पंडित जी

पंडित जी

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धार्मिक संदर्भ – हिंदू धर्म में पंडित जी वे होते हैं जो वेद, पुराण, ज्योतिष, संस्कृत या पूजा-पाठ का गहरा ज्ञान रखते हैं। ये पूजा, संस्कार, विवाह या ज्योतिषीय परामर्श के लिए मार्गदर्शन देते हैं।

24/03/2026

।। जय माता दी ।।

।। नवदुर्गा की जय ।।

।। मां दुर्गा के नौ रूप और उनका महत्व ।।

।। शैलपुत्री ।।

दुर्गाजी पहले स्वरूप में 'शैलपुत्री' के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा।नवरात्र पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। इस देवी ने दाएँ हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएँ हाथ में कमल सुशोभित है। यही सती के नाम से भी जानी जाती हैं।

।। मन्त्र: ।।

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्‌।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

।। कथा ।।

एक बार जब सती के पिता प्रजापति दक्ष ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमन्त्रित किया, पर अपने दामाद भगवान शंकरजी को नहीं। सती अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमन्त्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहाँ जाना उचित नहीं है। परन्तु सती सन्तुष्ट नहीं हुईं।

सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुँचीं तो सिर्फ माँ ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकरजी के प्रति भी तिरस्कार का भाव था। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुँचा। वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपनेआप को जलाकर भस्म कर लिया।

इस दारुण दुख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने ताण्डव करते हुये उस यज्ञ का विध्वंस कर दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मी और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री जी का विवाह भी फिर से भगवान शंकरजी से हुआ। शैलपुत्री शिवजी की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनन्त है।

अन्य नाम: सती, पार्वती, वृषारूढ़ा, हेमवती और भवानी भी इन्हि देवी जी के अन्य नाम हैं।

।। ब्रह्मचारिणी ।।

नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली।

भगवान शंकरजी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया।

कहते है माँ ब्रह्मचारिणी देवी जी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।

।। मन्त्र:।।

दधाना करपद्माभ्यामक्षमाला-कमण्डलू ।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

इस श्लोक में अनुत्तमा का अर्थ ' जिनसे अधिक उत्तम कोई नहीं ' ऐसे होता है । और अक्षमाला-कमण्डलू शब्द में दो वस्तू होने के कारण कमण्डलु शब्द के द्विवचन का प्रयोग है ।

।। कथा ।।

पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर जी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।

कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा पड़ गया।
कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा "हे देवी आज तक किसी ने इस प्रकार की कठोर तपस्या नहीं की। यह आप से ही सम्भव थी। आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चन्द्रमौलि शिवजी आपको पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही आपके पिताजी तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।"

।। चन्द्रघण्टा ।।

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रविष्ट होता है।

इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगन्धियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियाँ सुनाई देने लगती हैं।
देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी माना गया है। इसीलिए कहा जाता है कि हमें निरन्तर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधना करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चन्द्र है। इसीलिए इस देवी को चन्द्रघण्टा कहा गया है। इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। इस देवी के दस हाथ हैं। वे खडग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं।
सिंह पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध के लिए उद्धत रहने की है। इसके घण्टे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस काँपते रहते हैं। नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा का महत्व है। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियाँ सुनाईं देने लगती हैं। इन क्षणों में साधक को बहुत सावधान रहना चाहिए।
इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। इसलिए हमें चाहिए कि मन, वचन और कर्म के साथ ही काया को विहित विधि-विधान के अनुसार परिशुद्ध-पवित्र करके चन्द्रघण्टा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना करना चाहिए। इससे सारे कष्टों से मुक्त होकर सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते हैं। यह देवी कल्याणकारी है।

।। मन्त्र: ।।

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

।। कूष्माण्डा ।।

नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन 'अनाहत' चक्र में अवस्थित होता है।
नवरात्रि में चौथे दिन देवी को कुष्माण्डा के रूप में पूजा जाता है। अपनी मन्द, हल्की हँसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कुष्माण्डा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार था, तब इसी देवी ने अपने ईषत्‌ हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा गया है।
इस देवी की आठ भुजाएँ हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाईं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृत में कुम्हड़े को कुष्माण्ड कहते हैं इसलिए इस देवी को कुष्माण्डा कहा जाता है।
इस देवी का वास सूर्यमण्डल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कान्ति और प्रभा सूर्य की भाँति ही दैदीप्यमान है। इनके ही तेज से दसों दिशाएँ आलोकित हैं। ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है।
अचंचल और पवित्र मन से नवरात्रि के चौथे दिन इस देवी की पूजा-आराधना करना चाहिए। इससे भक्तों के रोगों और शोकों का नाश होता है तथा उसे आयु, यश, बल और आरोग्य प्राप्त होता है। यह देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है।
विधि-विधान से पूजा करने पर भक्त को कम समय में ही कृपा का सूक्ष्म भाव अनुभव होने लगता है। यह देवी आधियों-व्याधियों से मुक्त करती हैं और उसे सुख समृद्धि और उन्नति प्रदान करती हैं। अंततः इस देवी की उपासना में भक्तों को सदैव तत्पर रहना चाहिए।

