Technical_classes_by_Mukesh_yadav

12/04/2026

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*♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️*

*!!संगति का प्रभाव!!*
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एक बार एक जंगल में एक कौआ और एक हंस रहते थे। दोनों एक ही पेड़ पर रहते थे, लेकिन उनकी आदतें बिल्कुल अलग थीं। हंस शांत, सरल और सज्जन था, जबकि कौआ शरारती और दूसरों को परेशान करने वाला।

एक दिन दोपहर के समय एक थका हुआ यात्री उस पेड़ के नीचे आकर सो गया। तेज धूप थी, तो हंस को उस पर दया आई और वह अपने पंख फैलाकर उसके चेहरे पर छाया करने लगा।

कुछ देर बाद कौआ वहाँ आया। उसने हंस को ऐसा करते देखा और मजाक करने के लिए उसने यात्री के चेहरे पर गंदगी गिरा दी और उड़ गया।

गंदगी गिरते ही यात्री की नींद खुल गई। उसने ऊपर देखा तो हंस को अपने ऊपर बैठा पाया। उसे लगा कि यही इसका कारण है।

गुस्से में आकर उसने तुरंत पत्थर उठाया और हंस पर फेंक दिया। बेचारा निर्दोष हंस वहीं घायल होकर गिर पड़ा।

जब कौआ दूर से यह सब देख रहा था, तब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

यह घटना पूरे जंगल के लिए एक सीख बन गई कि बुरी संगति का परिणाम हमेशा बुरा ही होता है।

*शिक्षा:*

मनुष्य की पहचान उसकी संगति से भी होती है। बुरे लोगों का साथ, अच्छे व्यक्ति को भी संकट में डाल सकता है, इसलिए हमेशा अच्छी संगति का चयन करना चाहिए।

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*
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09/04/2026

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*♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️*

*!! धैर्य और सही दृष्टि !!*
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एक छोटे से गाँव में एक वृद्ध कारीगर रहता था, जो पत्थरों को तराशकर सुंदर मूर्तियाँ बनाता था। उसकी कला इतनी अद्भुत थी कि दूर-दूर से लोग उसे देखने और सीखने आते थे। उसके पास एक शिष्य भी था, जो वर्षों से उसके साथ काम कर रहा था, लेकिन वह हमेशा शिकायत करता रहता था कि उसे अभी तक वैसी उत्कृष्ट कला क्यों नहीं आई।

एक दिन शिष्य ने अधीर होकर पूछा, “गुरुजी, आप इतने साधारण पत्थर को छूते ही उसे जीवंत बना देते हैं, लेकिन मैं वही काम करता हूँ फिर भी मेरे हाथों में वैसी सुंदरता क्यों नहीं आती?”

गुरुजी मुस्कुराए और उसे एक बड़ा पत्थर देते हुए बोले, “इसे तराशो।”
शिष्य ने पूरे दिन मेहनत की, हथौड़े चलाए, छेनी चलाई, लेकिन पत्थर में कोई खास परिवर्तन नहीं आया। वह थककर बैठ गया।

अगले दिन गुरुजी ने वही पत्थर उठाया और बड़ी सहजता से कुछ ही चोटों में उसे एक सुंदर आकृति में बदल दिया। शिष्य यह देखकर हैरान रह गया। उसने कहा, “गुरुजी, आपने तो कुछ ही वार किए और पत्थर बदल गया, जबकि मैंने पूरे दिन मेहनत की थी!”

गुरुजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “बेटा, फर्क मेहनत में नहीं, समझ और धैर्य में होता है। तुम्हारे हर वार में जल्दी और बेचैनी थी, जबकि मेरे हर वार के पीछे वर्षों का अनुभव, सही दिशा और धैर्य था।”

फिर उन्होंने आगे कहा, “जब तुम पत्थर को तराशते हो, तो केवल उसे तोड़ने का प्रयास करते हो। लेकिन जब मैं काम करता हूँ, तो मैं पहले उस पत्थर के भीतर छिपी मूर्ति को देखता हूँ। मैं उसे बाहर लाने के लिए काम करता हूँ, न कि केवल पत्थर को काटने के लिए।”

यह सुनकर शिष्य की आँखें खुल गईं। उसे समझ आ गया कि सफलता केवल परिश्रम से नहीं, बल्कि सही दृष्टिकोण, धैर्य और निरंतर अभ्यास से मिलती है।

