विहंग

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शब्दों के पंख… भावनाओं की उड़ान। स्वागत है ‘विहंग’ में।

विहंग सिर्फ एक पेज नहीं, एक दृष्टि है—
जहाँ शब्द पंख बन जाते हैं, और सोच आसमान की ओर उड़ान भरती है।
यहाँ मिलेगा प्रकृति का सौन्दर्य, जीवन का दर्शन, यात्रा की धड़कन और आत्मा की शांति।

12/01/2026

धरती के भगवान : सत्ता से ऊँची मानवीय नैतिकता ✍️
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कुछ लोग पद से बड़े होते हैं, और कुछ लोग सत्ता से भी। ऐसे ही विरले मनुष्यों में एक नाम है— पद्मश्री डॉ. तपन कुमार लहरी (डॉ. टी.के. लहरी)। वे उस परंपरा के प्रतिनिधि हैं जहाँ चिकित्सा पेशा नहीं, सेवा का व्रत होता है।

जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वाराणसी प्रवास के दौरान उनसे मिलने उनके घर गए, तो डॉ. लहरी ने विनम्र लेकिन दृढ़ शब्दों में कह दिया— "मुख्यमंत्री को मुझसे मिलना है तो मेरी ओपीडी में मिलें।" सत्ता के शिखर से आई इस पेशकश को उन्होंने ठुकराया नहीं बल्कि उसका स्थान बदल दिया, मरीजों की कतार के बीच।

यह कोई पहली घटना नहीं थी। कहा जाता है कि इससे पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के लिए भी उनका उत्तर यही था। डॉ. लहरी के लिए हर व्यक्ति चाहे वह वीवीआईपी हो या फिर निर्धन, पहले मरीज है, बाद में कुछ और।

बीएचयू के जाने-माने कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. लहरी 1994 से अपनी पूरी तनख्वाह गरीबों को दान करते रहे। 1997 के बाद उन्होंने वेतन लेना भी बंद कर दिया।

रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन में से भी वे उतना ही रखते हैं जितना दो वक्त की रोटी के लिए आवश्यक हो। शेष राशि बीएचयू कोष में छोड़ देते हैं ताकि गरीब मरीजों का इलाज चलता रहे।

उन्हें किसी भी दिन शहर के अन्नपूर्णा होटल में 25 रुपये की थाली खाते देखा जा सकता है। एक हाथ में बैग, दूसरे में काली छतरी लिए वे आज भी पैदल अस्पताल आते-जाते हैं। न कोई चारपहिया, न कोई दिखावा।

डॉ. लहरी ने अमेरिका से पढ़ाई की, लेकिन जीवन भारत के गरीब मरीजों के नाम कर दिया। 1974 में वे 250 रुपये मासिक पर बीएचयू में लेक्चरर बने। चाहते तो आलीशान अस्पताल खोलकर करोड़ों कमा सकते थे, पर उन्होंने शादी तक नहीं की, ताकि सेवा में कोई व्यवधान न आए।

बीएचयू से 2003 में रिटायर होने के बाद भी उनका रिश्ता अस्पताल से नहीं टूटा। इमेरिटस प्रोफेसर के रूप में वर्षों तक सेवाएँ दीं और आज भी नियमित समय पर ओपीडी करते हैं।

लोग उनकी समयबद्धता से घड़ी मिलाते हैं। वे लोग जो पैसों के अभाव में महंगे इलाज से वंचित रह जाते हैं, उन लाखों गरीबों का दिल आज भी डॉ. लहरी के बदौलत धड़क रहा है।

🔎 इसी परंपरा में कुछ और नाम भी सम्मानपूर्वक लिए जाने चाहिए, जिन्होंने ज्ञान, पद और प्रतिष्ठा को निजी लाभ नहीं बल्कि सार्वजनिक भलाई के लिए समर्पित किया है।

📍प्रो. आलोक सागर — आईआईटी दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर, जिन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा झुग्गी-बस्तियों और वंचित बच्चों की शिक्षा के लिए समर्पित किया। क्योंकि वे मानते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य डिग्री नहीं, मानव गरिमा है।

📍डॉ. देवी शेट्टी — जिन्होंने कम लागत में हृदय शल्य चिकित्सा को संभव बनाया और लाखों गरीबों को जीवन दिया।

📍डॉ. प्रफुल्ल विजयकर — जिन्होंने होम्योपैथी को जनसामान्य तक पहुंचाया और निःशुल्क चिकित्सा शिविरों की संस्कृति विकसित की।

📍डॉ. बिनायक सेन — जिन्होंने आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवा को मानवाधिकार के रूप में स्थापित किया।

📍प्रो. राजेंद्र सिंह (जल पुरुष) — जिन्होंने जल को राजनीति नहीं, समाज का साझा उत्तरदायित्व बनाया।

📍संदीप पांडे — रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित, जिन्होंने शिक्षा और सामाजिक न्याय को जमीन पर उतारा।

देश में ऐसे कई अनाम नायक हैं जो बिना किसी शोर के, बिना किसी प्रचार के, समाज को थामे हुए हैं।

आज के समय में, जब चमक-दमक, कमीशन और ब्रांडिंग सामान्य हो चली है, डॉ. टी.के. लहरी जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि महानता का माप पद नहीं, उद्देश्य होता है।

ऐसे लोग सचमुच ‘धरती के भगवान’ हैं क्योंकि वे ईश्वर को मंदिरों में नहीं, लोगों की आँखों में देखते हैं। गर्व होता है कि यह देश अभी भी ऐसे महापुरुषों को जन्म देता है।
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12/01/2026

शिकागो से आज तक: विवेकानंद और हमारा वर्तमान ✍️
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स्वामी विवेकानंद द्वारा 11 सितंबर 1893 को विश्व धर्म संसद, शिकागो में दिया गया यह भाषण भारत की आध्यात्मिक चेतना, सहिष्णुता और वैश्विक मानवता का ऐतिहासिक उद्घोष था। यह केवल एक भाषण नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का विश्वमंच पर आत्मविश्वासपूर्ण परिचय था।

