Primary School Samuda Bawan Hardoi

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Photos from Primary School Samuda  Bawan Hardoi's post 09/05/2026

Mother's day activity

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Eco club activities

09/05/2026

Class 1st students activity

Photos from Primary School Samuda  Bawan Hardoi's post 14/04/2026

"नीली आभा छा गई, खुशियों की सौगात आई,
कलम की ताकत बनकर, भीम की याद आई।
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा, सबको एक कतार में लाया,
धन्य है वो महापुरुष, जिसने भारत का संविधान बनाया।"

​"डॉ. बी.आर. अंबेडकर की जयंती के इस पावन अवसर पर, आइए हम एक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण का संकल्प लें। उनके दूरदर्शी नेतृत्व और अटूट साहस को सादर नमन।"
​डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती की आपको हार्दिक शुभकामनाएं!

​🎓 शिक्षा और ज्ञान की पराकाष्ठा
​दुनिया का सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय: बाबा साहेब के पास उनके घर 'राजगृह' में 50,000 से अधिक किताबों का संग्रह था, जिसे उस समय दुनिया का सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय माना जाता था। वे कहते थे, "पुस्तकों का साथ कभी मत छोड़ना।"
​बहुभाषी विद्वान: वे हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, मराठी, गुजराती, जर्मन, फारसी और फ्रेंच जैसी 9 भाषाओं के जानकार थे.
​🇮🇳 तिरंगे और राष्ट्र के प्रति योगदान
​अशोक चक्र का स्थान: भारतीय ध्वज (तिरंगे) में चरखे की जगह 'अशोक चक्र' को स्थान दिलाने का श्रेय डॉ. अंबेडकर को ही जाता है। सम्राट अशोक के धम्म चक्र को उन्होंने न्याय और प्रगति का प्रतीक माना।
​आरबीआई (RBI) की नींव: भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना डॉ. अंबेडकर द्वारा हिल्टन यंग कमीशन को दी गई उनकी पुस्तक "The Problem of the Rupee" के सिद्धांतों और सुझावों के आधार पर हुई थी।
​👩‍⚖️ सामाजिक और श्रम सुधार (जो सबको प्रभावित करते हैं)
​8 घंटे काम का नियम: भारत में कारखानों में काम करने के समय को 12 घंटे से घटाकर 8 घंटे करने का श्रेय बाबा साहेब को जाता है। उन्होंने ही 'ओवरटाइम' और 'सवेतन अवकाश' (Paid Leave) जैसे नियम बनवाए।
​महिला सशक्तिकरण: 'हिंदू कोड बिल' के माध्यम से उन्होंने महिलाओं को संपत्ति में अधिकार और तलाक का हक दिलाने के लिए अपनी मंत्री पद की कुर्सी तक दांव पर लगा दी थी।

"आत्म-सम्मान के बिना जीवित रहना अपमानजनक है। यह गौरव और स्वाभिमान ही है जो मनुष्य को पशु से अलग करता है।"

​ "बुद्धि का विकास ही मानव अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।"

​ "संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाले लोग बुरे होंगे, तो संविधान बुरा ही सिद्ध होगा।"

