26/07/2026
💐💐मुंशी प्रेमचंद कथन 💐💐
• "लिखते तो वह लोग हैं, जिनके अंदर कुछ दर्द है, अनुराग है, लगन है, विचार है। जिन्होंने धन और भोग-विलास को जीवन का लक्ष्य बना लिया, वह क्या लिखेंगे?"
• "चापलूसी का ज़हरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नहीं पहुँचा सकता जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझ कर पी न जाएँ।"
• "देश का उद्धार विलासियों द्वारा नहीं हो सकता। उसके लिए सच्चा त्यागी होना आवश्यक है।"
• कुछ दिलों में सन्देह की जड़ इतनी मज़बूत होती है कि सबूत और दलील के हमले उस पर कुछ असर नहीं कर सकते। यहां तक कि वह अपनी आंख से देखने को भी धोखा या तिलिस्म समझता है।,('मुबारक बीमारी' कहानी से)
• "ईमानदार मनुष्य स्वभावत: स्पष्टभाषी होता है; उसे अपनी बातों में नमक-मिर्च लगाने की जरुरत नहीं होती।"('ईश्वरीय न्याय' कहानी से)
• "गरीबों का दर्द कौन समझता है ! हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झाँकने नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है।"(ठाकुर का कुआं' कहानी से)
• संसार में गऊ बनने से काम नहीं चलता, जितना दबो, उतना ही दबाते हैं।
• "सच है, पाप के पंजों में फँसा हुआ मन पतझड़ का पत्ता है, जो हवा के जरा-से झोंके से गिर पड़ता है।('ईश्वरीय न्याय' कहानी से)
• क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?('पंच परमेश्वर' कहानी से)
• मुंशी प्रेमचंद जी ने अपने जीवन के बारें में एक स्थान पर यूं लिखा है- "मेरा जीवन सपाट, समतल मैदान है, जिसमें कहीं-कहीं गढ़े तो हैं, पर टीलों, पर्वतों, घने जंगलों, गहरी घाटियों और खण्डहरों का स्थान नहीं है। जो सज्जन पहाड़ों की सैर के शौकीन हैं, उन्हें तो यहाँ निराशा ही होगी।"
• "मेरी राय है, जनता स्वयं अपना भला-बुरा निर्णय करे। यहाँ तो लोगों को लीडरी की पड़ी रहती है, तब भला वे कैसे जनता के हित की बात सोचें। हिन्दू-मुसलमान की लड़ाइयों में तो ये अपनी लीडरी चमकाते हैं।"
• "लेखक हर आदमी की बात कैसे सोच सकता है? वह तो जी-हुज़ूरी हुई। लेखक उसमें कहाँ रहा। लेखक किसी की परवाह किये बिना ही अपने विचार देगा और हृदय से जनता उन विचारों को लेगी भी। और फिर जनता भेड़ भी तो नहीं है। जिसे माना, उसी के इशारे पर चलती रहे, यह तो अच्छी बात नहीं"
• "मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है।('नमक का दारोगा' कहानी से)
• "जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें शक्ति और गति न पैदा हो, हमारा सौन्दर्य-प्रेम न जाग्रत हो-जो हममे सच्चा सङ्कल्प और कठिनाइयो पर विजय पाने की सच्ची दृढता न उत्पन्न करे, वह आज हमारे लिए बेकार है, वह साहित्य कहाने का अधिकारी नही ।('साहित्य का उद्देश्य' से)
• "हमारी कला यौवन के प्रेम मे पागल है और यह नही जानती कि जवानी छाती पर हाथ रखकर कविता पढने, नायिका की निष्ठुरता का रोना रोने या उसके रूप-गर्व और चोचलो पर सिर धुनने मे नहीं है। जवानी नाम है आदर्शवाद का, हिम्मत का, कठिनाई से मिलने की इच्छा का, अात्म-त्याग का ।"('साहित्य का उद्देश्य' से)
