धन है। लेकिन धन में वहां किसी को आकर्षण नहीं है। कम्यून में ऐसे संन्यासी थे, जिन्होंने एक करोड़ रुपया दान दे दिया, जो कि उनकी पूरी संपत्ति थी। एक पैसा भी पीछे नहीं बचाया कि कल क्या होगा। दो सौ करोड़ रुपए कम्यून के बनाने में सिर्फ संन्यासियों ने दिए। हमने किसी और के सामने हाथ नहीं फैलाया और न किसी से भीख मांगी। दो सौ करोड़ रुपए देते वक्त किसी ने किसी से कोई आग्रह नहीं किया…लोगों के पास पैसा है। और यह भी समझ में आ गया कि पैसे से जो भी खरीदा जा सकता है, वह दो कौड़ी का है। कुछ और भी है, जो पैसे से नहीं खरीदा जा सकता है। और अब उसी की तलाश है, उसी की प्यास है, उसी की खोज है, उसी की अभीप्सा है। ध्यान उस सबका इकट्ठा नाम है। उसमें प्रेम जुड़ा है। उसमें करुणा जुड़ी है। ध्यान तो एक मंदिर है, जिसके बहुत द्वार हैं। उसमें वह सब जुड़ा है, जो पैसे से नहीं खरीदा जा सकता।

पश्चिम में अपूर्व रूप से ध्यान के प्रति आकर्षण है, क्योंकि पश्चिम ने कभी भी ध्यान के शिखर नहीं छुए—न कोई गौतम बुद्ध, न कोई कबीर, न कोई रैदास। पश्चिम की आत्मा खाली है। हाथ भरे हैं, प्राण शून्य हैं। इस स्थिति ने पश्चिम के मन में धन के प्रति एक विकर्षण पैदा कर दिया और भारत में ध्यान के प्रति एक विकर्षण पैदा कर दिया।

जिंदगी का चक्र बहुत अदभुत है। इस बात का बहुत डर है कि पूरब पश्चिम हो जाए और पश्चिम पूरब हो जाए।

भारतीय पार्लियामेंट में विरोधी पार्टी के नेता के द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में संबंधित मंत्री ने जवाब दिया था कि भगवान को या उनके किसी संन्यासी को भारत आने से नहीं रोका जाएगा। यह अफवाह कि उनके संन्यासियों को भारत से रोका जाएगा, झूठी है। मैंने कुछ संन्यासियों को अलग—अलग देशों में भारतीय राजदूतों में भेजा। एथेंस में राजदूतावास में पूछा गया कि भारत किसलिए जाना चाहते हो? तो जो संन्यासिन वहां गई थी, उसने कहा ध्यान करने के लिए। और तुम हैरान होओगे कि उत्तर राजदूत ने यह दिया कि ध्यान, योग इत्यादि के लिए अब भारत में कोई स्थान नहीं। हमें इस तरह के यात्री नहीं चाहिए।

जो युवती गई थी, उसे मैंने खबर की कि तम राजदूत से कहो कि हमें लिखित उत्तर चाहिए। यह जो तुम कह रहे हो, वह लिखित दो। मगर भारत की नपुंसकता ऐसी है कि लिखने की हिम्मत भी नहीं, कि यह लिखकर हम नहीं देंगे। क्योंकि मैं चाहता था कि लिखित उत्तर हो तो हम साबित कर सकेंगे कि पार्लियामेंट में जो मिनिस्टर बोला, वह झूठा बोला। यहां रोज पुलिस सुबह से लेकर शाम तक चक्कर मार रही है। दिन में चार—चार, पांच—पांच बार व्यर्थ सूरज प्रकाश को परेशान कर रहे हैं—कि यहां कितने विदेशी ठहरे हुए हैं? अगर तुम्हें विदेशियों को मेरे पास आने देने से कोई एतराज नहीं है, यह तुम पार्लियामेंट में कहते हो तो कुछ तो ईमान रखो। फिर यहां पुलिस भेजने की क्या जरूरत? और विदेशियों से तुम्हें इतनी घबड़ाहट क्या है? अगर वे ध्यान सीखने भारत आ भी रहे हैं तो तुम्हारी तो उनके धन पर नजर होनी चाहिए। तुम्हें तो ध्यान से कुछ लेना—देना नहीं है। आर रहे हैं तो कुछ धन खर्च करके ही जाएंगे। तो भारत के भिखमंगों की झोली में कुछ पैसे डालकर ही जाएंगे।

