30/04/2026
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05/11/2025
“*संविधान निर्माता” विवाद का पुनर्मूल्यांकन: डॉ. भीमराव अम्बेडकर, बी.एन. राउ और इतिहास-विकृति की राजनीति*
हाल के वर्षों में कुछ वैचारिक रूप से प्रेरित समूहों, विशेषकर दक्षिणपंथी हिंदुत्व खेमे से जुड़े व्यक्तियों द्वारा यह विवाद पुनः उछाला गया है कि भारत के संविधान के वास्तविक निर्माता सर बेनेगल नरसिंग राउ थे, न कि डॉ. बी आर अम्बेडकर। यह दावा सतही रूप से इतिहास के पुनर्पाठ का आभास देता है, परंतु वस्तुतः यह भारत के संवैधानिक इतिहास के अभिलेखों को विकृत करने और डॉ. अम्बेडकर के अद्वितीय योगदान को कमतर दिखाने का एक सुनियोजित प्रयास है। इस प्रकार की पुनर्लेखनात्मक प्रवृत्ति राजनीतिक तथा सांस्कृतिक उद्देश्यों से प्रेरित है और इसका प्रतिवाद तथ्यों एवं इतिहास-आधारित विश्लेषण से किया जाना आवश्यक है।
1. विवाद की पृष्ठभूमि और स्वरूप-
सर बी.एन. राउ एक अत्यंत विद्वान सिविल सेवक, न्यायविद् और संवैधानिक विशेषज्ञ थे। उन्हें संविधान सभा का संविधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया था। उनकी भूमिका संविधान सभा के प्रस्तावों और विश्व के विभिन्न लोकतांत्रिक संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन कर एक प्रारंभिक मसौदा तैयार करने की थी। राउ ने यह दायित्व कुशलता से निभाया और अक्टूबर 1947 में अपना मसौदा संविधान सभा को प्रस्तुत किया।
परंतु यह मसौदा केवल एक प्रारंभिक दस्तावेज़ था — चर्चा के लिए आधार, न कि अंतिम संविधान। इसके बाद संविधान सभा ने मसौदा समिति गठित की, जिसके अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर थे, जिन्होंने संविधान को संशोधित, परिष्कृत और अंतिम रूप प्रदान किया।
2. संविधान के मुख्य निर्माता के रूप में डॉ. अम्बेडकर की भूमिका-
मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ. भीमराव अम्बेडकर की भूमिका न केवल मूलभूत और बौद्धिक थी, बल्कि परिवर्तनकारी भी थी। उन्होंने न केवल प्रारंभिक मसौदे की समीक्षा और संशोधन किया, बल्कि संविधान में वह दर्शन और नैतिक दृष्टि भी समाहित की जो उसे जीवंत बनाती है। लगभग दो वर्षों में मसौदा समिति ने 7500 से अधिक संशोधनों पर विचार किया और प्रत्येक प्रावधान पर गहन विमर्श कर एक सुसंगत और दूरदर्शी दस्तावेज़ तैयार किया।
डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में प्रत्येक अनुच्छेद का तार्किक और विवेकपूर्ण बचाव किया। उनके वक्तव्यों से यह स्पष्ट होता है कि वे केवल विधि-तकनीकी पक्ष तक सीमित नहीं थे, बल्कि संविधान के सामाजिक दर्शन को भी गहराई से समझते थे। उनके नेतृत्व में संविधान एक कानूनी दस्तावेज़ मात्र न रहकर सामाजिक परिवर्तन का चार्टर बन गया।
3. योगदान की प्रकृति और भिन्नता-
राउ और अम्बेडकर की भूमिकाएँ परस्पर प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक थीं।
राउ ने प्रशासनिक प्रारूप दिया, जबकि अम्बेडकर ने उसे आत्मा प्रदान की।
राउ का कार्य तकनीकी था; डॉ अम्बेडकर का कार्य वैचारिक और राष्ट्रनिर्माण से जुड़ा हुआ।
संविधान सभा के अभिलेख इस विषय में किसी भ्रम की गुंजाइश नहीं छोड़ते। अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर, के.एम. मुंशी और टी.टी. कृष्णमाचारी जैसे सदस्यों ने स्पष्ट रूप से डॉ. अम्बेडकर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।
25 नवम्बर 1949 को टी.टी. कृष्णमाचारी ने कहा:
“इस सदन और इस देश का डॉ. अम्बेडकर के प्रति गहरा ऋण है, जिन्होंने मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में अत्यंत श्रमसाध्य कार्य किया है।”
