ताइवान के लोग भारतीयों से नफरत क्यों करते हैं।
जरा पढ़िए-
जानना जरूरी है!
"ताइवान में करीब एक वर्ष बिताने पर एक भारतीय महानुभाव की कई लोगों से दोस्ती हो चुकी थी, परंतु फिर भी उन्हें लगा कि वहाँ के लोग उनसे कुछ दूरी बनाकर रखते हैं, वहाँ के किसी दोस्त ने कभी उन्हें अपने घर चाय के लिए तक नहीं बुलाया था...?
उन्हें यह बात बहुत अखर रही थी अतः आखिरकार उन्होंने एक करीबी दोस्त से पूछ ही लिया...?
थोड़ी टालमटोल करने के बाद उसने जो बताया,उसे सुनकर उस भारतीय महानुभाव के तो होश ही उड़ गए।
ताइवान वाले दोस्त ने पूछा-
“200 वर्ष राज करने के लिए कितने ब्रिटिश भारत में रहे...?”
भारतीय महानुभाव ने कहा कि लगभग “10, 000 रहे होंगे!”
“तो फिर 32 करोड़ लोगों को यातनाएँ किसने दीं?
वह आपके अपने ही तो लोग थे न...?
जनरल डायर ने जब *"फायर"* कहा था...
तब 1300 निहत्थे लोगों पर गोलियाँ किसने दागी थीं?
उस समय ब्रिटिश सेना तो वहाँ थी ही नहीं!
क्यों एक भी बंदूकधारी (सब के सब भारतीय) पीछे मुड़कर जनरल डायर को नहीं मार पाया...?
फिर उसने उन भारतीय महानुभाव से कहा-
आप यह बताओ कि कितने मुगल भारत आए थे? उन्होंने कितने वर्ष तक भारत पर राज किया? और भारत को गुलाम बनाकर रखा! और आपके अपने ही लोगों को धर्म परिवर्तन करवाकर आप के ही खिलाफ खड़ा कर दिया!
जोकि 'कुछ' पैसे के लालच में, अपनों पर ही अत्याचार करने लगे! अपनों के साथ ही दुराचार करने लगे…!!
तो मित्र, आपके अपने ही लोग, कुछ पैसे के लिए, अपने ही लोगों को सदियों से मार रहे हैं...?
आपके इस *स्वार्थी धोखेबाज, दगाबाज, मतलबपरस्त, 'दुश्मनों से यारी और अपने भाईयों से गद्दारी..!!
अपनी मां,मातृभाषा वा मतभूमि के संग ही गद्दारी करें वा उनको अपने झूठे घमंड वा छोटे से स्वार्थ के लिए विदेशियों की रखैल बनवाएं ऐसे अपनी धरती मां की दलाली खाने वाले चरित्रहीन व्यक्ति से क्यों संबंध रखना चाहेगा।
इस प्रकार के व्यवहार एवं इस प्रकार की मानसिकता के लिए, हम भारतीय लोगों से सख्त नफ़रत करते हैं!
इसीलिए हमारी यही कोशिश रहती है कि यथासंभव, हम भारतीयों से सरोकार नहीं रखते...?
उसने बताया कि-
जब ब्रिटिश हांगकांग में आए तब एक भी व्यक्ति उनकी सेना में भरती नहीं हुआ क्योंकि उन्हें अपने ही लोगों के विरुद्ध लड़ना गवारा नहीं था...?
यह भारतीयों का दोगला चरित्र है, कि अधिकाँश भारतीय हर वक्त, बिना सोचे समझे, पूरी तरह बिकने के लिए तैयार रहते हैं...?
और दोस्तों आज भी भारत में यही चल रहा है।
विरोध हो या कोई और मुद्दा, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में और खुद के फायदों वाली गतिविधियों में भारत के लोग आज भी, राष्ट्र हित को हमेशा दोयम स्थान देते हैं। आप लोगों के लिए "मैं और मेरा परिवार" पहले रहता है। "समाज और देश" जाए भाड़ में...?
भ्रष्ट नौकरशाही ,भ्रष्ट बिकता हुआ नेतृत्व की स्वीकारता चरित्रहीन जनता को भी हो गई हे।आज भ्रष्टाचार का खिलफत का स्वांग करने वाले भी महाधूर्त एवम भ्रष्ट नेता निकल रहें हैं जो देश के लिए वा स्वयं के लिए दीमक है।देश इससे बुरे दिन क्या देखेगा ?
थोड़े बहुत चरित्रवान बचे भी हैं वाह भी अपने को बेचने की लाइन में लगे हैं।उनके अंदर दुष्चरित्र लोगो को आंख दिखाने की हिम्मत नहीं है। आज काले जनरल डायरो को खत्म करने वाले महा प्रक्रमी देश के लाल उधम सिंह जेसे सुपुत्र पैदा होने भी बंद हो गए हैं।घर घर में वेश्यालय वा मदिरालय जो खुल गए हैं।
-आज जापान ,ताइवान जेसे कई छोटे देश अपने चरित्रवान नागरिकों के कारण विश्व में सबसे समृद्ध देश बन गए हैं।"
पर दोस्तों आज भी भारत में यही सब चल रहा है।जिस फसल के दम पर इस देश में विदेशीयो का शासन रहा। वो आज भी काटी जा रही है उसी फसल की बुआई भारत में आज भी की जा रही है राम भली करें
बात कड़वी है पर सच है!
