राष्ट्रीय बालशिक्षा शिखर सम्मान -2026
Trilok chand maths teacher
I am a maths teacher
31/03/2026
Got first position in maths exhibition
#शारदा #प्रशिक्षण में #संदर्भ #दाता की भूमिका निभाते हुए
#प्रथम बैच तीन दिवसीय शारदा प्रशिक्षण का हुआ समापन ゚viralシviralシfypシ゚viralシalシ2026
Happy National science day @
28/02/2026
With Proud to be a teacher – I'm on a streak! I've been a top fan for 8 months in a row. 🎉
30/01/2026
If are not on A.I. then you will become of A.I. ゚viralシviralシfypシ゚viralシalシeveryone
27/01/2026
वह सुबह जब मीना मैडम ने दोष देना छोड़ दिया
मीना मैडम कक्षा के दरवाज़े पर खड़ी थीं।
हाथ में उपस्थिति रजिस्टर था।
निपुण आकलन का समय चल रहा था।
तीन बेंच खाली थीं।
मन में वही पुराने विचार उभर आए—
“बच्चे रोज़ स्कूल नहीं आते।”
“अभिभावक पढ़ाई में मदद नहीं करते।”
“ज़्यादातर माता-पिता अनपढ़ हैं, क्या ही उम्मीद करें?”
मीना मैडम ने यह बातें ज़ोर से नहीं कही।
लेकिन उनका मन बार-बार इन्हें दोहरा रहा था।
और बच्चे…
बिना कुछ सुने भी, सब महसूस कर रहे थे।
उसी दिन, वरिष्ठ शिक्षक शिव नारायण सर ने मीना मैडम की चुप्पी देखी।
उन्होंने मुस्कराकर कहा,
“मीना जी, एक छोटी सी बात कहूँ?”
मीना मैडम ने सिर हिलाया।
शिव नारायण सर बोले,
“पिछले साल निपुण के समय मैं भी बहुत परेशान था।
कभी बच्चों से नाराज़,
कभी अभिभावकों से,
कभी पूरे सिस्टम से।”
फिर उन्होंने धीरे से पूछा,
“लेकिन एक दिन मैंने खुद से सवाल किया—
मेरा असली लक्ष्य क्या है?
अंक… या बच्चों का आत्मविश्वास?”
यह सवाल मीना मैडम के मन में बैठ गया।
शिव नारायण सर आगे बोले,
“मुझे यह भी समझ में आया कि मैं खुद को परिस्थितियों का शिकार मान रहा था।
और जब शिक्षक खुद को असहाय मान ले,
तो बच्चे खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं।”
उन्होंने एक पल रुककर कहा,
“एक दिन मैंने खुद को एक ऐसे अभिभावक की जगह रखकर देखा,
जो कभी स्कूल नहीं गया।
जो डरता है कि कहीं कोई सवाल न पूछ ले,
कहीं कोई नीचा न दिखा दे।”
उस पल मीना मैडम को लगा—
वे लापरवाह माता-पिता नहीं थे।
वे डरे हुए माता-पिता थे।
डर—अपमान का।
डर—कमज़ोर महसूस करने का।
मीना मैडम के मन की सख़्ती धीरे-धीरे पिघलने लगी।
अगले दिन मीना मैडम ने कुछ अलग किया।
जब अभिभावक आए,
उन्होंने शिकायत नहीं की।
निर्देश नहीं दिए।
बस इतना कहा—
“आपका बच्चा कोशिश कर रहा है।
हमें बस आपका साथ चाहिए।”
उन्होंने बच्चों की छोटी-छोटी उपलब्धियों की तारीफ़ की।
उपस्थिति को भी सराहा।
बात सरल शब्दों में की।
और कुछ बदलने लगा।
बच्चे ज़्यादा आने लगे।
अभिभावक खुलने लगे।
सब कुछ तुरंत सही नहीं हुआ—
लेकिन रिश्ता बदल गया।
एक सुबह, बच्चों को पढ़ते हुए मीना मैडम को अचानक एहसास हुआ—
परिस्थितियाँ वही थीं।
समस्याएँ वही थीं।
लेकिन उनका अंदर का संवाद बदल गया था।
उन्होंने अपने मन को मना लिया था—
दोष से → विश्वास की ओर
झुंझलाहट से → ज़िम्मेदारी की ओर
दबाव से → समझ की ओर
और जब मन बदला…
तो कक्षा का माहौल भी बदल गया।
मीना मैडम ने शिव नारायण सर को धन्यवाद दिया।
वे बोले,
“मीना जी, याद रखिए—
हम सबसे पहले बच्चों को नहीं बदलते।
हम सबसे पहले अपनी दृष्टि बदलते हैं।”
“जब शिक्षक का मन शांत और स्पष्ट हो जाता है,
तो बच्चे और माता-पिता अपने आप जुड़ने लगते हैं।”
निपुण आकलन के दौरान याद रखें—
बच्चे सीखने से नहीं भागते।
वे सुरक्षा महसूस करना चाहते हैं।
अभिभावक ज़िम्मेदारी से नहीं भागते।
वे अपमान से डरते हैं।
और शिक्षक कोमल होकर कमजोर नहीं होते।
वे और प्रभावशाली बनते हैं।
👉 लक्ष्य लोगों को बदलना नहीं,
बल्कि उन्हें समझ तक पहुँचने का अवसर देना है।
जब शिक्षक पहले अपने मन को प्रेरित करता है,
तो पूरी कक्षा उसका अनुसरण करती है।
यही है Self-Persuasion।
यही है नैतिक प्रेरणा।
और यही है सच्ची शिक्षा।
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