ज्ञान कुंज Gyan kunj

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समर्थ और सक्षम भारत के निर्माण में संलग्न हम सब

26/05/2026

1 बैरल कच्चा तेल = 159 लीटर कच्चा तेल।
1 बैरल कच्चा तेल से निकलता है 43% पेट्रोल, 23% डीजल, 9% एटीएफ, 5% पेट कोक, बाकी 20% में मरीन फ्यूल, एस्फाल्ट और कई अन्य पेट्रोकेमिकल।
कच्चा तेल का इंडिया बास्केट है 106.26 डॉलर पर। यह भारत सरकार का दिया हुआ भाव है 22 मई का। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल आज 92 डॉलर पर गिरा हुआ है। सरकार ने अभी 22 मई के बाद का भाव अपडेट नहीं किया है। जब करेगी तो इंडिया बास्केट भी 100 डॉलर के नीचे आ जायेगा। पर अभी सुविधा के लिए 100 डॉलर ही मान लेते हैं।
अभी एक डॉलर में आ रहे हैं 95.35 रुपये। यह आज दोपहर डेढ़ बजे का भाव है। इस हिसाब से इंडिया बास्केट का एक बैरल कच्चा तेल हो जाता है 9,535 रुपये का।
लेकिन एक बैरल कच्चे तेल में 43% ही पेट्रोल आ रहा है, तो इसकी लागत निकलती है 4,100.05 रुपये। एक बैरल कच्चे तेल से पेट्रोल निकला 68.37 लीटर। यानी प्रति लीटर पेट्रोल की लागत बैठी 59.97 रुपये।
अब इसमें क्रूड को भारत लाने का खर्च जोड़ते हैं। यह खर्च इस बात पर निर्भर करता है कि तेल आ कहाँ से रहा है। अमेरिका के आदेश पर हम अब वेनेजुएला वाला तेल खरीदने जा रहे हैं। उसे आने में लगेंगे 56 दिन। लागत बैठेगी करीब 15%। रूस से तेल आने में लगते हैं 36 दिन। लागत बैठती है करीब 10%। पश्चिम एशिया से आने में लगते हैं 8-10 दिन। लागत बैठती है 5% से कम। इसे औसत में 10% मान लेते हैं। यानी अब 1 लीटर पेट्रोल की लागत हुई करीब 66 रुपये। क्रूड को रिफाइन करने की लागत आती है करीब 5%। यानी अब हो गया भाव 69.30 रुपये। पेट्रोल को रिफाइनरी से टंकी तक पहुँचाने की औसत दर है 25 पैसे लीटर। पेट्रोल पंप डीलरों का औसत मार्जिन है 4 रुपये लीटर। यानी एक-एक पाई लागत जोड़ने के बाद पेट्रोल का मूल भाव बैठ रहा है 73.55 रुपये लीटर।
लेकिन अभी गणित पूरा हो नहीं पाया है। पूरे देश में पेट्रोल में अब कम से कम 20% इथेनॉल है। इथेनॉल की भारत सरकार द्वारा तय औसत कीमत है 60 रुपये लीटर। इसे मिलाने के बाद प्रति लीटर गन्ना जूस मिश्रित पेट्रोल की कीमत आ रही है 70.84 रुपये। 26 पैसे का बेनेफिट ऑफ डाउट दे देते हैं। गोल-मटोल 71 रुपये लीटर।
अब अपने-अपने शहर में पेट्रोल की कीमत देख लीजिए। 71 रुपये से ऊपर जो भी आप भर रहे हैं, वो तेल कंपनियों के मुनाफे में और केंद्र-राज्य सरकारों के खजाने में जा रहा है। जैसे हमारे यहाँ अब भाव चल रहा है 113.54 रुपये प्रति लीटर। यानी हर लीटर पेट्रोल पर हम बिहार वासी 42-43 रुपये सरकारों को और तेल कंपनियों को दे रहे हैं।

ये हो गया मोटा-मोटी गणित। अब कुछ महीने पीछे चलते हैं। इस साल जनवरी में कच्चा तेल था 60 डॉलर पर। रुपया था 1 डॉलर के बराबर 92 पर। मतलब उस समय कच्चे तेल की ढुलाई, रिफाइनिंग, टंकी तक पहुँचाने की लागत, डीलर मार्जिन, इथेनॉल 20% सबको मिलाने के बाद लागत बैठ रही थी प्रति लीटर 40-41 रुपये। उस समय हमारे यहाँ पेट्रोल मिल रहा था 105 रुपये का। यानी तब सरकारी तेल कंपनियाँ और सरकारें मिलकर हर लीटर पेट्रोल से लगभग 65 रुपये खा रही थीं। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ फरवरी 2022 में। उस समय कच्चा तेल अभी की तरह ही भागा था। फिर 4-6 महीने में नीचे आ गया था। उसके बाद मार्च 2026 से पहले कभी 80 डॉलर के पार नहीं गया था। इस दौरान कई बार तो 40-50 डॉलर तक भी गिरा था। मतलब साढ़े तीन साल सरकार और सरकारी कंपनियों ने आम लोगों की जेब पर डाका डालकर हर लीटर पेट्रोल से 65 रुपये कमाये।

अभी इंडिया बास्केट का क्रूड मार्केट रेट से महँगा है, इसके लिए जिम्मेदार भी हमारी ही सरकार है। ट्रंप के आदेश के चलते रूसी तेल पर मिलने वाला डिस्काउंट चला गया। अब ट्रंप के आदेश पर वेनेजुएला से तेल खरीदेंगे, जिसे लाने में भी खर्च अधिक बैठेगा और उसे रिफाइन करने की लागत भी अधिक बैठेगी। यदि हमने अपनी विदेशी नीति को ट्रंप के हवाले नहीं किया होता, हमारा इंडिया बास्केट अब भी मार्केट रेट से सस्ता होता। लागत बढ़ने का दूसरा बड़ा कारण है कमजोर रुपया। दिसंबर में 1 डॉलर बराबर 89 रुपये था। इस महीने रुपया 97 तक गिरा। अब रिजर्व बैंक रोज 1-2 बिलियन डॉलर बेच रहा है, तो कुछ राहत मिली है और 95.35 तक आया है। लेकिन यह राहत भी चार दिनों की चाँदनी है। रुपया क्यों कमजोर हो रहा है? एससी गर्ग से पनगढ़िया तक कई ऐसे अर्थशास्त्री रुपये की कमजोरी के लिए कमजोर आर्थिक बुनियाद को कारण बता रहे हैं, जो इसी सरकार के साथ जुड़े रहे हैं। आरबीआई के पूर्व गवर्नर सुब्बाराव भी इसी तरह के कारण बता रहे हैं। कई इंडीपेंडेंट एनालिस्ट भी यही कारण गिना रहे हैं। मतलब रुपये की कमजोरी इस कारण नहीं है कि डॉलर जिम जाने लगा है। कमजोरी का वास्तविक कारण है कि रुपया कुपोषण का शिकार हो गया है। पाकिस्तानी रुपया, चीनी युआन, बांग्लादेशी टका... इन सबके सामने भी पिछले 2-4 महीने में रुपया 10-20% कमजोर हुआ है। कुपोषण क्यों आया? मोदीजी स्वयं बता चुके हैं पहले कि रुपया केंद्र सरकार की मूर्खतापूर्ण नीतियों से गिरता है।

