30/06/2025
प्यारे बच्चों नमस्कार।
बच्चों आप सभी के कहने पर UP -SI का बैच हम लोग प्रारम्भ कर रहे हैं । समय के अभाव के चलते ये बैच साप्ताहिक रहेगा जिसमें शनिवार और रविवार को 4 -4 घंटे की क्लासेज रहेंगी।
आप सभी लोग जानते हैं कि UP SI अन्य परीक्षाओं से एक दम भिन्न है ऐसे में बहुत गंभीर और गहन परिश्रम की आवश्यकता है इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए बैच में केवल 50 विद्यार्थियों को ही शामिल करने का निर्णय लिया गया है ऐसे में आप लोग शीघ्र ही अपने एडमिशन को नीचे दिए गए नंबर पे व्हाट्स अप करके सुनिश्चित कर लें।
बैच की डिटेल आपको शीघ्र ही प्रेषित की जाएगी।
व्हाट्स अप नंबर -9627698560
02/05/2025
प्यारे बच्चों नमस्कार।
दिल्ली पुलिस की आगमी भर्ती हेतु तीसरा बैच 5 मई 2025 से प्रातः 8.30 से प्रारंभ हो रहा है।
ये बैच उन छात्रों के लिए अत्यधिक उपयोगी है जो अपने संपूर्ण समर्पण भाव से अध्ययनरत है तथा अपने लक्ष्य के प्रति गंभीर है।
उम्मीद है आप भी ऐसा सोच रहे होंगे, ऐसे में सही मार्गदर्शन आपकी सफलता को और आसान कर सकता है।
13/03/2025
लगभग 3 ,4 दिनों से फेसबुक पे सामूहिक तस्वीरें दिखाई दे रही हैं, ये तस्वीरें सेल्फी के रूप में ली गईं हैं। पता है किसने ली ये तस्वीरें ,ध्यान से देखो जो आगे खड़ा है उस लड़के ने ली है तस्वीरें । कौन है ये लड़का? नाम कुछ भी हो उसका ,चिंटू,पिंटू ,कल्लू, सोनू ,गुप्ला, छोटा, नन्हें, गणेशा पर सब में एक बात एक जैसी है कि सब लड़के दीवाली के बाद किसी शहर में गए थे , और आज होली पे घर आए तो सबसे पहले अपने परिवार के साथ सेल्फी ली, घर आने पे इन सबके चेहरे की चमक देखने लायक है। 4 दिन त्यौहार मनाकर फिर मुरझाए मन से ये अपना बैग उठाकर चल देंगे शहर के लिए शरीर भले ही शहर में रहेगा लेकिन आत्म गांव में रहेगी। इंतजार करेंगे फिर दीवाली का और फिर से सबके साथ फोटो। यही जिंदगी है हम जैसे इन सभी लड़कों की। किसी शायर ने शायद ठीक ही लिखा है -
"अब तो खुद के घर भी मेहमान बन के आना जाना हुआ,
जब से शहर में कमाना हुआ।"
कमाना भी बहुत जरूरी है इसलिए घर तो छोड़ना पड़ेगा , होलिका माता से ये सदैव यही प्रार्थना है कि त्यौहार पे ही सही ,सबको घर आने का मौका दें। ये लड़की घिसते है स्वयं को शहरों में लेकिन ये चमकते सिर्फ गांव में ही हैं।
ये शहर में भले ही नौकर हों नौकरी करते हों लेकिन गांव के सही बादशाह ये लड़के ही हैं।
आप भी अगर इसी तरह से है तो फिर देर किस बात की निकालिए फोन और डालिए एक सेल्फी परिवार के साथ ।
26/10/2022
प्रभु श्री कृष्ण जिनका है नाम,
गोकुल जिनका है धाम,
ऐसे प्रभु श्री कृष्ण जी को
हम सब करें प्रणाम
गोवर्धन की हार्दिक शुभकामनाये
05/10/2022
दशहरा के इस दिन से अनन्त शत्रुओं और
नकारात्मक ऊर्जा पर विजय प्राप्त करके
अपने जीवन का एक नया अध्याय शुरू करें।
आपको दशहरा की शुभकामनाएं!