प्रस्तुत है ऐतिहासिक भाषण के मुख्य बिंदु—

“अमेरिका के भाइयों और बहनों,”
(इन शब्दों पर सभागार में कई मिनट तक तालियाँ बजती रहीं)

मुझे अत्यंत गर्व है कि मैं उस धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकार्यता दोनों सिखाई है।

मुझे गर्व है कि मैं उस राष्ट्र से हूँ जिसने हर धर्म और हर देश के शरणार्थियों को अपने हृदय में स्थान दिया है।

मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने उन यहूदियों को शरण दी जिन्हें उनके पवित्र मंदिर के विनाश के बाद रोमन अत्याचार से भागना पड़ा था, और जो आज भी हमारे बीच सुरक्षित हैं।

मुझे उस महान धर्म पर गर्व है जिसने पारसी समुदाय को शरण दी और आज तक उन्हें सुरक्षित रखा है।

मैं उस धर्म से संबंधित हूँ जिसने दुनिया को यह सिखाया— “जैसे विभिन्न नदियाँ अलग-अलग मार्गों से बहकर अंततः समुद्र में मिल जाती हैं, वैसे ही मनुष्य द्वारा चुने गए अलग-अलग मार्ग अंततः ईश्वर तक ही पहुँचते हैं।”

यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि केवल उसका ही धर्म सत्य है और अन्य सभी धर्म झूठे हैं, तो वह न केवल अज्ञान है बल्कि खतरनाक भी है।

धार्मिक कट्टरता, संकीर्णता और हठधर्मिता ने इस सुंदर धरती को बहुत लंबे समय तक हिंसा और रक्तपात से भर दिया है।

इन्होंने सभ्यताओं को नष्ट किया है, राष्ट्रों को तबाह किया है, और मनुष्यों को एक-दूसरे का दुश्मन बनाया है। यदि ये न होतीं, तो मानव समाज आज कहीं अधिक उन्नत होता।

लेकिन मुझे आशा है कि यह सभा, जो इन सबका अंत करने के लिए संगठित हुई है, घोषणा करेगी कि अब और नहीं। अब समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि हर धर्म में सत्य का अंश है, और हर मार्ग ईश्वर की ओर ही जाता है।

मैं केवल सहिष्णुता में विश्वास नहीं करता, मैं सभी धर्मों की सत्यता में विश्वास करता हूँ।

मैं उस धर्म से हूँ जो कहता है— “जिस प्रकार एक दीपक अनेक दीपकों को जला सकता है और फिर भी अपनी ज्योति नहीं खोता, उसी प्रकार सत्य साझा करने से सत्य कम नहीं होता।”

संकीर्ण विचारों का समय समाप्त होना चाहिए। यह वही संकीर्णता है जिसने मनुष्य को मनुष्य से अलग किया।

मैं आशा करता हूँ कि इस धर्म संसद से एक ऐसा संदेश जाएगा जो पूरी मानवता को जोड़ने वाला होगा।

कट्टरता, संकीर्णता और हठधर्मिता के अंत की कामना के साथ।

(उन्होंने संदेश पूरा किया, कुछ क्षण का मौन रहा और फिर सभागार लंबे, स्वतःस्फूर्त तालियों और खड़े होकर सम्मान से गूँज उठा)

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1893 में शिकागो में स्वामी विवेकानंद ने जो कहा, वह केवल धार्मिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि समाज, राज्य और सत्ता के लिए एक नैतिक दिशा थी।

जब उन्होंने सभी धर्मों की सत्यता की बात की, तो उसका आशय था— विचारों का सह-अस्तित्व, न कि वर्चस्व।

आज के भारत और विश्व में समस्या धर्म की नहीं, धर्म के राजनीतिक उपयोग की है। जहाँ विवेकानंद का धर्म मानव को जोड़ता था, आज वही पहचान अक्सर विभाजन का औज़ार बन जाती है।

असहमति को राष्ट्रविरोध और सवाल को अपराध मानने की प्रवृत्ति, विवेकानंद की चेतावनी को और प्रासंगिक बना देती है।

विवेकानंद का भारत नैतिक साहस वाला लोकतंत्र चाहता था जहाँ सत्ता विवेक से चले, डर से नहीं; जहाँ राष्ट्रवाद मानवता के विरुद्ध न खड़ा हो।

शिकागो का भाषण आज एक आईना है जिसमें हम देख सकते हैं कि हम सहिष्णुता, विवेक और आत्मबल के रास्ते पर हैं या संकीर्णता और भय के।

विवेकानंद का संदेश आज भी उतना ही स्पष्ट है— विचारों से डरने वाला समाज कभी महान नहीं बनता।
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09/01/2026

नेहरू के बाद भारत : विचार से व्यवस्था की ओर ✍️
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नेहरू के बाद का भारत केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, वह विचारधारा से प्रशासन की ओर बढ़ने का काल था। देश को अब आदर्शों की उड़ान से ज़्यादा धरातल पर टिके निर्णयों की आवश्यकता थी।

नेहरू ने जिस भारत की वैज्ञानिक सोच, लोकतांत्रिक सहिष्णुता, और अंतरराष्ट्रीय सम्मान के साथ कल्पना की थी, वह नींव बन चुकी थी। अब चुनौती थी उस नींव पर सामान्य नागरिक का जीवन खड़ा करने की।

यहीं से लाल बहादुर शास्त्री का युग अपनी सादगी के साथ आरंभ होता है। शास्त्री जी राजनीति में किसी चमत्कारी व्यक्तित्व के रूप में नहीं आए। वे जनता के बीच से उठे, जनता के बीच रहे, और सत्ता में भी जनता जैसे ही दिखे।

1956 में रेल मंत्री रहते हुए एक भीषण रेल दुर्घटना हुई। तकनीकी रूप से दुर्घटना उनकी प्रत्यक्ष जिम्मेदारी नहीं थी, फिर भी उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। आज के समय में यह उदाहरण किसी कल्पना जैसा लगता है, लेकिन उस दौर में यह नेतृत्व की नैतिक परिभाषा थी।

लाल बहादुर शास्त्री सादगी की मिशाल थे और वह उनके स्वभाव की सहज अभिव्यक्ति थी। वे सत्ता में आए, लेकिन सत्ता उन पर कभी हावी नहीं हुई।