सरल शब्दों में:- अभी भारत के लिए तेल बाकी दुनिया से महँगा होने के 2 कारण हैं। पहला इंडिया बास्केट में महँगा क्रूड, दूसरा कुपोषित रुपया। दोनों के लिए जिम्मेदार कौन? ऑफकोर्स नेहरू या मनमोहन सिंह नहीं, बल्कि वही, जो 12 साल से सरकार चला रहे हैं।

अभी दाम नहीं भी बढ़ाये जाते तो सरकारी तेल कंपनियाँ और सरकारें मिलकर हर लीटर पेट्रोल से करीब 35 रुपये कमातीं। लेकिन मुफ्त की रेवड़ियाँ बाँटने के लिए पैसे चाहिए, अपने नालायक बेटों-रिश्तेदारों को करोड़पति बनाने के लिए पैसे चाहिए, जिन पूँजीपतियों ने चुनावी चंदे दिये, उनका एहसान उतारने के लिए पैसे चाहिए। ये पैसे देगा कौन? निश्चित हमारे और आपके जैसे लोग, जो इन प्रिविलेज्ड हरामखोरों के लिए बस कॉक्रोच बराबर हैसियत रखते हैं।

(डेटा सरकारी पीपीएसी, सीसीआईएल, ओएमसीज से उठाये गये हैं। फोटो एनडीटीवी प्रॉफिट का है। कोई भक्त कुतर्क न करे। डेटारिच पोस्ट है। इसे डेटा से काट सकें तो स्वागत है। सरकारी दुमछल्ले फैक्टचेकर्स से फैक्टचेक करने का विशेष अनुरोध रहेगा। बाकी लोग इस पोस्ट को श्रद्धानुसार कॉपी-पेस्ट-शेयर करें। मुझे क्रेडिट देना-न देना आपकी श्रद्धा। नेट दो घंटे की मेहनत लगी है इसमें। अब कल इसका दूसरा हिस्सा लिखूँगा, उसमें डेटा से ही बताऊँगा किस तरह मोदी सरकार सुनियोजित तरीके से सरकारी तेल कंपनियों को बर्बाद कर एक खास पूँजीपति को बढ़ाने में लगी हुई है।)

साभार सुभाष सिंह सुमन जी

23/05/2026

क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि आप बिना कोई ख़ास मेहनत वाला काम किये भी हमेशा थके थके महसूस करते हैं...
फिर आप Zeigarnik Effect का शिकार हो सकते हैं.... और आपको ये ध्यान से पढ़ना चाहिए...!

सन् 1927 में, रूस की एक युवा शोधकर्ता दोपहर का भोजन करने बर्लिन के एक कैफ़े में गई। वहाँ उसने वेटर के व्यवहार में एक अजीब बात देखी।

कुछ ही हफ्तों बाद, यही साधारण-सी लगने वाली घटना 20वीं सदी के मनोविज्ञान के सबसे प्रसिद्ध खोजों में से एक में बदल गई।

आज यही संयोग यह समझाने में मदद करता है कि क्यों बहुत-से वयस्क लोग बिना कोई खास कठिन काम किए भी हल्की लेकिन लगातार थकान महसूस करते हैं।

उस शोधकर्ता का नाम ब्लूमा ज़िगार्निक था। वह 26 वर्ष की थीं। वह बर्लिन आई थीं ताकि उस समय के प्रभावशाली मनोवैज्ञानिक कुर्ट लेविन की प्रयोगशाला में अध्ययन कर सकें।

लेविन इस बात का अध्ययन कर रहे थे कि वास्तविक रोज़मर्रा की जिंदगी में मानव मन कैसे काम करता है, न कि केवल कृत्रिम प्रयोगशाला परिस्थितियों में।

इसी दृष्टिकोण ने ज़िगार्निक को ऐसी बात देखने की ओर प्रेरित किया, जिसने बाद में हमारी स्मृति और ध्यान (attention) की समझ को बदल दिया।

उस शाम, ज़िगार्निक अपने कुछ साथियों के साथ एक कैफ़े गईं। उन्होंने काफी सारा खाना ऑर्डर किया। वेटर ने बिना कागज़-पेन के सभी ऑर्डर याद रखे और एक भी गलती किए बिना सही तरीके से सब कुछ परोस दिया।

जब बिल चुका दिया गया और सभी जाने लगे, तभी दरवाज़े पर ज़िगार्निक को याद आया कि वह मेज़ पर कुछ भूल गई हैं। वह वापस लौटीं।

उन्होंने उसी वेटर से पूछा:
“क्या आप बता सकते हैं कि हमने आज क्या-क्या ऑर्डर किया था?”

वेटर ने उन्हें हैरानी से देखा। उसे ऑर्डर की कोई भी जानकारी याद नहीं थी।

कुछ मिनट पहले तक वह हर चीज़ को पूरी सटीकता से याद रखे हुए था। लेकिन जैसे ही ऑर्डर पूरा हुआ और बिल चुक गया, वह सारी जानकारी उसकी याददाश्त से जैसे गायब हो गई।

यहीं से ज़िगार्निक के मन में एक बड़ा शोध प्रश्न पैदा हुआ:
मस्तिष्क अधूरे कामों को क्यों याद रखता है, और पूरे हो चुके कामों को क्यों भूल जाता है?