30/09/2022
विद्यार्थी अकादमी की फ्रीगंज रोड पर चल रही, सभी क्लासेज व ऑफिस को अब आवास विकास छोटे पुल के पास वाले हॉल पर सिफ्ट कर दिया गया है।
अतः सभी विद्याथी आवास विकास छोटे पुल के पास ही पधारे ।
19/08/2022
पारसी पंथ:
पारसी पंथ अथवा जोरोएस्ट्रिनिइजम फारस का राजपंथ हुआ करता था। यह ज़न्द अवेस्ता नाम के ग्रन्थ पर आधारित है। इसके संस्थापक ज़रथुष्ट्र हैं, इसलिये इसे ज़रथुष्ट्री पंथ भी कहते हैं। जोरोएस्ट्रिनिइजम दुनिया के सबसे पुराने एकेश्वरवादी धर्मों में से एक है। दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व की संभावित जड़ों के साथ, पारसी धर्म 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में लिखित इतिहास में प्रवेश करता है। यह लगभग 600 ईसा पूर्व से 650 सीई तक एक सहस्राब्दी से अधिक के लिए प्राचीन ईरानी साम्राज्यों के राज्य धर्म के रूप में कार्य करता था, लेकिन 633-654 के फारस की मुस्लिम विजय और पारसी लोगों के बाद के उत्पीड़न के बाद 7 वीं शताब्दी सीई से इसमें गिरावट आई। हाल के अनुमानों में पारसी की वर्तमान संख्या लगभग 110000–120000 है, जिसमें से अधिकांश भारत, ईरान और उत्तरी अमेरिका में रहते हैं; माना जाता है कि उनकी संख्या घट रही है।
17/08/2022
ब्रह्मपुत्र नदी:
ब्रह्मपुत्र एक नदी है। यह तिब्बत, भारत तथा बांग्लादेश से होकर बहती है। ब्रह्मपुत्र का उद्गम हिमालय के उत्तर में तिब्बत के पुरंग जिले में स्थित मानसरोवर झील के निकट होता है
ब्रह्मपुत्र के अन्य नाम:👉
☑️बांग्ला भाषा में जमुना के नाम से जानी जाती है।
☑️चीन में या-लू-त्सांग-पू चियांग या यरलुंग ज़ैगंबो जियांग कहते है।
☑️तिब्बत में यरलुंग त्संगपो या साम्पो के नाम से जानी जाती है।
☑️मध्य और दक्षिण एशिया की प्रमुख नदी कहते हैं।
☑️अरुणाचल में ब्रह्मपुत्र देहांग के नाम से जानी जाती है।
☑️असम में ब्रह्मपुत्र को ब्रह्मपुत्र कहते है।
☑️गंगा नदी को बांग्लादेश में पद्मा कहते है।
☑️ब्रह्मपुत्र को बांग्लादेश में जमुना कहा जाता है।
☑️गंगा और ब्रह्मपुत्र की संयुक्त धारा मेघना कहलाती है जिसकी सहायक नदी बराक है
09/08/2022
काकोरी कांड:
09 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों ने काकोरी में एक ट्रेन में डकैती डाली थी. इसी घटना को ‘काकोरी कांड’ के नाम से जाना जाता है. क्रांतिकारियों का मकसद ट्रेन से सरकारी खजाना लूटकर उन पैसों से हथियार खरीदना था ताकि अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध को मजबूती मिल सके. काकोरी ट्रेन डकैती में खजाना लूटने वाले क्रांतिकारी देश के विख्यात क्रांतिकारी संगठन ‘हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन’ (एचआरए) के सदस्य थे.
एचआरए की स्थापना 1923 में शचीन्द्रनाथ सान्याल ने की थी. इस क्रांतिकारी पार्टी के लोग अपने कामों को अंजाम देने के लिए धन इकट्ठा करने के उद्देश्य से डाके डालते थे. इन डकैतियों में धन कम मिलता था और निर्दोष व्यक्ति मारे जाते थे. इस कारण सरकार क्रांतिकारियों को चोर-डाकू कहकर बदनाम करती थी. धीरे-धीरे क्रांतिकारियों ने अपनी लूट की रणनीति बदली और सरकारी खजानों को लूटने की योजना बनाई. काकोरी ट्रेन की डकैती इसी दिशा में क्रांतिकारियों का पहला बड़ा प्रयास था.
बताते हैं कि काकोरी षडयंत्र के संबंध में जब एचआरए दल की बैठक हुई तो अशफाक उल्लाह खां ने ट्रेन डकैती का विरोध करते हुए कहा, ‘इस डकैती से हम सरकार को चुनौती तो अवश्य दे देंगे, परंतु यहीं से पार्टी का अंत प्रारंभ हो जाएगा. क्योंकि दल इतना सुसंगठित और दृढ़ नहीं है इसलिए अभी सरकार से सीधा मोर्चा लेना ठीक नहीं होगा.’ लेकिन अंततः काकोरी में ट्रेन में डकैती डालने की योजना बहुमत से पास हो गई.