उस दिन के बाद उसने जल्दबाजी छोड़ दी। उसने हर कार्य को समझकर, ध्यानपूर्वक और धैर्य के साथ करना शुरू किया। समय बीतने के साथ उसकी कला भी निखरने लगी, और एक दिन वह भी अपने गुरु की तरह श्रेष्ठ कारीगर बन गया।

*शिक्षा:-*
जीवन में केवल मेहनत करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि सही दिशा, धैर्य और सकारात्मक दृष्टिकोण भी उतना ही आवश्यक है।

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*
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08/04/2026

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*♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️*

*!! मन से किया गया कार्य !!*
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एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। वह पढ़ाई में ठीक-ठाक था, लेकिन हर काम को आधे मन से करता था। उसका मानना था कि “जितना जरूरी है, उतना ही करो, ज्यादा मेहनत का क्या फायदा?” इसी सोच के कारण वह कभी किसी काम में आगे नहीं बढ़ पाता था।

गाँव में ही एक बुजुर्ग कुम्हार रहते थे, जिनकी बनाई हुई मिट्टी की वस्तुएँ बहुत प्रसिद्ध थीं। एक दिन अर्जुन उनके पास गया और पूछा, “बाबा, आपकी हर चीज इतनी सुंदर कैसे बनती है? आप इसमें क्या खास करते हैं?”

कुम्हार मुस्कुराए और बोले, “मैं हर घड़े को ऐसे बनाता हूँ जैसे यही मेरा सबसे अच्छा काम हो।” अर्जुन को यह बात समझ नहीं आई।

अगले दिन कुम्हार ने अर्जुन को अपने साथ काम करने के लिए बुलाया। उन्होंने उसे एक घड़ा बनाने को कहा। अर्जुन ने जल्दी-जल्दी काम किया और एक साधारण घड़ा बना दिया। फिर कुम्हार ने वही काम खुद किया—धीरे-धीरे, पूरी लगन और ध्यान से। उनका घड़ा न सिर्फ मजबूत था बल्कि देखने में भी बेहद सुंदर था।

कुम्हार ने अर्जुन से कहा, “बेटा, फर्क सिर्फ हाथों में नहीं, मन में होता है। जब तुम किसी काम को पूरी निष्ठा से करते हो, तो वह साधारण नहीं रहता।”

यह बात अर्जुन के दिल को छू गई। उसने उसी दिन से हर काम पूरे मन और मेहनत से करना शुरू कर दिया—चाहे वह पढ़ाई हो, घर का काम हो या कोई छोटी जिम्मेदारी।

धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा, उसके परिणाम बेहतर होने लगे और लोग भी उसकी तारीफ करने लगे। कुछ वर्षों बाद वही अर्जुन गाँव का सबसे सफल और सम्मानित व्यक्ति बन गया।

*शिक्षा 👉*

काम छोटा या बड़ा नहीं होता, हमारा दृष्टिकोण उसे बड़ा बनाता है। जब हम हर कार्य को पूरी लगन और ईमानदारी से करते हैं, तभी सफलता हमारे कदम चूमती है।

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*
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03/04/2026

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♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️

*!!सिंह और चतुर खरगोश!!*

एक घने जंगल में एक अत्यंत बलशाली सिंह रहता था। वह प्रतिदिन कई जानवरों का शिकार कर उन्हें मार डालता था। उसके भय से पूरे जंगल के जीव-जन्तु परेशान थे। अंततः सभी जानवर एकत्र हुए और उन्होंने सिंह से विनती की कि वह प्रतिदिन स्वयं शिकार करने के बजाय उनके द्वारा भेजे गए एक जानवर को ही खा लिया करे। सिंह ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

अब रोज एक जानवर स्वयं सिंह के पास जाने लगा। एक दिन एक छोटे से खरगोश की बारी आई। वह स्वभाव से बहुत चतुर था। उसने सोचा कि यदि आज भी मैं सीधा सिंह के पास चला गया, तो यह अत्याचार कभी समाप्त नहीं होगा।

वह जानबूझकर देर से सिंह के पास पहुँचा। भूखा सिंह क्रोध से गरज उठा और देर का कारण पूछने लगा। खरगोश ने विनम्रता से कहा— “महाराज, मैं समय पर ही आ रहा था, पर रास्ते में एक दूसरे सिंह ने मुझे रोक लिया। उसने कहा कि वही इस जंगल का असली राजा है।”