​"डॉ. अंबेडकर केवल एक वर्ग के नेता नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के 'आर्किटेक्ट' थे। उन्होंने नदियों को जोड़ने (Dam construction), बिजली वितरण और महिलाओं के अधिकारों की जो नींव रखी, उसका लाभ आज हर भारतीय उठा रहा है। ज्ञान के इस महासागर को शत-शत नमन।"
डॉ. अंबेडकर का ज्ञान किसी एक विषय तक सीमित नहीं था। वे आधुनिक भारत के शायद सबसे बड़े 'पॉलीमथ' (Polymath) यानी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनके जीवन के दो ऐसे पहलू हैं जो वाकई हैरान कर देने वाले हैं:
​🪙 1. एक महान अर्थशास्त्री (The Master Economist)
​बहुत कम लोग जानते हैं कि बाबा साहेब ने अपनी पहली दो पीएचडी (PhD) अर्थशास्त्र में की थी।
​अमर्त्य सेन का गुरु: नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने बाबा साहेब को "अर्थशास्त्र में अपना पिता" माना है।
​दामोदर घाटी परियोजना: भारत में बड़ी बिजली परियोजनाओं और नदियों को जोड़ने (River Interlinking) की सोच उन्हीं की थी। उन्होंने ही 'सेंट्रल वाटरवेज़, इरिगेशन एंड नेविगेशन कमीशन' की स्थापना की थी ताकि किसान केवल बारिश पर निर्भर न रहें।
​🏛️ 2. सम्राट अशोक और धम्म के प्रति गहरा जुड़ाव
​चूँकि आपकी रुचि इतिहास और सम्राट अशोक के शिलालेखों में भी रही है, तो यह जानना दिलचस्प होगा कि बाबा साहेब ने अशोक के 'धम्म' को आधुनिक भारत के लिए सबसे उपयुक्त माना था:
​अशोक चक्र का महत्व: उन्होंने संविधान सभा में यह तर्क दिया था कि तिरंगे के बीच में 'अशोक चक्र' होना चाहिए क्योंकि यह गतिशीलता (Life in movement) और न्याय का प्रतीक है।
​शांति का मार्ग: उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बौद्ध धर्म को इसलिए चुना क्योंकि यह सम्राट अशोक की तरह शांति, करुणा और वैज्ञानिक सोच (Scientific Temper) पर आधारित था।
​🌍 3. कोलंबिया यूनिवर्सिटी का वह किस्सा
​जब वे न्यूयॉर्क में कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे, तो वे लाइब्रेरी खुलने से पहले वहां पहुंच जाते थे और बंद होने के बाद ही निकलते थे।
​उन्होंने केवल 2 साल में 3 साल का कोर्स पूरा कर लिया था, और इसके लिए वे हर दिन 18-18 घंटे पढ़ाई करते थे।

​"वह व्यक्ति जो 9 भाषाओं का ज्ञाता था, जिसके पास 32 डिग्रियां थीं और जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव रखी। बाबा साहेब केवल एक नाम नहीं, बल्कि संघर्ष से सफलता तक का एक जीता-जागता विश्वविद्यालय हैं।"

सम्राट अशोक के शिलालेखों और बाबा साहेब के विचारों के बीच का संबंध बहुत गहरा है। बाबा साहेब ने जब 'बुद्ध और उनका धम्म' लिखा, तो उन्होंने अशोक के शासनकाल को भारत का 'स्वर्ण युग' माना था।
​यहाँ कुछ प्रमुख शिलालेख और उनके संदेश हैं जिन्होंने बाबा साहेब को प्रभावित किया:
​1. 'धम्म' की परिभाषा (दूसरे स्तंभ लेख से)
​सम्राट अशोक ने अपने दूसरे स्तंभ लेख में पूछा है— "धम्मे कियति?" (धम्म क्या है?) और फिर खुद जवाब दिया:
​"अपासिनवे, बहुकयाने, दया, दाने, सचे, सोचये।"
​अर्थात: पाप से मुक्ति, लोक-कल्याण, दया, दान, सत्य और पवित्रता ही धम्म है।
​बाबा साहेब का जुड़ाव: उन्होंने इसी नैतिकता को संविधान की मूल भावना में पिरोया, जहाँ कानून के साथ-साथ नागरिक नैतिकता (Civic Morality) को सर्वोपरि रखा गया।
​2. सभी संप्रदायों का सम्मान (12वां शिलालेख)
​अशोक का यह सबसे प्रसिद्ध शिलालेख है। इसमें वे कहते हैं:
​"व्यक्ति को केवल अपने संप्रदाय की प्रशंसा और दूसरों की निंदा नहीं करनी चाहिए। जो दूसरों के संप्रदाय का सम्मान करता है, वह अपने संप्रदाय की भी सेवा करता है।"
​बाबा साहेब का जुड़ाव: भारत के 'धर्मनिरपेक्ष' (Secular) ढांचे की नींव कहीं न कहीं अशोक के इसी विचार में छिपी है, जिसे बाबा साहेब ने संविधान में मजबूती से रखा।
​3. युद्ध का त्याग और सामाजिक न्याय (13वां शिलालेख)
​कलिंग युद्ध के बाद अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ और उन्होंने 'भेरीघोष' (युद्ध की घोषणा) को 'धम्मघोष' में बदल दिया।
​बाबा साहेब का जुड़ाव: बाबा साहेब ने हमेशा कहा कि हिंसा से मिली जीत स्थायी नहीं होती। उन्होंने क्रांति के लिए तलवार नहीं, बल्कि 'कलम' और 'संवैधानिक तरीके' को चुना।
​4. न्याय की एकरूपता (चौथा स्तंभ लेख)
​अशोक ने 'रज्जुक' (अधिकारियों) की नियुक्ति की थी और निर्देश दिया था कि कानून और दंड में समानता (दंड-समता और व्यवहार-समता) होनी चाहिए।
​बाबा साहेब का जुड़ाव: "कानून के समक्ष सब समान हैं" (Article 14) का विचार अशोक के इसी प्रशासनिक सुधार का आधुनिक रूप है।