इस ट्रेन डकैती में कुल 4601 रुपये लूटे गए थे. इस लूट का विवरण देते हुए लखनऊ के पुलिस कप्तान मि. इंग्लिश ने 11 अगस्त 1925 को कहा, ‘डकैत (क्रांतिकारी) खाकी कमीज और हाफ पैंट पहने हुए थे. उनकी संख्या 25 थी. यह सब पढ़े-लिखे लग रहे थे. पिस्तौल में जो कारतूस मिले थे, वे वैसे ही थे जैसे बंगाल की राजनीतिक क्रांतिकारी घटनाओं में प्रयुक्त किए गए थे.’
इस घटना के बाद देश के कई हिस्सों में बड़े स्तर पर गिरफ्तारियां हुई. हालांकि काकोरी ट्रेन डकैती में 10 आदमी ही शामिल थे, लेकिन 40 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया. अंग्रेजों की इस धरपकड़ से प्रांत में काफी हलचल मच गई. जवाहरलाल नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े-बड़े लोगों ने जेल में क्रांतिकारियों से मुलाकात की और मुकदमा लड़ने में दिलचस्पी दिखाई. वे चाहते थे कि उनका मुकदमा सुप्रसिद्ध वकील गोविंद वल्लभ पंत लडे़ं. लेकिन उनकी फीस ज्यादा होने के कारण अंततः यह मुकदमा कलकत्ता के बीके चौधरी ने लड़ा.
काकोरी कांड का ऐतिहासिक मुकदमा लगभग 10 महीने तक लखनऊ की अदालत रिंग थियेटर में चला (आजकल इस भवन में लखनऊ का प्रधान डाकघर है.). इस पर सरकार का 10 लाख रुपये खर्च हुआ. छह अप्रैल 1927 को इस मुकदमे का फैसला हुआ जिसमें जज हेमिल्टन ने धारा 121अ, 120ब, और 396 के तहत क्रांतिकारियों को सजाएं सुनाईं. इस मुकदमे में रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खां को फांसी की सजा सुनाई गई. शचीन्द्रनाथ सान्याल को कालेपानी और मन्मथनाथ गुप्त को 14 साल की सजा हुई. योगेशचंद्र चटर्जी, मुकंदीलाल जी, गोविन्द चरणकर, राजकुमार सिंह, रामकृष्ण खत्री को 10-10 साल की सजा हुई. विष्णुशरण दुब्लिश और सुरेशचंद्र भट्टाचार्य को सात और भूपेन्द्रनाथ, रामदुलारे त्रिवेदी और प्रेमकिशन खन्ना को पांच-पांच साल की सजा हुई.
फांसी की सजा की खबर सुनते ही जनता आंदोलन पर उतारू हो गई. अदालत के फैसले के खिलाफ शचीन्द्रनाथ सान्याल और भूपेन्द्रनाथ सान्याल के अलावा सभी ने लखनऊ चीफ कोर्ट में अपील दायर की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. 17 दिसंबर 1927 को सबसे पहले गांडा जेल में राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को फांसी दी गई. फांसी के कुछ दिनों पहले एक पत्र में उन्होंने अपने मित्र को लिखा था, ‘मालूम होता है कि देश की बलिवेदी को हमारे रक्त की आवश्यता है. मृत्यु क्या है? जीवन की दूसरी दिशा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं. यदि यह सच है कि इतिहास पलटा खाया करता है तो मैं समझता हूं, हमारी मृत्यु व्यर्थ नहीं जाएगी, सबको अंतिम नमस्ते.’
19 दिसंबर, 1927 को पं. रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी दी गई. उन्होंने अपनी माता को एक पत्र लिखकर देशवासियों के नाम संदेश भेजा और फांसी के तख्ते की ओर जाते हुए जोर से ‘भारत माता’ और ‘वंदेमातम्’ की जयकार करते रहे. चलते समय उन्होंने कहा -
मालिक तेरी रजा रहे और तू ही रहे,
बाकी न मैं रहूं, न मेरी आरजू रहे.
जब तक कि तन में जान, रगों में लहू रहे
तेरा हो जिक्र या, तेरी ही जुस्तजू रहे.
फांसी के दरवाजे पर पहुंचकर बिस्मिल ने कहा, ‘मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं.’ और फिर फांसी के तख्ते पर खड़े होकर प्रार्थना और मंत्र का जाप करके वे फंदे पर झूल गए. गोरखपुर की जनता ने उनके शव को लेकर आदर के साथ शहर में घुमाया. उनकी अर्थी पर इत्र और फूल बरसाए.
काकोरी कांड के तीसरे शहीद थे, ठाकुर रोशन सिंह जिन्हें इलाहाबाद में फांसी दी गई. उन्होंने अपने मित्र को पत्र लिखते हुए कहा था, ‘हमारे शास्त्रों में लिखा है, जो आदमी धर्मयुद्ध में प्राण देता है, उसकी वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करने वालों की.’