।। मन्त्र: ।।

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदाऽस्तु मे॥

।। स्कंदमाता ।।

नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। इस देवी की चार भुजाएँ हैं। यह दायीं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कन्द को गोद में पकड़े हुए हैं। नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बायीं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है।
पहाड़ों पर रहकर सांसारिक जीवों में नवचेतना का निर्माण करने वालीं स्कन्दमाता। नवरात्रि में पाँचवें दिन इस देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। कहते हैं कि इनकी कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है। स्कन्द कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कन्दमाता नाम से अभिहित किया गया है। इनके विग्रह में भगवान स्कन्द बालरूप में इनकी गोद में विराजित हैं। इस देवी की चार भुजाएँ हैं।

यह दायीं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कन्द को गोद में पकड़े हुए हैं। नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बायीं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है। इनका वर्ण एकदम शुभ्र है। यह कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसीलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। सिंह इनका वाहन है।
शास्त्रों में इसका पुष्कल महत्व बताया गया है। इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं। भक्त को मोक्ष मिलता है। सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज और कान्तिमय हो जाता है। अतः मन को एकाग्र रखकर और पवित्र रखकर इस देवी की आराधना करने वाले साधक या भक्त को भवसागर पार करने में कठिनाई नहीं आती है।
इनकी पूजा से मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है। यह देवी विद्वानों और सेवकों को पैदा करने वाली शक्ति है। यानी चेतना का निर्माण करने वालीं। कहते हैं कालिदास द्वारा रचित रघुवंशम महाकाव्य और मेघदूत रचनाएँ स्कन्दमाता की कृपा से ही संभव हुईं।

।। मन्त्र:।।

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदाऽस्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

।। कात्यायनी।।

माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। उस दिन साधक का मन 'आज्ञा' चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।
नवरात्रि में छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा की जाती है।
इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी सहजता से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना की। कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि उन्हें पुत्री प्राप्त हो। मां भगवती ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाईं। इनका गुण शोधकार्य है। इसीलिए इस वैज्ञानिक युग में कात्यायनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है। इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे हो जाते हैं। यह वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट होकर पूजी गईं।
माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान श्री कृष्ण जी को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी। यह पूजा कालिन्दी यमुना के तट पर की गई थी।
इसीलिए यह ब्रजमण्डल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इनका स्वरूप अत्यन्त भव्य और दिव्य है। यह स्वर्ण के समान चमकीली हैं और भास्वर हैं। इनकी चार भुजाएँ हैं। दायीं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। माँ के बाँयी तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन भी सिंह है।
इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि इस देवी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है।

।। मन्त्र:।।

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानव-घातिनी॥

।। कालरात्रि ।।

माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन 'सहस्रार' चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है।
कहा जाता है कि कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्माण्ड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं।
नाम से अभिव्यक्त होता है कि माँ दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अन्धकार की तरह एकदम काला है। नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। अन्धकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है।
इस देवी के तीन नेत्र हैं। यह तीनों ही नेत्र ब्रह्माण्ड के समान गोल हैं। इनकी साँसों से अग्नि निकलती रहती है। यह गर्दभ की सवारी करती हैं। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो।
बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है। इनका रूप भले ही भयंकर हो परन्तु यह सदैव शुभ फल देने वाली माँ हैं। इसीलिए यह शुभंकरी कहलाईं। अर्थात इनसे भक्तों को किसी भी प्रकार से भयभीत या आतंकित होने की कतई आवश्यकता नहीं। उनके साक्षात्कार से भक्त पुण्य का भागी बनता है।

कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्माण्ड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियाँ उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं। यह ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जन्तु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।