प्रधानमंत्री रहते हुए भी उनका रहन-सहन एक सामान्य मध्यवर्गीय भारतीय जैसा था। ना कोई तड़क-भड़क और ना विशेषाधिकारों का प्रदर्शन।

कहा जाता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी शास्त्री जी के पास गिनती के ही कपड़े और सामान थे। उनकी चप्पल तक कई बार मरम्मत कराई जाती थी। यह दिखावे की सादगी नहीं थी बल्कि यह आत्मसंतोष की सादगी थी।

यह तथ्य आज भी चौंकाता है कि देश के प्रधानमंत्री रहते हुए भी शास्त्री जी सरकारी गाड़ी खरीदने के लिए बैंक से ऋण लेते हैं। उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवार ने वह कर्ज़ चुकाया। आज के दौर में यह बात अविश्वसनीय लगती है, लेकिन तब यह नैतिकता का मानक थी।

शास्त्री जी ने कभी सत्ता को अपने परिवार के लिए सीढ़ी नहीं बनाया। उनके बच्चों को न कोई विशेष पद मिला, न कोई राजनीतिक उत्तराधिकार। उनकी पत्नी ललिता देवी सरल गृहिणी की तरह रहती थीं, और सत्ता के गलियारों से हमेशा दूरी बनाए रखती थीं।

आज जब सत्ता वैभव का पर्याय बन गई है, शास्त्री जी की सादगी हमें असहज करती है। वह हमें अपने प्रश्नों से घेरती है कि क्या सादगी आज भी संभव है? क्या ईमानदारी आज भी नेतृत्व की शर्त बन सकती है?

शायद शास्त्री जी इन सवालों के उत्तर नहीं, बल्कि मापदंड हैं। उनका जीवन यह याद दिलाता है कि नेतृत्व का आकार महल से नहीं, चरित्र से तय होता है।

1960 के दशक में भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। अमेरिका से PL-480 के तहत अनाज आयात करना पड़ता था। देश आत्मनिर्भर नहीं था। शास्त्री जी ने किसानों को राष्ट्रनिर्माण का नायक माना। उन्होंने उच्च उपज वाले बीज, सिंचाई और कृषि अनुसंधान को बढ़ावा दिया और यहीं से हरित क्रांति का बीज पड़ा।

कहा जाता है कि खाद्यान्न संकट के दौरान शास्त्री जी ने सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की और स्वयं भी उसे अपनाया। यह केवल प्रतीक नहीं था, यह जनता के साथ नेतृत्व के खड़े होने का संकेत था।

1965 में पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत भारत में घुसपैठ की। शास्त्री जी ने न कोई उग्र भाषण दिया, न युद्ध का ढोल पीटा। लेकिन जब युद्ध हुआ, तो निर्णय स्पष्ट था— राष्ट्र की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं।

जब सेना ने लाहौर की ओर बढ़त बनाई, तो शास्त्री जी ने सेना पर पूर्ण विश्वास दिखाया। उनका नेतृत्व राजनीतिक हस्तक्षेप से नहीं, स्पष्ट समर्थन से पहचाना गया।

1966 में ताशकंद समझौता हुआ। कई लोग इसे समझौता कहकर आलोचना करते हैं, लेकिन यह समझौता एक युद्धविराम नहीं, एक थके हुए राष्ट्र को साँस लेने का अवसर था।

शास्त्री जी की दृष्टि में शांति कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति का सबसे परिपक्व रूप थी। उनका ताशकंद में अचानक निधन भारत को एक ईमानदार, संयमित नेतृत्व से अचानक वंचित कर गया।

ताशकंद की एक घटना को मैं समझता हूँ कि हर भारतीय को जानना चाहिए। 3 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री शांति समाधान के लिए ताशकंद पहुँचे। वह समय कड़ाके की सर्दी का था, मध्य एशिया की बर्फ़ीली हवाएँ हड्डियाँ जमा देने वाली थीं।

रूसी नेता एलेक्सेई कोसीजिन ने देखा कि शास्त्री जी का साधारण खादी का कोट उस ठंड के लिए पर्याप्त नहीं है। मित्रता के भाव से उन्होंने शास्त्री जी को एक रूसी ओवरकोट भेंट किया।अगली सुबह कोसीजिन ने देखा कि शास्त्री जी फिर वही पुराना खादी कोट पहने हैं।

उन्होंने सहज भाव से पूछा— क्या ओवरकोट पसंद नहीं आया? शास्त्री जी मुस्कराए और बोले— “कोट बहुत गर्म और आरामदायक है, लेकिन मैंने उसे अपने साथ आए एक कर्मचारी को दे दिया, जो यहाँ की ठंड के लिए कोई उपयुक्त कोट नहीं लाया था। जब कभी किसी ठंडे देश की यात्रा होगी, तब आपके उपहार का उपयोग अवश्य करूँगा।”

इस घटना का उल्लेख स्वयं कोसीजिन ने भारतीय प्रधानमंत्री और पाकिस्तानी राष्ट्रपति के सम्मान में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम के स्वागत भाषण में किया और कहा— “हम कम्युनिस्ट हैं, लेकिन प्रधानमंत्री शास्त्री एक ‘सुपर कम्युनिस्ट’ हैं।”

यही मूल अंतर है—विचारधारा का नहीं, दृष्टि और आदर्श का।

अब जब पीछे देखता हूँ, तो समझ आता है कि नेहरू और शास्त्री दो अलग रास्ते नहीं, एक ही यात्रा के दो चरण थे।

नेहरू ने भारत को सपने देखना सिखाया। शास्त्री ने उन्हें संभालकर जीना सिखाया। नेहरू का भारत वैश्विक था, शास्त्री का भारत लोकल और आत्मनिर्भर होने की राह पर था।

एक ने संविधान और संस्थाएँ दीं, दूसरे ने उनमें नैतिकता भरी। शायद महान राष्ट्र ऐसे ही बनते हैं— विचार से शुरुआत, और चरित्र से स्थायित्व।