प्रयोगशाला लौटकर, ज़िगार्निक ने एक सरल प्रयोग तैयार किया।

उन्होंने प्रतिभागियों को लगभग 20 अलग-अलग कार्य दिए। उनमें से आधे कार्य पूरे करने दिए गए, जबकि बाकी आधे कार्यों को बीच में ही रोक दिया गया और उन्हें दूसरे कार्य पर भेज दिया गया।

बाद में उन्होंने उनसे पूछा:
“आज आपने कौन-कौन से कार्य किए? याद करके बताइए।”

परिणाम हर बार लगभग एक जैसे और स्पष्ट थे।

प्रतिभागियों को अधूरे छोड़े गए कार्य, पूरे किए गए कार्यों की तुलना में लगभग दोगुना बेहतर याद रहे।

जो काम अधूरे रह गए, मस्तिष्क उन्हें आसानी से नहीं छोड़ता था। वे स्मृति और ध्यान का एक हिस्सा घेरे रहते थे, जैसे दिमाग उन्हें पूरा करने के लिए वापस बुला रहा हो।

ज़िगार्निक ने अपने निष्कर्ष 1927 में एक जर्मन मनोविज्ञान पत्रिका में प्रकाशित किए। आज इस घटना को ज़िगार्निक प्रभाव (Zeigarnik Effect) कहा जाता है।

लगभग सौ साल बीत चुके हैं। आज का इंसान ऐसी परिस्थितियों में जी रहा है, जिनकी ज़िगार्निक शायद कल्पना भी नहीं कर सकती थीं।

उसके पास एक साथ दर्जनों अधूरे काम होते हैं—कोई अधूरा संदेश, टली हुई बातचीत, अधूरा प्रोजेक्ट, परिवार की कोई अनसुलझी समस्या।

ऐसी हर अधूरी चीज़ मन के पीछे कहीं न कहीं जगह घेरती रहती है, ठीक वैसे ही जैसे वेटर के दिमाग में अधूरा ऑर्डर था। और जितनी ज़्यादा ऐसी चीज़ें होती हैं, सामान्य जीवन जीने के लिए उतनी कम मानसिक ऊर्जा बचती है।

जब लोग कहते हैं:
“मैं हमेशा थका हुआ महसूस करता हूँ”
तो अक्सर ज़िगार्निक प्रभाव याद आता है।

वे ठीक से सोते हैं, छुट्टियाँ लेते हैं, कोई बहुत भारी काम भी नहीं करते… फिर भी थकान नहीं जाती।

अक्सर समस्या आराम की कमी नहीं होती, बल्कि अधूरे कामों की अधिकता होती है—ऐसे कार्य, बातचीतें और निर्णय जो सालों तक मन की पृष्ठभूमि में पड़े रहते हैं।

इनमें से हर एक मानसिक ऊर्जा का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा खाता है, और समय के साथ मिलकर गहरी थकान और मानसिक क्षय का कारण बन सकता है।

Ajai Singh

29/04/2026

भारत की ऊर्जा कहानी आज एक नए शिखर पर पहुँच गई है — और यह सिर्फ एक आँकड़ा नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की गर्जना है!

कल भारत की पीक पावर डिमांड 260 गीगावॉट तक पहुँच गई — एक नया ऑल-टाइम रिकॉर्ड।
वो भी तब, जब उत्तर भारत 47°C की झुलसा देने वाली गर्मी से गुजर रहा था।

लेकिन असली बात सुनिए —
ग्रिड डटा रहा। कोई ब्लैकआउट नहीं।
यह एक साधारण लाइन नहीं है, यह इंजीनियरिंग, प्लानिंग और निष्पादन की ऐतिहासिक जीत है, जिसे हर कोई शायद समझ न पाए।

कुछ साल पहले की तस्वीर याद कीजिए—
बिजली की कमी आम बात थी, लोड शेडिंग रोजमर्रा का हिस्सा था।
2023 में 243 GW की डिमांड पर कई राज्य संघर्ष कर रहे थे।

और आज, अप्रैल 2026 में —
260 GW की मांग, और सिस्टम बिना डगमगाए खड़ा है।

तो आखिर बदला क्या?

⚡ 26.5 GW नई क्षमता सिर्फ FY26 में जोड़ी गई — एक दशक का सबसे बड़ा विस्तार
☀️ 18 GW सोलर पावर — स्वच्छ ऊर्जा का मजबूत योगदान
🔌 नई HVDC ट्रांसमिशन कॉरिडोर — जहाँ बिजली ज्यादा है, वहाँ से जहाँ कमी है, वहाँ तक seamless सप्लाई
🔋 बैटरी स्टोरेज सिस्टम्स — पीक लोड के दौरान सुरक्षा कवच

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती…

⚠️ मार्जिन बेहद पतला है।
भारत का ग्रिड लगभग 270 GW के लिए डिज़ाइन है — और हम 260 GW छू चुके हैं।
मतलब 96% उपयोग क्षमता पर सिस्टम चल रहा है।
एक और हीटवेव या किसी बड़े प्लांट की अनपेक्षित खराबी — और बफर खत्म।

यही वजह है कि पावर सेक्टर के स्टॉक्स नई ऊँचाइयों पर हैं।
मार्केट वो देख रहा है जो हेडलाइंस नहीं दिखा रहीं—

💰 अगले 5 सालों में $150 बिलियन का निवेश चाहिए सिर्फ इस रफ्तार को बनाए रखने के लिए।

क्योंकि आगे क्या आ रहा है?
डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, सेमीकंडक्टर फैब्स, इंडस्ट्रियल ग्रोथ —
इन सबकी नींव एक ही चीज़ पर टिकी है:

⚡ 24x7 भरोसेमंद बिजली

और सच यही है —
भारत की ग्रिड ही वो backbone है, जो पूरे विकास को थामे हुए है।

14/04/2026

फिंगरप्रिंट से किसी व्यक्ति को पहचानना एक बहुत सामान्य प्रक्रिया है। क्या हो अगर कोई 64 किलोमीटर दूर से किसी की धड़कन सुनकर उसे खोज निकाले? यह किसी विज्ञान-कथा का दृश्य प्रतीत होता है, पर यह पूर्णतः सत्य है।

मरीका का एक एफ-15 ईगल स्ट्राइक फाइटर जेट ईरान की सीमा में गिर गया। यह लड़ाकू विमान इतना आधुनिक था कि राडार को भी चकमा दे सकता था, पर गर्मी को पकड़ने वाली एक इंफ्रारेड मिसाइल ने इसे अपना निशाना बना लिया। विमान नष्ट हो गया, लेकिन पायलट किसी प्रकार अपना जीवन बचाकर एक जंगली और पहाड़ी क्षेत्र में छिप गया।

विशाल पहाड़ों के बीच एक अकेले व्यक्ति को खोजना भूसे के ढेर में सुई खोजने के समान था। अपने उस पायलट को सुरक्षित वापस लाने के लिए जिस तकनीक का उपयोग किया गया, वह क्वांटम फिजिक्स का एक अद्भुत चमत्कार है।

इस पूरी घटना के पीछे के विज्ञान को समझना बहुत रोचक है। जब किसी तार से बिजली गुजरती है, तो उसके भीतर मौजूद इलेक्ट्रॉन आपस में टकराते हैं। इससे रुकावट उत्पन्न होती है और कुछ ऊर्जा नष्ट हो जाती है। वर्ष 1911 में एच. के. ओन्स नामक वैज्ञानिक ने एक प्रयोग किया। उन्होंने तापमान को घटाकर शून्य केल्विन यानी माइनस 273 डिग्री सेल्सियस कर दिया। इस अत्यधिक ठंड में तार की सारी रुकावट समाप्त हो गई और करंट बिना किसी बाधा के बहने लगा। इसे विज्ञान की भाषा में 'सुपरकंडक्टिविटी' कहा जाता है।