अशफाक उल्ला खां काकोरी कांड के चौथे शहीद थे. उन्हें फैजाबाद में फांसी दी गई. वे बहुत खुशी के साथ कुरान शरीफ का बस्ता कंधे पर लटकाए हाजियों की भांति ‘लवेक’ कहते और कलाम पढ़ते फांसी के तख्ते पर गए. तख्ते का उन्होंने चुंबन किया और उपस्थित जनता से कहा, ‘मेरे हाथ इंसानी खून से कभी नहीं रंगे, मेरे ऊपर जो इल्जाम लगाया गया, वह गलत है. खुदा के यहां मेरा इंसाफ होगा.’ और फंदे पर झूल गए. उनका अंतिम गीत था -
तंग आकर हम भी उनके जुल्म से बेदाद से
चल दिए सुए अदम जिंदाने फैजाबाद से
19 दिसंबर को उनका पार्थिव शरीर मालगाड़ी से शाहजहांपुर ले जाते समय गाड़ी लखनऊ बालामऊ स्टेशन पर रुकी. जहां पर एक साहब सूट-बूट में गाड़ी के अंदर आए और कहा, ‘हम शहीद-ए-आजम को देखना चाहते हैं.’ उन्होंने पार्थिव शरीर के दर्शन किए और कहा, ‘कफन बंद कर दो, मैं अभी आता हूं.’ यह साहब कोई और नहीं चन्द्रशेखर आजाद थे. काकोरी कांड में अंग्रेजों ने चन्द्रशेखर आजाद को भी बहुत ढूंढ़ा. वे हुलिया बदल-बदल कर बहुत समय तक अंग्रेजों को धोखा देने में सफल होते रहे. अंततः 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों का सामना करते हुए वे अपनी ही गोली से शहीद हो गए.
09/08/2022
गुप्त राजवंश:
गुप्त राजवंश प्राचीन भारत के प्रमुख राजवंशों में से एक था। इतिहासकारों द्वारा इस अवधि को भारत का स्वर्ण युग माना जाता है।
मौर्य वंश के पतन के बाद दीर्घकाल में हर्ष तक भारत में राजनीतिक एकता स्थापित नहीं रही। कुषाण एवं सातवाहनों ने राजनीतिक एकता लाने का प्रयास किया। मौर्योत्तर काल के उपरान्त तीसरी शताब्दी ईस्वी में तीन राजवंशो का उदय हुआ जिसमें मध्य भारत में नाग शक्ति, दक्षिण में वाकाटक तथा पूर्वी में गुप्त वंश प्रमुख हैं। मौर्य वंश के पतन के पश्चात नष्ट हुई राजनीतिक एकता को पुनः स्थापित करने का श्रेय गुप्त वंश को है।
गुप्त साम्राज्य की नींव तीसरी शताब्दी के चौथे दशक में तथा उत्थान चौथी शताब्दी की शुरुआत में हुआ। गुप्त वंश का प्रारम्भिक राज्य आधुनिक उत्तर प्रदेश और बिहार में था।साम्राज्य के पहले शासक चंद्र गुप्त प्रथम थे, जिन्होंने विवाह द्वारा लिच्छवी के साथ गुप्ता को एकजुट किया। उनके पुत्र प्रसिद्ध समुद्र गुप्ता ने विजय के माध्यम से साम्राज्य का विस्तार किया। ऐसा लगता है कि उनके अभियानों ने उत्तरी और पूर्वी भारत में गुप्ता शक्ति का विस्तार किया और मध्य भारत और गंगा घाटी के कुलीन राजाओं और उन क्षेत्रों को वस्तुतः समाप्त कर दिया जो तब गुप्ता के प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण में आ गए थे ।
साम्राज्य के तीसरे शासक चंद्र गुप्त द्वितीय (या विक्रमादित्य, "शौर्य का सूर्य") उज्जैन तक साम्राज्य का विस्तार करने के लिए मनाया गया, लेकिन उनका शासनकाल सैन्य विजय की तुलना में सांस्कृतिक और बौद्धिक उपलब्धियों से अधिक जुड़ा हुआ था। उनके उत्तराधिकारी- कुमारा गुप्ता, स्कंद गुप्ता और अन्य - ने धुनास (हेफ्थालवासियों की एक शाखा) पर आक्रमण के साथ साम्राज्य के क्रमिक निधन को देखा। 6 वीं शताब्दी के मध्य तक, जब राजवंश का अंत हुआ, तो राज्य एक छोटे आकार में घट गया था।
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26/07/2022
May the divine Shiva bless you and your family with his power and grace. Happy Shivratri!