क्रमशः .. .𓂃✍︎

09/01/2026

विचारों की यात्रा : विरोध से विवेक तक ✍️
(लोकतंत्र, नैतिक साहस और ऐतिहासिक निर्णयों का पुनर्पाठ)
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जब मैं ग्रेजुएशन कर रहा था, तब मेरे आदर्श स्पष्ट थे। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांति, विद्रोह और प्रतिरोध मेरे मन के नायक थे। उसी दौर में गांधी और नेहरू मेरे लिए आलोचना के पात्र थे, बल्कि सच कहूँ तो मैं उनका सबसे बड़ा आलोचक था।

तब मेरी दुनिया काली और सफ़ेद थी। या तो आप राष्ट्रभक्त थे या राष्ट्रविरोधी, या तो आप क्रांतिकारी थे या समझौतावादी। बीच का कोई रास्ता मुझे दिखाई ही नहीं देता था।

मेरी पढ़ाई सीमित थी मतलब अपने विषय की किताबें, कुछ कॉमिक्स और इक्का-दुक्का नोबेल पुरस्कार विजेताओं की कहानियाँ। जो भी बाहरी ज्ञान था, वह आधा-अधूरा था, और उसका बड़ा हिस्सा दोस्तों की बातों, चाय की दुकानों पर चलने वाली बहसों और उस समय के तथाकथित युवा बुद्धिजीवियों से आया था।

उनके साथ बैठकर ऐसा लगता था कि देश में जो कुछ भी ग़लत है, जो कुछ भी बिगड़ा है, वह सब नेहरू–गांधी की देन है। विभाजन, कश्मीर, गरीबी, भ्रष्टाचार आदि हर समस्या का एक ही उत्तर था: “अगर गांधी–नेहरू न होते…”

उस समय यह प्रश्न पूछने का साहस नहीं था कि क्या इतिहास इतना सरल होता है? क्या किसी देश की नियति दो व्यक्तियों तक सीमित की जा सकती है?

वक़्त गुज़रता गया। नौकरी के सिलसिले में कई जगह जाना हुआ, कई संस्थानों में काम किया। लोग बदले, अनुभव बदले, और सबसे अहम यह कि जीवन ने सवाल पूछने शुरू किए।

पढ़ने और लिखने की आदत पहले से थी। इसलिए जब भी समय मिला, मैंने किताबों की ओर लौटना शुरू किया। अब केवल सुना हुआ नहीं, खुद पढ़ा हुआ समझना चाहता था।

विवेकानंद, गांधी, नेहरू, डॉ. आंबेडकर, रवींद्रनाथ टैगोर, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, जे. कृष्णमूर्ति, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे और राजेंद्र प्रसाद आदि को पढ़ते-पढ़ते मेरी सरल धारणाएँ टूटने लगीं।

मैंने जाना कि ये लोग न तो देवता थे और न ही खलनायक। वे अपने समय की जटिलताओं में जीते मनुष्य थे, जो सीमाओं के बावजूद देश को दिशा देने की कोशिश कर रहे थे।

वर्ष 2010 में जब मैं शिक्षक बना, तो यह यात्रा और गहरी हो गई। अब मुझे ऐसे सुलझे हुए बुद्धिजीवियों की संगत मिली जो असहमति को दुश्मनी नहीं मानते थे। वे सवाल करते थे, लेकिन ज़हर नहीं घोलते थे। वे तर्क रखते थे, लेकिन नफ़रत नहीं फैलाते थे।

उनसे संवाद करते हुए मैंने पहली बार यह स्वीकार किया कि मेरी सोच भी संकीर्ण रही है। मैंने विरोध किया था, पर बिना पूरी समझ के।

आज गांधी मेरी दृष्टि में एक राजनीतिक व्यक्ति से अधिक एक नैतिक प्रयोग हैं। वे अब मुझे कमजोर नहीं लगते, बल्कि सबसे साहसी प्रतीत होते हैं क्योंकि हिंसा की आसान राह छोड़कर अहिंसा की कठिन राह चुनना हर किसी के बस की बात नहीं।

गांधी सत्ता के विरुद्ध नैतिक साहस का नाम हैं। वे यह सिखाते हैं कि लक्ष्य कितना भी पवित्र क्यों न हो, यदि साधन अपवित्र हैं तो अंततः समाज ही हारता है।

यह स्वीकार करना भी उतना ही ज़रूरी है कि गांधी कोई देवता नहीं थे। उनमें भी मनुष्य की तरह कुछ व्यक्तिगत कमज़ोरियाँ थीं, कुछ प्रयोग ऐसे थे जिनसे असहमति हो सकती है, कुछ विचार ऐसे थे जिन पर सवाल उठाए जा सकते हैं।

लेकिन किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत बुराइयों को राष्ट्र के नैतिक ढाँचे से जोड़ देना अपने आप में एक बौद्धिक अन्याय है।

राष्ट्र इतिहास में नेताओं को उनके निजी जीवन की पवित्रता से नहीं, सार्वजनिक जीवन की दिशा से परखता है। यदि व्यक्तिगत कमज़ोरियाँ ही नेतृत्व को खारिज करने का आधार बन जाएँ, तो इतिहास में शायद कोई भी महापुरुष कठघरे से बाहर नहीं बचेगा।

गांधी की महानता उनके निष्कलंक होने में नहीं, बल्कि इस बात में थी कि उन्होंने अपनी कमज़ोरियों को भी छुपाया नहीं। उन्होंने अपने जीवन को एक खुली प्रयोगशाला बनाया जहाँ वे स्वयं भी उसी नैतिक कसौटी पर खड़े हुए जिस पर वे समाज को खड़ा करते थे।

चौरी-चौरा के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेना, अपने ही समर्थकों का विरोध झेलना, विभाजन के बाद बहुसंख्यक उन्माद के विरुद्ध खड़ा होना आदि निर्णय किसी निर्दोष संत के नहीं, बल्कि एक जागरूक, संघर्षशील और जिम्मेदार नागरिक के थे।

गांधी का संघर्ष सिर्फ़ अंग्रेज़ी सत्ता से नहीं था, वह उस भीड़ से भी था जो अपने गुस्से को देशभक्ति समझ बैठती है।

