07/05/2025
Solanki English Institute.
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07/05/2025
25/04/2024
My student cm Niece Jyoti Tomar (Ashika) got 10th rank (96.4 %) in class 12th in M.P.. .....and 96 /100 in English ... Congratulations dear
दोगली मानसिकता
बड़े चालक है हम लोग मंगलवार और शनिवार को मांसाहार, नशा या अन्य गलत काम करने से बचते है । मान्यता हनुमान जी का दिन है , उन्हे ये सब पसंद नहीं। मानों बाकी दिनों में कुछ भी करो तो हनुमान जी की पूर्ण सहमति ? इसका मतलब बाकी देवी देवताओं के दिन सब कुछ करना सही है । अन्य देवताओं का अपमान क्यों भाई ? बाकी दिनों 100 खून माफ हो जाते है क्या?
हम खुद को ही इतना भ्रम में रखते है।😀 स्पष्टवादी बनने क्या समस्या है भाई ?
ऐसे काम करना है तो किसी भी दिन कर लो या फिर किसी भी दिन मत करो। ये दोगलापन कहां से आता है दिमाग में ?
★ आखिरकार हमे अपने जीवन में चाहिए क्या ?
✍️✍️आकाश सिंह सोलंकी
जब छोटे थे तब हमसे कहा जाता था की अच्छे से पढ़ लिख लो उसके बाद मजे ही मजे,फिर जब पढ़–लिख लिए तो कहा गया की अच्छी नौकरी ले लो या आय का अच्छा source बना लो फिर आनंद ही आनंद, वो भी कर लेते है फिर पता चलता हैं शादी कर लो फिर आनंद ही आनंद ,वो भी कर लेते है फिर बोला जाता है धन,संपत्ति ,प्रसिद्धि, ताकत प्राप्त कर लो फिर सुकून ही सुकून है। बहुत लोग ये भी कमा लेते है । ये सब प्राप्त कर लेने के बाद भी जब मैं लोगों को दुखी, परेशान ,निराश, हताश , जीवन से थका-हारा और तनाव में देखता हूं तो लगता है की जीवन में ऐसा क्या है जिसकी कमी हमेशा हमे महसूस होती रहती है और इतना सबकुछ पा लेने के बाद भी जिसकी तलाश में हम हमेशा ही लगे रहते है?
क्या वह शिक्षा या ज्ञान है?
तो फिर शिक्षक, वैज्ञानिक, डॉक्टर्स, दर्शनशास्त्री और धर्म के ज्ञाता इतना हताश,निराश एवं दुखी क्यों ?
क्या वह धन है?
तो फिर धनवान इतना चिंतित, असुरक्षित और दुखी क्यों ?
क्या वह सत्ता या ताकत हैं?
तो फिर सारे राजनेता , अधिकारी, गैंगस्टर्स और माफिया इतने भयभीत, बैचेन और चिंतित क्यों?
सबसे बड़ा झटका मुझे तब लगता है जब समाज की नजर में सफल,धनवान या ताकतवर व्यक्ति किसी दुख, कलेश या समस्या की वजह से आत्महत्या कर लेता है या सबकुछ त्यागकर सन्यासी बन जाता है या मंदिर-मंदिर भटकता है या सबकुछ पा लेने के बाद भी संतों की शरण में जाना पड़ता है । पुरी दुनिया न जाने किस सफलता की बात करती है जहां पहुंचकर भी संतुष्टि,शांति और पूर्णता का अनुभव नहीं होता है बल्कि और ज्यादा अधूरापन, खोखलापन,अशांति और बैचेनी महसूस होती है। आप किसी भी क्षेत्र के सफल व्यक्ति से पूछेंगे और यदि वह ईमानदारी से जवाब दे तो पाएंगे की आपकी मनोस्तिथि उससे बेहतर है।
ऐसा क्या है जो हमे वास्तव में चाहिए जिसे पा लेने के बाद कुछ और पाने की इच्छा न हो और कहीं किसी की शरण में जाने का मन न करे ?
