Dheerendra KUMAR YADAV

Dheerendra KUMAR YADAV

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I want change education system , and made it friendly to Lerner.

21/03/2019

Happy holi to all my friend and students.

25/06/2018

वृक्ष कभी इस बात पर व्यथित नहीं होता कि,
उसने कितने पुष्प खो दिये…
वह सदैव नये फूलों के सृजन में व्यस्त रहता है ।
जीवन में कितना कुछ खो दिया
इस पीड़ा को भूलकर, हम क्या नया कर सकते है, यह सोचना…
इसी में जीवन की सार्थकता है
सुप्रभात!!
📕दिव्य शिक्षण संस्थान 📙
गुरुग्राम

14/09/2015

आर्थिक स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता

एक महत्वपूर्ण सवाल: क्या आर्थिक स्वतंत्रता से सचमुच लोगों के जीवन स्तर में कोई सुधार आता है? श्रीलंका में आर्थिक स्वतंत्रता ज्यादा है। यहां आर्थिक और सामाजिक माहौल भी अन्य दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में बेहतर है। फ्रेजर तालिका में आर्थिक मायने में ज्यादा मुक्त देशों और कम मुक्त देशों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में आश्चर्यजनक अंतर देखने को मिलता है।

24 सबसे ज्यादा मुक्त देशों (शीर्ष के 20%) के लोग 24 सबसे कम मुक्त देशों (नीचे से 20%) के लोगों की तुलना में 20 साल ज्यादा जीते हैं। 1997 में सबसे ऊपर के 20% देशों में प्रतिव्यक्ति औसत आय 18,000 डॉलर थी, जबकि नीचे के 20% देशों में यही आय 2,000 डॉलर से भी कम थी। यही नहीं, 90 के दशक में आर्थिक रूप से सबसे कम मुक्त देशों के सकल घरेलू उत्पाद में नकारात्मक वास्तविक विकास देखने को मिला - उनकी अर्थव्यवस्था सिकुड़ गयी।

सबसे ऊपर 20% देशों का संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक 0.9 है, वहीं नीचे के 20% देशों का सूचकांक 0.45 से भी कम है। और आगे बढ़कर बात की जाए तो ऊपर के 20% देशों में प्रौढ़ निरक्षरता और गरीबी की दर काफी कम है, श्रम की उत्पादकता काफी ज्यादा है और शुद्ध पेयजल ज्यादा लोगों को उपलब्ध है।

पुरानी धारणा के अनुसार अमीर देशों में काफी आर्थिक असमानता होती है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? इसकी जांच का एक आसान तरीका यह है कि हम देश के औसत परिवार के जीवन-शैली की तुलना 'पहले परिवार' यानी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के परिवार से करें। उन देशों में इनके जीवन-शैली का अंतर बहुत कम है, जो आर्थिक मायने में ज्यादा स्वतंत्र हैं, जैसे जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका या स्विटजरलैंड। जबकि उत्तरी कोरिया, वर्मा, क्यूबा या ईरान जैसे कम मुक्त देशों में यह अंतर काफी ज्यादा है। जर्मनी के चांसलर के रोजमर्रा का भोजन कमोबेश जर्मनी के औसत परिवार के जैसा ही है, जबकि निःसंदेह बर्मा या उत्तरी कोरिया में इसमें काफी अंतर होता है।

आर्थिक स्वतंत्रता का पैमाना विकसित करने से सामाजिक वैज्ञानिकों को आर्थिक और सामाजिक विकास में इसके महत्व का आंकलन करने का मौका मिला है। अब लेखों या अन्य प्रकार के साहित्य द्वारा एडम स्मिथ के विचार को स्वीकार किया जाने लगा है कि विकास की ऊंची दर हासिल करने में आर्थिक स्वतंत्रता का काफी महत्व है। साथ ही सरकार की कानूनी और नियंत्रक व्यवस्था में थोड़ा ही परिवर्तन कर देने से आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ सकती है। बुनियादी ढांचे, स्कूलों और अस्पतालों के विपरीत आर्थिक स्वतंत्रता बिना अधिक पूंजी और नई प्रौद्योगिकी लगाए बढ़ाई जा सकती है। यह लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने का सबसे आसान तरीका है।

मानवीय गरिमा की रक्षा करने और एक अच्छा समाज बनाने के लिए आर्थिक स्वतंत्रता उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी राजनीतिक और सामाजिक स्वतंत्रता। आर्थिक स्वतंत्रता अर्थात उत्पादन और व्यापार की स्वतंत्रता को मानव के मौलिक अधिकारों में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए।

Photos 29/08/2015

फेरीवाले कारोबार से क्यों इन्कार

देश के तमाम शहरों की सड़कें न सिर्फ लाखों कामगार गरीबों तथा अभावग्रस्त लोगों की आश्रयस्थली वरन उनकी रोजीरोटी का केंद्र भी हैं, जहां पर वे सस्ते और आकर्षक सामानों की दुकान सजाते हैं। शहरों में सड़क किनारे फुटपाथ पर आपकों ऐसे अनेक पुरष-महिलाएं पकाया हुआ भोजन, फल व सब्जियां, कपड़े, खिलौने, किताबें, घरेलू इस्तेमाल की चीजें व सजावटी सामान बेचते मिल जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक भारत में तकरीबन एक करोड़ लोग इस तरह सड़क किनारे सामान बेचते हुए अपनी आजीविका कमाते हैं।

हालांकि इन स्ट्रीट वेंडर्स की जिंदगी बेहद कठिन होती है। शरित भौमिक द्वारा नेशनल अलायंस ऑफ स्ट्रीट वेंडिंग ऑफ इंडिया के साथ मिलकर सात शहरों में किए गए सर्वे से पता चला कि उनकी कामकाजी स्थितियां बेहद खराब हैं। उन्हें दिन में दस से बारह घंटे तक काम करना पड़ता है और उनके पास मौसमी प्रकोप से बचने, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा के कोई संसाधन नहीं होते। उनकी आमदनी न्यूनतम मजदूरी से भी कम होती है। उन्हें काम करने के लिए पूंजी कर्ज के रूप में सिर्फ निजी सूदखोरों से ही मिलती है, जो अनाप शनाप सूद वसूलते हैं।