।। मन्त्र:।।

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

।। महागौरी ।।

माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। नवरात्रि में आठवें दिन महागौरी शक्ति की पूजा की जाती है। नाम से प्रकट है कि इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चन्द्र और कुन्द के फूल से दी गई है। अष्टवर्षा भवेद् गौरी। इनके सभी आभूषण और वस्त्र श्वेत हैं। इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है। इनकि चार भुजाएँ हैं और वाहन वृषभ है इसीलिए वृषारूढ़ा भी कहा गया है इनको।
इनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है तथा नीचे वाला हाथ त्रिशूल धारण किया हुआ है। ऊपर वाले बाएँ हाथ में डमरू धारण कर रखा है और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है। इनकी पूरी मुद्रा बहुत शान्त है।
पति रूप में शिव को प्राप्त करने के लिए महागौरी ने कठोर तपस्या की थी। इसी कारण से इनका शरीर काला पड़ गया परन्तु तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोकर कान्तिमय बना दिया। उनका रूप गौर वर्ण का हो गया। इसीलिए यह महागौरी कहलाईं।
यह अमोघ फलदायिनी हैं और इनकी पूजा से भक्तों के तमाम कल्मष धुल जाते हैं। पूर्वसंचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। महागौरी का पूजन-अर्चन, उपासना-आराधना कल्याणकारी है। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती हैं।
एक और मान्यता के अनुसार एक भूखा सिंह भोजन की तलाश में वहाँ पहुँचा जहाँ देवी ऊमा तपस्या कर रही होती है। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गई, परन्तु वह देवी के तपस्या से उठने का प्रतीक्षा करते हुए वहीं बैठ गया। इस प्रतीक्षा में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आ गई। उन्होने द्याभाव और प्रसन्न्ता से उसे भी अपना वाहन बना लिया क्‍योंकि वह उनकी तपस्या पूरी होने के प्रतीक्षा में स्वंय भी तप कर बैठा।
कहते है जो स्त्री माँ की पूजा भक्ति भाव सहित करती हैं उनके सुहाग की रक्षा देवी स्वंय करती हैं।

।। मन्त्र: ।।

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव-प्रमोद-दा॥

अन्य नाम: इन्हें अन्नपूर्णा, ऐश्वर्य प्रदायिनी, चैतन्यमयी भी कहा जाता है। महादेव-प्रमोद-दा का अर्थ है महादेव को आनंद देनेवाली ।

।। सिद्धिदात्री ।।

माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। मान्यता है कि इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। इस देवी के दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है। इनका वाहन सिंह है और यह कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। नवरात्र में यह अन्तिम देवी हैं। हिमाचल के नन्दापर्वत पर इनका प्रसिद्ध तीर्थ है।
माना जाता है कि इनकी पूजा करने से बाकी देवीयों कि उपासना भी स्वंय हो जाती है।
यह देवी सर्व सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी हैं। उपासक या भक्त पर इनकी कृपा से कठिन से कठिन कार्य भी आसानी से संभव हो जाते हैं। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियाँ होती हैं। इसलिए इस देवी की सच्चे मन से विधि विधान से उपासना-आराधना करने से यह सभी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं।
कहते हैं भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से यह तमाम सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिव जी का आधा शरीर देवी का हुआ था।इसी कारण शिवजी अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए।
इस देवी के दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है।
विधि-विधान से नौंवे दिन इस देवी की उपासना करने से सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इनकी साधना करने से लौकिक और परलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। मां के चरणों में शरणागत होकर हमें निरन्तर नियमनिष्ठ रहकर उपासना करनी चाहिए। इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और अमृत पद की ओर ले जाते हैं।

।। मां सिद्धिदात्री का मन्त्र:।।

सिद्धगन्धर्व-यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

गन्धर्व + यक्ष + आद्य -> का अर्थ (स्वर्गलोकनिवासी उपदेवता गण, जिन में गन्धर्व, यक्ष, इत्यादि आद्य हैं), और असुर (राक्षस) , अमर (देव) गण भी, इन सब से जिसकी सेवा होती है ।
सिद्धगन्धर्व-यज्ञज्ञैरसुरैरमरैरपि यह पाठभेद भी दिखता है । यज्ञज्ञ = वह जो यज्ञों के विधान आदि जानता हो।

नवदुर्गा सनातन धर्म में भगवती माता दुर्गा जिन्हे आदिशक्ति जगत जननी जगदम्बा भी कहा जाता है, भगवती के नौ मुख्य रूप है जिनकी विशेष पूजा व साधना नवरात्रि के दौरान और वैसे भी विशेष रूप से करी जाती है। इन नवों/नौ दुर्गा देवियों को पापों की विनाशिनी कहा जाता है, हर देवी के अलग अलग वाहन हैं, अस्त्र शस्त्र हैं परन्तु यह सब एक हैं और सभी परम भगवती दुर्गा जी से ही प्रकट होती है।