मेने इसका जबाव प्राप्त करने के लिए थोड़ी बहुत दर्शन शस्त्रों , धार्मिक पुस्तकों ,वैज्ञानिक पुस्तकों को पढ़ा,धर्म के ज्ञानियों को सुना और सबसे महत्वपूर्ण खुद शांत-चित्त होकर चिंतन-मनन और अवलोकन (observation) किया तो मेने पाया की हमको अंततः जो चाहिए वो है "स्वतंत्रता और मन की शांति" जिसे धार्मिक शास्त्रों ने मुक्ति,मोक्ष ,केवल्य या निर्वाण कहा है जो मृत्यु के बाद नहीं बल्की जीवित रहते हुए ही अनुभव की जा सकती है।
जीवन भर इतने ताम- झाम करने के बाद ,सगाई-संबंध बनाने और निभाने के बाद ,धन-संपत्ति और सुख-सुविधाएं जुटाने के बाद भी भी हमेशा ऐसा लगता है मानो जीवन में कुछ तो कमी रह गई है, असंतुष्टि और दुःख है,एक अधूरापन का एहसास हमेशा रहता है, कुछ तो है जो अभी भी अनपाया रह गया जिसे पाने के लिए अनजाने में हम बहुत सारी चीज़ें प्राप्त करते जा रहे हैं और खुद को एवं दूसरों को दिलासा देते रहते हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब सब कुछ ठीक होगा । क्या है वह चीज ?
जवाब है "स्वतंत्रता और मन की शांति"
ये सब सांसारिक कामों को करने में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती, करने भी चाहिए, लेकिन हम इन सब चीजों में इतना खो गए हैं की ये भूल ही गए हैं की ऐसा क्या है जिसकी पूर्ति के लिए या जिसे प्राप्त करने के लिए हम जीवन भर इतना संघर्ष करते रहते लेकिन अंत में असंतुष्ट होकर मर जाते हैं।
ध्यान से थोड़ा बैठकर शांतचित्त होकर सोचेंगे तो फिर वही जवाब मिलेगा " स्वतंत्रता और शांति "
धन कमाते है ताकि वो चीज खरीद सकें जिससे सुख मिले और सुख मिलता भी है लेकिन बहुत कम समय के लिए। फिर दूसरे सुख को पाने में लग जाते है । एक सुख को पा लेने के बाद दूसरे सुख की इच्छा फिर तीसरे जिसका कोई अंत ही नजर नहीं आता है। मतलब संतोष फिर भी नहीं मिलती है।
बस एक ही चीज है जिसे अनुभव करने के बाद कुछ पाने की महत्वकांक्षा शेष नहीं रह जाती है वह है "मन की शांति" जो संतोष (satisfaction) से आती है । थोड़े पल को ही सही लेकिन कभी कभार हमे शांति का अनुभव जब भी होता है तो मानो ऐसा लगता है की दुनिया थम सी गई है , विचारों, इच्छाओं,चिंताओं पर विराम लग गया है । कुछ पाना शेष नहीं है ,कुछ खोने की चिंता नहीं,मानो सब कुछ मिल गया है । ऐसी अवस्था में जहां बैठे हैं वही बस बैठे रह जाते हैं,जी करता है की बस यह क्षण यहीं रुका रह जाए । लेकिन थोड़े ही पल बाद फिर वही पुराने जीवन में लौट आते है, लेकिन कुछ ताजा और नयापन के अनुभव के साथ। हां यही तो चाहिए हमें, यही पाने के लिए तो हम मंदिर-मस्जिद-चर्च में जाते है ,यही कुछ क्षण अनुभव करने के लिए तो जंगल एवं पहाड़ों में घूमने जाते है, यही कुछ क्षण की शांति का अनुभव करने के लिए तो कभी-कभी हमारा मन सबसे दूर कहीं चले जाने को करता है।
स्वतंत्रता मतलब किसी भी प्रकार का बंधन न हो, न किसी रिश्ते से बंधे हों,न किसी नौकरी या व्यापार से बंधे हो ,न किसी वस्तु या जीव से बंधे हो। यहां सभी बंधनों को तोड़ने की बात नहिं है। बल्की मैं तो मानसिक स्वतंत्रता की बात कह रहा हूं। बंधनों में होते हुए भी मन से किसी बंधन में न उलझना ।
शांती अर्थात किसी भी प्रकार का मन में भय,असुरक्षा की भावना या चिंता न हो, कुछ पाने की महत्वकांक्षा न हो और कुछ भी खोने का डर न हो, दिमाग में जैसे सभी प्रकार के विचारों पर विराम लग गया हो। शान्ति अनुभव करने के लिए संतोषी बनने का अभ्यास निरंतर करते रहना होगा । संतोष (satisfaction) कैसे मिले ? जो कुछ हमारे पास है उसके प्रति परमात्मा का आभारी हूं मैं तो इसके भी लायक नहीं था। लेकिन कर्म करना तो नहीं छोड़ सकते है न, हांथ पर हांथ रख कर नहीं बैठ सकते , फिर संसार चलेगा कैसे? हम अपना और देश का विकाश करेंगे कैसे? तो फिर क्या करें ?