लेकिन इनकी सबसे बड़ी समस्या व तनाव प्रशासन का प्रतिकूल रवैया है। इन स्ट्रीट वेंडर्स को रोज पुलिस व नगर निगम वालों के साथ अघोषित लड़ाई लड़नी पड़ती है। सात शहरों में किए गए अध्ययन से इस बात की पुष्टि हुई कि तमाम शहरों में स्ट्रीट वेंडर्स को पुलिस व नगर-निगम वालों को दिहाड़ी या साप्ताहिक घूस के साथ-साथ कई बार भारी जुर्माना भी देना पड़ता है। इसके बावजूद वे कभी भी अचानक खदेड़े जाने के भय से मुक्त नहीं हो पाते। इस अध्ययन का आकलन है कि उनकी कम से कम 20 फीसदी आमदनी तो वसूली करने वाले सरकारी कर्मचारियों के हाथों में चली जाती है।

आधिकारिक जबरन वसूली और असुरक्षा वास्तव में एक दमनकारी व अपारदर्शी लाइसेंस राज से उपजती है, जो प्रभावी ढंग से स्ट्रीट वेंडिंग के तकरीबन तमाम पेशे को अवैध करार देता है। किसी शहर में मनमाने ढंग से लाइसेंसों की एक उच्च सीमा तय कर दी जाती है, जो इतनी कम होती है कि इसमें स्ट्रीट वेंडर्स का बहुत छोटा हिस्सा समायोजित हो पाता है। मसलन मुंबई में एक अनुमान के मुताबिक 2 लाख हॉकर्स हैं, लेकिन नगर निगम ने महज 14,000 लाइसेंसों की सीमा तय कर दी और ये लाइसेंस भी कई सालों तक जारी नहीं हुए। इस वजह से ज्यादातर वेंडर्स अवैध माने गए। वहां लाइसेंस देने के बदले जमकर वसूली की जाती है। कोलकाता में तो स्थिति और भी खराब थी, जहां कानून के जरिये तमाम स्ट्रीट वेंडिंग को प्रतिबंधित कर दिया गया।

1990 के दशक से घोषित सरकारी नीति निजी कारोबारी उद्यमों को लाइसेंस परमिट राज के चंगुल से मुक्त करने की रही है। सरकारी प्रयासों के तहत नियोजित सेक्टर में कारोबार स्थापित करने के नियमों को सरल बनाने व नियंत्रण-मुक्त करने पर फोकस किया गया। हाल ही में बड़े मल्टी-ब्रांड रिटेल स्टोर्स में विदेशी निवेश लाने के लिए भी नियमों को सरल किया गया। हालांकि स्ट्रीट वेंडर्स की रोजी रोटी को सरल बनाने के लिए इस तरह के कोई प्रयास नहीं किए गए, जो अब भी अन्यायपूर्ण लाइसेंसिंग व्यवस्थाओं के जाल में फंसे हैं।

ये वेंडर्स शहरी भूमि के सिर्फ 2 फीसदी हिस्से पर निर्भर होते हैं, लेकिन कई बार इन स्थलों को भी उनके लिए कानूनी तौर पर प्रतिबंधित कर दिया जाता है। सात शहरों के अध्ययन से पता चला कि सिर्फ भुवनेश्वर व इम्फाल ने अपनी शहर विकास योजनाओं में स्ट्रीट वेंडर्स के लिए प्रावधान किया है, लेकिन दिल्ली, पटना, बेंगलुरू, मुंबई, अहमदाबाद व कोलकाता की विकास योजनाओं में ये नदारद थे। इन योजनाओं में अस्पतालों, पार्कों, ऑफिसों, आवासीय कॉलोनियों और बस व रेल टर्मिनलों के लिए जगहें चिन्हित की गईं, लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि इन तमाम जगहों के ईर्द-गिर्द वेंडर्स स्वाभाविक तौर पर जमा होते हैं, जो लोगों को सस्ती दरों पर जरूरी चीजें व सेवाएं मुहैया कराते हैं। शहरी योजनाओं में मॉल्स व शॉपिंग कॉम्पलेक्स के लिए जगह है, लेकिन गरीबों द्वारा गरीब के लिए चलाई जाने वाली दुकानों के लिए कोई जगह नही है।

एक अहम केंद्रीय विधेयक सदन के समक्ष है, जो इन विषमताओं को दुरूस्त करने का भरोसा देता है। कहा यही जा रहा है कि इस विधेयक का मकसद महज स्ट्रीट वेंडिंग को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि स्ट्रीट वेंडर्स के रोजी-रोटी कमाने के अधिकार को संरक्षित रखना भी है। लेकिन व्यवहार में इस विधेयक का ज्यादतर हिस्सा पंजीयन व लाइसेंसिंग को समर्पित है और इसमें प्रस्तावित व्यवस्था अब भी अपारदर्शी व भ्रामक लगती है। यह स्ट्रीट वेंडर्स के लिए अपने व्यवसाय का पंजीयन कराने के लिए कहता है। नगर निगम स्ट्रीट वेंडर्स के लए मूल निवासी जैसी अनेक शर्तें पूर्वनिर्धारित कर सकते हैं, जिनके लिए दस्तावेजों की जरूरत पड़ सकती है और जिन्हें गरीब स्ट्रीट वेंडर्स पेश नहीं कर पाएंगे। इसके अलावा वे उच्च कीमतों वाले मौजूदा वेंडिंग बाजारों को नॉन-वेंडिंग जोन घोषित कर सकते हैं।

यह स्थिति तभी बदल सकती है, जबकि कानून यह निर्धारित करे कि ज्यादातर वेंडर्स रजिस्टर्ड हों, और उनके विक्रय केंद्रों तथा बिक्री क्षमताओं का निर्धारण पारदर्शी प्रक्रिया द्वारा किसी ऐसी एजेंसी द्वारा किया जाए, जिसमें वेंडर्स के प्रतिनिधि भी शामिल हों।

कुल मिलाकर हमें अपने शहरों का स्वरूप इस तरह तैयार करना होगा, जिसमें व्यापक शहरी गरीब समुदाय वैध साझेदार के तौर पर शामिल हो सके। इसके अलावा हमें आर्थिक विकास का ऐसा नया खाका भी खींचना होगा, जिसे न सिर्फ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफों, बल्कि लाखों कामकाजी गरीबों के प्रतिष्ठानों से भी गति मिले।