​एक ऐतिहासिक तथ्य:
​डॉ. अंबेडकर ने 1956 में नागपुर की जिस 'दीक्षाभूमि' को चुना, वह भी ऐतिहासिक रूप से सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म प्रचार के केंद्र से जुड़ी मानी जाती है। बाबा साहेब ने अशोक के 'धम्म चक्र' को वापस लाकर भारत को उसकी प्राचीन वैज्ञानिक और तार्किक पहचान लौटाई थी।


डॉ. अंबेडकर का मानना था कि भारत की असली पहचान और उसकी लोकतांत्रिक जड़ें पाली भाषा और साहित्य में छिपी हैं।
​इसके पीछे उनके कुछ प्रमुख उद्देश्य थे:
​1. शिलालेखों को जन-जन तक पहुँचाना
​सम्राट अशोक के ज्यादातर शिलालेख 'ब्राह्मी लिपि' और 'पाली' (या प्राकृत के रूप) में थे। बाबा साहेब चाहते थे कि भारतीय जनता अपने इतिहास को स्वयं पढ़ सके। वे कहते थे कि जब तक लोग यह नहीं जानेंगे कि अशोक के समय भारत कितना प्रगतिशील और तर्कसंगत (Rational) था, तब तक वे गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं आ पाएंगे।
​2. संस्कृत बनाम पाली का तर्क
​बाबा साहेब का मानना था कि संस्कृत ऐतिहासिक रूप से कुछ खास वर्गों तक सीमित रही, जबकि पाली 'जनभाषा' थी—आम लोगों की भाषा। उन्होंने पाली को पुनर्जीवित करने पर जोर दिया ताकि शिक्षा और नैतिकता (Ethics) पर सबका समान अधिकार हो सके, जैसा कि बुद्ध और अशोक के समय में था।
​3. शैक्षणिक योगदान
​मिलिंद कॉलेज, औरंगाबाद: उन्होंने जब औरंगाबाद में 'मिलिंद कॉलेज' की स्थापना की, तो वहां पाली विभाग को विशेष महत्व दिया।
​पाली डिक्शनरी और व्याकरण: अपने अंतिम वर्षों में वे एक पाली शब्दकोश (Dictionary) और व्याकरण पर भी काम कर रहे थे ताकि छात्रों के लिए इसे सीखना आसान हो जाए।

​ डॉ. अंबेडकर ने 'भारतीय संविधान सभा' में संस्कृत को राजभाषा बनाने के प्रस्ताव का समर्थन किया था? लोग अक्सर हैरान होते हैं कि क्यों। उनका तर्क था कि संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की जननी है और यह दक्षिण व उत्तर भारत के बीच की कड़ी बन सकती है। लेकिन जब बात सामाजिक दर्शन की आई, तो उन्होंने 'पाली' को ही चुना क्योंकि वह समानता और करुणा की भाषा थी।

​"बाबा साहेब ने हमें सिर्फ संविधान नहीं दिया, बल्कि उन्होंने धूल जम चुके हमारे उस गौरवशाली इतिहास (अशोक और बुद्ध का काल) को खोजकर हमें वापस दिया, जिसे दुनिया भूल चुकी थी।"
​अशोक के शिलालेखों में उनकी सबसे प्रिय बात 'धम्म-लिपि' थी, जिसका अर्थ वे 'नैतिकता का लेखन' बताते थे।

