31/10/2022
माँग में चाँद को मैं सजा दूँ चलो
हार तारों जड़ा मैं बना दूँ चलो
मांगकर देख लो तुम भी सूरज कभी
तोड़कर ही सही मैं भी ला दूँ चलो
सात जन्मों तलक साथ हम तुम रहें
एक दूजे के हैं मैं लिखा दूँ चलो
अनिल कुमार ''निश्छल''
#अनिल_कुमार_निश्छल
#प्रेमगीत
#जिंदगी
#शेर
#दर्द
#सूरज
#चाँद
29/08/2022
#गीत
#निश्छल
#हक
#हुक़ूक़
बुरा लगे लग जाए तुमको
दिन को क्यों फिर रात कहेंगें?
हम तो अपनी बात कहेंगें
दीन-हीन-लाचार हैं जो फ़िर
युवा-वृध्द-बीमार हैं जो फ़िर
नारी को इक आशा देकर
फिरते देख दिलासा देकर
नन्हें हाथों को इक रोटी
हर हाँथों को रोजी-रोटी
देख किसानों की पीड़ा को
और जवानों की पीड़ा को
उनकी आवाज़ों को स्वर दे
लोहे पे इक घात कहेंगें
हम तो अपनी.........
पर-पीड़ा को मुखरित होकर
गाएँगें उद्देलित होकर
झूठ को झूठ कहेंगें लेकिन
सच को मरने ना हम देंगें
गाँवों की आवाज़ दबाकर
शहरों को चढ़ने ना देंगें
सरकारों को याद दिलाकर
उनके वादों को पूँछेंगें
आमजनों के हक को लेकर
तीख़ी-तीख़ी बात कहेंगें
हम तो अपनी.......
इन सारे मुद्दों को लेकर
इक भी मौत अगर होगी
शासन जिम्मेदारी लेगा
इक भी मौत अगर होगी
फाँसी पे चढ़वाकर जनता
हर इक जश्न मनाएगी फ़िर
तानाशाही एक चले ना
जनता के सेवक हैं सब
खैंच!पटक के दे दे मारे
सीधी-सीधी बात कहेंगें
हम तो अपनी..........
अनिल कुमार ''निश्छल''
हमीरपुर, बुंदेलखंड
उ०प्र०
29/08/2022
#गीत
#निश्छल
#बचपन
#बच्चे
#जीवटता
कोरे कागज से बच्चे हैं,जो लिख दोगे लिख जाएगा।
मन के सादे-सच्चे हैं,जो लिख डोगे लिख जाएगा।।
चाँद-सितारे,सूरज,बादल,ख़्वाब में परियाँ आती हैं।
जादू के किस्से सारे हैं,फ्रोजन,मुअना आती हैं।
डोरा,ओबोचामा,जैरी,टॉम-सी नटखट मस्ती भी।
तरुवर जैसे पर-उपकारी,और हिमालय-सी हस्ती भी।
मिश्री के गुलबट्टे हैं,जो लिख दोगे लिख जाएगा।।
बागों की कलियों के जैसे,निश्छल इनके तन-मन हैं।
रंगबिरंगी तितली जैसे,पावन इनके तन-मन हैं।
कच्ची माटी से कोमल हैं,ढलकर दीपकदान बनें।
करके अच्छे कर्मों से फिर,नेक-हृदयी इंसान बनें।
मन के इतने अच्छे हैं,जो लिख दोगे लिख जाएगा।।
तर्क विवेक विचार करें,ख़्वाब पतंगों के जैसे।
हँसमुख रहते रहें सदा,संत-मलंगों के जैसे।
शैतान बड़े हैं लेकिन फिर भी,मन भावों से भरा हुआ।
पल में रोते पल में हँसते, मन घावों से हरा हुआ।
सूतफेनियों के लच्छे,जो लिख दोगे लिख जाएगा।।
कितना प्यारा बचपन होता,राग द्वेष का भाव नहीं।
चंचलता के उदगम से हैं,और कोई अभाव नहीं।
जीवन जीवटता से जीते,होठों पे मुस्कान रहे बस।
कभी तो ज्ञानी बन जाते हैं,जानबूझ अज्ञान रहे बस।
फूलों के गुलदस्ते हैं,जो लिख दोगे लिख जाएगा।।
अनिल कुमार निश्छल
Newws Gaaon
29/08/2022
#गीत
#निश्छल
#जीवन
#जीवटता
जीवन है इक राग बसंती,रंगबिरंगा फ़ाग बसंती।
याद बसंती,दाद बसंती,सतरंगी इमदाद बसंती।।।
सुख-दुःख जीवन के पहलू दो, मीठा-तीखा स्वाद रहे बस।
दुनिया रूठे गर रूठे पर,अपनों का संग साथ रहे बस।
सारी दुनिया एक तरफ़ है,एक तरफ़ परिवार हमारा।
एक अमोल खज़ाना जग का,खिला-बसा संसार हमारा।
हम सब कलियों का है प्यारा, ख़्वाब बसंती, बाग बसंती।।
जीवन है इक राग बसंती........