Photos 23/07/2015

भारत के पक्ष में बन रहा माहौल

पहले ग्रीस का आर्थिक संकट और बाद में चीन में मंदी और अब ईरान पर से वैश्विक प्रतिबंधों का हटना। एक एक करके परिस्थितियां भारत के पक्ष में झुकती प्रतीत हो रही हैं। भले ही ग्रीस की अर्थव्यवस्था से भारतीय अर्थव्यवस्था का सीधा जुड़ाव नहीं है लेकिन चीन के बाजार में गिरावट का सीधा लाभ भारत को मिल सकता है। पिछले कुछ दशकों से दुनियाभर के निवेशकों के लिए चीन और भारत के बाजार आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। हालांकि चीन के मुकाबले भारत को दूसरी वरीयता ही प्राप्त होती है। किंतु चीन के धड़ाम होते बाजार ने निवेशकों के मन में हलचल पैदा कर दी है। पिछले एक महीने से भी कम के समय में चीन के शेयर बाजार में 3.2 खरब डॉलर की रकम डूब चुकी है। निवेशकों ने तेजी अपना पैसा चीन के बाजार से निकालना शुरू कर दिया। लगभग 500 कंपनियों ने शंघाई और शेनझेन एक्सचेंजों में ट्रेडिंग बंद कर दी। कोढ़ में खाज का काम किया चीनी सरकार के उस फैसले ने जिसमें बड़े शेयर धारकों के शेयर बेचने पर छह माह के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया है। चीनी सरकार का यह फैसला दीर्घकाल में निवेशकों के मन पर बुरा प्रभाव डाल सकता है।

इधर भारतीय अर्थव्यवस्था ग्रीस और चीन की मंदी से अप्रभावित दिख रही है। शुरुआती हिचकोलों के बाद निवेशकों ने शेयर मार्केट में भरोसे कायम रखा है। भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा मेक इन इंडिया, इज ऑफ डूईंग बिजनेस जैसे चलाए जा रहे अभियानों और विदेशी निवेशकों को निवेश के लिए आमंत्रित करने का असर भी देखने को मिल सकता है। इसके अलावा दुनियाभर की रेटिंग एजेंसियों के द्वारा भारतीय विकास दर के चीन से आगे निकल जाने के दावों से भी निवेशकों के रूख में तब्दीली आने की उम्मीद की जा रही है।

कुछ लोगों का मानना है कि चीन की मंदी भारत पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी, हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था के निर्यात आधारित न होने के कारण इसकी संभावना अत्यंत कम है।

उधर, ईराक पर से वैश्विक प्रतिबंध समाप्त करने पर सहमति बन जाने के बाद भारतीय बाजार के आत्मविश्वास में वृद्धि देखने को मिल रही है। शुरुआती आशंकाओं के बावजूद मानसून के भी अबतक ठीक ठाक रहने से भी माहौल सकारात्मक बना है। उम्मीद है कि ईरान के साथ भारत के संबंधों में गर्मजोशी देखने को मिलेगी। ईरान के तेल निर्यात के बाजार में फिर से सक्रिय होने के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज हो सकती है। इससे लगभग 70 फीसदी आयातित तेल पर निर्भर रहने वाले भारत को फायदा मिलेगा। प्रतिबंध के दौर में भी भारत ने सीमित मात्रा में ही सही ईरान से तेल का आयात जारी रखा था जिसके ऐवज में संभव है कि ईरान आपसी लेनदेन अमेरिकन डॉलर की बजाए भारतीय रूपए में करने को राजी हो जाए। लंबे समय से अटके गैस-तेल पाइप लाइन का प्रोजेक्ट भी शुरु हो सकता है जिससे तेल की कीमतों में और कमी हो सकेगी। इससे परिवहन व माल ढुलाई सस्ती हो सकेगी और महंगाई पर काबू पाने में सफलता मिलेगी।

हालांकि ईरान आईएईए में भारत द्वारा उसके खिलाफ किए गए मतदान को भी नहीं भूला होगा जिसकी भरपाई वह अपने देश निर्माण क्षेत्र के ठेकों को यूरोपिय देशों की कंपनियों को हस्तांतरित कर सकता है। भारतीय बासमती चावल के आयात पर वह पहले भी रोक लगा चुका है, अतः विश्वास निर्माण भी अत्यंत आवश्यक है।

इन सभी किंतु परंतु के बीच भारत को चाहिए कि वह अपने बाजार को विदेशी निवेश के अनुकूल बनाने के अभियान से जुड़ा रहे। सरकारी खर्चों और कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करे तथा लाइसेंस परमिट प्रक्रिया और श्रम कानूनों आदि के क्षेत्र में सुधार के कार्यों को और तेज करे। पुराने और रद्दी कानूनों को कानून की पुस्तकों से निकाल फेंके और रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक नीति को ब्याज दरों को कृत्रिम तरीके से नियंत्रित करने की प्रक्रिया पर रोक लगाए।

21/07/2015

अंकुश का अभाव, सरकारी स्कूल बेहाल

सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की विद्यार्थियों के प्रति अरुचि और कक्षाओं से नदारद रहने के मामले सामने आते रहते हैं। इस व्यवस्था में बदलाव के लिए जरूरी है कि न सिर्फ मानिटरिंग सिस्टम बेहतर हो बल्कि शिक्षकों को उनके प्रदर्शन पर आधारित प्रोत्साहन दिया जाए। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी (सीसीएस) की ओर से दिल्ली के सरकारी, निजी व बजट स्कूलों को ध्यान में रखकर हुई रिसर्च में सामने आया है कि किस तरह से सरकारी स्कूलों की हालत खराब हो रही है और निजी स्कूलों की साख मजबूत हो रही है।

स्कूलों में शिक्षकों की भूमिका पर केंद्रित रिसर्च में बताया गया है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का कक्षाओं से गैरहाजिर रहना बड़ी परेशानी है। सीसीएस के अध्यक्ष पार्थ जे शाह कहते हैं कि इसके पीछे के दो अहम कारण हैं-पहला, सरकारी स्कूल के शिक्षक को गंभीर कार्रवाई का भय नहीं रहता है और दूसरा अक्सर उसे शिक्षण से इतर अन्य कामों जैसे जनगणना, चुनाव ड्यूटी आदि में लगाया जाता है।

रिसर्च में सामने आया है कि निजी व बजट प्राइवेट स्कूलों में शिक्षकों को उनके प्रदर्शन के आधार पर रोजगार मिलता है। मॉनिटरिंग व अंकुश के मामले में भी ये सरकारी स्कूलों से कहीं आगे हैं। गाहे बगाहे सरकारी स्कूल का विद्यार्थी उम्दा प्रदर्शन कर देता है तो उसे गुदड़ी का लाल कहा जाता है। पार्थ कहते हैं कि सुधार की बात करें तो सरकार को शिक्षकों की नियुक्ति का पैमाना बदलने की जरूरत है। इसमें शैक्षणिक योग्यता के साथ-साथ शिक्षण के प्रति रूझान की परख भी होनी चाहिए। रिसर्च में 55 शिक्षकों व 7 स्कूल प्रमुखों से विस्तार से बातचीत की गई। इसमें चार बड़े निजी स्कूल, तीन बजट प्राइवेट स्कूल, तीन सरकारी स्कूल व एक सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल शामिल रहे।