• "साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नही है-उसका दरजा इतना न गिराइये । वह देश- भक्ति भार राजनीति के पीछे चलनेवाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलनेवाली सचाई है।('साहित्य का उद्देश्य' से)
• "अगर हम सच्चे दिल से समाज की सेवा करेंगे तो मान, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि सभी हमारे पाॅव चूमेगी। फिर मान-प्रतिष्ठा की चिन्ता हमें क्यों सताये ? और उसके न मिलने से हम निराश क्यो हो ? सेवा मे जो आध्यात्मिक आनन्द है, वही हमारा पुरस्कार है-हमे समाज पर अपना बड़प्पन जताने, उस पर रोब जमाने की हवस क्यो हो ? दूसरो से ज्यादा आराम के साथ रहने की इच्छा भी हमे क्यो सताये ? हम अमीरो की श्रेणी मे अपनी गिनती क्यो कराये ? हम तो समाज के झण्डा लेकर चलनेवाले सिपाही है और सादी जिन्दगी के साथ ऊँची-निगाह-हमारे जीवन का लक्ष्य है। जो आदमी सच्चा कलाकार है, वह स्वार्थमय जीवन का प्रेमी नही हो सकता । उसे अपनी मनस्तुष्टि के लिए दिखावे की आव- श्यकता नहीं-उससे तो उसे घृणा होती है।"('साहित्य का उद्देश्य' से)
• "जो हो, जब तक साहित्य का काम केवल मन-बहलाव का सामान जुटाना, केवल लोरियाँ गा-गाकर सुलाना, केवल आँसू बहाकर जी हलका करना था, तब तक इसके लिए कर्म की आवश्यकता न थी। वह एक दीवाना था, जिसका गम दूसरे खाते थे, मगर हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वस्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।"('साहित्य का उद्देश्य' से)
• "साहित्य मनुष्य की सृष्टि है, इसलिए सुबोध है, सुगम है और मर्यादाओं से परिमित है। जीवन परमात्मा को अपने कामों का जवाबदेह है या नहीं, हमें मालूम नहीं, लेकिन साहित्य तो मनुष्य के सामने जवाबदेह है।"('जीवन में साहित्य का स्थान' से)
• "सत्य से आत्मा का सम्बन्ध तीन प्रकार का है। एक जिज्ञासा का सम्बन्ध है, दूसरा प्रयोजन का सम्बन्ध है और तीसरा आनंद का। जिज्ञासा का सम्बन्ध दर्शन का विषय है, प्रयोजन का सम्बन्ध विज्ञान का विषय है और साहित्य का विषय केवल आनंद का सम्बन्ध है। सत्य जहाँ आनंद का स्त्रोत बन जाता है, वहीं वह साहित्य हो जाता है। जिज्ञासा का सम्बन्ध विचार से है, प्रयोजन का सम्बन्ध स्वार्थ-बुद्धि से। आनंद का सम्बन्ध मनोभावों से है। साहित्य का विकास मनोभावों द्वारा ही होता है। एक ही दृश्य या घटना या कांड को हम तीनों ही भिन्न-भिन्न नजरों से देख सकते हैं। हिम से ढँके हुए पर्वत पर ऊषा का दृश्य दार्शनिक के गहरे विचार की वस्तु है, वैज्ञानिक के लिए अनुसंधन की और साहित्यिक के लिए विह्नलता की! विह्नलता एक प्रकार का आत्म-समर्पण है। यहाँ हम पृथकता का अनुभव नहीं करते। यहाँ ऊँचे-नीच, भले-बुरे का भेद नहीं रह जाता। श्रीरामचन्द्र शबरी के जूठे बेर क्यों प्रेम से खाते हैं, कृष्ण भगवान् विदुर के शाक को क्यों नाना व्यंजनों से रूचिकर समझते हैं इसलिए कि उन्होंने इस पार्थक्य को मिटा दिया है। उनकी आत्मा विशाल है। उसमें समस्त जगत् के लिए स्थान है। आत्मा आत्मा से मिल गई है। जिसकी आत्मा जितनी ही विशाल है वह उतना ही महापुरूष है। यहाँ तक कि ऐसे महान् पुरूष भी हो गए हैं, जो जड़ जगत् से भी अपनी आत्मा का मेल कर सके हैं।"('जीवन में साहित्य का स्थान' से)