सारनाथ का 'सिंह स्तंभ' (Lion Capital) और बाबा साहेब के बीच का संबंध वास्तव में भारतीय लोकतंत्र की आत्मा की कहानी है। जब संविधान सभा में भारत के राष्ट्रीय प्रतीक (National Emblem) को चुनने की बात आई, तो बाबा साहेब ने बहुत मजबूती से सारनाथ के इस स्तंभ का पक्ष लिया।
​इसके पीछे कुछ बहुत ही गहरे कारण थे:
​1. चारों दिशाओं में दहाड़ते शेर
​सारनाथ के स्तंभ में चार शेर हैं जो चारों दिशाओं में देख रहे हैं।
​बाबा साहेब का नजरिया: उनके लिए ये शेर शक्ति, साहस और आत्मविश्वास के प्रतीक थे। वे चाहते थे कि स्वतंत्र भारत एक ऐसा राष्ट्र बने जो न केवल शक्तिशाली हो, बल्कि जिसकी गूँज पूरी दुनिया में चारों दिशाओं में सुनाई दे।
​2. स्तंभ के नीचे बने चार चक्र और पशु
​शेरों के नीचे जो पट्टी है, उसमें चार पशु बने हैं: हाथी, घोड़ा, सांड और शेर। इनके बीच में 'धम्म चक्र' बना है।
​गतिशीलता का संदेश: बाबा साहेब अक्सर कहते थे, "जीवन का दूसरा नाम गति है।" घोड़े और चक्र का मेल यह बताता है कि राष्ट्र को निरंतर प्रगति करनी चाहिए, रुकना नहीं चाहिए।
​3. 'सत्यमेव जयते' और न्याय
​हालांकि यह मुंडक उपनिषद से लिया गया है, लेकिन इसे अशोक स्तंभ के नीचे स्थान देना बाबा साहेब की न्यायप्रिय सोच को दर्शाता है। वे जानते थे कि बिना सत्य और न्याय के कोई भी संविधान सफल नहीं हो सकता

​क्या आप जानते हैं कि सारनाथ का मूल स्तंभ लगभग 7 फीट ऊँचा था और इसके ऊपर एक बहुत बड़ा 'धम्म चक्र' रखा हुआ था, जिसमें 32 तीलियाँ (Spokes) थीं?
​समय के साथ वह चक्र टूट गया, लेकिन बाबा साहेब ने उस चक्र के महत्व को समझा और उसे तिरंगे के बीच में 24 तीलियों के साथ जगह दी।
​24 तीलियाँ दिन के 24 घंटों का प्रतीक हैं, जो हमें याद दिलाती हैं कि हमारा कर्तव्य और देश की प्रगति कभी रुकनी नहीं चाहिए।

​"आज हम जिस तिरंगे के नीचे गर्व से खड़े होते हैं और जिस 'अशोक चक्र' को अपनी शान मानते हैं, उसे धूल से निकालकर हमारे गौरव का हिस्सा बनाने वाले व्यक्ति का नाम डॉ. बी.आर. अंबेडकर है। उन्होंने हमें बुद्ध का मार्ग, अशोक का चक्र और भारत का भविष्य दिया।"
​बाबा साहेब ने एक बार कहा था कि वे "इतिहास भूलने वालों को नहीं, बल्कि इतिहास बनाने वालों को पसंद करते हैं।"