काम का बोझ है ज्यादा

गवर्नमेंट स्कूल टीचर्स एसोसिएशन (जीएसटीए) के महासचिव अजयवीर यादव का कहना है कि सभी शिक्षकों को एक ही नजर से देखना ठीक नहीं है। सरकारी स्कूलों में संसाधनों के अभाव के बावजूद शिक्षक अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाते हैं। जहां तक नदारद रहने की बात है तो चंद लोगों के चलते समूची शिक्षक बिरादरी का नाम खराब होता है। हालांकि शिक्षण के अलावा स्कूल शिक्षकों को दिए जाने वाले अन्य कामों को वह उचित नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि मध्याह्न् भोजन से जनगणना सरीखे करीब 41 ऐसे काम हैं जो शिक्षकों को दिए जाते हैं। इससे सीधे तौर पर शैक्षणिक कार्य बाधित होता है।

22/01/2015

क्यों गरीब है भारत? एजेंडा नए भारत के लिए

भारत के लोग स्मार्ट और सृजनात्मक होते हैं. उन्होंने यह साबित किया है कि वे परिश्रमी और मितव्ययी होते हैं. भारत की धरती को कई तरह की नेमतें मिली हुई हैं, जिनमें एक अच्छी जलवायु और ढेर सारे प्राकृतिक संसाधन शामिल हैं. इस देश का लोकतंत्र शानदार है जिसकी जड़ें बेहद मजबूत हैं और यहां का शासन कानून-सम्मत है. लेकिन अब सवाल यह है कि आज़ादी के 53 साल बाद भी भारत एक बेहद गरीब देश क्यों है?

वे क्या कारण हैं जो भारत को गरीब और अमेरिका को एक अमीर देश बनाते हैं- ऐसे में जबकि एक समान राजनैतिक ढांचा है, काम के मोर्चे पर समान उदार विचारधाराएं और मान्यताएं हैं. इतना ही नहीं, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों देशों में मेधावी और परिश्रमी मानव संसाधन के समृद्ध स्रोत हैं. ऐसा क्यों है कि भारत का प्रति व्यक्ति जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) 500 अमेरिकी डॉलर है जबकि अमेरिका का करीब 40,000 डॉलर? क्यों एक अमेरिकी नागरिक 80 गुना अधिक उत्पादक है? एक शिक्षित भारतीय अमेरिका में बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धात्मक होता है, यह बात इस तथ्य से प्रमाणित होती है कि एक भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक का औसत जीडीपी 60,000 डॉलर है. दरअसल, ऐसा अमेरिका में क्या है कि ज्यादातर मामलों में वह भारतीयों को अपनी घरेलू जमीन से बेहतर प्रदर्शन करवाता है, वह भी इतना अच्छा काम कि कई मामलों में भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक अपने साथी मूल अमेरिकियों से भी ज्यादा अच्छा काम करते हैं.

मैंने सुना है कि भारत अपनी औपनिवेशिक वजहों के कारण गरीब है. लेकिन हकीकत यह है कि अपनी आजादी के 53 वर्ष के बाद भारतीय अमेरिकियों की तुलना में खराब स्थिति में हैं. ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब भारत की हालत भी एशियन टाइगर्स या चीन के समान ही थी. पिछले 40 वर्षों में इन सभी देशों ने भारत को पीछे छोड़ दिया है.

अपने तर्क को स्थापित करने की खातिर हम फिलहाल अपनी बात को अमेरिका और भारत पर ही फोकस करेंगे. मेरा मानना यह है कि भारत जान-बूझकर गरीब है और वह गरीब बने रहने के लिए कड़ी मेहनत करता है जबकि इसके विपरीत अमेरिका अमीर इसलिए है क्योंकि वह न केवल अपनी संपत्ति को बनाए रखने के लिए बल्कि हर रोज खुद को ज्यादा धनवान बनाने के लिए कठोर परिश्रम करता है. भारत गरीब इसलिए है क्योंकि उसने खुद को आत्मघाती रूप से गरीबी पर पूरी तरह केंद्रित कर रखा है. देश के अथाह संसाधनों का इस्तेमाल गरीबों को आर्थिक सहायता और रोजगार मुहैया करवाने में किया जाता है. दरअसल भारत में नौकरियों को अति पवित्र माना जाता है और यह देश अनुत्पादक नौकरियों को बचाने के लिए काफी हद तक कुछ भी करने के लिए तैयार रहता है. इसके विपरीत अमेरिका में जहां उत्पादकता को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है और उत्पादक लोग सबसे ज्यादा कमाई करते हैं. संक्षेप में कहा जाए तो उत्पादकता से मिलने वाले फायदों के लिये किए जाने वाले अथक प्रयास अमेरिकी समृद्धि की हकीकत है जबकि नौकरियों को सुरक्षित बनाए रखना भारतीय गरीबी की असलियत है. इस बात को यदि और सरल शब्दों में कहा जाए तो अमेरिका उस राजनीति का अनुसरण करता है जिससे संपत्ति का सृजन होता है जबकि भारत उस राजनीति के पीछे बढ़ता है जिसमें संपत्ति का पुनर्वितरण होता है. राष्ट्रीय संपदा के अभाव में भारत गरीबी का पुनर्वितरण करता है और गरीब ही बना रहता है जबकि अमेरिका ज्यादा अमीरी से और भी ज्यादा अमीरी की ओर बढ़ता है.

नौकरियां बनाम उत्पादकता
भारत में जॉब एक ऐसी चीज है जिस पर जरूरत से ज्यादा ध्यान दिया जाता है. मैंने वरिष्ठ मंत्रियों और नौकरशाहों (ब्यूरोक्रेट्स) से सुना है कि सरकार के लिए सबसे बड़ा काम है रोजगार उपलब्ध करवाना. भारत में कल-पुरजों को जोड़ कर असेंबल्ड गुड्स बनाने संबंधी असेंबली जॉब्स उपलब्ध करवाने की कवायद के लिए बड़े-बड़े पदों पर लोगों की नियुक्तियां की जाती हैं. अस्सी के दशक के शुरू में "स्क्रूड्राइवर असेंबली प्लांट" चलन में थे जब एक मैन्यूफेक्चरर महज एक ही पूंजीगत उपकरण (केपिटल इक्विपमेंट) की सप्लाई करता था, वह था पेंचकस यानी स्क्रूड्राइवर.

