06/04/2026
बम्हनी (गुमला): कुड़ुख भाषा एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान केंद्र, बम्हनी के तत्वावधान में रविवार को 'खद्दी सरहुल पखवाड़ा' के तहत एक दिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। झारखंड सरकार द्वारा समर्थित इस कार्यक्रम में यूकेजी से लेकर महाविद्यालय स्तर तक के सैकड़ों विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया और अपनी जड़ों से जुड़ने का संकल्प लिया।
आध्यात्मिक शुरुआत और भाषाई परिचय
कार्यशाला का आगाज़ पारंपरिक 'अना आदी' प्रार्थना और प्रवचन के साथ हुआ। कार्यक्रम की सबसे खास बात यह रही कि इसमें शामिल नन्हे बच्चों ने कुड़ुख भाषा में अपना परिचय देकर अपनी भाषाई दक्षता का परिचय दिया। आयोजकों ने बच्चों को दैनिक जीवन में कुड़ुख बोलने के गुर भी सिखाए।
सूरज और धरती के मिलन का पर्व है सरहुल
मुख्य अतिथि श्री महाबीर उरांव ने मंदार और नगाड़े की थाप पर बच्चों को झूमते हुए सरहुल के गौरवशाली इतिहास से रूबरू कराया। उन्होंने भावुक होते हुए कहा:
"सरहुल मात्र एक त्योहार नहीं, बल्कि सूरज और धरती के मिलन से प्रकृति के सृजन का सत्कार करने की हमारी पावन परंपरा है।"
गीत-संगीत से बांधा समां
सांस्कृतिक सत्र में गीतों की झड़ी लग गई:
प्रतिभा उरांव ने सरहुल के मुख्य गीतों से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।
अर्चना और मनीषा उरांव ने “खुड़ी-खुड़ी पेलो” गीत गाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।
जयंती उरांव ने “भादुरा रे भादुरा” के माध्यम से बच्चों को लोक धुनों का प्रशिक्षण दिया।
नैतिक उरांव एवं ग्रुप ने लगातार पांच गीतों की प्रस्तुति देकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
संस्कृति का वैज्ञानिक पहलू और संरक्षण
अखिल भारतीय समन्वय समिति के जितेश मिंज ने बच्चों को सरहुल के वैज्ञानिक महत्व के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने जोर दिया कि आदिवासी संस्कृति प्रकृति संरक्षण का सबसे बड़ा उदाहरण है। वहीं, कुड़ुख शोधार्थी पूजा कच्छप ने बच्चों के आत्मविश्वास की सराहना करते हुए उन्हें समाज का भविष्य बताया और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
इनकी रही मुख्य उपस्थिति
कार्यक्रम को सफल बनाने में आदर्श लुरकुड़ीया (पुगु) के निदेशक पवन प्रकाश तिर्की, शिवशंकर तिग्गा, शशिकान्त उरांव, उर्मिला भगत, बबलू भगत, बुधवा उरांव और समाज सुधारक गीता उरांव की सक्रिय भूमिका रही। कार्यक्रम में आदर्श लुरकुड़ीया, संत चार्ल्स स्कूल, डॉन बोस्को स्कूल और कार्तिक उरांव कॉलेज सहित कई संस्थानों के विद्यार्थी शामिल हुए।