आज जब मैं गांधी को देखता हूँ, तो वे मुझे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखते हैं जिसने राष्ट्र को यह सिखाया कि आज़ादी केवल शासन बदलना नहीं, बल्कि आत्मसंयम सीखना भी है। शायद इसीलिए गांधी को पसंद करना आसान नहीं है, लेकिन उन्हें समझना आज भी ज़रूरी है।

नेहरू को भी मैंने नए सिरे से पढ़ा। अब वे मुझे सिर्फ़ सत्ता के वारिस नहीं लगते, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति दिखते हैं जो खंडहर बने भारत में आधुनिक राष्ट्र की नींव रखना चाहते था।

विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, संस्थाएँ और लोकतांत्रिक मूल्य में नेहरू की सोच केवल आज के लिए नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए थी। उन्होंने भारत को दुनिया से बात करना सिखाया, सवाल करना सिखाया और सोचने की आज़ादी दी।

एक समय मेरे भीतर यह गुस्सा भी था कि गांधी ने सरदार पटेल की जगह नेहरू को प्रधानमंत्री क्यों बनाया। लेकिन धीरे-धीरे यह समझ आई कि आज़ादी के बाद का भारत सिर्फ़ प्रशासनिक चुनौती नहीं था, वह सांप्रदायिक, वैचारिक और भावनात्मक रूप से भी घायल था।

उस समय ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत थी जो आधुनिक सोच रखता हो, जो दुनिया की भाषा समझता हो और जो धार्मिक सौहार्द को प्राथमिकता दे। नेहरू उस भूमिका में उपयुक्त थे।

सरदार पटेल का योगदान कम नहीं, बल्कि अनिवार्य था। रियासतों का विलय, प्रशासनिक दृढ़ता, निर्णायक और स्पष्ट नेतृत्व— यह सब वही कर सकते थे जिनके भीतर निर्णय लेने का साहस हो और उसे लागू करने की शक्ति भी।

यही कारण है कि नेहरू और पटेल एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक थे। दो भिन्न स्वभाव, दो अलग दृष्टियाँ, लेकिन एक ही राष्ट्र के प्रति समान प्रतिबद्धता।

दोनों व्यक्तित्वों के बीच परस्पर सम्मान इतना गहरा था कि सरदार पटेल जवाहरलाल नेहरू की विद्वता, अंतरराष्ट्रीय दृष्टि और बौद्धिक क्षमता को पहचानते हुए उन्हें स्नेह से “पंडित जी” कहकर संबोधित करते थे। यह संबोधन औपचारिक नहीं, आपसी आदर का प्रतीक था।

वहीं नेहरू भी वल्लभभाई पटेल की मज़बूत नेतृत्व क्षमता, प्रशासनिक कुशलता और जनसरोकारों से जुड़े साहस को पूरी स्पष्टता से पहचानते थे। खेड़ा सत्याग्रह और बारडोली सत्याग्रह में किसानों का नेतृत्व करते हुए पटेल ने जो विश्वास अर्जित किया, उसने उन्हें सिर्फ़ आंदोलन का नेता नहीं, जनता का सरदार बनाया।

इसी कारण नेहरू जनसभाओं और सार्वजनिक मंचों से उन्हें हमेशा “सरदार वल्लभभाई पटेल” कहकर संबोधित करते थे— सम्मान के साथ, विश्वास के साथ।

उनका संबंध सहमति और असहमति का था, लेकिन कभी अवमानना का नहीं। मतभेद थे, पर मनभेद नहीं थे। और शायद यही कारण है कि इतिहास उन्हें दो ध्रुवों के रूप में नहीं, बल्कि भारत के निर्माण में दो अनिवार्य स्तंभों के रूप में याद रखता है।

नेहरू की एक बात जो मुझे विशेष रूप से भीतर तक प्रभावित करती है वह है उनका लोकतांत्रिक धैर्य। आज के समय में जहाँ विरोध को तुरंत राष्ट्रविरोध, असहमति को साज़िश और सवाल को अपमान मान लिया जाता है, वहाँ नेहरू का दौर मुझे एक अलग ही लोकतांत्रिक संस्कार का स्मरण कराता है। वे संसद में विरोध से डरते नहीं थे। वे जानते थे कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा शोर नहीं, बल्कि चुप्पी होती है।

1962 का भारत–चीन युद्ध उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी विफलता माना जाता है। यह पराजय केवल सीमा पर नहीं हुई थी, यह देश के आत्मविश्वास पर भी एक गहरी चोट थी। संसद में माहौल भारी था, पीड़ा थी, गुस्सा था, अविश्वास था। उसी समय राज्यसभा में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने काव्यात्मक शब्दों में सत्ता से प्रश्न किए। यह कोई साधारण कविता नहीं थी बल्कि यह राष्ट्र की अंतरात्मा की आवाज़ थी, जो हार, आत्मसम्मान और आत्ममंथन की मांग कर रही थी।

नेहरू चाहते तो इसे “राष्ट्र की भावना को आहत करने वाला वक्तव्य” कहकर कार्यवाही से निकलवा सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे मौन रहे, उन्होंने दिनकर की कविता पूरी सुनी और बाद में केवल इतना कहा— “आज देश दुखी है, और दुख की अभिव्यक्ति के कई रूप होते हैं।” उस क्षण नेहरू एक प्रधानमंत्री से अधिक एक परिपक्व लोकतांत्रिक दिखाई दिए।

नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी का संबंध भी इसी लोकतांत्रिक उदारता का उदाहरण है। अटल तब जनसंघ के तेज़तर्रार नेता थे मतलब वैचारिक रूप से नेहरू के ठीक विपरीत।संसद में वे नेहरू की नीतियों पर बेहद तीखे, लेकिन भाषाई रूप से शालीन हमले करते थे।

नेहरू कई बार अटल की वाणी, तर्क और भाषा से प्रभावित हुए। एक अवसर पर संसद में अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण के बाद नेहरू ने खुले सदन में कहा— “इस युवक में भविष्य का नेतृत्व दिखाई देता है।”

यह कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं थी। यह उस व्यक्ति की स्वीकारोक्ति थी जो जानता था कि लोकतंत्र में विरोधी भी देश का ही प्रतिनिधि होता है।