बाद में ब्रायन जोसेफसन ने दो सुपरकंडक्टर के बीच एक ऐसा पदार्थ रखा जिससे करंट नहीं गुजर सकता था। फिर भी, क्वांटम टनलिंग प्रभाव के कारण इलेक्ट्रॉन उस पार चले गए और इस खोज के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। इसी तकनीक को मिलाकर एक नया उपकरण तैयार हुआ जिसे 'स्क्विड' (SQUID) कहते हैं। यह उपकरण चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले अत्यंत सूक्ष्म बदलाव को भी पकड़ सकता है।

हमारा शरीर भी एक चलता-फिरता सर्किट है। हमारे हृदय में भी इलेक्ट्रिक पल्स उत्पन्न होती है, जिससे वह धड़कता है। विज्ञान का सीधा नियम है कि जब भी इलेक्ट्रिक करंट बहता है, तो उसके चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र बन जाता है। हमारे हृदय का भी अपना एक अत्यंत सूक्ष्म चुंबकीय क्षेत्र होता है जिसे पढ़ा जा सकता है।

समस्या यह थी कि 'स्क्विड' को काम करने के लिए अत्यधिक ठंडे तापमान की आवश्यकता होती है और मानव हृदय का चुंबकीय क्षेत्र बहुत ही कमजोर होता है। इस बाधा को दूर करने के लिए प्रयोगशाला में एक कृत्रिम हीरा बनाया गया। इसे बनाते समय कार्बन परमाणुओं के बीच एक नाइट्रोजन परमाणु बैठाकर पास में एक खाली स्थान छोड़ दिया गया। इसे 'एनवी डायमंड' कहते हैं। यह उपकरण इतना शक्तिशाली है कि इसे किसी ठंडे तापमान की आवश्यकता नहीं होती और यह सामान्य तापमान पर भी फेम्टो टेस्ला (10 की घात माइनस 15) तक के अत्यंत क्षीण चुंबकीय क्षेत्र को पढ़ सकता है।

अमेरिकी डेल्टा फोर्स ने इसी 'एनवी डायमंड' सेंसर को एक ड्रोन में लगाया और उसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जोड़ दिया। जंगल और पहाड़ों में अनगिनत पशु-पक्षियों की धड़कनें भी गूंज रही थीं। एआई का मुख्य कार्य उस पूरी भीड़भाड़ से केवल उस अमेरिकी पायलट के हृदय के सिग्नल को पहचानना था।

ड्रोन ने उड़ान भरी और पूरे 64 किलोमीटर दूर से ही उसने पायलट के हृदय के चुंबकीय क्षेत्र को पकड़ लिया। हर व्यक्ति के हृदय की धड़कन का पैटर्न फिंगरप्रिंट की तरह एकदम अलग होता है। शरीर की बनावट और मांसपेशियों के कारण यह एक विशिष्ट सिग्नल बन जाता है जिसे एआई ने तुरंत पहचान लिया।

यह केवल एक सैन्य अभियान की सफलता नहीं थी। यह क्वांटम तकनीक और चिकित्सा विज्ञान का वह रूप है जो भविष्य को पूरी तरह बदल देगा। वर्ष 2025 को 'इंटरनेशनल क्वांटम ईयर' भी घोषित किया गया है। वह दिन दूर नहीं जब बिना शरीर को छुए, दूर बैठे ही किसी भी व्यक्ति की पूरी मेडिकल रिपोर्ट तैयार हो जाएगी।

10/04/2026

कोविड का वह दौर याद कीजिए जब भारत ने अपने संसाधन खोलकर विश्व भर में फ्री वैक्सीन भेजी थी। उस समय कई लोगों के मन में यह प्रश्न था कि देश के बाहर बिना कोई मूल्य लिए वैक्सीन बांटने का क्या औचित्य है। लेकिन कूटनीति का पहिया बड़ा गोल होता है। जो बीज आप आज बोते हैं, उसका फल भविष्य में कभी न कभी अवश्य मिलता है।

आज पूरे विश्व में ऊर्जा संसाधनों की आपूर्ति को लेकर भारी उथल-पुथल मची है। हमारे पास तेल का तो पर्याप्त भंडार है, लेकिन गैस की आपूर्ति को लेकर थोड़ी उलझन खड़ी हो गई। हमारा सबसे बड़ा गैस प्रदाता कतर रहा है, लेकिन वहां कुछ स्थानीय और वैश्विक अड़चनों के कारण गैस का आना थोड़ा धीमा पड़ गया। कतर को अपनी पुरानी गति में लौटने में अभी समय लग सकता है।

ऐसे कठिन समय में जब हमें एक भरोसेमंद साथी की तुरंत आवश्यकता थी, तब कुछ ऐसा हुआ जिसने पुरानी यादें ताज़ा कर दीं। अफ्रीका के कई देश हमारे समर्थन में खड़े हो गए। नाइजीरिया, अल्जीरिया, अंगोला, कैमरून और मोजाम्बिक जैसे देशों ने बिना किसी विलंब के भारत के साथ गैस आपूर्ति के नए कॉन्ट्रैक्ट कर लिए।

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे अच्छी बात यह है कि इन अफ्रीकी देशों से भारत तक आने वाला समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित है। मध्य पूर्व के क्षेत्रों में जो भी तनाव चल रहा है, उसका इस नए मार्ग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला। अब लाखों टन गैस बिना किसी बाधा के हमारे देश की ओर आ रही है।

यही वह बिंदु है जहां अतीत के वे कार्य अपना परिणाम दिखा रहे हैं। जब भारत ने महामारी के भयंकर प्रकोप के दौरान इन अफ्रीकी देशों को 'वैक्सीन मैत्री' के तहत संजीवनी भेजी थी, तब वहां अनगिनत प्राण बचे थे। उन देशों ने उस निस्वार्थ कार्य के लिए भारत का गहरा आभार प्रकट किया था।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कब कौन सा कदम काम आ जाए, कहा नहीं जा सकता। आज जब भारत को अपनी गैस की डिमांड पूरी करनी थी, तो वही देश एक सच्चे मित्र की भांति बिना किसी देरी के साथ आ गए।

यह केवल गैस का कोई साधारण लेन-देन नहीं है, बल्कि एक बहुत बड़ी रणनीतिक विजय है। अफ्रीका और साउथ मरीका के कई देशों के बीच भारत ने अपनी स्थिति बहुत सुदृढ़ कर ली है। आने वाले कल की अत्याधुनिक तकनीक के लिए जो रेयर अर्थ मटेरियल, मैग्नेट, सिलिकॉन या अन्य खनिज चाहिए, उनके लिए भी इन देशों के साथ जो नए एग्रीमेंट हुए हैं, वह भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा की ओर उठाया गया एक ऐसा कदम है जिसका प्रभाव अब स्पष्ट दिखने लगा है।