यह सुनकर सिंह का अहंकार भड़क उठा। उसने तुरंत उस दूसरे सिंह को देखने की इच्छा जताई। खरगोश उसे एक गहरे कुएँ के पास ले गया और बोला— “महाराज, वह सिंह इसी कुएँ में रहता है।”

सिंह ने कुएँ में झाँका तो उसे पानी में अपनी ही परछाई दिखाई दी। उसने उसे दूसरा सिंह समझ लिया और क्रोध में आकर जोर से दहाड़ा। परछाई ने भी वैसा ही किया। क्रोधित होकर सिंह कुएँ में कूद पड़ा और वहीं डूबकर मर गया।

इस प्रकार एक छोटे से खरगोश की बुद्धिमानी ने पूरे जंगल को उस अत्याचारी सिंह से मुक्त कर दिया।

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*📚 शिक्षा 👉*
_बुद्धि और धैर्य से किया गया कार्य बड़े से बड़े बल को भी परास्त कर सकता है। केवल शक्ति नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय ही सच्ची विजय दिलाता है।_

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*
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02/04/2026

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♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️

*!! बूढ़ा और घोड़ा !!*

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एक गाँव में एक गरीब बूढ़ा रहता था। वह बहुत गरीब था, फिर भी उसके पास एक अत्यंत सुंदर सफेद घोड़ा था। उसी घोड़े के कारण राजा के लोग भी उससे ईर्ष्या करते थे।

उस सफेद घोड़े को खरीदने के लिए राजा की ओर से उसे बहुत ऊँची कीमत की पेशकश की गई थी, लेकिन बूढ़ा आदमी यह कहते हुए मना कर देता था, “यह मेरे लिए केवल एक घोड़ा नहीं है। वह मेरे लिए एक व्यक्ति के समान, मेरा सच्चा मित्र है। क्या कोई अपने मित्र को बेच सकता है? नहीं, यह मेरे लिए संभव नहीं है।”

एक दिन सुबह जब वह खलिहान में गया, तो उसने देखा कि घोड़ा वहाँ नहीं है। यह खबर गाँव में तेजी से फैल गई और पूरा गाँव उसके घर पर इकट्ठा हो गया।

गाँव वालों ने कहा, “तुम बहुत बड़े मूर्ख हो। हर कोई उस घोड़े को पाना चाहता था। सभी जानते थे कि एक दिन यह घोड़ा चोरी हो जाएगा। तुम उसे अच्छी कीमत पर बेच सकते थे, फिर भी तुमने ऐसा नहीं किया। अब घोड़ा चला गया है, यह तुम्हारा दुर्भाग्य है।”
बूढ़े आदमी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “सच तो केवल इतना है कि घोड़ा यहाँ नहीं है। बाकी सब कुछ जो तुम कह रहे हो, वह केवल एक निष्कर्ष है। तुम कैसे निश्चित हो सकते हो कि यह दुर्भाग्य ही है?”

लोगों ने उत्तर दिया, “हमें भ्रमित मत करो। तुम्हारा सफेद घोड़ा चला गया है, यह स्पष्ट रूप से तुम्हारा दुर्भाग्य है।”
गाँव के लोग उस पर हँसे और उसे पागल कहकर चले गए। वे सोचते थे कि वह अपने ही भाग्य को नहीं समझ पा रहा।

कुछ दिनों के बाद, वही सफेद घोड़ा जंगल से वापस आ गया। उसके साथ कई और जंगली घोड़े भी आ गए, जिससे उसका छोटा सा आँगन मानो समृद्धि से भर उठा।

गाँव के लोग फिर उसके घर पर आए और बोले, “आप सही थे, यह दुर्भाग्य नहीं बल्कि आशीर्वाद है। अब आपके पास और भी घोड़े हैं। आप उन्हें प्रशिक्षित करके अच्छा धन कमा सकते हैं।”

बूढ़े ने शांत भाव से उत्तर दिया, “फिर से तुम लोग बहुत आगे बढ़ रहे हो। बस इतना कहो कि घोड़ा वापस आ गया है और उसके साथ कुछ और घोड़े भी आए हैं। यह तो केवल एक घटना का हिस्सा है, जो समय के साथ बदल भी सकता है।”