🙏 माता नवदुर्गा की जय जयकार हो।
जय माता दी।

23/03/2026

📿 श्री दक्षिणा स्तोत्रम्

॥ यज्ञपुरुष उवाच ॥

श्लोक १
पुस गोलोकगोपी त्वं गोपनीयं प्रवरा परा।
राधास्मा तत्सर्शी च श्रीकृष्णप्रेयसीं प्रिये ॥

भावार्थ : हे दक्षिणे! तुम गोलोक की गोपी हो, गोपनीय रहने वाली, सर्वश्रेष्ठ और परा शक्ति हो। तुम राधा के समान हो, उनके स्पर्श से युक्त और श्रीकृष्ण की प्रियतम हो।

श्लोक २
कार्तिकीपूर्णिमायां तु रासे राधामहोत्सवे।
अंगिन्यता दक्षिणाशाखाप्रभस्य तेन दक्षिणा ॥

भावार्थ : कार्तिक पूर्णिमा की रास राधा महोत्सव में जो अंगिन्यता (स्वीकारोक्ति) दक्षिणा शाखा के प्रभाव से हुई, इसी कारण तुम 'दक्षिणा' नाम से विख्यात हुई।

श्लोक ३
पुस त्वं सुशीलास्थ्या शौलैनं शोधनं च।
कृष्णदक्षाशखासाव्य रीधाशापाव्य दक्षिणा ॥

भावार्थ : हे दक्षिणे! तुम सुशीला हो, शौल (शील) से शोधन करने वाली हो। कृष्ण की दक्षिण शाखा और राधा की शाप से भी तुम दक्षिणा कहलाती हो।

श्लोक ४
योलोकात्त्वं परिवर्तिता मम भाव्याद्धूपस्थिता।
कृपां कुरुं त्वमेवाव स्थामिनं कुरुं मां प्रिये ॥

भावार्थ : हे प्रिये! तुम लोक से परिवर्तित होकर मेरी भावना से ही यहाँ स्थित हुई। मुझ पर कृपा करो, मुझे स्थिर और स्थामी (प्रतिष्ठित) बनाओ।

श्लोक ५
कर्मिणां कर्मणां देवी त्वमेव पत्निं सदा।
त्वया विज्ञा च सर्वेषां सर्वं कर्मे च निष्प्रत्यगम् ॥

भावार्थ : हे देवी! कर्म करने वालों के कर्मों की तुम ही सदा पत्नी (स्वामिनी) हो। तुमसे ज्ञात होने पर ही सभी कर्म निष्प्रत्यग (फलदायक) होते हैं।

श्लोक ६
प्रत्यशास्त्राविरहीनश्च यथा वृष्णां महीतते।
त्वया विज्ञा तथा कर्मकर्मिणां च न शोभते ॥

भावार्थ : जैसे प्रत्यक्ष शास्त्र से रहित वृष्णियों की महिमा नहीं होती, वैसे ही तुमसे ज्ञात किए बिना कर्म और कर्मी शोभा नहीं पाते।

श्लोक ७
ब्रह्म विष्णुमहेशाश्रि विल्लाहालाय पूर्व चा कर्मणश्च फलं द्वातुं न शक्तिश्च त्वया विज्ञ ॥

भावार्थ : ब्रह्मा, विष्णु, महेश और लक्ष्मी आदि भी पूर्व कर्मों का फल देने में तुम्हारे बिना शक्तिशाली नहीं हैं।

श्लोक ८
कर्मस्न्त्पी स्वयं ब्रह्मा फलस्न्त्पी महेशः ।
यज्ञस्न्त्पी विष्णुमहं त्वमेवां सारस्न्त्पी ॥

भावार्थ : कर्मों के संतापक स्वयं ब्रह्मा हैं, फलों के संतापक महेश हैं, यज्ञ के संतापक मैं विष्णु हूँ, और तुम इन सबकी सार संतापक (सार रूप) हो।

श्लोक ९
फलद्वाता परं ब्रह्मं निर्गुप्तः प्रकृतेः परः ।
स्वयं कृष्णश्च भगवानुं व शक्तिस्वया विज्ञ ॥

भावार्थ : फल देने वाला परब्रह्म है, जो प्रकृति से परे और निर्गुण है। वह स्वयं भगवान कृष्ण हैं, और उनकी शक्ति तुम ही हो।