एक और प्रसंग जो मुझे भीतर तक छूता है— नेहरू संसद में कई बार अपनी भूल स्वीकार करते थे। कश्मीर, चीन और आर्थिक नीतियों पर जब आलोचना हुई,तो उन्होंने यह कहने का साहस किया— “संभव है हमसे भूल हुई हो, इतिहास हमें परखेगा।”

आज के समय में सत्ता द्वारा गलती स्वीकार करना कमज़ोरी माना जाता है, लेकिन नेहरू के लिए यह लोकतंत्र की मजबूती थी। उनके समय संसद शोरगुल का अखाड़ा नहीं, बहस का विद्यालय थी। नेहरू जानते थे कि सत्ता क्षणिक है, लेकिन संस्थाएँ स्थायी होती हैं।

इतिहास को नए सिरे से पढ़ते–समझते हुए कुछ बातें ऐसी भी हैं जिनसे मैं आज भी पूरी तरह सहमत नहीं हो पाता। यह असहमति विरोध की नहीं, बल्कि इतिहास से संवाद करने की असहमति है।

• पहली बात— प्राथमिक शिक्षा पर अपेक्षाकृत कम ध्यान।
आजादी के बाद भारत के सामने शिक्षा व्यवस्था को लगभग शून्य से खड़ा करने की चुनौती थी। नेहरू ने उच्च शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी को देश के भविष्य का आधार माना। आईआईटी, एम्स, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान आदि सब उसी दृष्टि की देन थे।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इन संस्थानों ने भारत को बौद्धिक और तकनीकी पहचान दी। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि प्राथमिक शिक्षा जो किसी भी समाज की जड़ होती है, उसे वह प्राथमिकता नहीं मिली जिसकी वह हकदार थी।

विशाल आबादी, सीमित संसाधन और तत्काल राष्ट्रनिर्माण की कई चुनौतियाँ और इन सबके बीच हर बच्चे तक स्कूल पहुँचाना निस्संदेह कठिन था। फिर भी, यदि प्राथमिक शिक्षा को राष्ट्रीय मिशन की तरह और मजबूती से अपनाया जाता, तो सामाजिक असमानता, अशिक्षा और अवसरों की खाई शायद आज इतनी गहरी न होती।

• दूसरी बात— कश्मीर का मुद्दा और उसका अंतरराष्ट्रीयकरण।
जितना इतिहास को पढ़ा और जाना उसके अनुसार मेरा मानना है कि महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत में विलय के प्रस्ताव के बाद भी कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाना एक गंभीर रणनीतिक भूल थी। इससे यह विषय भारत का आंतरिक मामला न रहकर अंतरराष्ट्रीय विवाद बन गया।

1947 के युद्ध में जब भारतीय सेना रणनीतिक रूप से मज़बूत स्थिति में थी, तब युद्धविराम का निर्णय और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता ने पाकिस्तान को कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा बनाए रखने का अवसर दे दिया। यही क्षेत्र आगे चलकर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) कहलाया।

• तीसरी एवं अंतिम बात— चीन को लेकर रणनीतिक चूक और 1962 का युद्ध।
नेहरू का “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का विश्वास आदर्शवादी था, लेकिन भू-राजनीति आदर्शों से नहीं, ताकत और तैयारी से चलती है। चीन की सैन्य क्षमता को कम आंकना, सीमा विवाद को राजनयिक मित्रता से सुलझाने की उम्मीद और भारतीय सेना को पर्याप्त रूप से तैयार नहीं करने का परिणाम 1962 के युद्ध में भारत की करारी हार के रूप में सामने आया। अक्साई चिन का नुकसान सिर्फ़ भूगोल का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मनोबल का भी था।

इन सभी मुद्दों पर नेहरू से असहमति रखते हुए भी यह समझना ज़रूरी है कि ये निर्णय किसी दुर्भावना से नहीं, बल्कि उस समय की वैचारिक सीमाओं, आदर्शवाद और अनुभवहीनता के भीतर लिए गए थे।

शायद इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि राष्ट्र निर्माण में नियत की पवित्रता पर्याप्त नहीं होती, रणनीतिक कठोरता और यथार्थबोध भी उतना ही आवश्यक होता है।

नेहरू की सबसे बड़ी विरासत उनकी त्रुटिहीनता नहीं, बल्कि वह लोकतांत्रिक वातावरण है जिसमें उनकी नीतियों पर सवाल उठाना आज भी संभव है। और शायद यही किसी भी लोकतांत्रिक नेता की सबसे बड़ी सफलता होती है।

इन उदाहरणों को पढ़ते हुए मैं समझ पाया कि नेहरू की महानता उनकी नीतियों की निष्कलंकता में नहीं, बल्कि आलोचना सहने की क्षमता में थी। वे सत्ता में रहकर भी लोकतंत्र से भयभीत नहीं थे। शायद यही कारण है कि नेहरू केवल अपने समर्थकों के नहीं, अपने विरोधियों के भी नेता थे।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो महसूस करता हूँ कि गलती गांधी या नेहरू की नहीं थी। गलती मेरी अधूरी समझ, सुनी-सुनाई बातों और जल्दबाज़ निष्कर्षों की थी।

यह लेख केवल गांधी–नेहरू का पुनर्पाठ नहीं है, यह मेरी अपनी वैचारिक यात्रा की स्वीकारोक्ति है। विरोध से विवेक तक पहुँचने की यात्रा।

शायद यही परिपक्वता है जब आदमी यह मान ले कि सीखना जीवन भर चलता है, और सच किसी एक किताब, एक नारे या एक विचारधारा में कभी पूरा नहीं मिलता।
क्रमशः . . .𓂃✍︎

07/01/2026

धारणा का साम्राज्य और मीडिया का पतन✍️
(2029 तक कौन बचेगा? सत्ता, कॉरपोरेट और नियंत्रित पत्रकारिता का खेल)
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भारतीय मीडिया के भीतर चल रही उथल-पुथल अब छिपी नहीं है। हालात इस ओर बढ़ते दिख रहे हैं कि कमाई, प्रभाव और सत्ता तक पहुँच कुछ गिने-चुने मीडिया घरानों में सिमटती जा रही है। चर्चा है कि फिलहाल यदि किसी की मीडिया कमाई अपेक्षाकृत सुरक्षित मानी जा रही है, तो वह अदाणी समूह की NDTV और अंबानी समूह की News18 तक सीमित है। इसके अलावा कभी देश का नंबर-वन रहा आज तक भी किसी तरह इस दौड़ में टिका हुआ है, जबकि शेष बड़े चैनल गंभीर आर्थिक दबाव में हैं।