इस बार गाँव के लोग कुछ सोच में पड़ गए और चुपचाप लौट गए।
बूढ़े आदमी के इकलौते बेटे ने उन जंगली घोड़ों को प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया। कुछ दिनों बाद, प्रशिक्षण के दौरान वह एक घोड़े से गिर गया और उसकी टांग बुरी तरह टूट गई।

यह सुनकर गाँव के लोग फिर इकट्ठा हुए और बोले, “अब समझ में आया कि अधिक घोड़े होना कोई आशीर्वाद नहीं था। तुम्हारा बेटा घायल हो गया। इस बुढ़ापे में तुम अपने अपाहिज बेटे का कैसे सहारा बनोगे?”

बूढ़े ने पहले की तरह ही शांत स्वर में कहा, “इतनी दूर मत जाओ। इतना ही कहो कि मेरे बेटे की टांग टूट गई है। कौन जानता है कि यह दुर्भाग्य है या आशीर्वाद? इसका निर्णय समय ही करेगा।”

एक महीने बाद, युद्ध छिड़ गया और गाँव के सभी युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए जबरन ले जाया गया। पूरे गाँव में रोने-धोने का माहौल था, क्योंकि किसी को भी अपने बेटों के लौटने की आशा नहीं थी।

तब गाँव के लोग बूढ़े आदमी के पास आए और बोले, “आप सही थे। हमारे बेटे शायद कभी वापस नहीं आएँगे, लेकिन आपका बेटा सुरक्षित है। उसका घायल होना ही उसके लिए वरदान सिद्ध हुआ।”

बूढ़े ने गहरी मुस्कान के साथ उत्तर दिया, “कोई नहीं जानता। इतना ही कहो कि तुम्हारे बेटों को सेना में जाना पड़ा और मेरे बेटे को नहीं जाना पड़ा। लेकिन यह आशीर्वाद है या दुर्भाग्य, इसका सत्य केवल भगवान ही जानता है।”

*शिक्षा:-*
हमें किसी भी स्थिति का निर्णय केवल उसी आधार पर नहीं करना चाहिए, जो हम उस क्षण देखते हैं। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, और जो आज दुर्भाग्य प्रतीत होता है, वही कल आशीर्वाद बन सकता है।

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*

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30/03/2026

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*♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️*

*!! सपने और हकीकत !!*
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बहुत समय पहले की बात हैं, एक व्यक्ति था जो बेहद आलसी और साथ ही साथ गरीब भी था। वह कुछ भी मेहनत नहीं करना चाहता था। लेकिन अमीर बनने का सपना देखता रहता था। वह भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करता था।

एक सुबह उसे भिक्षा के रूप में दूध से भरा एक घड़ा मिला। वह बहुत प्रसन्न हुआ और दूध का घड़ा लेकर घर चला गया।

उसने दूध को उबाला, उसमें से कुछ दूध पिया और बचा हुआ दूध, एक बर्तन में डाल दिया। दूध को दही में बदलने के लिए उसने बर्तन में थोड़ा सा दही डाला। इसके बाद वह सोने के लिए लेट गया। वह सोते समय दही के बर्तन के बारे में सोचने लगा।

उसने सोचा, “सुबह तक दूध दही बन जायेगा। मैं दही को मथकर उससे मक्खन बना लूंगा। फिर मक्खन को गर्म करके उससे घी बना लूंगा। फिर घी को बाजार में जाकर उसे बेच दूँगा और कुछ पैसे कमा लूंगा। उस पैसे से मैं एक मुर्गी खरीदूंगा। मुर्गी अंडे देगी, उन अंडो से बहुत सारे मुर्गे मुर्गी पैदा होंगे। फिर ये मुर्गियां सैकड़ों अंडे देगी और मेरे पास जल्द ही एक पोल्ट्री फार्म होगा।” वह कल्पना में डूबा रहा।

फिर उसने सोचा, “मैं सारी मुर्गियां बेच दूंगा और फिर कुछ गाय भैंस खरीद लूंगा और दूध की डेयरी खोल दूंगा। शहर के सभी लोग मुझसे दूध खरीदने आएंगे और मैं बहुत जल्दी ही अमीर हो जाऊंगा। फिर में अमीर परिवार की खूबसूरत लड़की से शादी कर कर लूंगा। फिर मेरा एक सुंदर सा बेटा होगा। अगर वह कोई शरारत करेगा तो मुझे बहुत गुस्सा आएगा और उसे सबक सिखाने के लिए मैं उसे डंडे से ऐसे मारूंगा।”