मात-पिता इक नींव हमारे,भाई-बहना और सहारे।
जीवन-नैया धीरे-धीरे,लग जाती है एक किनारे।
मानव-जीवन एक रहे ना, रात कभी तो भोर हुई है।
शेर बना है गली का कुत्ता,धूल कभी सिरमौर हुई है।
वक्त किसे कब राजा कर दे,घात बसंती,नाद बसंती।।
जीवन है इक राग बसंती........
रोना हरदम ठीक नहीं है,कौन भला है सुखी यहाँ।
छोटी-छोटी बातों को ले,रहते अक्सर हैं दुःखी यहाँ।
छोटी-छोटी खुशियाँ ढूँढो, और प्रभु का ध्यान धरो।
जीवन हँसते-हँसते गुजरे,साथ प्रभु-गुणगान करो।
भव-सागर से बंधन छूटे,वात बसंती,त्याग बसंती।।
जीवन है इक राग बसंती........
अनिल कुमार ''निश्छल''
हमीरपुर, बुंदेलखंड
उ०प्र०
13/02/2022
#निश्छल #गीत #देश #देशप्रेम #भारत
#जनता #लोकतंत्र #लोकतंत्रबचाओ #नेता #चुनाव #चुनाव2022
लोकतंत्र बस चीख़ रहा है
और पतन अब दीख रहा है
सत्ता लोलुपता है व्यापित
राजनीति केवल है शापित
जनता केवल लूटी जाती
बात पड़े पर कूटी जाती
जनता की आवाज़ नहीं है
कोई नया आगाज़ नहीं है
चौथा खंभा चाटुकार है
बढ़ गया देखो अनाचार है
अधिकारों की बाते खोईं
बिना बात के आँखें रोईं
कृषकों की बस दशा वही है
रूप बदलकर दशा वही है
भाई-भाई लड़ बैठे हैं
इक-दूजे पे चढ़ बैठे हैं
हवा में घोला ज़हर किसी ने
ढाया सब पर क़हर किसी ने
शांति डरी-सहमी रहती है
कांति उड़ी-वहमी रहती है
सालों से जो रहता आया
गैर उन्हीं को फिर बतलाया
आपस में फिर फूट डालकर
दो हिस्सों में बंटवाया
शिक्षा की परिभाषा बदली
जन-जन की अभिलाषा बदली
नेता-चोर-उचक्के-सारे
मजलूमों को चुन-चुन मारें
गाँधी वाला देश नहीं हैं
बाबा-से परिवेश नहीं है
अटल इरादे माटी हो गए
झूठों की परिपाटी हो गए
नेता जी के सपने खोए
भगत-आज़ाद फूटकर रोए
नेहरू ने जो सपना बोया
लगता केवल खोया-खोया
राम-नाम से लूट मची है
अपनों में ही फूट मची है
रहमानों ने कसमें खाईं
बिना बात के रार बढ़ाई
दो हिस्सों में बँट गए सारे
कल तक थे जो भाई-भाई
राजनीति के चक्कर में आ
समता, एकता भी गँवाई
नेता अपनी रोटी सेंकें
गाँव गली और गलियारों में
उनको दिखता प्रेम है केवल
बंदूकों और तलवारों में
हमको आपस में लड़वाकर
खूब मलाई मिलकर खाते
इक थाली के चट्टे-बट्टे
कुछ सिंगल कुछ हट्टे-कट्टे
संसद एक अखाड़ा बनता
वाणी-शर बेशक फिर तनता
जनता को धीरे बहलाते
उनके नायक बन-बन जाते
धूल झोंककर आँखों में भी
ख़ुद को हितकारी बतलाते
धीरे-धीरे पेट बढ़ाते
और खज़ाना चट कर जाते
इक रोटी का दसवां हिस्सा
जनता हित भी काम कराते