• "साहित्य मस्तिष्क की वस्तु नहीं, हृदय की वस्तु है। जहाँ ज्ञान और उपदेश असफल होता है, वहाँ साहित्य बाजी ले जाता है। यही कारण है कि हम उपनिषदों और अन्य धर्म-ग्रंथों को साहित्य की सहायता लेते देखते हैं! हमारे धर्माचार्यो ने देखा कि मनुष्य पर सबसे अधिक प्रभाव मानव-जीवन के दुख-सुख के वर्णन से ही हो सकता है और उन्होंने मानव-जीवन की वे कथाएँ रचीं, जो आज भी हमारे आनंद की वस्तु हैं। बौद्धों की जातक-कथाएँ, तौरेह, कुरान, इंजील ये सभी मानवी कथाओं के संग्रह-मात्र हैं। उन्हीं कथाओं पर हमारे बड़े-बड़े धर्म स्थिर हैं। वही कथाएँ धर्मो की आत्मा हैं। उन कथाओं को निकाल दीजिए, तो उस धर्म का अस्तित्व मिट जायेगा। क्या उन धर्म-प्रवर्तकों ने अकारण ही मानवी जीवन की कथाओं का आश्रय लिया? नहीं, उन्होंने देखा कि हृदय द्वारा ही जनता की आत्मा तक अपना संदेश पहुँचाया जा सकता है। वे स्वयं विशाल हृदय के मनुष्य थे। उन्होंने मानव-जीवन से अपनी आत्मा का मेल कर लिया था। समस्त मानव-जाति से उनके जीवन का सामंजस्य था, फिर वे मानव-चरित्र की उपेक्षा कैसे करते?"('जीवन में साहित्य का स्थान' से)
• "आदिकाल से मनुष्य के लिए सबसे समीप मनुष्य है। हम जिसके सुख-दुःख हँसने-रोने का मर्म समझ सकते हैं, उसी से हमारी आत्मा का अधिक मेल होता है। विद्यार्थी को विद्यार्थी जीवन से, कृषक को कृषक जीवन से जितनी रूचि है, उतनी अन्य जातियों से नहीं, लेकिन साहित्य जगत् में प्रवेश पाते ही यह भेद, यह पार्थक्य मिट जाता है। हमारी मानवता जैसे विशाल और विराट होकर समस्त मानव जाति पर अध्किार पा जाती है। मानव जाति ही नहीं, चर और अचर, जड़ और चेतन सभी उसके अधिकार में आ जाते हैं। उसे मानो विश्व की आत्मा पर साम्राज्य प्राप्त हो जाता है। श्री रामचन्द्र राजा थे, पर आज रंक भी उनके दुःख से उतना ही प्रभावित होता है, जितना कोई राजा हो सकता है।"('जीवन में साहित्य का स्थान' से)
• "सच्चा साहित्य कभी पुराना नहीं होता। वह सदा नया बना रहता है। दर्शन और विज्ञान समय की गति के अनुसार बदलते हैं पर साहित्य तो हृदय की वस्तु है और मानव-हृदय में तबदीलियाँ नहीं होतीं।"('जीवन में साहित्य का स्थान' से)
• "साहित्य ही सच्चा इतिहास है, क्योंकि उसमें अपने देश और काल का जैसा चित्र होता है, वैसा कोरे इतिहास में नही हो सकता। घटनाओं की तालिका इतिहास नहीं है और न राजाओं की लड़ाइयाँ ही इतिहास है। इतिहास जीवन के विभिन्न अंगों की प्रगति का नाम है और जीवन पर साहित्य से अधिक प्रकाश और कौन वस्तु डाल सकती है, क्योंकि साहित्य अपने देशकाल का प्रतिबिम्ब होता है।"('जीवन में साहित्य का स्थान' से)
• "साहित्य का सम्बन्ध बुद्धि से उतना नहीं जितना भावों से है। बुद्धि के लिए दर्शन है, विज्ञान है, नीति है। भावों के लिए कविता है, उपन्यास है, गद्यकाव्य है।"('साहित्य का आधार' से)
• "एक जरा-सा इशारा, एक जरा-सा बीज, लेखक के मस्तिष्क मे पहुंचकर इतना विशाल वृक्ष बन जाता है कि लोग उस पर आश्चर्य करने लगते है।"('उपन्यास' लेख से)