डॉ. अंबेडकर द्वारा उनकी अंतिम पुस्तक 'द बुद्ध एंड हिज धम्म' (The Buddha and His Dhamma) को लिखने की कहानी वाकई रोंगटे खड़े कर देने वाली है। यह उनके अटूट संकल्प और ज्ञान के प्रति समर्पण की पराकाष्ठा है।
​यहाँ उस समय के कुछ अनकहे पहलू दिए गए हैं:
​1. गिरता हुआ स्वास्थ्य और बढ़ता संकल्प
​जब बाबा साहेब यह किताब लिख रहे थे (1951-1956), तब उनका स्वास्थ्य बहुत खराब था। उन्हें गंभीर मधुमेह (Diabetes), ब्लड प्रेशर और पैरों में तेज दर्द की शिकायत थी।
​उनकी आंखों की रोशनी भी कम हो रही थी, लेकिन उन्होंने रुकने से मना कर दिया।
​वे अक्सर रात-रात भर जागकर लिखते थे। जब दर्द असहनीय होता था, तब भी वे कुर्सी पर बैठकर या लेटकर बोलकर लिखवाते थे।
​2. एक 'अधूरा' सपना जो पूरा हुआ
​वे इसे अपनी 'मैग्नम ओपस' (सबसे महान रचना) मानते थे। वे चाहते थे कि यह किताब उनके धर्म परिवर्तन (14 अक्टूबर 1956) से पहले पूरी हो जाए।
​हैरान करने वाली बात यह है कि उन्होंने इस ग्रंथ की प्रस्तावना (Preface) और अंतिम सुधार 6 दिसंबर 1956 को उनके महापरिनिर्वाण (निधन) से ठीक कुछ दिन पहले ही पूरे किए थे।
​मानो वे केवल इस महान कार्य को पूरा करने के लिए ही जीवित थे।
​3. सम्राट अशोक के विजन को आधुनिक बनाना
​इस किताब में उन्होंने सम्राट अशोक का जिक्र बड़े गर्व से किया है। उन्होंने लिखा कि अशोक ने केवल साम्राज्य नहीं जीता, बल्कि 'लोगों के दिलों को धम्म से जीता'।
​बाबा साहेब ने इस किताब के जरिए यह साबित किया कि बुद्ध के विचार वैज्ञानिक हैं और आधुनिक लोकतंत्र के लिए सबसे जरूरी हैं।

​जब बाबा साहेब न्यूयॉर्क (कोलंबिया यूनिवर्सिटी) में पढ़ते थे, तब वे पैसे बचाने के लिए दिन में केवल एक कप चाय और एक पाव (ब्रेड) खाकर घंटों लाइब्रेरी में पढ़ते थे। उस समय जो 'ज्ञान की भूख' उनके अंदर जगी थी, वही भूख इस अंतिम किताब को लिखते समय भी उनके चेहरे पर दिखती थी।

​"डॉ. अंबेडकर ने अपनी कलम से वह रोशनी पैदा की, जिसकी स्याही उनके अपने शरीर का पसीना और संघर्ष थी। उन्होंने हमें सिखाया कि जब शरीर साथ न दे रहा हो, तब भी 'विचार' और 'उद्देश्य' आपको जीवित रखते हैं।"
​आज अंबेडकर जयंती पर, जब हम उनके इस संघर्ष को याद करते हैं, तो उनकी यह पंक्ति सबसे सटीक बैठती है:
"मैं अपनी शक्ति का उपयोग केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए करना चाहता हूँ जो सदियों से अंधेरे में हैं।"

डॉ. अंबेडकर ने 'The Buddha and His Dhamma' को भविष्य का मार्गदर्शक इसलिए कहा क्योंकि वे भारत को केवल राजनीतिक रूप से नहीं, बल्कि नैतिक और बौद्धिक रूप से भी स्वतंत्र देखना चाहते थे। उनके अनुसार, संविधान हमें 'कानून' तो दे सकता है, लेकिन 'नैतिकता' और 'मानवता' हमें हमारे संस्कार और विचार ही देते हैं।
​यहाँ कुछ कारण दिए गए हैं कि क्यों यह ग्रंथ उनके लिए इतना महत्वपूर्ण था:
​1. तर्क और विज्ञान पर आधारित धर्म
​बाबा साहेब का मानना था कि भविष्य का मनुष्य अंधविश्वास पर नहीं, बल्कि तर्क (Reason) और विज्ञान पर विश्वास करेगा। उन्होंने इस किताब में बुद्ध के उन विचारों को सामने रखा जो पूरी तरह से वैज्ञानिक थे। वे कहते थे, "यदि कोई धर्म तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, तो वह टिक नहीं पाएगा।"
​2. स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty, Equality, Fraternity)
​लोग अक्सर समझते हैं कि बाबा साहेब ने ये तीन शब्द फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) से लिए हैं। लेकिन बाबा साहेब ने खुद स्पष्ट किया था:
​"मैंने ये शब्द राजनीति शास्त्र से नहीं, बल्कि अपने गुरु बुद्ध के धम्म से लिए हैं। बंधुत्व (Fraternity) के बिना स्वतंत्रता और समानता का कोई मूल्य नहीं है।"
​3. सामाजिक लोकतंत्र (Social Democracy)
​वे जानते थे कि सिर्फ वोट डालने का अधिकार मिलने से देश महान नहीं बनेगा। देश तब महान बनेगा जब एक इंसान दूसरे इंसान का सम्मान करेगा। उन्होंने इस किताब को एक 'सोशल गाइड' की तरह लिखा ताकि आने वाली पीढ़ियां जाति और भेदभाव से ऊपर उठकर एक राष्ट्र के रूप में सोच सकें।