संविधान सभा ने सर्वसम्मति से डॉ. अम्बेडकर को संविधान का प्रमुख निर्माता माना। बी.एन. राउ के योगदान को भी सराहा गया, किंतु उन्हें इस भूमिका में कभी नहीं माना गया।
4. इस विकृति के वैचारिक निहितार्थ-
बी.एन. राउ को संविधान का वास्तविक निर्माता बताने की हालिया कोशिशें निष्पक्ष ऐतिहासिक समीक्षा नहीं, बल्कि वैचारिक उद्देश्यों से प्रेरित विकृति हैं।
डॉ. अम्बेडकर की सामाजिक न्याय की विचारधारा, जाति-व्यवस्था पर उनकी कठोर आलोचना, और समानता व संवैधानिक नैतिकता के प्रति उनका अटूट आग्रह — ये सभी मूल्य उस सामाजिक-सांस्कृतिक रूढ़िवाद के लिए असहज हैं, जिसके साथ हिंदुत्व विचारधारा जुड़ी हुई है।
बी.एन. राउ जैसे औपनिवेशिक नौकरशाह को संविधान का निर्माता बताना उस प्रक्रिया को अराजनीतिक और अम्बेडकरविहीन बनाने का प्रयास है, जो वास्तव में भारत के सामाजिक पुनर्निर्माण का साधन थी। यह रणनीति संविधान के उस क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी चरित्र को धुंधला करना चाहती है, जिसे डॉ. अम्बेडकर ने उसमें निहित किया था।
5. नैतिक और दार्शनिक आयाम-
डॉ. अम्बेडकर के योगदान का मूल्यांकन केवल संस्थागत परिप्रेक्ष्य में नहीं किया जा सकता। संविधान की आत्मा के हर कोने में उनका दर्शन दृष्टिगोचर होता है —
प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता का उद्घोष;
मौलिक अधिकारों में व्यक्ति की गरिमा और समानता की गारंटी;
और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र का लक्ष्य —
ये सभी उनके चिंतन की प्रतिध्वनियाँ हैं।
डॉ. अम्बेडकर ने संविधान को केवल विधिक दस्तावेज़ नहीं रहने दिया, बल्कि उसे नैतिक पुनर्निर्माण का उपकरण बना दिया — ऐसा सेतु जो राजनीतिक स्वतंत्रता से सामाजिक मुक्ति तक ले जाता है।
6. ऐतिहासिक सत्य की रक्षा-
इतिहास, संविधान सभा के वृतांत और स्वयं संविधान की आत्मा — तीनों इस निष्कर्ष पर एकमत हैं कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर ही भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता हैं।
सर बी.एन. राउ का योगदान निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण था, किंतु वह सलाहकार के रूप में था, न कि निर्माता के रूप में।
दोनों भूमिकाओं को गड्डमड्ड करना या एक को दूसरे के स्थान पर प्रस्तुत करना शोध का विषय नहीं, बल्कि इतिहास का विकृतिकरण है।
हम सबका दायित्व है कि हम ऐतिहासिक सत्य की रक्षा करें और वैचारिक हेरफेर का विरोध करें।
डॉ. अम्बेडकर की संविधान-निर्माता की भूमिका न तो किसी भावनात्मक आग्रह का परिणाम है, न किसी प्रतीकात्मक सम्मान का —
वह इतिहास, प्रमाण और विवेक से सिद्ध तथ्य है।
निष्कर्ष
संविधान के निर्माण से जुड़ा यह तथाकथित विवाद वस्तुतः एक सुनियोजित प्रयास है —
डॉ. अम्बेडकर की बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को कमजोर करने का। इतिहास साक्षी है कि जहाँ सर बी.एन. राउ ने प्रारंभिक प्रशासनिक मसौदा प्रस्तुत किया, वहीं डॉ. अम्बेडकर ने अपने विचार, दृष्टि और नेतृत्व से उस मसौदे को जीवंत संविधान का रूप दिया।
भारतीय संविधान अपने स्वरूप, सार और आत्मा — तीनों में — डॉ. अम्बेडकर के उस अमर दर्शन का प्रतिबिंब है,
जो कहता है:
संवैधानिकता ही सामाजिक न्याय है,
लोकतंत्र ही नैतिक अनुशासन है,
और समानता ही भारत का राष्ट्रीय धर्म।
साभार
30/03/2025
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04/11/2024
किसी भी व्यक्ति की , वस्तु की सहज उपलब्धता उस व्यक्ति या वस्तु का भाव गिरा देता है ।
स्वर्ण कितना ही सुंदर क्यों न हो , हीरा कितना ही सुंदर क्यों न हो , अगर वह सहज और हर जगह प्राप्त होने लगे तो तुरंत उसकी कीमत और उसके मूल्य में अवमूल्यन आ जायेगा ।
आपको पता है कि संसार की सबसे मुल्यवान चीज़ क्या है ??