जबाव है निष्काम कर्म ।
क्या है निष्काम कर्म ? इसका जवाब भागवत गीता में मिलेगा , उसे पढ़ना होगा।
क्या "स्वतंत्रता और शांति" (मोक्ष) सब काम -धंधा, रिश्ते-नाते और कर्तव्य त्यागकर जंगल और पहाड़ों में जाकर ही सिर्फ मिल सकती है ? जैसे बुद्ध,महावीर आदि
क्या " स्वतंत्रता और शांति" संसार में रहकर संसार के कामों को करते हुए भी मिल सकती है ? जैसे भगवान कृष्ण, भगवान राम, राजा जनक, संत कबीर, तुलसीदास आदि
क्या हमेशा के लिए "स्वतंत्रता और शांति" प्राप्त करना या अनुभव करना संभव है ?
मैं जहां तक समझ पाया हूं की सभी धर्म शास्त्रों में जिस मोक्ष (स्वतंत्रता और शांति) की बात हुई है वो किसी व्यक्ति या वस्तु या बंधन से दूर भागकर मोक्ष पाने की बात नहीं हैं बल्कि मन से मुक्त होने की बात कही गई है या कहे इच्छाओं और उम्मीदों से स्वतंत्र होने की बात कही गई है। जैसे बंधन में रहते हुए भी बंधन महसूस न हो , किसी भी वस्तु, व्यक्ति या जीव से प्रेम करते हुए भी अधिक मोह (Attachment) महसूस न हो, किसी व्यक्ति, वस्तु या आदत आदि त्यागने में बहुत कठिनाई न हो, कुछ खो गया तो अधिक दुख या संताप का न हो, कुछ पा लिया तो प्रसन्नता और अभिमान में डूब ही न जाएं आदि ऐसी अवस्था जब हो जाए तब शायद बुध, महावीर ,कृष्ण और राम तत्व किसी व्यक्ति के अंदर जन्म लेता है। तब व्यक्ति का पूरा व्यक्तिव, सोच और नजरिया बदल जाता है , और व्यक्ति एक नए अवतार में आ जाता है । शायद यही अवतारवाद दर्शन के पीछे का सिद्धांत है।
ये सब ज्ञान की बातें हम अक्सर पढ़ते एवं सुनते रहते है। इन सबसे कुछ नहीं होता है । ये सब सुनने और प्रवचन देने में ही अच्छी लगती है , ऐसे विचार हम सबके दिमाग में आते है। लेकिन जहां तक मैं समझ पाया हूं , ये सब बातें हमें खुद को बार बार ध्यान दिलानी होंगी, जीवन में उतारना होगा एवं जीवन भर अभ्यास (Practice) करना होगा । जो ऐसा करता है उसे ही श्री कृष्ण ने गीता में योगी कहा है।
स्वतंत्रता और शांति को पाने के जिन तरीको को मेने अभी बताया है वो आपके और मेरे लिए कर पाना आसान नहीं, लेकिन हम इसमें अभ्यस्त या योगी (skilled) बनने का निरंतर प्रयास तो कर ही सकते है।
अपनी छोटी सी बुद्धि और कम अनुभव के आधार पर अभी तक बस इतना ही समझ पाया हूं।🙏
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