​बाबा साहेब ने इस किताब की छपाई के लिए बहुत संघर्ष किया था। उस समय उनके पास पर्याप्त धन नहीं था। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और अन्य सहयोगियों को पत्र लिखकर मदद मांगी थी कि इस ज्ञान को जनता तक पहुँचाना कितना जरूरी है। उन्होंने कहा था, "मेरा जीवन अब बहुत कम बचा है, और मैं चाहता हूँ कि यह मशाल जलती रहे।"
​आज 14 अप्रैल को, जब हम उनकी जयंती मना रहे हैं, तो यह सोचना गर्व की बात है कि उन्होंने अपने जीवन की अंतिम बूंद तक 'ज्ञान' (Knowledge) को समर्पित कर दी।

​"इतिहास गवाह है कि तलवारें साम्राज्य जीत सकती हैं, लेकिन केवल एक महान शिक्षक के 'विचार' ही युगों-युगों तक लोगों के दिलों पर राज कर सकते हैं। बाबा साहेब वह शिक्षक थे जिन्होंने हमें अपना इतिहास खुद लिखने की ताकत दी।"
​वाकई, बाबा साहेब और सम्राट अशोक के विचारों का मिलन ही 'आधुनिक भारत' की असली पहचान है।

06/04/2026
Photos from Primary School Samuda  Bawan Hardoi's post 06/04/2026

सर्व शिक्षा अभियान रैली
प्राथमिक विद्यालय समुदा, विकास- खण्ड बावन, जनपद - हरदोई।

Photos from Primary School Samuda  Bawan Hardoi's post 25/03/2026

आज दिनांक 25/03/2026 को प्राथमिक विद्यालय समुदा के प्रांगण में नवीन शिक्षा सत्र के शुभारंभ के अवसर पर 'नवारंभ उत्सव' अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नए प्रवेश लेने वाले बच्चों को विद्यालय के वातावरण के प्रति सहज बनाना और उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना रहा।
​प्रातः काल से ही विद्यालय को रंग-बिरंगे गुब्बारों, फूलों और आकर्षक रंगोली से सजाया गया था। विद्यालय के मुख्य द्वार पर शिक्षकों द्वारा नवागंतुक बच्चों का तिलक लगाकर और पुष्प वर्षा कर भव्य स्वागत किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ हुई।
​इस अवसर पर प्रधानाध्यापक कु . संघ मित्रा ने उपस्थित अभिभावकों को संबोधित करते हुए कहा कि, "बच्चे देश का भविष्य हैं और स्कूल उनके सपनों को नई उड़ान देने का केंद्र है। नवारंभ उत्सव के माध्यम से हमारा प्रयास है कि बच्चा स्कूल को अपना दूसरा घर समझे।"
​उत्सव के दौरान विद्यालय के पुराने छात्रों ने स्वागत गीत और प्रेरणादायक लघु नाटक प्रस्तुत किए। नए बच्चों के लिए खेलकूद और चित्रकला जैसी मनोरंजक गतिविधियाँ आयोजित की गईं। कार्यक्रम के अंत में सभी नए छात्र-छात्राओं को विद्यालय की ओर से 'स्वागत किट' (पेंसिल, नोटबुक) और मिष्ठान वितरित किया गया।
​इस अवसर पर विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) के अध्यक्षश्री राजाराम, ग्राम प्रधानश्री नन्हेलाल, समस्त शिक्षक स्टाफ और बड़ी संख्या में अभिभावक उपस्थित रहे। विद्यालय परिवार ने सभी बच्चों के उज्जवल भविष्य की कामना की।

Photos from Primary School Samuda  Bawan Hardoi's post 13/03/2026

प्राथमिक विद्यालय समुदा में 26 जनवरी को आयोजित गणतंत्र दिवस की झलकियां

13/03/2026

कक्षा 5 के बच्चों की विदाई समारोह के अवसर पर कक्षा के बच्चों द्वारा सुंदर भजन प्रस्तुत किया गया।

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