08/04/2026

अमेरिका, जापान और यूरोप ने जिस तकनीक पर 50 बिलियन डॉलर पानी की तरह बहा दिए और अंत में हार मान ली, भारत ने उसे सच कर दिखाया है। यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। पश्चिमी देश मानते थे कि यह तकनीक असंभव है और इसे सुरक्षित रखना उनके बस की बात नहीं है।

बात हो रही है फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की। तमिलनाडु के कलपक्कम में भारत का 500 मेगावाट का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अब क्रिटिकल हो चुका है। प्रधानमंत्री ने हाल ही में भारत के परमाणु कार्यक्रम के इस दूसरे स्टेज के शुरू होने की आधिकारिक घोषणा की है।

पश्चिमी देश इस तकनीक से बहुत घबराते थे क्योंकि इसमें लिक्विड सोडियम का उपयोग कूलेंट के रूप में होता है। सोडियम हवा के संपर्क में आते ही तुरंत आग पकड़ लेता है और पानी के संपर्क में आने पर इसमें भीषण विस्फोट होता है। रूस के रिएक्टर में ऐसे कई लीकेज और आग लगने की घटनाएं अतीत में हो चुकी हैं। लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने इस खतरे को पूरी तरह से नियंत्रित करना सीख लिया है।

इस फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की सबसे बड़ी विशेषता इसका काम करने का तरीका है। यह जितना ईंधन इस्तेमाल करता है, उससे कहीं अधिक ईंधन का निर्माण खुद करता है।

इस पूरी योजना के पीछे महान वैज्ञानिक होमी भाभा का विजन है। उन्होंने भारत के लिए एक थ्री स्टेज न्यूक्लियर प्रोग्राम तैयार किया था। पहले स्टेज में नेचुरल यूरेनियम का उपयोग करके ऊर्जा और प्लूटोनियम बनाया जाता है। भारत पिछले 70 वर्षों से यही काम कर रहा है।

अब हम दूसरे स्टेज में प्रवेश कर चुके हैं। इस स्टेज में पहले स्टेज से निकले प्लूटोनियम का उपयोग इस नए रिएक्टर को चलाने के लिए किया जाएगा। और सबसे महत्वपूर्ण बात, इसी रिएक्टर के अंदर थोरियम को रखा जाएगा ताकि वह यूरेनियम 233 में बदल सके।

भारत के पास प्राकृतिक यूरेनियम बहुत कम मात्रा में है, लेकिन थोरियम का विशाल भंडार है। विश्व का लगभग 16 से 17 प्रतिशत थोरियम अकेले भारत के समुद्री तटों, जैसे केरल, तमिलनाडु और ओडिशा की रेत में बिखरा पड़ा है।

थोरियम सीधे तौर पर कोई ऊर्जा नहीं देता। इसे यूरेनियम 233 में बदलना पड़ता है और यह काम केवल दूसरे स्टेज के रिएक्टर ही कर सकते हैं। जब हमारे पास पर्याप्त मात्रा में यूरेनियम 233 जमा हो जाएगा, तब भारत अपने तीसरे स्टेज के रिएक्टर शुरू करेगा।

अनुमान है कि हमारे पास इतना थोरियम है कि हम आने वाले 700 वर्षों तक बिना किसी रुकावट के अपनी ऊर्जा आवश्यकताएं पूरी कर सकते हैं। हमें कोयले या पेट्रोल के लिए किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

हालांकि यह सब रातोंरात नहीं होने वाला है। पहले स्टेज से दूसरे स्टेज तक पहुंचने में हमें सात दशक लग गए। तीसरे स्टेज तक जाने के लिए आवश्यक यूरेनियम 233 जमा करने में अभी 30 से 40 वर्ष और लगेंगे। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसे अब एक ठोस गति मिल चुकी है।

ऊर्जा के अतिरिक्त इसका एक रणनीतिक पहलू भी है। इस प्रक्रिया में बहुत उच्च गुणवत्ता वाला प्लूटोनियम भी बनता है। यह वही प्लूटोनियम है जिसका उपयोग आधुनिक न्यूक्लियर वेपन बनाने में होता है। यह एक रिएक्टर हर साल इतना प्लूटोनियम बना सकता है जिससे दर्जनों परमाणु हथियार बन सकें।

लेकिन भारत का मुख्य उद्देश्य हथियार बनाना नहीं, बल्कि यूरेनियम 233 का उत्पादन बढ़ाना है। यह हमारी ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्थायी समाधान है। कलपक्कम में कामिनी रिसर्च रिएक्टर के रूप में हमारे पास पहले से ही यूरेनियम 233 से चलने वाला एक छोटा मॉडल मौजूद है जो सफलता से काम कर रहा है।

अनेक दशकों से भारत का यह स्वप्न चुपचाप आकार ले रहा था। आर्थिक बाधाओं और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद यह थोरियम प्रोजेक्ट चलता रहा। आज जब इस दूसरे स्टेज ने काम करना शुरू कर दिया है, तो यह केवल एक ढांचा मात्र नहीं है। यह उस महाशक्ति बनने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है जहां असीमित ऊर्जा का स्रोत हमारे अपने देश की मिट्टी और रेत में छिपा है।

Photos from ज्ञान कुंज Gyan kunj's post 04/04/2026

होर्मुज बंद? कोई बात नहीं! भारत ने तेल-गैस की सप्लाई को तीन वैकल्पिक रूट्स से लॉक कर दिया है

ईरान-अमेरिका-इजराइल का युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा। ट्रंप प्रशासन ने साफ संकेत दे दिए हैं कि ईरान पर हमले और तेज होंगे। नतीजा? ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया वो संकरा गला, जिससे दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल गुजरता है। कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं (ब्रेंट क्रूड 107 डॉलर प्रति बैरल के पार), कई देशों में पेट्रोल-डीजल का संकट खड़ा हो गया है, और ग्लोबल एनर्जी मार्केट में आग लगी हुई है।

लेकिन भारत अभी भी अपेक्षाकृत स्थिर है क्योंकि पिछले कुछ सालों में भारत ने अपनी तेल निर्भरता को होर्मुज से काफी हद तक अलग कर लिया है। आज भारत कच्चा तेल लगभग 40 देशों से आयात करता है, और कुल आयात का करीब 60-70% अब होर्मुज के बाहर के रूट्स से आ रहा है (पहले यह हिस्सा 55% के आसपास था)। होर्मुज वाली हिस्सेदारी घटकर 30-40% रह गई है।