लेकिन नहीं। कारण यह है कि अमरीका जोर दे रहा है कि भारत किसी भी ध्यान सीखने के लिए न आने दिया जाए। क्योंकि पश्चिम में एक घबड़ाहट है और वह घबड़ाहट यह है कि अगर लोग ध्यान में उत्सुक हो जाएं तो वह जो फिजूल के कामों में उनको लगा रखा है, उनमें उनको अरुचि हो जाएगी। एक अजीब हालत है दुनिया की। पश्चिम की आकांक्षा है कि ध्यान की यात्रा करे। वहां की सरकारें उस आकांक्षा को रोकने की पुरी चेष्टा कर रही हैं। पूरब ने ध्यान के आकाश को छुआ है, वह हमारी वसीयत है। सरलता से हम उसे वापस उपलब्ध कर सकते हैं। लेकिन हम अपनी वसीयत को इंकार कर रहे हैं। हम जैसे अंधों की दुनिया और दूसरी शायद ही हो और खास कर मेरे पास किसी को आने से रोकना निहायत अपराध है। क्योंकि मैं संन्यास को संसार—विरोधी नहीं मानता और न ही ध्यानी को चाहता हूं कि घर—द्वार छोड़कर हिमालय भाग जाए।

मेरी चेष्टा इतनी भिन्न है पुरानी चेष्टाओं से कि शायद भारत के राजनीतिक नेता, या पश्चिम के राजनीतिक नेता उसे समझने में समर्थ भी नहीं हैं। मेरी चेष्टा है कि तुम दोनों यात्राओं पर एक साथ जा सकते हो। क्योंकि दोनों यात्राएं एक—दूसरे की दुश्मन नहीं हैं। ध्यान तुम्हें भीतर ले जाता है और जितने तुम भीतर जाते हो, उतनी ही तुम्हारी प्रतिभा निखरती है। और जितनी तुम्हारी प्रतिभा निखरती है, उतनी तुम बाहर की दुनिया में सफलता की यात्रा कर सकते हो। मैं बाहर और भीतर को दुश्मन नहीं मानता। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए न तो भारत की सरकार को मुझसे डरने की जरूरत है और न अमरीका या यूरोप की सरकारों को मुझसे डरने की जरूरत है। मुझसे तो उन्हें बिलकुल निर्भय होना चाहिए। सच तो यह है कि अगर वे मुझे रोकते हैं तो वे अपनी—अपनी कौम और अपने—अपने राष्ट्र के साथ गदारी कर रहे हैं। और उन लोगों के हाथों में उन्हें धकेल रहे हैं, जो जीवन—विरोधी हैं। वे चाहते हैं, उससे उलटा ही परिणाम होगा। उन्हें मेरी अनूठी और अद्वितीय जीवन—शैली का कोई अंदाज नहीं। मैं यह कह रहा हूं कि ठीक संसार में रहते हुए तुम ईश्वर के मंदिर बन सकते हो और फिर मंदिर जितना सुंदर बन सके, सोने का बन सके, हीरे—जवाहरातों से जड़ा हुआ बन सके, उतना अच्छा।

मेरे भीतर कोई विरोध नहीं है बाहर और भीतर में हां, अतीत में यह बात सच थी कि जो लोग बाहर रहने के लिए उत्सुक थे, वे भीतर का विरोध करते थे। उनके दिन लद गए। अब उनके मरे हुए संस्कारों को क्यों ढो रहे हो? और क्या दुनिया में कोई नई बात नहीं होने दोगे?