अत्यधिक संरक्षणवादी श्रम कानूनों ने अन्य सभी लोगों और पक्षों की कीमत पर संगठित श्रमिक क्षेत्र को अधिकतम संरक्षण दे रखा है. ऐसे कानूनों की वजह से कारोबार करने के लिए नौकरी देने वाले बहुत ज्यादा हतोत्साहित होते हैं. आगे बताई जाने वाली कहानियां मुझे अपनी यह बात साबित करने में मदद करेंगी कि क्यों अनुत्पादक रोजगार गरीबी की दिशा में ले जाते हैं.

मैं सबसे पहले 80 के दशक के मध्य की उस स्टोरी की चर्चा करूंगा जो मेरा अपना अनुभव है. कंप्यूटर नेटवर्किंग बोर्ड्स के सप्लायर्स के रूप में हमें एक भारतीय कंप्यूटर उत्पादक की ओर से 200 अनअसेम्बल्ड कंप्यूटर बोर्ड्स या जिसे भारत में "खुले हुए पुर्जों के किट्स" (“knocked down kits”) कहा जाता है, के लिए एक “निवेदन“ (“request for quote”) मिला. हमने अपने अनअसेम्बल्ड बोर्ड्स नहीं भेजे और 20 फीसदी स्पेशल हैंडलिंग चार्जेस की मांग की जिसे देने के लिए वे तैयार थे. भारत सरकार ने पूरी तरह असेम्बल्ड बोर्ड्स पर लगे 300 फीसदी आयात शुल्क की तुलना में पुर्जों पर 70 फीसदी आयात शुल्क लगा रखा था. ताकि स्थानीय स्तर पर लोगों के लिए रोजगार के अवसर मिल सकें. 20 फीसदी ज्यादा देकर कम हासिल करना, कैसा सौदा है यह? यानी बगैर असेम्बल किए, बगैर जांचे-परखे बोर्ड आर्थिक रूप से कैसे लाभप्रद हो सकते हैं? ऐसे जॉब्स को किस आधार पर उत्पादक माना जाए?

पिछले दिनों अपने भारत प्रवास के दौरान दिल्ली की कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने मुझे चर्चा के दौरान बताया कि भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर है. उन्होंने बताया कि आजादी के बाद हुई अपनी आर्थिक प्रगति पर भारत को गर्व है. मेरा यह मानना है, भारत की आबादी का 70 फीसदी हिस्सा कृषि आधारित आजीविका से जुड़ा है, इससे खेती करने वाला एक भारतीय अपने लिए पर्याप्त खाद्यान्न का उत्पादन करता है और जिस अतिरिक्त अनाज का वह उत्पादन करता है उससे महज एक व्यक्ति की आधी भूख मिटाई जा सकती है. खेती करने वाले भारतीय की खर्च करने योग्य औसत आय अगर देखी जाए यह औसतन आधे भारतीय के खाने के बजट जितनी है. यानी उसकी खर्च करने योग्य आमदनी इतनी भी नहीं है कि एक व्यक्ति भरपेट भोजन कर सके. इसलिए वह हमेशा गरीब ही रहेगा. अगर इसकी अमेरिका से तुलना की जाए तो दो फीसदी से भी कम अमेरिकी आबादी खेती या इससे जुडे काम करती है. एक अमेरिकी किसान खुद को मिलाकर 50 लोगों के लिए अन्न का उत्पादन करता है और इतना खाद्यान्न बच जाता है कि उसका निर्यात होता है. यानी तुलनात्मक रूप से अमेरिकी किसान बहुत ज्यादा उत्पादक और अत्यधिक धनी है. प्रसंगवश, यदि कोई व्यक्ति पिछले 53 वर्षों में भारत के रेकॉर्ड के बारे में गर्व का यदि कोई दावा करता है तो वह अपने बारे में ही अनजान और आत्मप्रशंसा करने वाला है.

मेरे पास इतने किस्से हैं कि वे खत्म ही नहीं होंगे. उदाहरण के लिए, एक आंकड़े की तुलना कीजिए- प्रति हवाई जहाज एयर इंडिया 800 से ज्यादा कर्मचारियों की नियुक्ति करती है जबकि युनाइटेड एयरलाइंस में प्रति हवाई जहाज करीब 40 लोगों को काम पर रखा जाता है. अमेरिकी कर्मचारी करीब 20 गुना ज्यादा उत्पादक हैं! अनुत्पादक रोजगार निश्चित रूप से गरीबी के गर्त में ले जाते हैं. फिर सवाल यह उठता है कि उन लोगों की उस भीड़ का क्या किया जाए जिसे रोजगार की जरूरत है? बहुत से लोगों का यह मानना है कि हमारी समस्याओं की जड़ में हमारी बहुत बड़ी आबादी या यूं कहें जरूरत से ज्यादा आबादी है. यह वही लोग हैं जो यह भी मानते होंगे कि इस समस्या का कोई समाधान नहीं है क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है. मैं इन मुद्दों को जायज मानूंगा यदि हम अपनी इन समस्याओं के समाधान के लिए वह सब कुछ कर रहे हैं जो कि किया जा सकता है और किया जाना चाहिए. हमारा नेतृत्व बेहद कमजोर है, जिसने गरीबों की मदद के नाम पर लंबे समय तक खराब साबित हो चुकी नीतियों को लंबे समय तक अपनाया. हमारा समाजवादी और राष्ट्र की महत्ता पर केंद्रित राष्ट्रीय एजेंडा विनाशकारी साबित हुआ है. आवश्यकता इस बात की है कि यह उद्यमिता को प्रवर्तित करने वाला एजेंडा हो जहां राष्ट्र की भूमिका उद्योग और वाणिज्य में कम से कम हो. फिर हम शायद आबादी को एक बहाने के रूप में इस्तेमाल न करें. इस समस्या का समाधान अपने आप हो जाएगा जब हमारा देश समृद्ध हो जाएगा, जैसा कि अन्य जगहों पर भी हुआ है. इसी बीच हमें अपनी जनता की उत्पादक और प्रतिस्पस्पर्धात्मक ऊर्जा को प्रवर्तित करने की जरूरत है. और महत्वपूर्ण बात यह है हमें यह काम इसी क्षण शुरू करना है.

एक नए राष्ट्रीय एजेंडा की मांग
संक्षेप में मैं यह कहना चाहूंगा कि भारत अपनी गलत आर्थिक नीतियों और दृष्टिकोण के कारण गरीब है. हम अपनी संपदा को अनुत्पादक कामों में जाया कर रहे हैं. हमने अपने यहां उद्यमियों का दमन किया है और नौकरशाहों की ताकत में इजाफा किया है. सरकार ने जिस उद्योग को छूआ उसने उसे अनुत्पादक बना दिया. हमने अपने लोगों को मछली खाना तो सिखा दिया लेकिन यह नहीं सिखाया कि खाने के लिए उसे पकड़ते कैसे हैं. क्या हमने इसी पैसे का इस्तेमाल लोगों को शिक्षा देने में किया, अगर हम प्रभावी ढंग से ऐसा करते तो आज हम एक समर्थ और सक्षम लोगों का समूह होते. मेरा यह मानना है कि भारत के पास वह सब कुछ है जो उसे एक महाशक्ति बनने के लिए जरूरी है, लेकिन इसके लिए बहत बड़े पैमाने पर राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ ही प्रभावी नेतृत्व की दरकार होगी ताकि हमारे देश को आगे बढ़ाया जा सके.