श्लोक १०
त्वमेव शक्तिः कालो मे शथज्जन्मलिन जन्मलिन।
सर्वकर्माणि शक्तिश्च त्वया सह वरान्ने ॥

भावार्थ : हे दक्षिणे! तुम ही मेरी शक्ति हो, तुम ही मेरा काल हो। तुम सहस्रों जन्मों के लिन (समाप्त) करने वाली हो। सभी कर्मों की शक्ति तुम ही हो, तुम्हारे साथ ही मैं वरान्न (वरदान) देता हूँ।

श्लोक ११
इत्युत्त्वा तत्पुरस्तस्थौ यज्ञाधिष्ठावृद्धिकः ।
तूष्टां बभूव सा देवी भैत्रं च कामलाकला ॥

भावार्थ : इस प्रकार कहकर यज्ञाधिष्ठान को बढ़ाने वाले यज्ञपुरुष स्थित हुए। वह देवी प्रसन्न हो गई और कामलाकला (कमल की कला) के समान आनंदित हुई।

श्लोक १२
इन्द्रं च लक्ष्मणास्त्रीग्रं यज्ञकाले च यः पठेत्।
एवं च सर्वयज्ञानां लाभते नाग संशयः ॥

भावार्थ : जो कोई इन्द्र (यज्ञ) और लक्ष्मणास्त्री (लक्ष्मी सहित) के साथ यज्ञकाल में इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे सभी यज्ञों का फल प्राप्त होता है - इसमें कोई संदेह नहीं।

॥ इति श्री दक्षिणा स्तोत्रम् ॥

14/11/2025

उत्पन्ना एकादशी
उत्पन्ना एकादशी हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और महत्त्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है। यह मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की एकादशी को आती है और इसे एकादशियों की उत्पत्ति का दिन भी कहा जाता है।

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🌼 उत्पन्ना एकादशी का महत्व

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।

मान्यता है कि इसी तिथि को एकादशी देवी का प्राकट्य हुआ था।

इस व्रत के प्रभाव से भक्त को पापों से मुक्ति, मानसिक शांति और मोक्ष का मार्ग मिलता है।

व्रत रखने से शत्रुओं पर विजय और सभी प्रकार के भय का नाश होता है।

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📖 उत्पन्ना एकादशी की कथा (सारांश)

पुराणों के अनुसार, एक समय असुर मुर अत्याचार कर देवताओं को कष्ट दे रहा था। देवताओं ने भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की। विष्णुजी युद्ध करते हुए एक गुफा में विश्राम करने लगे। तब असुर मुर ने उन पर आक्रमण करना चाहा, तभी भगवान के कंठ से एक तेजस्वी देवी प्रकट हुईं।
इस देवी ने उस असुर का वध कर दिया।
भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर कहा कि –
"तुम्हारा नाम एकादशी होगा और तुम सब पापों का नाश करोगी। जो भी तुम्हारा व्रत करेगा, वह मेरे धाम को प्राप्त करेगा।"

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🪔 व्रत विधि

1. प्रातः स्नान कर संकल्प लें।

2. पूरे दिन उपवास रखें।

3. भगवान विष्णु का पीला वस्त्र, तुलसी, दीपक, धूप आदि से पूजन करें।

4. विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना उत्तम माना जाता है।

5. रात्रि में जागरण कर कीर्तन-भजन करें।

6. अगले दिन द्वादशी को व्रत का पारण करें।

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🌸 विशेष फल

कठिन पाप भी नष्ट होते हैं।

मन को शांति तथा घर में सुख-समृद्धि आती है।

आध्यात्मिक उन्नति और स्वास्थ्य लाभ मिलता है।

31/10/2025

अक्षय नवमी (Akshaya Navami) हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास (Kartika Maas) के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। यह तिथि बहुत पवित्र मानी जाती है और धार्मिक दृष्टि से इसका विशेष महत्व है।

यहाँ इसके बारे में संक्षेप में जानकारी दी गई है 👇

🌸 अक्षय नवमी का महत्व:

यह तिथि अक्षय फल देने वाली मानी जाती है — यानी इस दिन किए गए दान, पूजन और पुण्य कर्म अक्षय (कभी समाप्त न होने वाले) फल प्रदान करते हैं।

ऐसा माना जाता है कि इस दिन सत्ययुग का आरंभ हुआ था, इसलिए इसे “सत्ययुगादि नवमी” भी कहा जाता है।