यह सोचने के दौरान उसने बिस्तर के बगल में पड़ा डंडा उठाया और मारने का नाटक करने लगा। यही डंडा उसके दूध के बर्तन में लग गया और दूध का बर्तन टूट गया, इससे सारा दूध जमीन पर फैल गया।

बर्तन की आवाज सुनकर उस आदमी की नींद उड़ गई। फैला हुआ दूध देखकर उसने अपना सिर पकड़ लिया।

*शिक्षा:-*
सपने देखो, लेकिन खाली सपने देखने से कुछ नहीं होगा। हमें कड़ी मेहनत करनी होगी। कुछ भी जिंदगी में आसानी से नहीं मिलता हैं। हमारी जिंदगी को बेहतरीन बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। क्योंकि कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है।

अगर आप केवल सपने ही देखते रहते हैं उनको साकार करने के लिए कोई कदम नहीं उठाते हैं, तो ऐसा करके आप खुद को धोखा दे रहे हैं। इसलिए पहले खुद का 100% दीजिए, फिर सफलता खुद आपके कदम चूमने आएगी।

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

29/03/2026

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*♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️*

*!!धैर्य और निरंतर प्रयास!!*
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एक छोटे से नगर में *माधव* नाम का एक युवक रहता था। वह एक साधारण परिवार से था, लेकिन उसके मन में कुछ बड़ा करने का संकल्प था। उसने कई बार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, पर हर बार असफलता ही हाथ लगी।

हर असफलता के बाद उसके मित्र और आसपास के लोग उसे ताने देते—“यह तेरे बस की बात नहीं”, “कोई छोटा-मोटा काम कर ले।” धीरे-धीरे माधव का मन भी डगमगाने लगा।

एक दिन वह बहुत निराश होकर पास के एक मंदिर में गया। वहाँ उसने देखा कि एक वृद्ध पुजारी पत्थर पर धीरे-धीरे जल की बूंदें गिरा रहे थे। माधव ने आश्चर्य से पूछा, “महाराज, इससे क्या होगा?”

पुजारी मुस्कुराए और बोले, “बेटा, यह पत्थर बहुत कठोर है, लेकिन निरंतर गिरती जल की बूंदें एक दिन इसमें भी निशान बना देती हैं। यही धैर्य और निरंतर प्रयास की शक्ति है।”

माधव को यह बात सीधे हृदय में उतर गई। उसे समझ आ गया कि उसकी असफलता उसकी क्षमता की कमी नहीं, बल्कि उसके धैर्य की परीक्षा है।

उस दिन के बाद उसने न तो दूसरों की बातों पर ध्यान दिया, न ही परिणाम की चिंता की। वह रोज थोड़ा-थोड़ा पढ़ता, अपनी कमजोरियों को सुधारता और पूरे मन से प्रयास करता रहा।

समय बीतता गया। कई महीनों की मेहनत के बाद जब परिणाम आया, तो इस बार माधव ने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। वही लोग, जो कभी उसका मज़ाक उड़ाते थे, अब उसकी सराहना कर रहे थे।

माधव ने मुस्कुराते हुए केवल इतना कहा, “मैंने कुछ नया नहीं किया, बस रुकना नहीं सीखा।”

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*शिक्षा 👉*

धैर्य और निरंतर प्रयास से असंभव भी संभव हो जाता है। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि हम हार न मानें तो सफलता निश्चित रूप से हमारे कदम चूमती है।

28/03/2026

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♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️

*!!परिश्रम का विजय मार्ग!!*

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एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। वह पढ़ाई में ठीक था, लेकिन उसे जल्दी हार मानने की आदत थी। कोई भी कठिन काम सामने आता तो वह सोचता—“यह मुझसे नहीं होगा।”

एक दिन उसके स्कूल में एक प्रतियोगिता की घोषणा हुई। जो छात्र इसमें जीतता, उसे शहर के बड़े विद्यालय में पढ़ने का अवसर मिलता। अर्जुन भी इसमें भाग लेना चाहता था, लेकिन मन में डर था कि वह सफल नहीं हो पाएगा।

उसके गुरुजी ने उसकी झिझक समझ ली। उन्होंने अर्जुन को पास बुलाया और कहा,
“यदि तुम कोशिश ही नहीं करोगे, तो कैसे जानोगे कि तुम क्या कर सकते हो?”