भारत के ज्यादा समृद्ध बनने का एक ही तरीका है कि वह अपनी श्रम शक्ति और भौतिक पूंजी की उत्पादकता पर अपना ध्यान केंद्रित करे. हमें अपने संसाधनों का भरपूर दोहन करते हुए अधिकतम उत्पादन करना होगा. यह एक गलत धारणा है कि उत्पादकता बढ़ाने से बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ेगी और यह बात दुनिया में कहीं भी साबित नहीं हुई है. जब हम आर्थिक विकास दर में 6 फीसदी बढ़ोतरी की बात करते हैं, और हमारी आबादी 2 फीसदी की दर से बढ़ रही है, तब हम हमारी मानव पूंजी की उत्पादकता में 4 फीसदी इज़ाफे की बात कर रहे हैं. कौशल या दक्षता (जैसे- शिक्षा) और प्रति व्यक्ति पूंजी निवेश को बढ़ा कर हम मानव उत्पादकता में काफी हद तक बढ़ोतरी कर सकते है. पूंजी की उत्पादकता तब बढ़ती है जब आप इस पूंजी का सर्वाधिक उत्पादक इस्तेमाल करते हैं.

प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाएं
उत्पादकता को तेजी से बढ़ाने वाला सबसे प्रमुख कारक है प्रतिस्पर्धा- मुक्त और निर्बाध. इससे लोगों पर अपनी दक्षता बढाने का दबाव रहता है ताकि वे प्रतिस्पर्धा में बने रहें. इससे पूंजी पर भी दबाव रहता है कि वह सही दिशा में लगती रहे ताकि इसके निवेश से अधिकतम रिटर्न्स हासिल हो सकें बजाए इसके कि राजनीतिज्ञ और नौकरशाह इसका इसका अपनी मर्जी से प्रबंध करते रहें. यदि आप किसी आदमी को एक ट्रैक पर दौड़ते हुए सबसे अच्छा प्रदर्शन करने के लिए कहें तो बड़े आराम से 15 मिनट में एक मील तक दौड़ेगा. लेकिन यदि आप इस पर एक और व्यक्ति को साथ में दौड़ने के लिए कहते हैं और यह चुनौती देते हैं कि दोनों में से कौन ज्यादा तेज दौड़ता है तो जो व्यक्ति हारेगा उसका प्रदर्शन भी उस दौड़ से बेहतर होगा जिसमें उसे अकेले दौड़ने के लिए कहा जाता. यानी प्रतिस्पर्धा में हारने वाले का भी प्रदर्शन बेहतर हो जाता है. बाजार में प्रतिस्पर्धा के अच्छे परिणाम मिलते हैं क्योंकि सप्लायर व्यापार में अपना स्थान बनाए रखने के लिए कम कीमत पर अच्छा सामान या सेवाएं देने के लिए बाध्य रहते हैं. यदि बाजार में मांग की गारंटी रहती है तो उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता कमजोर होना तय है. भारत में लाइसेंस राज के दौरान हमारा अनुभव ठीक वैसा ही था जिसकी किसी अर्थशास्त्री ने कभी भविष्यवाणी की होती. लाइसेंस राज के सफल उद्यमी कौन थे- निश्चित ही न तो राष्ट्र और न ही जनता. भारत को चाहिए कि अर्थव्यवस्था को नियमों-कानूनों से बांध कर रखने की बजाए वह बाजार शक्तियों को बने रहने दे.

सीधे शब्दों में कहा जाए तो दुनिया में श्रेष्ठ होने के लिए हम दुनिया के श्रेष्ठ से प्रतिस्पर्धा करें. संयोगवश, हमें इस मसले पर किसी से घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमने यह दिखा दिया है कि दुनिया के बाजार में भारतीय बेहद प्रतिस्पर्धी हैं और हमें किसी के संरक्षण की जरूरत नहीं.

मैं इस बात का जिक्र भी करना चाहूंगा कि नौकरी की गारंटी का मतलब बाजार की गारंटी नहीं होता। अगर निजी तौर पर देखा जाए तो रोजगार की गारंटी व्यक्ति से अपने कौशल में बेहतरी के साथ समाज में उसकी तरक्की का माद्दा ही छीन लेती है। साथ ही उस व्यक्ति को नौकरी बचाने के लिए न तो कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और न ही उस पर किसी लक्ष्य को हासिल करने का कोई दबाव ही होता है। अनुत्पादक और आलसी कर्मचारियों से छुटकारा पाने के तौर-तरीकों में ज्यादा गुंजाईश का न होना ही कई कंपनियों की राह की एक बड़ी बाधा होती है। बचीखुची कसर नौकरी की गारंटी पूरी कर देती है। ऐसा होने के बाद लोग अनुत्पादक कामकाज में जुट जाते हैं और उनका उत्साह और आत्मसम्मान भी खत्म होता जाता है।

कृषि प्रधान समाज से दूरी
केवल अस्तित्व कायम रखने के प्रयास करने वाली अर्थव्यवस्था, जहां ज्यादातर लोग खाद्य उत्पादन और अन्य आजीविका से जुड़े काम में जुटे हों, मूलतः गरीबी की चपेट में होती हैं। इस हाल में पहुंचने के लिए उत्पादन क्षमता की ज्यादा जरूरत नहीं होती। आज गरज तो इस बात की है कि तमाम खाद्य सामग्री और जीवनोपयोगी सामान को कम से कम मानव श्रम के जरिये हासिल किया जाए। इससे हमारा मानव संसाधन दूसरे ऐसे नये कामों के लिए उपलब्ध हो जाएगा, जो पहले संभव नहीं थे। ये नये काम क्या हैं? यहां संभावनाएं अंतहीन हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, सेनिटेशन, मनोरंजन, ट्रेवल, इंश्योरेंस, बैंकिंग और खेल जैसी सेवाएं शामिल है। समाज जब अधिक उत्पादक बन जाता है तो वह सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) पर ज्यादा ध्यान देने लगता है, जो अंततः उसके जीवन स्तर को सुधारने में अहम भूमिका निभाता है। एक आम आदमी का दिन तीन बार खाकर गुजर सकता है, लेकिन जहां तक सुविधाओं की बात है तो वह एक दिन में अनगिनत इस्तेमाल कर सकता है।