मेरा प्रयोग नया है। इसे किसी पुराने प्रयोग से जोड़ने की कोई जरूरत नहीं। मैं चाहता हूं प्रत्येक व्यक्ति र्स्वांगीण रूप से समृद्ध हो। भीतर भी स्वर्ग का साम्राज्य हो और बाहर भी।

भगवान श्री रजनीश

कोंपलें फिर फूट आईं
प्रवचन—बारहवां
15 अगस्त 1986
सुमिला, जुहू, बंबई

" महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने मुझसे एक बार पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन बारह लोग हैं-मेरी दृष्टि में-जो सबसे चमकते...
16/04/2021

" महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने मुझसे एक बार पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन बारह लोग हैं-मेरी दृष्टि में-जो सबसे चमकते हुए सितारे हैं? मैंने उन्हें यह सूची दी: कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकर, गोरख, कबीर, नानक, मीरा, रामकृष्ण, कृष्णमूर्ति। सुमित्रानंदन पंत ने आंखें बंद कर लीं, सोच में पड़ गये...।

सूची बनानी आसान भी नहीं है, क्योंकि भारत का आकाश बड़े नक्षत्रों से भरा है! किसे छोड़ो, किसे गिनो?.. वे प्यारे व्यक्ति थे-अति कोमल, अति माधुर्यपूर्ण, स्त्रैण...। वृद्धावस्था तक भी उनके चेहरे पर वैसी ही ताजगी बनी रही जैसी बनी रहनी चाहिए। वे सुंदर से सुन्दरतम होते गये थे...। मैं उनके चेहरे पर आते-जाते भाव पढ़ने लगा। उन्हें अड़चन भी हुई थी। कुछ नाम, जो स्वभावतः होने चाहिए थे, नहीं थे। राम का नाम नहीं था! उन्होंने आंख खोली और मुझसे कहा: राम का नाम छोड़ दिया है आपने! मैंने कहा: मुझे बारह की ही सुविधा हो चुनने की, तो बहुत नाम छोड़ने पड़े। फिर मैंने बारह नाम ऐसे चुने जिनकी कुछ मौलिक देन है। राम की कोई मौलिक देन नहीं है, कृष्ण की मौलिक देन है। इसलिए हिंदुओं ने भी उन्हें पूर्णावतार नहीं कहा।

उन्होंने फिर मुझसे पूछा: तो फिर ऐसा करें, सात नाम मुझे दें। अब बात और कठिन हो गयी थी। मैंने उन्हें सात नाम दिये: कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, शंकर, गोरख, कबीर। उन्होंने कहा: आपने जो पांच छोड़े, अब किस आधार पर छोड़े हैं? मैंने कहा: नागार्जुन बुद्ध में समाहित हैं। जो बुद्ध में बीज-रूप था, उसी को नागार्जुन ने प्रगट किया है। नागार्जुन छोड़े जा सकते हैं। और जब बचाने की बात हो तो वृक्ष छोड़े जा सकते हैं, बीज नहीं छोड़े जा सकते। क्योंकि बीजों से फिर वृक्ष हो जायेंगे, नये वृक्ष हो जायेंगे। जहां बुद्ध पैदा होंगे वहां सैकड़ों नागार्जुन पैदा हो जायेंगे, लेकिन कोई नागार्जुन बुद्ध को पैदा नहीं कर सकता। बुद्ध तो गंगोत्री हैं, नागार्जुन तो फिर गंगा के रास्ते पर आये हुए एक तीर्थस्थल हैं-प्यारे! मगर अगर छोड़ना हो तो तीर्थस्थल छोड़े जा सकते हैं, गंगोत्री नहीं छोड़ी जा सकती।