यह संकट छोटे चैनलों तक सीमित नहीं है। खुद अरुण पुरी जैसे मीडिया उद्योग के वरिष्ठ चेहरे सार्वजनिक रूप से विज्ञापन संकट और इंडस्ट्री की बदहाली की बात स्वीकार कर चुके हैं। साफ है कि यह समस्या किसी एक चैनल की नहीं, बल्कि पूरे ढांचे की है।

बीते वर्षों में सरकारी और कॉरपोरेट विज्ञापनों का संतुलन जिस तरह बदला है, उसने मीडिया की रीढ़ तोड़ दी है। आरोप हैं कि विज्ञापन का बड़ा हिस्सा चुनिंदा संस्थानों तक सीमित कर दिया गया है। नतीजा यह कि बाकी मीडिया संस्थान आर्थिक रूप से हांफ रहे हैं। इसका असर उन चेहरों पर भी दिख रहा है, जो कभी सत्ता के सबसे आक्रामक समर्थक माने जाते थे। आज वही चेहरे अपनी प्रासंगिकता और आय दोनों को बचाने की जद्दोजहद में हैं।

मीडिया गलियारों में अब यह सवाल आम हो गया है कि क्या सत्ता के लिए दो-तीन बड़े कॉरपोरेट मीडिया हाउस पर निर्भर रहना अधिक सुविधाजनक नहीं है? बीस संस्थानों को संभालने की बजाय कुछ भरोसेमंद मंचों तक संवाद सीमित कर देना कहीं ज्यादा आसान रणनीति नहीं है? इसी सोच के तहत यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 2029 तक NDTV, News18 और किसी हद तक आज तक ही मुख्यधारा में टिक पाएंगे, जबकि बाकी चैनलों की आर्थिक ऑक्सीजन धीरे-धीरे बंद कर दी जाएगी, ताकि वे स्वतः ही हाशिए पर चले जाएँ।

लेकिन इस पूरे परिदृश्य का एक और पहलू है, जिसे जानबूझकर अनदेखा किया जाता रहा है—
मीडिया की अपनी ज़िम्मेदारी।

Malcolm X ने बहुत पहले चेताया था— “अगर आप सावधान नहीं रहे, तो मीडिया आपको उत्पीड़क से प्रेम और उत्पीड़ित से घृणा करना सिखा देगा।”

आज यह कोई चेतावनी नहीं, बल्कि भारतीय मीडिया की रोज़ की कार्यप्रणाली बन चुकी है।

यह पतन केवल सत्ता या कॉरपोरेट के दबाव का नतीजा नहीं है। बीते एक दशक में बड़े मीडिया संस्थानों ने पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को त्याग कर सुविधाजनक नैरेटिव को अपनाया। सवाल पूछने की जगह प्रचार किया गया। तथ्यों की जगह भावनाएँ बेची गईं। अपराध और अन्याय को “एंगल” और “डिबेट” में बदलकर उसका नैतिक बोझ हल्का किया गया।

खबरों की भाषा, एंकर का स्वर, स्टूडियो में बैठाए गए चेहरे सब कुछ इस तरह चुना गया कि दर्शक सच पर नहीं, प्रतिक्रिया पर ध्यान दे। यह सूचना नहीं, धारणा निर्माण है। एक ऐसा मनोवैज्ञानिक अभियान, जिसमें जनता को महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय जैसे असहज सवालों से दूर रखकर भावनात्मक उत्तेजना में उलझाए रखा गया।

परिणाम यह हुआ कि सत्ता के अन्याय पर गुस्सा पैदा होने के बजाय, सवाल पूछने वाले नागरिक पर शक और नफ़रत पैदा की गई। व्यवस्था सुरक्षित रही और सच को संदिग्ध बना दिया गया।

आज सजग होने का अर्थ सिर्फ़ “फ़ेक न्यूज़” पहचानना नहीं है। आज ज़रूरी यह पूछना है— यह खबर किसके हित में है? किसे बचाया जा रहा है और किसे कटघरे में खड़ा किया जा रहा है?

जो मीडिया यह सवाल पूछने नहीं देता, वह लोकतंत्र की नहीं, अपने संरक्षक की सेवा कर रहा होता है।

इसी कारण आज पढ़ा-लिखा दर्शक टीवी न्यूज़ से दूर होता जा रहा है। लोग अब न्यूज़ चैनल को सूचना का स्रोत नहीं, बल्कि नियंत्रित विचारधारा का उपकरण मानने लगे हैं। यूट्यूब और डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर झुकाव किसी तकनीकी क्रांति का परिणाम नहीं, बल्कि विश्वास के टूटने का संकेत है।

2026 के बाद मीडिया का चेहरा और बदलेगा। कुछ लोग व्यवस्था से टकराएँगे, कुछ पूरी तरह समर्पण करेंगे, और कई चेहरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नया ठिकाना तलाशेंगे। लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी रोज़ी-रोटी का सवाल सत्ता की कृपा से जुड़ा हुआ है। अंततः यह लड़ाई चैनलों के अस्तित्व की नहीं, सच पर नियंत्रण की है।

फिलहाल संकेत यही देते हैं कि इस नियंत्रण के खेल में कुछ कॉरपोरेट समूह दूसरों की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति में हैं। कौन कितनी दूर तक साथ चलेगा और किस मोड़ पर समीकरण बदलेंगे यह राजनीति तय करेगी।

लेकिन इतिहास गवाह है— सत्ता का सहारा अस्थायी होता है। जब जनता भरोसा वापस ले लेती है, तो सबसे बड़ा मीडिया साम्राज्य भी शोर के बीच खामोशी में डूब जाता है।