कल तक रहते थे जमीं पर
आज आसमाँ चढ़-चढ़ जाते
निश्छल की विनती बस इतनी
इनकी बातों में मत आना
दया,धर्म,सच्चाई का ही
मिलके सब बस साथ निभाना
तोड़े जो भाईचारे को
इस अखंड भारत प्यारे को
उसका हक-सम्मान छीनकर
सत्ता से निष्कासित कर दें
तहज़ीब-मुहब्बत बनी रहे
और तिरंगा-शान बढ़े
परचम फहरे विश्व-पटल पर
आन-बान-गुणगान बढ़े
इक उंगली में शक्ति कहाँ वो
जो मुट्ठी बनकर आ जाए
लोकतंत्र अब हाथ हमारे
संविधान भी हमारे सहारे
आओ मिलकर देश बचा लें
आओ मिल परिवेश बचा लें
बचा-खुचा बस प्यार बचा लें
प्रीत-रीत त्योहार बचा लें
देशप्रेम की डोर बचा लें
प्यारे-न्यारे छोर बचा लें
अपने कर्तव्यों को समझें
सबके मन्तव्यों को समझें
ये देश सभी का कल भी था
और आने वाले दिन में रहेगा
कौन किसे फिर चोर कहेगा
आने वाला दौर कहेगा
देशप्रेम सबसे ऊपर है
इससे आला कोई नहीं
देश रहे महबूब सदा गर
और निराला कोई नहीं
मातृभूमि-रज भाल लगाकर
निश्छल बस इक बात कहे
प्यार पनपता रहे यहाँ पर
सुख-दुःख बाँटें इक-दूजे के
आओ गले अब मिलकर साथी
अपना प्यारा देश बचाएँ
फिर से महक उठे ये धरती
इक ऐसा परिवेश बनाएँ
प्यारा अपना देश बनाएँ
न्यारा अपना देश बनाएँ
आओ अपना देश बनाएँ
मिलके अपना देश सजाएँ
आओ साथी ! आओ साथी!
आओ साथी ! आओ साथी!
मिलके प्यारा देश बचा लें।
अनिल कुमार निश्छल
01/02/2022
#गीत
#निश्छल
टूट जाने से अच्छा है बढ़ते चलो
रूठ जाने से अच्छा है बढ़ते चलो
जिंदगी ख़त्म होती नहीं यार यूँ
बंदगी ख़त्म होती नहीं यार यूँ
आज गिरकर उदासी लिए फिर रहे
आज डरकर मायूसी लिए फिर रहे
उनको गिरने का डर ना जो चलते नहीं
उनको उठने का गम ना जो चलते नहीं
रोने गाने से अच्छा है बढ़ते चलो
लोग तेरा मनोबल गिराकर रहें
भावना भाव में साथ तेरे बहें
साथ देगें सदा वादा करते सभी
साथ देते मगर वक्त पे ना कभी
आस टूटी हुई तेरे मन में बसे
साँस छूटी हुई मन के पुर्जे कसे
गम भुलाने से अच्छा है बढ़ते चलो
आप अपना हुनर पहले पहचान लो
अपने बारे में गहरे जरा जान लो
दम लगाकर दुबारा से महनत करो
मन मुताबिक़ चलो संग हामी भरो
चूम लोगे शिखर सफलता का भी तुम
गीत गाते हुए गुनगुनाते ही धुन
भाग जाने से अच्छा है बढ़ते चलो
©®अनिल कुमार ''निश्छल''
हमीरपुर, बुंदेलखंड
उ०प्र०
29/01/2022
याद आने लगे हैं पुराने वो दिन
फिर सताने लगे हैं पुराने वो दिन
साथ मिलके बिताए थे लम्हें हंसीं
फिर बुलाने लगे हैं पुराने वो दिन
अनिल कुमार ''निश्छल''
हमीरपुर,बुंदेलखंड
उ०प्र०