ऐसे ही कृष्णमूर्ति भी बुद्ध में समा जाते हैं। कृष्णमूर्ति बुद्ध का नवीनतम संस्करण हैं-नूतनतम; आज की भाषा में। पर भाषा का ही भेद है। बुद्ध का जो परम सूत्र था-अप्प दीपो भव-कृष्णमूर्ति बस उसकी ही व्याख्या है। एक सूत्र की व्याख्या-गहन, गंभीर, अति विस्तीर्ण, अति महत्वपूर्ण! पर अपने दीपक स्वयं बनो, अप्प दीपो भव-इसकी ही व्याख्या है। यह बुद्ध का अंतिम वचन था इस पृथ्वी पर। शरीर छोड़ने के पहले यह उन्होंने सार-सूत्र कहा था। जैसे सारे जीवन की संपदा को, सारे जीवन के अनुभव को इस एक छोटे-से सूत्र में समाहित कर दिया था। रामकृष्ण, कृष्ण में सरलता से लीन हो जाते हैं। मीरा, नानक, कबीर, में लीन हो जाते हैं; जैसे कबीर की ही शाखायें हैं। जैसे कबीर में जो इकट्ठा था, वह आधा नानक में प्रगट हुआ है और आधा मीरा में। नानक में कबीर का पुरुष-रूप प्रगट हुआ है। इसलिए सिक्ख धर्म अगर क्षत्रिय का धर्म हो गया, योद्धा का, तो आश्चर्य नहीं है। मीरा में कबीर का स्त्रैण रूप प्रगट हुआ है-इसलिए सारा माधुर्य, सारी सुगंध, सारा सुवास, सारा संगीत, मीरा के पैरों की घुंघरू बनकर बजा है। मीरा के इकतारे पर कबीर की नारी गाई है; नानक में कबीर का पुरुष बोला है। दोनों कबीर में समाहित हो जाते हैं। इस तरह, मैंने कहा: मैंने यह सात की सूची बनाई। अब उनकी उत्सुकता बहुत बढ़ गयी थी। उन्होंने कहा: और अगर पांच की सूची बनानी पड़े? तो मैंने कहा: काम मेरे लिए कठिन होता जायेगा।

मैंने यह सूची उन्हें दी: कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, गोरख।... क्योंकि कबीर को गोरख में लीन किया जा सकता है। गोरख मूल हैं। गोरख को नहीं छोड़ा जा सकता। और शंकर तो कृष्ण में सरलता से लीन हो जाते हैं। कृष्ण के ही एक अंग की व्याख्या है, कृष्ण के ही एक अंग का दार्शनिक विवेचन है।
तब तो वे बोले: बस, एक बार और..। अगर चार ही रखने हों?

तो मैंने उन्हें सूची दी: कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध गोरख।... क्योंकि महावीर बुद्ध से बहुत भिन्न नहीं हैं, थोड़े ही भिन्न हैं। जरा-सा ही भेद है; वह भी अभिव्यक्ति का भेद है। बुद्ध की महिमा में महावीर की महिमा लीन हो सकती है।
वे कहने लगे: बस एक बार और..। आप तीन व्यक्ति चुनें।

मैंने कहा: अब असंभव है। अब इन चार में से मैं किसी को भी छोड़ न सकूंगा। फिर मैंने उन्हें कहा: जैसे चार दिशाएं हैं, ऐसे ये चार व्यक्तित्व हैं। जैसे काल और क्षेत्र के चार आयाम हैं, ऐसे ये चार आयाम हैं। जैसे परमात्मा की हमने चार भुजाएं सोची हैं, ऐसी ये चार भुजाएं हैं। ऐसे तो एक ही हैं, लेकिन उस एक की चार भुजाएं हैं। अब इनमें से कुछ छोड़ना तो हाथ काटने जैसा होगा। यह मैं न कर सकूंगा। अभी तक मैं आपकी बात मानकर चलता रहा, संख्या कम करता चला गया। क्योंकि अभी तक जो अलग करना पड़ा, वह वस्त्र था; अब अंग तोड़ने पड़ेंगे। अंग-भंग मैं न कर सकूंगा। ऐसी हिंसा आप न करवायें। "

भगवान श्री रजनीश,
मरौ हे जोगी मरौ

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