गुरुजी ने उसे रोज थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करने की सलाह दी। अर्जुन ने इस बार ठान लिया कि वह हार नहीं मानेगा। शुरुआत में उसे बहुत कठिनाई हुई। कई बार वह थक जाता, गलतियाँ करता और निराश हो जाता। लेकिन हर बार गुरुजी की बात याद आती—“मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती।”

धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। जो प्रश्न पहले कठिन लगते थे, अब आसान लगने लगे। वह रोज अभ्यास करता और अपनी गलतियों को सुधारता।

प्रतियोगिता का दिन आ गया। अर्जुन ने पूरे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा दी। परिणाम आया तो वह विजेता घोषित हुआ। पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई।

अर्जुन को तब समझ आया कि असली जीत केवल प्रतियोगिता जीतना नहीं है, बल्कि खुद पर विश्वास करना और निरंतर मेहनत करना है।

उसने गुरुजी के चरण छूकर कहा,
“अगर आपने मुझे प्रेरित नहीं किया होता, तो मैं कभी प्रयास ही नहीं करता।”

गुरुजी मुस्कुराए और बोले,
“बेटा, सफलता का रास्ता हमेशा मेहनत और धैर्य से होकर जाता है।”

*शिक्षा 👉*

जो व्यक्ति खुद पर विश्वास रखकर निरंतर प्रयास करता है, वह असंभव को भी संभव बना सकता है।

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*
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25/03/2026

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*♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️*

*!!मूर्ख मित्र!!*
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प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। उसके पास एक वफादार बंदर था, जिसे वह अपने पुत्र की तरह मानता था। बंदर भी अपने स्वामी से बहुत प्रेम करता था और हर समय उसकी सेवा में तत्पर रहता था।
एक दिन व्यापारी थका हुआ था और विश्राम कर रहा था। बंदर उसके पास बैठकर उसकी रखवाली कर रहा था। तभी एक मक्खी बार-बार आकर व्यापारी के चेहरे पर बैठने लगी। बंदर उसे उड़ाता, पर वह फिर लौट आती। इससे बंदर को बहुत क्रोध आने लगा।
कुछ देर बाद बंदर ने सोचा—“यह मक्खी मेरे स्वामी को परेशान कर रही है, इसे हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहिए।” पास ही एक तलवार रखी थी। बंदर ने बिना सोचे-समझे तलवार उठा ली।
जैसे ही मक्खी फिर व्यापारी के चेहरे पर बैठी, बंदर ने पूरी ताकत से तलवार चला दी। मक्खी तो उड़ गई, लेकिन तलवार सीधे व्यापारी के शरीर पर लगी। बेचारा व्यापारी गंभीर रूप से घायल हो गया।
जब व्यापारी को होश आया तो उसने अपनी हालत देखी। उसे समझ में आ गया कि यह सब बंदर की मूर्खता का परिणाम है। बंदर रोने लगा, क्योंकि उसका उद्देश्य तो अपने स्वामी की रक्षा करना था, लेकिन उसकी नासमझी ने ही उसे संकट में डाल दिया।
कुछ समय बाद व्यापारी ने सोचा—“अज्ञानी और मूर्ख मित्र से अच्छा है कि बुद्धिमान शत्रु हो, क्योंकि मूर्ख मित्र अनजाने में ही बड़ा नुकसान कर देता है।”
इस घटना के बाद नगर में यह बात फैल गई कि केवल निष्ठा ही पर्याप्त नहीं होती, उसके साथ बुद्धि का होना भी अत्यंत आवश्यक है।

*शिक्षा 👉*
केवल प्रेम और निष्ठा काफी नहीं, बुद्धि और समझ भी जरूरी है।
मूर्ख मित्र, बुद्धिमान शत्रु से भी अधिक हानिकारक हो सकता है।
बिना सोचे-समझे किया गया कार्य हमेशा नुकसान ही देता है।

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

23/03/2026

*🙇‍♂️प्रेरक प्रसंग🙇‍♂️*

*!! चूहे दानी !!*
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बहुत समय पहले की बात है रहमान चाचा के यहाँ एक चूहा रहता था. हर दिन की तरह उस दिन भी बाज़ार से गाँव लौटते वक़्त चाचा झोले में कुछ सामान लेकर आये. झोले से बिस्कुट का पैकेट निकलते देख कर चूहे के मुंह में पानी आ गया, लेकिन ये क्या अगले ही पल उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई, चाचा आज बाकी सामन के साथ एक चूहेदानी भी खरीद कर लाये थे.