जैसी करनी, वैसी भरनी।

04/01/2026

वोट चोरी, संप्रभुता और सहानुभूति का भ्रम : वेनेजुएला का यथार्थ✍️
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वेनेजुएला में हालिया घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह निकोलस मादुरो के पक्ष में सहानुभूति की लहर दिखाई दे रही है, वह पहली नज़र में स्वाभाविक लग सकती है। किसी संप्रभु देश के राष्ट्रपति का अपहरण कर उसे अमेरिका ले जाना अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीतिक मर्यादाओं और राज्यों की संप्रभुता तीनों का खुला उल्लंघन है। यह कृत्य निंदनीय है और इसकी आलोचना होनी ही चाहिए।

किंतु यही वह बिंदु है जहाँ भावनात्मक प्रतिक्रिया और बौद्धिक विवेक के बीच फर्क करना आवश्यक हो जाता है। किसी राष्ट्रपति के साथ अन्याय होना अपने आप में उसे लोकतंत्र का वैध प्रतिनिधि सिद्ध नहीं कर देता।

वेनेजुएला के वर्तमान संकट को समझने के लिए बीते बीस वर्षों के इतिहास को देखना अनिवार्य है। ह्यूगो शावेज एक विवादास्पद लेकिन निर्विवाद रूप से लोकप्रिय नेता थे। वे उदार लोकतंत्र के प्रतीक नहीं थे और उनकी शासन शैली में तानाशाही के तत्व मौजूद थे, फिर भी उनकी वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाना कठिन था।

इसका कारण उनकी चुनावी जीतें थीं, जो न केवल बड़े बहुमत से होती थीं बल्कि ऐसी पारदर्शी चुनाव प्रणाली के तहत होती थीं कि विपक्ष भी उन्हें फर्जी नहीं कह सकता था। पहचान पत्र आधारित मतदान, ईवीएम के साथ पर्ची व्यवस्था, बूथ स्तर पर ही मशीन और पर्ची का मिलान, सार्वजनिक गिनती और पक्ष-विपक्ष एजेंटों के हस्ताक्षर, यह सब मिलकर एक ऐसी प्रक्रिया बनाते थे, जो परिणामों को लगभग निर्विवाद बना देती थी।

शावेज की मृत्यु के बाद निकोलस मादुरो सत्ता में आए। प्रारंभिक दौर में उन्हें शावेज की राजनीतिक विरासत और सहानुभूति का लाभ मिला और उनकी जीत पर भी व्यापक विवाद नहीं हुआ। किंतु समय के साथ वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था गहराते संकट में चली गई। तेल पर अत्यधिक निर्भरता, कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार ने जनता का भरोसा कमजोर कर दिया। 2024 तक आते-आते स्थिति यह हो चुकी थी कि विपक्ष की नेता मारिया कोरिना मचाडो देश की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक शख्सियत बन चुकी थीं।

यहीं से मादुरो शासन का वास्तविक चरित्र सामने आता है। मचाडो पर विदेशी ताकतों से साजिश और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के आरोप लगाए गए और उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिया गया। यह तर्क और भाषा दुनिया के कई लोकतंत्रों में सत्ता से चिपके शासकों द्वारा अपनाई जाती रही है। विडंबना यह है कि यही मारिया मचाडो 2025 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित होती हैं, जो उनके अंतरराष्ट्रीय नैतिक कद को दर्शाता है।

मचाडो की अनुपस्थिति में 2024 का चुनाव एडमुंडो गोंजालेज़ ने लड़ा। मतदान हुआ, पर्चियाँ बनीं और बूथ-स्तर के फॉर्म तैयार हुए। गोंजालेज़ ने देश भर से प्राप्त इन सभी 17C-नुमा फॉर्मों को सार्वजनिक किया और उन्हें वेबसाइट पर डाला। इनका कुल योग स्पष्ट रूप से दर्शाता था कि विपक्ष को लगभग 80 प्रतिशत समर्थन प्राप्त हुआ है। इसके बावजूद केंद्रीय मशीन परिणामों में मादुरो को विजेता घोषित कर दिया गया। सेना, न्यायपालिका और अधिकांश मीडिया सत्ता के साथ खड़े थे और इस प्रकार एक स्पष्ट जनादेश को कुचल दिया गया।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे निर्णायक प्रमाण जनता की प्रतिक्रिया बल्कि उसकी अनुपस्थिति है। मादुरो की गिरफ्तारी या अपहरण के बाद वेनेजुएला की सड़कों पर कोई व्यापक जनआंदोलन नहीं दिखा। यदि मादुरो वास्तव में जनता के चुने हुए और लोकप्रिय राष्ट्रपति होते, तो यह चुप्पी संभव नहीं थी। दिलचस्प यह है कि उनके पक्ष में सबसे तीखी प्रतिक्रियाएँ वेनेजुएला के भीतर नहीं, बल्कि विदेशों और सोशल मीडिया पर दिखाई देती हैं।

यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि अमेरिका वेनेजुएला में लोकतंत्र की रक्षा के लिए नहीं गया। वहां का हस्तक्षेप तेल, भू-राजनीति और रणनीतिक हितों से प्रेरित है। किंतु यह मानना भी भोला होगा कि अमेरिकी प्रशासन को वेनेजुएला के भीतर मादुरो के कमजोर जनाधार की जानकारी नहीं है। सत्ता बल और तंत्र के सहारे कायम रखी जा सकती है, लेकिन जनसमर्थन के बिना वह खोखली ही रहती है।

निष्कर्षतः, वेनेजुएला की संप्रभुता पर किसी भी प्रकार का बाहरी हमला निंदनीय है और उसकी आलोचना की जानी चाहिए। लेकिन इस सैद्धांतिक विरोध को मादुरो के लिए नैतिक सहानुभूति में बदल देना एक बौद्धिक भूल होगी। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है, बल्कि जनादेश का सम्मान करने का दायित्व भी है। वोट चोरी से सत्ता पर बैठा व्यक्ति कानूनी वैधता का भ्रम तो रच सकता है, लेकिन नैतिक वैधता अर्जित नहीं कर सकता।

मादुरो किसी लोकतांत्रिक अन्याय के शिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के हनन के प्रतीक हैं और यही वेनेजुएला की सबसे कड़वी सच्चाई है।

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