मिट्टी । यह जीवन का आधार है । इसी से सब अन्न , जल , भोजन सब प्राप्त होता है । इसी से प्रत्येक धातुओं का निर्माण होता है ।
मिट्टी न मिले तो लोग भोजन और पानी के अभाव से मर जायें , अरे वायु का भी कारण यही मिट्टी है क्योंकि इसकी मिट्टी में पनपने वाली वनस्पतियाँ ही तो ऑक्सीजन वायु को देती हैं ।
लेकिन मिट्टी का कोई मोल नहीं ।
और वहीं हीरा किसी काम का नहीं , स्वर्ण में आप कोई वनस्पति या किसी भी चीज़ का उत्पादन नहीं कर सकते , platinum की कोई उपयोगिता नहीं , लेकिन इनकी कीमत है , इनका मूल्य है ।
जानते हैं क्यों ?? क्योंकि यह बहुत ही विरले स्थान पर प्राप्त हैं , अनुपलब्ध है , और इनको प्राप्त करने के लिए मनुष्य को बहुत ही उद्योग करना पड़ता है ।
यही मनुष्य की प्रवृत्ति है । जो सहज रूप से उपलब्ध होगा भले उसकी उपयोगिता उच्चतम हो , फिर भी उसका कोई मूल्य नहीं करते ।
और एक बात संसार में बहुत ही ध्यान देने योग्य है कि किसी को भी कोई चीज़ वस्तु या व्यक्ति भी मुफ्त या सहज रूप से नहीं प्राप्त होना चाहिए ।
मनुष्य उसकी कोई कीमत नहीं करता जो सहज रूप से प्राप्य हो ।
इसीलिए जब जीव कल्याण निमित्त आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य ने चारों धाम की स्थापना की थी , या शक्तिपीठों की स्थापना की थी तो उन्होंने बहुत ही दुर्लभ , दुर्गम स्थानों पर पहाड़ों में , कंदराओं में इनकी स्थापना की । क्योंकि वह जानते थे मनुष्य का स्वभाव ।
इसीलिए आज जितने प्राचीन मंदिर या शक्तिपीठ हैं , सब दुर्गम स्थानों पर हैं ताकि मनुष्य उद्योग कर यहाँ तक पहुँचे और तब वह उसकी उपयोगिता से आत्मसात हो सके ।
इसीलिए भीषण गर्मी के पश्चात ही प्रकृति वर्षा करती है ।
जब बहुत तेज धूप हो , तभी छाँव की उपयोगिता पता लगती है ।
जब बहुत तेज प्यास हो , पानी न मिल रहा हो , तभी पानी का महत्व पता लगता है ।
इसीलिए आश्रम में गुरु अपने शिष्यों से कठोर श्रम करवाया करते थे , राजा के पुत्र से लेकर सामान्य बालकों से भी लकड़ी बीनने से लेकर आश्रम की साफ सफाई और हाड़ तोड़ श्रम करवाया जाता था ।
बहुत ही उद्योग से तब जाकर गुरु शिष्य को शिक्षा देता था ।
मलय पर्वत पर चन्दन के पेड़ भीलों और वनवासियों के लिए अत्यंत ही सुलभ हैं , तो वह लोग चन्दन को लकड़ियों को ईधन के रूप में प्रयोग करते हैं ।
इसीलिए अति सुलभता और सहजता से बचना चाहिए ।
किसी भी वस्तु को अगर आप मुफ्त में देंगे तो उसका महत्व कोई नहीं करेगा , लेकिन जैसे ही वह packet में बंद और मूल्य कोई तगड़ा सा लगाकर उसे देंगे तो उसकी महत्ता स्वयं बढ़ जाएगी ।