इस दिन आंवला नवमी (Amla Navami) के रूप में भी पूजा होती है — लोग आंवले के पेड़ की पूजा करते हैं और इसके नीचे भोजन करते हैं।

महिलाएँ इस दिन सौभाग्य और संतान सुख के लिए व्रत रखती हैं।

🌿 पूजा विधि:

1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

2. भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की पूजा करें।

3. आंवला वृक्ष की पूजा करें — दीप जलाएँ, जल चढ़ाएँ, और वृक्ष की परिक्रमा करें।

4. ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएँ और दान दें।

📅 2025 में अक्षय नवमी की तिथि:

2025 में अक्षय नवमी — 31 अक्टूबर (शुक्रवार) को मनाई जाएगी।
(कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि इस दिन प्रातःकाल तक रहेगी।)

29/10/2025

गोपाष्टमी एक प्रमुख हिन्दू पर्व है जो भगवान श्रीकृष्ण और गायों (गोमाता) की पूजा से जुड़ा हुआ है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है — इसलिए इसका नाम गोपाष्टमी पड़ा है (“गो” = गाय, “अष्टमी” = आठवीं तिथि)।

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🌾 गोपाष्टमी का धार्मिक महत्व

मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पहली बार गायों को चराने का कार्य आरंभ किया था।

इससे पहले वे बछड़ों (वत्सों) को चराते थे, लेकिन इस दिन नंद महाराज ने उन्हें गौचर (गाय चराने) की अनुमति दी।

इसी कारण यह दिन गोपालकृष्ण के रूप में श्रीकृष्ण के जीवन का एक नया अध्याय माना जाता है।

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🐄 पूजा-विधि और परंपरा

1. प्रातःकाल स्नान के बाद गोमाता की पूजा की जाती है।

2. गायों को स्नान कराकर, उनके सींगों को सजाया जाता है और हार पहनाए जाते हैं।

3. गायों को हरी घास, गुड़, रोटी और अन्य प्रिय वस्तुएँ खिलाई जाती हैं।

4. लोग गोपाष्टमी व्रत करते हैं और गोपूजन, गोदान (गाय का दान) भी किया जाता है।

5. ब्रजभूमि (मथुरा–वृंदावन–गोवर्धन) में यह पर्व अत्यंत हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

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🌼 आध्यात्मिक संदेश

गोपाष्टमी हमें गाय के संरक्षण और सेवा का महत्व बताती है। हिन्दू धर्म में गाय को “कामधेनु” कहा गया है — जो सभी इच्छाएँ पूर्ण करने वाली मानी जाती है। गाय के प्रति श्रद्धा रखना धरती और जीवों के प्रति करुणा का प्रतीक है।

28/10/2025

छठ पूजा में उगते हुए सूर्य की पूजा का बहुत ही विशेष महत्व होता है 🌅।
यह पूजा छठ व्रत का अंतिम और सबसे पवित्र चरण मानी जाती है। आइए समझते हैं इसका अर्थ और विधि 👇

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🌞 उगते हुए सूर्य की पूजा (उषा अर्घ्य)

छठ पूजा के चौथे दिन सुबह व्रती उगते हुए सूर्य (सूर्यदेव) को अर्घ्य अर्पित करते हैं।

इसे उषा अर्घ्य कहा जाता है क्योंकि यह उषा काल यानी भोर के समय किया जाता है।

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🙏 पूजा की विधि

1. व्रती और उनके परिवारजन सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं।

2. व्रती सूर्य उगने से पहले घाट (नदी, तालाब या जलाशय) पर पहुँचते हैं।

3. वे टोकरी में प्रसाद रखते हैं — ठेकुआ, कच्चा दूध, गन्ना, नारियल, फल आदि।

4. सूर्य की पहली किरण पड़ते ही, व्रती जल में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं।

5. इसके साथ ही छठी मइया और सूर्यदेव से परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और संतान की रक्षा की प्रार्थना करते हैं।

6. अर्घ्य के बाद व्रती व्रत का पारण करते हैं (जल या प्रसाद ग्रहण करके व्रत समाप्त करते हैं)।

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🌸 आध्यात्मिक महत्व

उगते हुए सूर्य की पूजा नए आरंभ, प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक है।

यह विश्वास है कि सूर्य की किरणें शरीर और मन को शुद्ध करती हैं।

छठी मइया की कृपा से संतान, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

27/10/2025

छठ पूजा हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और लोकआस्था से जुड़ा पर्व है, जो सूर्य देव (भगवान भास्कर) और उनकी पत्नी छठी मैया (ऊषा देवी) को समर्पित होता है। यह पर्व मुख्यतः बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में बड़ी श्रद्धा और भक्ति से मनाया जाता है।