खरी-खरी कहूं तो सौ फीसदी मानव संसाधन को कृषि में ही झोंक देना हास्यास्पद है। अगर हम तरक्की करना चाहते हैं तो ऐसा केवल इन लोगों को खेतों से निकालकर उत्पादन क्षेत्र में लगाने से ही हो सकेगा। उन्हें किसानी की बजाय ज्यादा आर्थिक संबल देने वाले कामों में जुटना चाहिए। हाशिये पर खड़े इन लोगों को अगर सरकार से कुछ चाहिए तो वह है केवल शिक्षा। शिक्षा हासिल करने के बाद यही अकुशल श्रमशक्ति हमारे देश का कायापलट कर सकती है। ठीक अमेरिका की तरह, केवल खेती किसानी में भागीदारी कम होने के बाद लोग ऐसे दूसरे कामकाज से जुड़ेंगे जिससे उनका जीवन स्तर ऊपर उठ सकेगा। आज अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत है तो मजबूत सर्विस सेक्टर के कारण। अमेरिका में सबसे बड़ा उद्योग है स्वास्थ्य सेवाएं, इसके बाद शिक्षा, फिर मनोरंजन। भारत को अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाकर उससे सीखना चाहिए।

नौकरियां बनाना, बचाना नहीं
नये उत्पादक रोजगार तैयार करना ही भारत की राष्ट्रीय नीति होनी चाहिए। सारी ताकत केवल नौकरियों को बचाने की नीति में ही झोंक देना घाटे का सौदा साबित हुआ है। रोजगार निर्माण का ढोल 53 साल पीटने के बाद भी भारत उद्योगों में आज तक केवल एक करोड़ नौकरियां दे सका है, जो उसकी एक अरब की आबादी को देखते हुए कुछ भी नहीं है। इतने ही वक्त में चीन ने उद्योग क्षेत्र में 20 करोड़ लोगों के लिए रोजगार तैयार किया है। हमारे विकास के साथ ही हमारे यहां अनुत्पादक या कम उत्पादन वाले रोजगार कम होते जाएंगे और उत्पादकता रोजगार का मुख्य आधार बन जाएगी। यही वह बात है जिससे किसी देश की उत्पादकता का सर्वांगीण विकास होता है। अपने काम और कौशल में निवेश करने वाले लोगों को फायदा होगा और वह आर्थिक तरक्की भी करेंगे। जो काम को लेकर निरूत्साही होंगे वो पीछे छूट जाएंगे। विकल्प सबके लिए खुला होगा!

विदेशी निवेश और कारोबार को प्रोत्साहित करें
विदेशी निवेश में सुधार के लिए केवल दो ही मापदंड होने चाहिए। या इससे भारत में रोजगार का निर्माण होगा? या इस निवेश से भारतीय उपभोक्ता के लिए उत्पादों की गुणवत्ता और सेवाओं में सुधार होगा? अगर हम इन मापदंडों का खयाल रखेंगे तो हम जल्द ही जान जाएंगे कि खराब निवेश जैसी कोई बात होती ही नहीं है। भारत में तमाम निवेश समृद्धि और रोजगार ही लाएंगे। स्वदेशी के ही विकास का इकलौता रास्ता होने की धारणा गलत है। आर्थिक खुलेपन और दरवाजे खुले रखने की नीति के प्रति सौ फीसदी समर्पण ही भारत के विकास को गति दे सकता है।

मुक्त अंतरराष्ट्रीय कारोबार में कोई पराजित नहीं होता। देश अपनी तुलनात्मक बेहतरी का फायदा उठाते हुए ज्यादा कार्यक्षम बन जाते हैं। भारत की आयात के विकल्प खोजने और उचित प्रौद्योगिकी (मतलब पुरानी प्रौद्योगिकी) की पूर्व की कोशिश हास्यास्पद थी। इसने हमसे हमारे बेहद प्रतिभाशाली इंजीनियर छीन लिए और उन्हें फिर आदिम युग में पहुंचा दिया जहां से उन्हें पुरानी और उधार की प्रौद्योगिकी के साथ सब नये सिरे से करना पड़ा। जैसा कि हमारे यहां आईटी और हीरा पॉलिशिंग उद्योग में देखा जा सकता है, हम अच्छी तनख्वाह पर कई लोगों को रोजगार दे सकते हैं, ताकि पूरी दुनिया की मांग को पूरा कर सकें। इन उद्योगों में हम बेहतर स्थिति में हैं। मुझे लगता है कि ऐसे कई उद्योग हैं जिनमें भारत पूरी दुनिया को पछाड़ सकता है।

जहां तक भारतीय नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों की बात है तो वह मल्टीनेशन कार्पोरेशन (एमएनसी) को हेयभाव से देखते हैं। उन्होंने विश्व बाजार को भारत को सस्ते श्रम के केंद्र की तरह इस्तेमाल नहीं करने दिया है। इसके लिए उन्होंने भारतीय श्रमशक्ति के शोषण की आशंका को इस्तेमाल किया। जबकि भारत के पास मानव संसाधन की अकूत संपदा है जिसे उत्पादक काम में लगाए जाने की दरकार है। दुनिया भर के बाजारों के लिए उत्पाद बनाने में भारत को केंद्र बनाने की विदेशी रोजगारदाताओं को अनुमति दी जानी चाहिए। भारतीयों को हर बात में आर्थिक मदद से बेहतर होगा कि उन्हें रोजगार दिया जाए।

उद्यमिता का विकास करें

अर्थव्यवस्था की तरक्की के लिए जरूरी है कि सरकार नीतियों में खुलापन लाए और भारतीय उद्यमियों को भी खुलकर काम करने दे। उसे उद्यमिता को प्रोत्साहन देना चाहिए और लोगों को काम के लिहाज से नफा-नुकसान पाने का रास्ता खोल देना चाहिए। हालांकि हमारी लघु उद्योगों की नीतियां उद्यमिता को प्रोत्साहित करने का ही प्रयास हैं, लेकिन वास्तविकता में यह अजीबोगरीब नियामक प्रणाली के चलते तरक्की और अधिक उत्पादक बनने की राह में बाधा ही साबित होती हैं। इन नीतियों के तहत छोटे-बड़े का फैसला, आकार ‌नहीं, लगाई गई पूंजी तय करती है। पूंजी निवेश कम रखने के लिए हतोत्साहित करने वाली कई बाधाएं हैं। बाजार में कामयाबी पर कड़े अर्थदंड का प्रावधान है। इन्हीं अजीब नीतियों के कारण भारत उस विश्व बाजार में भी नाकामयाब है जहां आसियान और पूर्व एशिया के ही उद्यमियों की तूती बोलती है। सरकारी नीतियों के कारण भारतीयों की प्रगति में बाधा का यह एक सटीक उदाहरण है। उद्यमी बुनियादी तौर पर मेहनती और किसी काम को बेहतर तरीके से करने के लिए समर्पित लोग होते हैं। उद्यमियों के बीच प्रतिस्पर्धा ही अर्थव्यवस्था को गति देती है। ऐसे में जहां वे खुद तरक्की करते हैं वहीं समाज के लिए रोजगार निर्माण करके उसे आर्थिक संबल देते हैं। अर्थव्यवस्था की ट्रेन को खींचने में उनकी भूमिका इंजिन की तरह होती है।