ये कोई संयोग नहीं, बल्कि स्मार्ट डाइवर्सिफिकेशन का नतीजा है रूस से सस्ता तेल, अफ्रीका-अमेरिका से बैकअप, और लंबे लेकिन सुरक्षित समुद्री मार्ग।

भारत के तीन मुख्य वैकल्पिक रूट्स जो होर्मुज की किल्लत को बेअसर कर रहे हैं:

1. रूस से लाल सागर-सuez नहर-बाब अल-मंदेब रूट जो सबसे मजबूत बैकअप है
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बन गया है । रूसी कच्चा तेल नोवोरोसिएस्क (काला सागर) या बाल्टिक सागर के बंदरगाहों से लोड होता है। जहाज तुर्की जलडमरूमध्य पार कर भूमध्य सागर में घुसते हैं, फिर सुएज नहर से लाल सागर में, बाब अल-मंदेब से अरब सागर में और सीधे भारत के पश्चिमी तट पर लगते हैं ।
यात्रा में 15-20 दिन लगते हैं जो करीब 4200 नॉटिकल मील है ।
लेकिन ये रूट भारत की ऊर्जा सुरक्षा का एक मजबूत स्तंभ बन चुका है भले ही रेड सी में तनाव हो, कभी-कभी जहाज केप ऑफ गुड हॉप घूमकर भी आते हैं।

2. बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य
1869 में सuez नहर बनने के बाद यह रूट वैश्विक व्यापार का धुरी बन गया। लाल सागर को अदन की खाड़ी (अरब सागर) से जोड़ता है, जिससे यूरोप-एशिया की दूरी हजारों किलोमीटर कम हो जाती है।
अफ्रीका और कुछ यूरोपीय/मध्य पूर्वी सप्लाई इसी रास्ते से भारत पहुंचती है। हालांकि हूती हमलों के कारण कभी-कभी जहाजों को लंबा चक्कर लगाना पड़ता है, लेकिन भारत के लिए यह अभी भी महत्वपूर्ण वैकल्पिक गलियारा है।

3. अफ्रीका (नाइजीरिया, अंगोला) और अमेरिका (USA) रूट केप ऑफ गुड हॉप वाला लंबा लेकिन सुरक्षित सफर है
पश्चिम अफ्रीका से तेल केप ऑफ गुड हॉप घूमकर हिंद महासागर में आता है। अमेरिका से तेल अटलांटिक महासागर पार कर सीधे भारत पहुंचता है।
ये रूट्स होर्मुज से पूरी तरह अलग हैं। तेल मुख्य रूप से जामनगर, वाडिनार, मुंबई, कोच्चि, पारादीप, विशाखापत्तनम जैसे बड़े बंदरगाहों पर उतरता है।
नाइजीरिया-अंगोला और USA से बढ़ती खरीद ने भी tttdxzzzzzzf को होर्मुज के दबाव से काफी राहत दी है।

होर्मुज अभी भी अहम है, लेकिन अब 'सब कुछ' नहीं है।

संजय अग्रवाल जी

02/04/2026

एक फ्रेंच नौसेना अधिकारी सुबह उठता है, जूते पहनता है, स्मार्ट वॉच चालू करता है और जॉगिंग पर निकल जाता है। उसे लगता है यह बस एक साधारण रन है… लेकिन उसी दौड़ ने 4 अरब डॉलर के परमाणु एयरक्राफ्ट कैरियर की लोकेशन दुनिया के सामने खोल दी।

13 मार्च को, फ्रांस के एयरक्राफ्ट कैरियर Charles de Gaulle पर तैनात एक अधिकारी ने फिटनेस ऐप Strava पर 7 किलोमीटर की रन रिकॉर्ड की। प्रोफाइल पब्लिक था… और बस यही एक गलती काफी थी। कुछ ही घंटों में उसकी पूरी लोकेशन इंटरनेट पर लाइव थी।

फिर एंट्री होती है Le Monde की। उन्होंने इस डेटा को सैटेलाइट इमेजरी से मैच किया… और जो सामने आया, वो चौंकाने वाला था। फ्रांस का सबसे ताकतवर युद्धपोत साइप्रस के उत्तर-पश्चिम में, तुर्की तट से करीब 100 किलोमीटर दूर खड़ा था।

और ये कोई एक बार की चूक नहीं थी।

उसी अकाउंट ने फरवरी में कैरियर की लोकेशन Cherbourg के पास ट्रैक की… फिर कुछ ही दिनों में Copenhagen के पास। मतलब, एक फिटनेस ऐप हफ्तों से एक न्यूक्लियर वॉरशिप की मूवमेंट को चुपचाप दुनिया के सामने रख रहा था।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती…

जनवरी 2025 में, फ्रांसीसी पनडुब्बियों की पेट्रोलिंग डिटेल्स भी इसी तरह लीक हो गई थीं। उससे पहले, Le Monde ने खुलासा किया था कि Strava फ्रांस, अमेरिका और रूस के राष्ट्रपतियों की सुरक्षा में लगे बॉडीगार्ड्स की लोकेशन तक ट्रैक कर रहा था।

और ये सिर्फ फ्रांस की कहानी नहीं है।

2018 में, Strava की “हीटमैप” फीचर ने दुनिया भर के सीक्रेट मिलिट्री बेस उजागर कर दिए थे , अफगानिस्तान और सीरिया जैसे इलाकों में सैनिकों की रनिंग और पेट्रोलिंग रूट साफ दिखने लगे थे।
इसी तरह, कुछ साल पहले अमेरिकी सैनिकों की फिटनेस ट्रैकिंग से इराक में उनके बेस की लोकेशन भी सामने आ गई थी।

यानी दुश्मन को अब जासूस भेजने की जरूरत नहीं… सैनिक खुद ही डेटा अपलोड कर रहे हैं।

अब जरा टाइमिंग देखिए…

Charles de Gaulle इस वक्त पूर्वी भूमध्यसागर में तैनात है। उसी समय फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी ने होरमुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने में मदद करने की बात कही है।

लेकिन एक बड़ा ट्विस्ट है।

तीनों देशों ने साफ कहा है कि जब तक युद्धविराम नहीं होता, वे सीधे युद्ध में नहीं उतरेंगे। फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron ने साफ कहा , “जब तक युद्ध जारी है, हम शामिल नहीं होंगे।”

तो फिर सवाल उठता है…

इतना ताकतवर युद्धपोत एक एक्टिव कॉन्फ्लिक्ट ज़ोन के इतने करीब क्यों है?
क्या ये चेतावनी है? तैयारी है? या सिर्फ ताकत दिखाने का खेल?