चूहा फ़ौरन भाग कर मुंडेर पर बैठे कबूतर के पास गया और घबड़ा कर कहने लगा– “यार, आज बड़ी गड़बड़ हो गई, चाचा मुझे मारने के लिए चूहे दानी लेकर आये हैं, मेरी मदद करो किसी तरह इस चूहेदानी को यहाँ से गायब कर दो!”

कबूतर मुस्कुराया और बोला, “पागल हो गया है, भला मुझे चूहेदानी से क्या खतरा, मैं इस चक्कर में नहीं पड़ने वाला. ये तेरी समस्या है तू ही निपट.”

चूहा और भी निराश हो गया और मुर्गो के पास हांफता हुआ पहुंचा, “भाई मेरी मदद करो, चाचा चूहेदानी लेकर आये हैं…”

मुर्गे दाना चुगने में मस्त थे. चूहे से कन्नी काटते हुए बोले, “अभी हमारा खाने का टाइम है, तू बाद में आना.”

अब चूहा भागा-भागा बकरे के पास पहुंचा और अपनी समस्या बताई.

बकरा जोर-जोर से हंसने लगा, “यार तू पागल हो गया है, चूहेदानी से तुझे खतरा है मुझे नहीं. और तेरी मदद करके मुझे क्या मिलेगा? मैं कोई शेर तो हूँ नहीं जो शिकारी मुझे जाल में फंसा लेगा और तू मेरा जाल कुतर कर मेरी जान बचा लेगा!”

और ऐसा कह कर बकरा जोर-जोर से हंसने लगा. बेचारा चूहा उदास मन से अपने बिल में वापस चला गया.

रात हो चुकी थी, चाचा और उनका परिवार खा-पीकर सोने की तैयारी कर रहे थे तभी खटाक की आवाज़ आई. चचा की छोटी बिटिया दौड़कर चूहेदानी की ओर भागी, सभी को लगा कि कोई चूहा पकड़ा गया है. कबूतर, मुर्गे और बकरे को भी लगा कि आदत से मजबूर चूहा खाने की लालच में मारा गया.

लड़की पलंग के नीचे हाथ डालकर चूहेदानी खींचेने लगी, तभी हिस्स की आवाज़ आयी… ये क्या चूहेदानी में चूहा नहीं बल्कि एक ज़हरीला सांप फंस गया था और उसने बिजली की गति से फूंफकार मारते हुए बिटिया को डस लिया.

बिटिया की चीख सुन सब वहां इकठ्ठा हो गए. रहमान चाचा सर पर पैर रख कर पड़ोस में रहने वाले ओझा के यहाँ भागे.

ओझा ने कुछ तंत्र-मन्त्र किया और बिटिया के हाथ पर एक लेप लगाते हुए बोले, बच्ची अभी खतरे से बाहर नहीं है, मुझे फ़ौरन कबूतर का कंठ लाकर दो मैं उसे उबालकर एक घोल तैयार करूँगा जिसे पीकर यह पूरी तराह स्वस्थ हो जायेगी.

ये सुनते ही रहमान चाचा कबूतर को पकड़ लाये. ओझा ने बिना देरी किये कबूतर का काम तमाम कर दिया.

बिटिया की हालत सुधरने लगी.

अगले दिन कई नाते-रिश्तेदार बिटिया का हाल-चाल जानने के लिए इकट्ठा हो गए. चाचा भी बिटिया की जान बचने से खुश थे और इसी ख़ुशी में उन्होंने सभी को मुर्गा खिलाने की ठानी. कुछ ही घंटों में मूढ़ों का भी काम तमाम हो गया.

ये सब देख कर बकरा भी काफी डरा हुआ था पर जब सभी मेहमान चले गए तो वो भी बेफिक्र हो गया. पर उसकी ये बेफिक्री अधिक देर तक नहीं रह पाई.