• "रचना-शक्ति थोडी-बहुत सभी प्राणियों मे रहती है। जो उसमें अभ्यस्त हो चुके है, उन्हे तो फिर झिझक नहीं रहती-कलम उठाया और लिखने लगे। लेकिन नये लेखकों को पहले कुछ लिखते समय ऐसी झिझक होती है, मानो वे दरिया मे कूदने जा रहे हो । बहुधा एक तुच्छ सी घटना उनके मस्तिष्क पर प्रेरक का काम कर जाती है । किसी का नाम सुनकर, काई स्वप्न देखकर, कोई चित्र देखकर, उनकी कल्पना जाग उठती है । किसी व्यक्ति पर किस प्रेरणा का सब से अधिक प्रभाव पड़ता है, यह उस व्यक्ति पर निर्भर है । किसी की कल्पना दृश्य-विषय से उभरती है, किसा की गन्ध से, किसी की श्रवण से।किसी को नये, सुरम्य स्थान की सैर से इस विषय मे यथेष्ट सहायता मिलती है। नदी के तट पर अकेले भ्रमण करने से बहुधा नयी-नयी कल्पनाएँ जाग्रत होती हैं।"('उपन्यास' लेख से)
• "उपन्यास कला में यह बात भी बड़े महत्त्व की है कि लेखक क्या लिखे ओर क्या छोड़ दे। पाठक कल्पनाशील होता है, इसलिए वह ऐसो बाते पढ़ना पसन्द नहीं करता जिनकी वह आसानो से कल्पना कर सकता है । वह यह नहीं चाहता कि लेखक सब कुछ खुद कह डाले और पाठक की कल्पना के लिए कुछ भी बाकी न छोडे । वह कहानी का खाका-मात्र चाहता है, रंग वह अपनी अभिरुचि के अनुसार भर लेता है। कुशल लेखक वही है जो यह अनुमान कर ले कि कौन सी बात पाठक स्वय सोच लेगा और कौन-सी बात उसे लिखकर स्पष्ट कर देनी चाहिए।" ('उपन्यास' लेख से)
• "कहानी या उपन्यास में पाठक की कल्पना के लिए जितनी अधिक सामग्री हो उतनी ही वह कहानी रोचक होगी। यदि लेखक आवश्यकता से कम बतलाता है तो कहानी आशयहीन हो जाती है, ज्यादा बतलाता है तो कहानी में मजा नही आता। किसी चरित्र की रूपरेखा या किसी दृश्य को चित्रित करते समय हुलिया नवीसी करने की जरूरत नही। दो चार वाक्यों में मुख्य मुख्य बातें कह देनी चाहिए। किसी दृश्य को तुरंत देखकर उसका वर्णन करने से बहुत सी अनावश्यक बातों के आ जाने की संभावना रहती है। कुछ दिनों के बाद अनावश्यक बातें आप ही आप मस्तिष्क से निकल जाती है, केवल मुख्य बातें स्मृति पर अंकित रह जाती है। तब उस दृश्य के वर्णन करने में अनावश्यक बातें ना रहेंगी।"('उपन्यास' लेख से)
• "वही तलवार, जो केले को नहीं काट सकती, सान पर चढ़कर लोहे को काट देती है। मानव-जीवन में लाग बड़े महत्त्व की वस्तु है। जिसमें लाग है, वह बूढ़ा भी हो तो जवान है। जिसमें लाग नहीं, गैरत नहीं, वह जवान भी मृतक है।"('सुजान भगत' कहानी से)
• "ईमान का सबसे बड़ा शत्रु अवसर है। "('ईश्वरीय न्याय' कहानी से)
• "दुष्कामनाओं के सामने एक बार सिर झुकाने पर फिर सँभलना कठिन हो जाता है। पाप के अथाह दलदल में जहाँ एक बार पड़े कि फिर प्रतिक्षण नीचे ही चले जाते हैं।"('ईश्वरीय न्याय' कहानी से)
• "स्त्रियां क्रोध के बाद किसी न किसी बहाने रोया करती हैं।"('ईश्वरीय न्याय' कहानी से)
• "सत्यवादी मनुष्य पर कोई विपत्त पड़ती हैं, तो लोग उनके साथ सहानुभूति करते हैं। दुष्टों की विपत्ति लोगों के लिए व्यंग्य की सामग्री बन जाती है। उस अवस्था में ईश्वर अन्यायी ठहराया जाता है; मगर दुष्टों की विपत्ति ईश्वर के न्याय को सिद्ध करती है।" ('ईश्वरीय न्याय' कहानी से)