पेरिस चुप है।

लेकिन एक बात साफ है , आज के दौर में सबसे बड़ा खतरा सिर्फ मिसाइल या बम नहीं… बल्कि डेटा है।

अगर एक सुबह की जॉगिंग से न्यूक्लियर वॉरशिप की लोकेशन सामने आ सकती है, तो सोचिए… दुनिया के कितने राज पहले ही अनजाने में इंटरनेट पर अपलोड हो चुके हैं।

साभार adila

29/03/2026

बाबा का ढाबा जब तक फेमस नहीं हुआ था वो बूढ़ा जहां था काट रहा था जीवन..
एक यूट्यूबर की दृष्टि उसपे पड़ी..लोगों की भावनाएं उमरी और लोगों ने लखपति बना दिया..बाबा फिर सनक गया..

जनता जितनी जल्दी सर पे चढ़ाती है उतनी ही जल्दी पटकती भी है..लोगों ने पटक दिया फिर बाबा अपनी औकात पे आ गया..

रानू मंडल भीख मांगती थी..किसी का ध्यान गया उसकी आवाज पे..फिर जनता ने इसे सर पे चढ़ा लिया..सिंगर बन गई..

लेकिन रानू मंडल तो भीख मांगती थी,कैसे बर्दाश्त कर पाती थी इतना नेम फेम..
अलबला गई और जनता पे ही चिल्लाने लगी..
आज रानू मंडल कहाँ है?गुमनामी के अंधेरे में..

अब बड़ा पाव वाली लड़की..बड़ा पाव बेच रही थी ठीक था..
लेकिन जनता तो भावुक है..
भाई सबको स्टार बनाना है..पहुंचा दिया आसमान में..
नतीजा..उल्टे सीधे बयान.

वो खूबसूरत आँखो वाली लड़की..जो कुंभ में फूल बेचा करती थी..
किसी का कैमरा उसपे गया..सोशल मीडिया पे जनता की नजर गई..लोगों ने सर पे बिठा लिया..

सड़क से उठ के स्टार बना दी गई..
नतीजा?
कृष्ण और राधा के प्रेम से अपनी तुलना कर रही...

अब लोग आहत होते लगे..

आप ऐसे लोगों से क्या उम्मीद करते हैं?
इतना भाव क्यों देना किसी को जो इस लायक नहीं..

ये पाव वाली लड़की या फूल बेचने वाली क्या इसके सोचने का दायरा इतना होगा के समझ पाए क्या बोल रही..
सामने माइक लगा है,कैमरा लगा है..
इनका दिमाग आउट ऑफ कंट्रोल..
बस मुंह फाड़ दिया..और उगल दिया कुछ भी..

ये लोग ऐसे एग्जांपल हैं जो आप अपने बच्चों के सामने रख सकते हैं..
के देखो बच्चे जीवन में पढ़ो लिखो मेहनत करो! ये शॉर्ट कट से फेम पाने जैसा कुछ नहीं होता..
ऐसे लोग जितनी जल्दी चमकते हैं उतनी ही जल्दी अपनी चमक खो देते हैं..
बच्चों को बताइए के
मेहनत,ईमानदारी और नैतिकता की चमक परमानेंट होती है..
और इससे मिला सक्सेस लाइफ लॉन्ग चलता है..

साभार

19/03/2026

खलील जिब्रान की एक कहानी है। एक आदमी परदेस गया। वह एक बड़े होटल के सामने खड़ा है। लोग भीतर आ रहे हैं, जा रहे हैं, बैरे लोगों का स्वागत कर रहे हैं—उसनेसमझा कि कोई राज—भोज है। वह भी चला गया। उसका भी स्वागत किया गया। उसको भीबिठाया गया। थाली लगाई गई, उसने भोजन किया।उसने कहा, अदभुत नगर है! इतना अतिथि—सत्कार! फिर बैरा तश्तरी में रख कर उसका बिल ले आया। लेकिन वह समझा कि बड़े अदभुत लोग हैं, लिख कर धन्यवाद भी दे रहे हैं कि आपनेबड़ी कृपा की कि आप आए! वह झुक—झुक कर नमस्कार करने लगा। वह बोला कि बड़ा खुश हूं। मगर वह बैरे को कुछ समझ में न आया कि मामला क्या है, यह झुक किसलिए रहा है,नमस्कार किसलिए कर रहा है! कुछ समझा नहीं, तो मैनेजर को बुला लाया।उस आदमी ने समझा कि हद हो गई, अब खुद मालिक आ रहा है महल का! वह झुक—झुक कर नमस्कार करने लगा और बड़ी प्रशंसा करने लगा, लेकिन एक—दूसरे की बात किसी को समझ में न आए। मैनेजर ने समझा, या तो पागल है या हद दर्जे का धूर्त है। उसको पुलिस के हवाले कर दिया। वह समझा कि अब शायद सम्राट के पास ले जा रहे हैं। वह ले जाया गया अदालत में, मजिस्ट्रेट बैठा था, वह समझा कि सम्राट…।मजिस्ट्रेट ने सारी बात समझने की कोशिश की, लेकिन समझने का वहां कोई उपाय न था। वहां भाषा एक—दूसरे की कोई जानता न था। आखिर उसने दंड दिया कि कुछ भी हो, इसको गधे पर बिठा कर, तख्ती लगा कर इसके गले में कि यह धूर्त है, दगाबाज है और दूसरे लोग सावधान रहें ताकि यह गांव में किसी और को धोखा न दे सके, इसकीफेरी लगवाई जाए। जब उसको गधे पर बिठायाजाने लगा, तब तो उसकी आंख से आंसू बहने लगे आनंद के। उसने कहा, हद हो गई, अब जुलूस निकाला जा रहा है! मैं सीधा—सादा आदमी, मैं कोई नेता वगैरह नहीं हूं मगर मेरा जुलूस निकाला जा रहाहै। मैं तो बिलकुल गरीब आदमी हूं, यह तो नेताओं को शोभा देता है, यह आप क्या कर रहे हैं!मगर कोई उसकी सुने नहीं। जब वह गधे पर बैठ कर गांव में घूमने लगा तो स्वभावत: भीड़ भी पीछे चली। बच्चे चले शोरगुल मचाते। उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहींहै। जीवन में ऐसा कभी अवसर मिला नहीं था। एक ही बात मन में चुभने लगी कि आज कोई अपने देश का होता और देख लेता। जा कर कहूंगा तो कोई मानेगा भी नहीं।वह बडी गौर से देख रहा है भीड़ को। जब बीचचौरस्ते पर उसका जुलूस पहुंचा—शोभा—यात्रा —और काफी भीड़ इकट्ठी हो गई, तो उसे भीड़ में एक आदमी दिखाई पड़ा। वह आदमी उसके देश का था। वह चिल्लाया कि अरे, मेरे भाई, देखो क्या हो रहा है! लेकिन वह दूसरा आदमी तो इस देश की भाषा समझने लगा था, यहां कई साल रह चुका था। ऐसा सिर झुका कर वह भीड़ में से निकल गया कि कोई दूसरा यह न देख ले कि हमारा इनसे संबंध है। लेकिन गधे पर बैठे हुए नेता ने समझा कि हद हो गई, ईर्ष्या की भी एक सीमा होती है!भाषा समझ में न आए तो फिर मनगढ़ंत है सब हिसाब। जब तक समझ में आता है, तब तक अच्छा शब्द, बुरा शब्द; जब समझ में नहीं आता तो सभी शब्द बराबर हैं, कोई अर्थ नहीं है।