चची ने रहमान चाचा से कहा, “अल्लाह की मेहरबानी से आज बिटिया हम सबके बीच है, जब सांप ने काटा था तभी मैंने मन्नत मांग ली थी कि अगर बिटिया सही-सलामत बच गई तो हम बकरे की कुर्बानी देंगे. आप आज ही हमारे बकरे को कुर्बान कर दीजिये.

इस तरह कबूतर, मुर्गे और बकरा तीनो मारे गए और चूहा अभी भी सही-सलामत था.

*शिक्षा:-*
दोस्तों, जब हमारा दोस्त या पडोसी मुसीबत में हो तो हमें उसकी मदद करने की भरसक कोशिश ज़रूर करनी चाहिए. किसी समस्या को दूसरे की समस्या मान कर आँखें मूँद लेना हमें भी मुसीबत में डाल सकता है. इसलिए मुश्किल में पड़े मित्रों की मदद ज़रूर करें, ऐसा करके आप कहीं न कहीं खुद की ही मदद करेंगे.

22/03/2026

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*♨️ आज का प्रेरक प्रसंग ♨️*

*!! चुहिया का स्वयंवर !!*
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गंगा नदी के तट पर कुछ तपस्वियों का आश्रम था जहाँ याज्ञवल्क्य नाम के ऋषि रहते थे. एक दिन वो नदी के किनारे आचमन कर रहे थे. उसी वक़्त आकाश में एक बाज अपने पंजे में एक चुहिया को दबाये जा रहा था जो उसकी पकड़ से छूटकर ऋषि की पानी से भरी हथेली में आ गिरी. ऋषि ने उसे एक पीपल के पत्ते पर रखा और दोबारा नदी में स्नान किया. चुहिया अभी मरी नहीं थी इसलिए ऋषि ने अपने तप से उसे एक कन्या बना दिया और आश्रम में ले आये. अपनी पत्नी से कहा इसे अपनी बेटी ही समझकर पालना. दोनों निसंतान थे इसलिए उनकी पत्‍नी ने कन्या का पालन बड़े प्रेम से किया. कन्या उनके आश्रम में पलते हुए बारह साल की हो गयी तो उनकी पत्‍नी ने ऋषि से उसके विवाह के लिए कहा.

ऋषि ने कहा में अभी सूर्य को बुलाता हूँ. यदि यह हाँ कहे तो उसके साथ इसका विवाह कर देंगे ऋषि ने कन्या से पूछा तो उसने कहा “यह अग्नि जैसा गरम है. कोई इससे अच्छा वर बुलाइये.”

तब सूर्य ने कहा बादल मुझ से अच्छे हैं, जो मुझे ढक लेते हैं. बादलों को बुलाकर ऋषि ने कन्या से पूछा तो उसने कहा “यह बहुत काले हैं कोई और वर ढूँढिए.”

फिर बादलों ने कहा “वायु हमसे भी वेगवती है जो हमें उड़ाकर ले जाती है."

तब ऋषि ने वायु को बुलाया और कन्या की राय माँगी तो उसने कहा “पिताजी यह तो बड़ी चंचल है. किसी और वर को बुलाइए."

इस पर वायु बोली “पर्वत मुझसे अच्छा है, जो तेज़ हवाओं में भी स्थिर रहता है.”

अब ऋषि ने पर्वत को बुलाया और कन्या से पूछा. कन्या ने उत्तर दिया “पिताजी, ये बड़ा कठोर और गंभीर है, कोई और अच्छा वर ढूँढिए न.”

इस पर पर्वत ने कहा “चूहा मुझसे अच्छा है, जो मुझमें छेद कर अपना बिल बना लेता है.”

ऋषि ने तब चूहे को बुलाया और बेटी से कहा “पुत्री यह मूषकराज क्या तुम्हें स्वीकार हैं?”

कन्या ने चूहे को देखा और देखते ही वो उसे बेहद पसंद आ गया. उस पर मोहित होते हुए वो बोली “आप मुझे चुहिया बनाकर इन मूषकराज को सौंप दीजिये.”

ऋषि ने तथास्तु कह कर उसे फिर चुहिया बना दिया और मूषकराज से उसका स्वयंवर करा दिया.

*शिक्षा:-*
जन्म से जिसका जैसा स्वभाव होता है वह कभी नहीं बदल सकता.

*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*

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