मुनाफे का सम्मान करो
समाजवादियों के शब्दकोष में मुनाफा एक नकारात्मक शब्द है। मुझे याद है कि 50 और 60 के दशक में हर बात की कमी से जूझ रहे भारत में मुनाफा कमाना घोर पाप माना जाता था। जबकि मुनाफा तो किसी की कार्यक्षमता और उत्पादकता का पैमाना है। यह मुनाफा ही तो है जो पूर्व तंत्र को आत्मनिर्भर बनाता है। उद्यमियों के लिए मुनाफा ही मुख्य लक्ष्य होता है और मुनाफे में कमी नाकामी की ओर ले जाती है। हमारी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का कम मुनाफा ही भारत की तरक्की की राह की बाधा है। मुनाफा कमाने की बजाय वो सरकारी खजाने को भी खाली करती जा रही हैं।

सरकार की भूमिका
रोजगार न दे या गरीबों को आर्थिक मदद न दे तो आखिर सरकार करे क्या? मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि अच्छी से अच्छी सरकार भी न तो उत्पादक रोजगार दे सकती है और न ही संपदा बना सकती है। ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहां यह निरंतर हुआ हो। सरकार का काम तो एक स्थायी और निष्पक्ष माहौल देना है ताकि हर नागरिक अपने बूते उसमें जीवनयापन कर तरक्की कर सके।

जहां तक सरकार की बात है तो उसे सबको प्राथमिक और उच्चतर शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य और खासतौर पर प्राथमिक ढांचे पर पूरा ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। यहां पूरा जोर प्राथमिक शब्द पर है। उद्यमी अपने लाभ का कहां, कैसे इस्तेमाल करना चाहते हैं, यह उन पर छोड़ देना चाहिए। सरकार को तो उनके लिए बाजार में एक निष्पक्ष और स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता का माहौल सुनिश्चित करना चाहिए। साथ ही सरकार को उत्पादकता की राह में आड़े आने वाली नीतियों और नियमों को भी खत्म कर देना चाहिए।

अब हर तरह के अनुदान को खत्म करने का वक्त आ गया है। अनुदान अनुपयोगी हैं और ऐसी निर्भरता को बढ़ावा देते हैं जो न तो स्वस्थ है और न ही लंबे समय तक फायदेमंद। अनुदानों की बजाय इस धन का उपयोग समाज में निवेश के लिए करना चाहिए। एक पढ़ा-लिखा भारतीय ही एक प्रतिस्पर्धी भारतीय है।

अंत में, सरकार की नीति हर तरह के निवेश को बढ़ावा देने की होनी चाहिए। हमें किसी भी एक उद्योग विशेष को ही प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। 1998 में भारतीय जनता पार्टी का यह स्लोगन 'आलू के चिप्स नहीं, कंप्यूटर चिप्स' मुझे अजीब लगा। इसका साफ आशय था कि आलू के चिप्स नहीं कंप्यूटर के चिप्स में निवेश को ज्यादा प्रोत्साहन दिया जाएगा। जबकि भारत को कंप्यूटर चिप्स से ज्यादा आलू के चिप्स में निवेश की दरकार है, क्योंकि यह कृषि आधारित उद्योग है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को इस वक्त ऐसे निवेश की ज्यादा दरकार है जो उसके महत्व को और अधिक बढ़ा सके।

हमारा राष्ट्रीय मंत्र होना चाहिए ज्यादा उत्पादक रोजगार और नये निवेश के जरिये नये उत्पादक रोजगार।

भ्रमित विचारधारा के लिए कोई जगह नहीं
अपनी बात मैं इस निष्कर्ष के साथ समाप्त करना चाहूंगा कि कोई स्पष्ट आर्थिक दृष्टिकोण नहीं होने के कारण भारत ने आर्थिक और राजनीतिक दोनों ही क्षेत्रों में काफी कुछ सहा है। अब हमें राष्ट्रीय उत्पादकता बढ़ाने वाली बातों पर ध्यान देने की जरूरत है। यहां आधे-अधूरे मन से तय या रूमानी विचारधाराओं के लिए कोई जगह नहीं है। समाजवाद के प्रति हमारा समर्पण एक गलत कदम था जो बुरी तरह से नाकामयाब रहा है। अब वक्त आगे बढ़ने का है और अभी भी देर नहीं हुई है। उद्योगों का सरकारीकरण सौ फीसदी फ्लॉप शो रहा है। अब वक्त आ गया है कि उद्योगों पर से सरकार का सर्वशक्तिमान नियंत्रण हटा लिया जाए। साथ ही स्वदेशी जैसे किसी निरर्थक विचार का भी यह वक्त नहीं है। भारत की जीडीपी की वार्षिक विकास दर छह फीसदी है। इस गति से तो हमें आज के मैक्सिको के करीब पहुंचने में पचास साल और लग जाएंगे। आखिर हम 10 फीसदी की वार्षिक विकास दर क्यों हासिल नहीं कर सकते? उस दर से भी हम आज के अमेरिका तक पचास साल में पहुंचेंगे।

53 साल के समाजवाद ने न तो हमें विकास दिया है और न ही समता। भारत सरकार को यह बात समझना ही होगी कि लोकतंत्र और मुक्त बाजार दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। आप एक के बगैर दूसरे को पूरी तरह से हासिल कर ही नहीं सकते। एक मुक्त बाजार आखिरकार बाजार का लोकतंत्र है, जहां उपभोक्ता अपने पैसे के तौर पर हर रोज वोट देता है।

अब भारत में संपदा समृद्धि की नीति का वक्त आ गया है। एक बार इसे हासिल करने के बाद इसके वितरण के लिए हमारे पास पर्याप्त वक्त होगा, लेकिन पहला काम पहले ही करना होगा।

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