Dheeraj

Dheeraj Hindi poems

01/11/2022

न जी भर के देखा न कुछ बात की

बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

उजालों की परियाँ नहाने लगीं

नदी गुनगुनाई ख़यालात की

मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई

ज़बाँ सब समझते हैं जज़्बात की

मुक़द्दर मेरी चश्म-ए-पुर-आब का

बरसती हुई रात बरसात की

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं

कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की

30/10/2022

तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे

मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे

तुम्हारे बस में अगर हो तो भूल जाओ मुझे

तुम्हें भुलाने में शायद मुझे ज़माना लगे

जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो

कि आस-पास की लहरों को भी पता न लगे

वो फूल जो मेरे दामन से हो गए मंसूब

ख़ुदा करे उन्हें बाज़ार की हवा न लगे

न जाने क्या है किसी की उदास आँखों में

वो मुँह छुपा के भी जाए तो बेवफ़ा न लगे

तू इस तरह से मेरे साथ बेवफ़ाई कर

कि तेरे बा'द मुझे कोई बेवफ़ा न लगे

तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िंदगी 'क़ैसर'

कि एक घूँट में मुमकिन है बद-मज़ा न लगे

29/10/2022

ज़िंदगी-भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात

एक अंजान हसीना से मुलाक़ात की रात

हाए वो रेशमीं ज़ुल्फ़ों से बरसता पानी

फूल से गालों पे रुकने को तरसता पानी

दिल में तूफ़ान उठाए हुए जज़्बात की रात

ज़िंदगी-भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात

डर के बिजली से अचानक वो लिपटना उस का

और फिर शर्म से बल खा के सिमटना उस का

कभी देखी न सुनी ऐसी तिलिस्मात की रात

ज़िंदगी-भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात

सुर्ख़ आँचल को दबा कर जो निचोड़ा उस ने

दिल पे जलता हुआ इक तेरा सा छोड़ा उस ने

आग पानी में लगाते हुए हालात की रात

ज़िंदगी-भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात

मेरे नग़्मों में जो बस्ती है वो तस्वीर थी वो

नौजवानी के हसीं ख़्वाब की ता'बीर थी वो

आसमानों से उतर आई थी जो रात की रात

ज़िंदगी-भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात

29/10/2022

थोडी दूर साथ चलो

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो

बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो

तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है

ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो

नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं

बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो

ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़नीमत है

किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो

अभी तो जाग रहे हैं चराग़ राहों के

अभी है दूर सहर थोड़ी दूर साथ चलो

तवाफ़-ए-मंज़िल-ए-जानाँ हमें भी करना है

'फ़राज़' तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो

28/10/2022

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं

दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता

मेरी तरह तेरा दिल बे-क़रार है कि नहीं

वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है

उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं

तेरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को

तुझे भी अपने पे ये ए'तिबार है कि नहीं

28/10/2022

बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा

इस ज़ख़्म को हम ने कभी सिलते नहीं देखा

इक बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश

फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा

यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं

जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा

काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन

तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा

किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आख़िर

वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा

27/10/2022

समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

तेरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से

कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

तेरी यादों की ख़ुश्बू खिड़कियों में रक़्स करती है

तेरे ग़म में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

न जाने हो गया हूँ इस क़दर हस्सास मैं कब से

किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

मैं सारा दिन बहुत मसरूफ़ रहता हूँ मगर जूँही

क़दम चौखट पे रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

हर इक मुफ़्लिस के माथे पर अलम की दास्तानें हैं

कोई चेहरा भी पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

बड़े लोगों के ऊँचे बद-नुमा और सर्द महलों को

ग़रीब आँखों से तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

तेरे कूचे से अब मेरा तअ'ल्लुक़ वाजिबी सा है

मगर जब भी गुज़रता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर

'वसी' मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

20/10/2022

इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना

इक नार पे जान को हार गया मशहूर है उस का अफ़साना

उस नार में ऐसा रूप न था जिस रूप से दिन की धूप दबे

इस शहर में क्या क्या गोरी है महताब-रुख़े गुलनार-लबे

कुछ बात थी उस की बातों में कुछ भेद थे उस की चितवन में

वही भेद कि जोत जगाते हैं किसी चाहने वाले के मन में

उसे अपना बनाने की धुन में हुआ आप ही आप से बेगाना

इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना

ना चंचल खेल जवानी के ना प्यार की अल्हड़ घातें थीं

बस राह में उन का मिलना था या फ़ोन पे उन की बातें थीं

इस इश्क़ पे हम भी हँसते थे बे-हासिल सा बे-हासिल था

इक ज़ोर बिफरते सागर में ना कश्ती थी ना साहिल था

जो बात थी इन के जी में थी जो भेद था यकसर अन-जाना

इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना

इक रोज़ मगर बरखा-रुत में वो भादों थी या सावन था

दीवार पे बीच समुंदर के ये देखने वालों ने देखा

मस्ताना हाथ में हाथ दिए ये एक कगर पर बैठे थे

यूँ शाम हुई फिर रात हुई जब सैलानी घर लौट गए

क्या रात थी वो जी चाहता है उस रात पे लिक्खें अफ़साना

इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना

हाँ उम्र का साथ निभाने के थे अहद बहुत पैमान बहुत

वो जिन पे भरोसा करने में कुछ सूद नहीं नुक़सान बहुत

वो नार ये कह कर दूर हुई 'मजबूरी साजन मजबूरी'

ये वहशत से रंजूर हुए और रंजूरी सी रंजूरी?

उस रोज़ हमें मालूम हुआ उस शख़्स का मुश्किल समझाना

इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना

गो आग से छाती जलती थी गो आँख से दरिया बहता था

हर एक से दुख नहीं कहता था चुप रहता था ग़म सहता था

नादान हैं वो जो छेड़ते हैं इस आलम में नादानों को

उस शख़्स से एक जवाब मिला सब अपनों को बेगानों को

'कुछ और कहो तो सुनता हूँ इस बाब में कुछ मत फ़रमाना'

इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना

अब आगे का तहक़ीक़ नहीं गो सुनने को हम सुनते थे

उस नार की जो जो बातें थीं उस नार के जो जो क़िस्से थे

इक शाम जो उस को बुलवाया कुछ समझाया बेचारे ने

उस रात ये क़िस्सा पाक किया कुछ खा ही लिया दुखयारे ने

क्या बात हुई किस तौर हुई अख़बार से लोगों ने जाना

इस बस्ती के इक कूचे में इक इंशा नाम का दीवाना

हर बात की खोज तो ठीक नहीं तुम हम को कहानी कहने दो

उस नार का नाम मक़ाम है क्या इस बात पे पर्दा रहने दो

हम से भी तो सौदा मुमकिन है तुम से भी जफ़ा हो सकती है

ये अपना बयाँ हो सकता है ये अपनी कथा हो हो सकती है

वो नार भी आख़िर पछताई किस काम का ऐसा पछताना?

इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना

25/09/2022

04/09/2022

Sher bhagga # Punjabi movie scene

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