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🌞 छठ पूजा का महत्व:

छठ पूजा सूर्य देव की उपासना का पर्व है। सूर्य देव को जीवन, ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। यह व्रत करने से घर-परिवार में सुख-शांति आती है और संतान की दीर्घायु तथा उन्नति की कामना की जाती है।

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🪔 छठ पूजा की अवधि:

यह पर्व चार दिनों तक चलता है —

1. पहला दिन – नहाय खाय:
इस दिन व्रती स्नान कर के घर को शुद्ध करते हैं और शुद्ध भोजन (लौकी-चने की दाल और चावल) ग्रहण करते हैं।

2. दूसरा दिन – खरना:
शाम को व्रती निर्जला व्रत रखकर सूर्यास्त के बाद गुड़-चावल की खीर, रोटी और फल का प्रसाद बनाते हैं। इस प्रसाद के साथ व्रती का 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होता है।

3. तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य:
व्रती और भक्तजन नदी, तालाब या घाट पर जाकर अस्ताचलगामी सूर्य (डूबते सूरज) को अर्घ्य देते हैं और छठी मैया से आशीर्वाद मांगते हैं।

4. चौथा दिन – उषा अर्घ्य:
सुबह-सुबह व्रती उदीयमान सूर्य (उगते सूरज) को अर्घ्य देकर पूजा समाप्त करते हैं। इसके बाद पारण करके व्रत पूरा किया जाता है।

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🌾 छठ पूजा में प्रमुख सामग्री:

ठेकुआ (मुख्य प्रसाद)

गुड़, गन्ना, नारियल, केला, सेब

पांच प्रकार के फल

सूप और डाला (बाँस से बना)

दीया, हल्दी, अदरक, सिंदूर आदि

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🙏 छठी मैया से जुड़ी मान्यता:

माना जाता है कि छठी मैया, सूर्य देव की बहन हैं, जो अपने भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी करती हैं और उनके जीवन से रोग, दुःख और अशुभता दूर करती हैं।

23/10/2025

भैयाभैया दूज (जिसे भाई दूज, भ्रातृ द्वितीया या यम द्वितीया भी कहा जाता है) हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है जो दीपावली के दो दिन बाद मनाया जाता है। यह पर्व भाई और बहन के प्रेम का प्रतीक है।

🌸 भैया दूज का महत्व:

भैया दूज के दिन बहन अपने भाई को तिलक लगाकर उसकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना करती है। भाई भी अपनी बहन को उपहार देता है और उसकी रक्षा का वचन देता है।

📖 भैया दूज की पौराणिक कथा:

कथा के अनुसार यमराज अपनी बहन यमुनाजी के घर भोजन करने गए थे। यमुनाजी ने स्नान, तिलक और भोजन से उनका स्वागत किया। प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि जो भी भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर भोजन करेगा, उसे यमलोक का भय नहीं रहेगा। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

🕯️ पूजा विधि:

1. भाई को आसन पर बैठाकर बहन उसके हाथ-पैर धोती है।

2. तिलक, अक्षत, पुष्प और मिठाई से पूजा करती है।

3. आरती उतारकर भाई के मस्तक पर चंदन या रोली से तिलक लगाती है।

4. भाई बहन को उपहार या पैसे देता है।

5. फिर दोनों साथ भोजन करते हैं।

22/10/2025

बहुत अच्छा प्रश्न 🙏

आपने सही कहा — कुछ क्षेत्रों में विश्वकर्मा पूजा कार्तिक मास की प्रतिपदा तिथि (यानी दीपावली के अगले दिन, जिसे गोवर्धन पूजा भी कहा जाता है) के दिन मनाई जाती है।

🌞 कार्तिक प्रतिपदा पर विश्वकर्मा पूजा

भारत के उत्तर भारत, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई हिस्सों में
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा की परंपरा है।
यह वही दिन होता है जब लोग गोवर्धन पूजा और अन्नकूट उत्सव भी करते हैं।

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🛠️ इस दिन विश्वकर्मा पूजा क्यों?

माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने इस दिन द्वारका नगरी का निर्माण पूरा किया था।

इसलिए इस दिन शिल्प, उद्योग, व्यापार और निर्माण कार्यों से जुड़े लोग अपने औज़ार, मशीन, वाहन आदि की पूजा करते हैं।

यह दिन सृजन, कौशल और नवचेतना का प्रतीक माना जाता है।

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🕉️ पूजा विधि (कार्तिक प्रतिपदा पर)

1. सुबह स्नान कर घर या कार्यस्थल की सफाई करें।

2. भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

3. फूल, अक्षत, हल्दी, कुंकुम, दीपक, और नैवेद्य से पूजा करें।

4. औज़ार, मशीन, वाहन पर रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।

5. अंत में आरती कर प्रसाद बाँटें और अपने कार्य में सफलता की प्रार्थना करें।

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🌺 विशेष महत्व

यह दिन कर्म और सृजन की आराधना का प्रतीक है।

मजदूर, इंजीनियर, तकनीकी पेशेवर, कलाकार — सभी इस दिन भगवान विश्वकर्मा से प्रेरणा लेते हैं।

माना जाता है कि इस दिन पूजा करने से कार्य में सिद्धि, सफलता और सुरक्षा प्राप्त होती है।

21/10/2025

गोवर्धन पूजा हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो दीपावली के अगले दिन, यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाकर इंद्र देव के गर्व को तोड़ने की कथा से इसका संबंध है।

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🌿 गोवर्धन पूजा का महत्व

गोवर्धन पूजा का मुख्य उद्देश्य प्रकृति, पशुधन और अन्न के प्रति आभार व्यक्त करना है। यह पर्व बताता है कि हमें अपनी प्रकृति और धरती माता की पूजा करनी चाहिए क्योंकि वही हमारे जीवन का आधार हैं।

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📖 गोवर्धन पूजा की कथा

कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि वृंदावनवासी हर वर्ष इंद्र देव की पूजा करते हैं, तो उन्होंने लोगों से कहा कि हमें इंद्र की नहीं, बल्कि गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि गोवर्धन हमें अन्न, जल और आश्रय देता है।
इंद्र इससे क्रोधित हुए और उन्होंने मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। तब श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और पूरे गाँव को उसकी शरण में ले लिया। सात दिन बाद इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने क्षमा मांगी।

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🙏 पूजा विधि

1. प्रातः स्नान कर भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा की तैयारी करें।

2. घर या आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाएं।

3. इसे फूल, जल, मिठाई, धूप, दीप और अन्नकूट (विभिन्न प्रकार के व्यंजन) से सजाएं।

4. पूजा के बाद आरती करें और परिवार व मित्रों के साथ अन्नकूट प्रसाद ग्रहण करें।

5. गायों की पूजा और उन्हें चारा खिलाना शुभ माना जाता है।

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🍛 अन्नकूट

इस दिन 56 प्रकार के व्यंजन (छप्पन भोग) भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाते हैं। इसे “अन्नकूट उत्सव” भी कहा जाता है।

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🌸 महत्वपूर्ण संदेश

गोवर्धन पूजा हमें सिखाती है कि प्रकृति और पर्यावरण का सम्मान करें, अहंकार का त्याग करें और सहयोग एवं संरक्षण का मार्ग अपनाएं।

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21/10/2025

बड़ी दिवाली (जिसे दीपावली या लक्ष्मी पूजा भी कहा जाता है) भारत का सबसे बड़ा और पवित्र त्योहार है। यह कार्तिक माह की अमावस्या को मनाया जाता है — आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में।

यहाँ बड़ी दिवाली के मुख्य पहलू दिए गए हैं 👇

🌟 महत्व

इस दिन भगवान श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे।

माता लक्ष्मी जी का प्राकट्य भी इसी दिन समुद्र मंथन से हुआ था।

इसलिए इस दिन धन, समृद्धि और उजाले का उत्सव मनाया जाता है।

🪔 पूजा विधि

1. घर को साफ़-सुथरा करके दीपों और रंगोली से सजाया जाता है।

2. संध्या के समय भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है।

3. नवीन खाते-बही (व्यवसायिक लेखे) की शुरुआत शुभ मानी जाती है।

4. पूजा के बाद दीप जलाकर घर के कोनों में रखे जाते हैं।

5. मिठाई और उपहार बांटकर परिवार व मित्रों संग खुशियाँ मनाई जाती हैं।

✨ मुख्य परंपराएँ

दीप जलाना अंधकार और अज्ञान को दूर करने का प्रतीक है।

आतिशबाज़ी, सजावट, और परिवारिक मिलन से वातावरण उल्लासपूर्ण हो जाता है।

अगले दिन गोवर्धन पूजा और फिर भाई दूज का त्योहार मनाया जाता है।

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