और एक बात और मैंने अनुभव किया है कि आप जबरदस्ती किसी का कल्याण या लाभ नहीं दे सकते । किसी को सही बात बतायेंगे तो वह चौंक कर दूर भागेगा ।
कोई विष्ठा में पड़ा है तो अगर आप उसे निकाल कर फूल में भी करना चाहेंगे तो वह दौड़ कर फिर वहीं जाएगा ।
कोई किसी की प्रकृति नहीं बदल सकता ।
क्योंकि अगर सभी घोड़े बन जायेंगे तो बोझा कौन ढोयेगा ??
सभी कल्याण मार्ग पर चल पड़ेंगे तो संसार का क्रम बाधित होगा ।
अगर कोई बोलता है कि सूर्य गर्मी नहीं देता बल्कि ठंडक देता है , तो उसे एक बार बतायें , न माने तो दूसरी बार बताने की कोई आवश्यकता नहीं बल्कि उसके सामने ही कम्बल ओढ़ लें मध्य गर्मी में भी कि हाँ देखो कितनी ठंडक है ।
बचपन में जब लड़ाईयाँ होती थी लोग धमकी देते थे कि हम कुएँ में कूदने जा रहे हैं , तो एक बुजुर्ग ने सबको कहा कि अब जो कुएँ में कूदने को कहे , उसको सब पकड़कर जबरदस्ती कुएँ में डाल दो और ऊपर से चार पाँच ईंटा और पत्थर भी डाल दो कि ताकि वह ऊपर न आने पाए ।
तो ऐसे ही करना चाहिए , कोई कुएँ में कूदे तो उसे एक बार रोको न माने तो दूसरी बार स्वयं कंधे पर बिठाकर या घिसराकर कुएँ में गिरा देना चाहिए ।
यह संसार बड़ा ही विचित्र है । सबकी प्रकृति , संस्कार , समझने का स्तर , विवेक , बुद्धि की क्षमता अलग अलग है ।
आप यह हर किसी से अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह सत्य को स्वीकार कर पायेगा या नहीं ।
अतः हर जगह अपनी सहज उपलब्धता अपनी ही हानि करने करने के बराबर है और साथ ही साथ आप उस गुण का भी अवमूल्यन करते हैं जो हर किसी के लिए सहज सरल रूप से उपलब्ध नहीं होना चाहिए ।
अतिपरिचयादवज्ञा सन्ततगमनादनादरो भवति ।
मलये भिल्लपुरन्ध्री चन्दनतरुकाष्ठमिन्धनं कुरुते ॥
किसी के वहाँ हर रोज़ जाने से और सहज उपलब्धता से मानहानि होती है । जिस तरह मलय पर्वत पर असंख्य चंदन के वृक्ष होने पर वहाँ की भील औरतें उसी चंदन को ईंधन बनाती है।
बस यह सभी बातें वहाँ लागू नहीं हैं जहाँ निश्चल और विशुद्ध प्रेम है ।
क्योंकि प्रेम का कोई आधार नहीं होता , मात्र आलंबन होता है।
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कैसे करूं मै खुद को, तेरे काबिल ए जिंदगी? जब मै आदतें बदलता हूं ,तू रास्ते बदल देती है l
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हर कोई नही सम्हाल सकता : बेहिसाब निःस्वार्थ प्रेम। खुद को खर्च कीजिए संभल कर ...ताकि आप ,आप रह सकें।