29/10/2016
जरूर पढें - (दीपावली का वास्तविक अर्थ और महत्व ) लेखक - सोमवीर आर्य( दिल्ली विश्वविद्यालय ) आप सभी को प्राचीन आर्य पर्व शारदीय नवस्येष्टि पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें !! ये पर्व मुख्य रूप से वैश्य वर्ग का है ! बाकि के तीनों वर्ण इसे मिलकर साथ मनाते है ! नवीन फसल घर आने पर सबसे पहले किसान हवन कुंड में आहुति प्रदान कर देवताओं को भोग लगा फिर खुद खाता है हमारे यहां खाकर खिलाने की परंपरा रही है , और इस दिन वैश्य संकल्प लेता था हवन मे आहुतियां प्रदान करते हुए की मैं मेरे देश मे अन्न और धन की कमी नही रहने दूंगा , खूब पुरूषार्थ कर अन्न धन कमाऊंगा ! यह पर्व संकल्प का पर्व है ! इस दिन वातावरण की शुद्धि के लिए पवित्र वेद मंत्रों से हवन होता था , और देशी घी के दीये जलाये जाते थे ताकि अंधकार का नाश हो , अंधकार हमारे भीतर का भी जब हवन मे पुनीत भावना से आहुतियां प्रदान करते थे तो दुरित भावनाओं का निष्कासन होता था , और पुनीत भावना हृदय पटल पर अंकित होती थी !! असतो मां सद्गमय । तमसो मां ज्योतिर्गमय ! मृत्योर्मा अमृतं गमय !! हे ईश्वर हमे असत्य से सत्य की ओर अंधकार से प्रकाश की ओर मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो !! हवन और देशी घी के दीयों के प्रकाश और सुगंधि से वातावरण शुद्ध होता था !! और आज ही के दिन लाखों लोगों के जीवन मे अंधकार को प्रकाश मे परिवर्तित करने वाले लाखों दीये जलाने , वाले स्त्रियों शूद्रों को उनके अधिकार दिलाने वाले ,वेदों को पुन: गौरव और सम्मान दिलाने वाले , सर्वप्रथम स्वराज्य का मंत्र गूंजाने वाले , हमारे महापुरूषों के सही चरित्र को हमारे सामने रखने वाले , अनुपम दया के धनी और जिनका नाम स्मरण आते ही मस्तक स्वयं श्रद्धा से झूक जाता है और शरीर के रोंगटे खडे़ हो जाते है और मेरे जैसे लाखों बच्चों का रोम -रोम जिनका कर्ज़दार है - महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का निर्वाण पर्व भी है ।महावीर स्वामी भी इसी दिन निर्वाण को प्रभावित हुए थे ! हर तरह से यह त्यौहार प्रेरणा , प्रकाश , संकल्प का त्यौहार है ! पर आज हमने इस पर्यावरण कि दृष्टि से सबसे पवित्र प्रकाशमय दिन को सबसे दुषित दिन बना दिया है ! हवन हम छोड़ चुके हैं , देशी घी के दीयों की जगह बिजली की लड़ियों ने ले ली है ! पटाखों का तो कोई संबंध ही इस त्यौहार के साथ नही था पर आज सबसे ज्यादा प्रदूषण इसी त्यौहार पर होता है ! और पहले ये सबसे शुद्ध दिन होता था , यानि बिल्कुल उल्टा हो रहा है ! हम अपनी संस्कृति एवं परंपराओं के बिल्कुल उल्टा जी रहे हैं ! हम ना राम की मानते है ना कृष्ण की बस उनका भक्त होने का ढोंग करते हैं ! आओ हवन करके संकल्प लेकर ईश्वर से प्रार्थना कर , देशी घी के दीये जला वातावरण को शुद्ध एवं रोगमुक्त कर दीपावली वैसे मनाये जैसे हमारे महापुरूष भगवान् राम और श्रीकृष्ण मनाते थे !! और अपने महापुरूषों को नमन् करे ! और एक दीपक उनके लिए जलायें जो माईनस ३५° और ५५ डिग्री तापमान मे खडे होते है जिनकी वजह से देश मे शांति और हमारे घरों मे उजियाला है ! उन वीर सैनिकों के शौर्य को प्रकाश पर्व समर्पित करें ,और संकल्प ले मातृभूमि को कभी जरूरत पडी तो हम पिच्छे नही हटेगें !!! जिनको दीपावली पर्व का अर्थ ही नही पता और पटाखे फोड़कर शौर मचाना और गालियां देना ही जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य है ,उनकी गालियां विनम्रता के साथ स्वीकार की जायेगीं , क्योकिं व्यक्ति के पास जो देने को होता है वही देता है ! आपको पुन: इस दीपों के और प्रेरणा पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें -Somveer arya (writer )