• "शत्रु की हानि मनुष्य को अपने लाभ से भी अधिक प्रिय होती है, मानव-स्वभाव ही कुछ ऐसा है।"('ईश्वरीय न्याय' कहानी से)
• "जिस तरह मां अपने बेटे को हमेशा दुबला ही समझती है, उसी तरह बाप बेटे को हमेशा नादान समझा करता है।"('मुबारक बीमारी' कहानी से)
• "बूढ़े आदमियों को नयी चीजों से चिढ़ हो जाती है।"('मुबारक बीमारी' कहानी से)
• "लोग कहते हैं, जुलूस निकालने से क्या होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि हम जीवित हैं, अटल हैं, और मैदान से हटे नहीं हैं। हमें अपने हार न माननेवाले आत्माभिमान का प्रमाण देना था। हमें यह दिखाना था कि हम गोलियों और अत्याचार से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटनेवाले नहीं और हम उस व्यवस्था का अंत करके रहेंगे जिसका आधार स्वार्थपरता और खून पर है।"('जेल' कहानी से)
• "जुलूस निकालने की मनाही हो गयी। जनता को चेतावनी दे दी गयी कि खबरदार जुलूस में न आना, नहीं दुर्गति होगी। इसका जनता ने वह जवाब दिया, जिसने अधिकारियों की आँखें खोल दी होंगी। संध्या समय पचास हजार आदमी जमा हो गये।"('जेल' कहानी से)
• "पुलिस अधिकारियों की इसीलिए गुलामी करती है कि उसे वेतन मिलता है। पेट की गुलामी उससे सब कुछ करवा लेती है। महाराजा का हुक्म लोग इसीलिए मानते हैं कि उससे उपकार की आशा या हानि का भय होता है।"('जेल' कहानी से)
• “कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।” ('कफ़न' कहानी से )
• "जब दूसरे के पाँवों-तले अपनी गर्दन दबी हुई है, तो उन पाँवों को सहलाने में ही कुशल है।"('गोदान' उपन्यास से)
• "मै एक मज़दूर हूँ। जिस दिन कुछ लिख न लूँ, उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नहीं।"
• "सुख के दिन आये तो लड़ लेना, दुःख तो साथ रोने से ही कटता है।"('गोदान' उपन्यास से)
• "देह के भीतर इसीलिए आत्मा रखी गई है कि देह उसकी रक्षा करे। इसलिए नहीं कि उसका सर्वनाश कर दे।"('ग़बन' उपन्यास से)
• "धन खोकर अगर हम अपनी आत्मा को पा सकें, तो यह कोई महंगा सौदा नहीं है।"
• "जिन वृक्षों की जड़ें गहरी होती हैं, उन्हें बार-बार सींचने की जरूरत नहीं होती।"
• "पहाड़ों की कंदराओं में बैठकर तप कर लेना सहज है, किन्तु परिवार में रहकर धीरज बनाये रखना सबके वश की बात नहीं!"
• "कभी-कभी हमें उन लोगों से शिक्षा मिलती है, जिन्हें हम अभिमान वश अज्ञानी समझते हैं!"
• "क्रोध अत्यंत कठोर होता है, वह मौन को सहन नहीं कर सकता।"
• "आलस्य वह राज रोग है जिसका रोगी कभी नहीं संभलता।"
• "जिस बंदे को पेट भर रोटी नहीं मिलती, उसके लिए मर्यादा और इज्जत ढोंग है!"
• "आजकल धर्म तो धूर्तों का अड्डा बना हुआ है। इस निर्मल सागर में एक से एक मगरमच्छ पड़े हुए हैं।"
• "मेरे लिए वर्तमान ही सब कुछ है।भविष्य की चिंता हमें कायर बना देती है,भूत का भार हमारी कमर तोड़ देता है।"
• "संसार में सबसे आसान काम स्वयं को धोखा देना है।"
• "स्त्री पुरुष से उतनी ही श्रेष्ठ है, जितना प्रकाश अंधेरे से!"
• "यह जमाना चाटुकारिता और सलामी का है तुम विद्या के सागर बने बैठे रहो, कोई सेत भी न पूछेगा।"