ओशो

16/03/2026

एक आयु के बाद मेडिकल माफिया का विश्वास मत करें।नहीं तो जितने टेस्ट उपलब्ध हैं पैसे कमाने के लिए सभी टेस्ट करवा कर आधे तो वैसे ही मार दिए जाओगे।
नो स्मोकिंग दिवस पर विशेष।नो तंबाकू पर ज्ञान झाड़ने वाले सारे एनजीओ और बाकी लोग जेनेटिक्स पढ़ लें ढंग से। तंबाकू से कैंसर नहीं होता तंबाकू सिर्फ ओंकॉजेनिक cells को एक्टिवेट कर सकता है। Oncogenic cells heridity से किसी के शरीर में हो सकते हैं। अगर किसी के शरीर में ओंकॉजैनिक cells हों तो तंबाकू से ज्यादा एक्टिवेटर तो आपको टमाटो सॉस में मिला हुआ सोडियम बेंजोएट है जिसको प्रिजर्वेटिव की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
इस प्रकार से तो तंबाकू से ज्यादा खतरनाक तो टमाटो सॉस और मैगी में और मोमो सूप में इस्तेमाल किए जाने वाला अजीनोमोटो है।
हां लंग्स में और छोटी मोटी समस्या तो तंबाकू पैदा कर सकता है। लेकिन oncogenic cells को एक्टिवेट करने में फूड प्रिजर्वेटिव और अजीनोमोटो तंबाकू से ज्यादा खतरनाक है।
ये एनजीओ और दूसरे संगठन अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए उल्टा सीधा प्रचार करने में माहिर है । जैसे आदिकाल से चले आ रहे प्राकृतिक मुफ्त में मिलने वाले नशे भांग के खिलाफ फर्जी एनजीओ और ड्रग माफिया पोषित एनजीओ नेताओं ने प्रचार करके इसे बैन करवा कर चिट्टे जैसे जानलेवा नशे के लिए स्पेस क्रिएट करवाया, जिससे रोज हिंदू सिर्फ हिन्दू युवा मर रहे हैं, जबकि भांग जैसे नशे से आज तक कोई नहीं मरा हमने नब्बे नब्बे साल के बजुर्गों को भांग पीते देखा है जिन्होंने पूरे परिवार की जिम्मेवारियों को निभाया। यह सब माफियाओं की धन कमाई का धंधा है। मैं नशे का समर्थक नहीं हूं लेकिन समाज का एक वर्ग हमेशा से नशे करता था और करेगा इस बात को नहीं झुठलाया जा सकता, आप यदि ब्रम्हचारी हो और यह सोचे कि सारा समाज आपकी तरह ब्रह्मचारी बन जाए तो इस्लामिक सोच और आपकी सोच में कोई अंतर नहीं है।मैगी तो बच्चे भी खाएं तो खाएं इनको तो बिजनेस करना है। अगर कोई डॉक्टर मेरी इस पोस्ट को पढ़ रहा है। तो मेरा चैलेंज है प्रूव करे कि तंबाकू क्या कैंसर पैदा करता है कि oncogenic cells को एक्टिवेट। तब तो ऐसी मुहिम फूड प्रिजर्वेटिव और अजीनोमोटो के खिलाफ भी चलनी चाहिए।
मुझे आईएमए और डॉक्टर्स से इस बात का जवाब चाहिए।
तंबाकू से ज्यादा कैंसर मरीज तो फ्लोराइड युक्त झाग वाला आईएमए द्वारा प्रमाणित कोलगेट पेस्ट कर चुका है।
coke pepsi में आईएमए द्वारा प्रमाणित brominated वेजिटेबल ऑयल की याद है या भूल गए।
मैंने पिछले काफी समय से 1999 से आजतक ऐसे किसी व्यक्ति की कुंडली नहीं देखी जो स्मोकर हो और उसकी मृत्यु कैंसर से हुई हो। या वर्तमान समय में उसे corona के कारण गंभीर समस्या हुई हो। अगर किसी के पास ऐसी कोई जानकारी हो तो बताए। कृप्या सुनी सुनाई बातों के आधार पर ना लिखें , अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं या थे तभी लिखें। इस विषय पर मुझे अपनी रिसर्च करने में मेरी मदद कीजिए। क्योंकि मैने देखा है कि अंतर राष्ट्रीय संगठन किसी ना किसी एजेंडा के तहत किसी चीज का प्रचार प्रसार अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रख कर करते आए हैं। हां इन बातों के कुछ नुकसान जरूर देखें हैं परन्तु उन नुकसानों को मत गिनाए। मैने अपने बचपन में ऐसे बहुत लोग देखे है जिनकी आयु 90-95 साल होती थी लेकिन बिल्कुल स्वस्थ और उनका हुक्का कभी बुझता नहीं था। और ऐसी बड़ी आयु 80-90 साल की औरतें देखी थी जो हर 5 मिनट बाद अपने नाक में नसवार सूंघती रहती थी बिल्कुल स्लिम ट्रिम और स्वस्थ। नस्वार भी तमाखु का पाउडर होता है। और मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूं जिन्होने किसी गुरु या पत्नी या डॉक्टर के कहने से बड़ी आयु 50 प्लस में तमाखू छोड़ा उनको सभी को स्टंट पड़ गए या उनकी हार्ट सर्जरी हुई।
यह सारा आधुनिक सिस्टम भय का व्यापार करता है और हमें दवाइयों पर निर्भर कर रहा है।
और जब से मोदी सरकार ने हार्ट स्टंट के रेट लाखों से 10-20 हजार के बीच कर दिए हमारे शहर में अब इक्कादुक्का केस में ही हार्ट स्टंट पड़ने के केस सुनाई देते है नहीं तो पहले हर दूसरे दिन सुनते थे कि उसको इसको हार्ट स्टंट पड़ गए। हमारा वैदिक ज्ञान भी यही कहता है कि अधिकतर बीमारियां हमारी सोच के कारण ज्यादा प्रभाव करती है। इसलिए जितना भय करोगे उतनी समस्या बढ़ेगी। एसपटीन फाइल्स वाले मनुष्यों की खेती करने वाले लोग ही इस मेडिकल माफिया के असली मालिक है आजकल।

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