Knowledge kings
शिक्षार्थ आइए, सेवार्थ जाइए । पत्थर पे लकीर खिंचने की कोशिश अभी जारी है.
12/04/2022
ये नन्ही कलिया खिलने को तैयार है,ये पवन सुमन सुरभित बहने को तैयार है,हम माली है इस उपवन के, ये नन्हे पौधे भोले मन के ,है उम्मीद की ये वृक्ष बनें ,छाया पथ-पथ सबको देगें।
23/11/2021
मैं #भारत हूँ। 🚩❤️
मैं वह भारत हूँ जिसने पिछले पाँच हजार वर्ष में कभी अपने किसी बेटे का नाम दुशासन नहीं रखा, क्योंकि उसने एक स्त्री का अपमान किया था।
मैं वह भारत हूँ जो कभी अपने बच्चों को रावण या कंश नाम नहीं देता, क्योंकि इन्होंने अपने जीवन में स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार किया था।
मैं वह भारत हूँ जहाँ कोई गांधारी अपने सौ पुत्रों की मृत्यु के बाद भी द्रौपदी पर क्रोध नहीं करती, बल्कि अपने बेटों की असभ्यता के लिए क्षमा मांगती है।
मैं वह भारत हूँ जहाँ निन्यानवे प्रतिशत बलात्कारियों को अपना गाँव छोड़ देना पड़ता है, और उसे धक्का कोई और नहीं, खुद उसके खानदान वाले देते हैं।
मैं वह भारत हूँ जहाँ गुस्सा आने पर सामान्य बाप बेटे को भले लात से मार दे, पर बेटी को थप्पड़ नहीं मारता!
मैं वह भारत हूँ जहाँ एक सामान्य बाप अपने समूचे जीवन की कमाई अपनी बेटी के लिए सुखी संसार रचने में खर्च कर देता है।
मैं वह भारत हूँ जहाँ अब भी बेटियाँ लछमी होती हैं। मैं वह भारत हूँ जहां बेटे बाप के हृदय में बसते हैं और बेटियां उसकी आत्मा में बसती हैं।
सभ्यता में असभ्यता के संक्रमण से उपजी आधुनिक कुरीतियों ने बेटियों के जन्म पर उपजने वाले उल्लास का रंग भले मार दिया हो, पर अब भी पिता सर्वाधिक खुश अपनी बेटी की मुस्कान देख कर ही होता है।
मैं वह भारत हूँ जिसके सौ करोड़ बच्चे अब भी नहीं लांघते मर्यादा की लकीर! उनमें बसते हैं, राम, बसते हैं कृष्ण, बसते हैं शिव... उनके बीच निर्भय हो कर मुस्कुराती है कोई राधा, कोई मीरा, कोई अनुसुइया...
मैं वह भारत हूँ जिसके हृदय में अब भी धर्म बहता है।
समाज की प्रतिष्ठा पराजित नहीं होती हिजड़ों के अश्लील ठहाकों से,
रोजी के लिए राष्ट्र पर प्रहार करने वाले चर्चित भले हों, प्रतिष्ठित नहीं होते।
मैं वह भारत हूँ, जिसकी प्रतिष्ठा स्वयं प्रकृति तय करती है, जिसके मस्तक पर तिलक स्वयं सूर्य लगाते हैं।
मैं भारत हूँ... ❤️🚩
साभार - सर्वेश तिवारी श्रीमुख
24/10/2021
COOKING COMPETITION 2021-22
नगर स्थित PLODDER FOR SCHOOL(Nur to 8th,9th & 11th) में कोरोना जैसी महामारी के समाप्त होने के बाद 100 करोड लोगों के टीकाकरण की कंप्लीट होने की खुशी में PLODDER FOR SCHOOL में COOKING COMPETITION का आयोजन किया गया। जिसमें बच्चों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया । आज के कार्यक्रम में प्रथम विजेता रही ''स्मार्ट क्लास किचन चैंपियंस''की छात्राएं अदिति सिंह ,पलक मिश्रा, आयुषी सिंह ,विनीता चौहान, तथा द्वितीय विजेता ''अन्नपूर्णा ग्रुप'' की छात्राएं पायल मिश्रा ब्यूटी शर्मा, अंजली प्रजापति साधना, अनामिका , छात्राएं रही इसी क्रम में तृतीय विजेता कुलदीप, अंकित ,अभिषेक, कृष्णा, शिवम, इरफान आदि छात्र रहे।
विद्यालय के प्रबंधक अरुण प्रताप सिंह ने बताया कि COOKING COMPETITION से बच्चों में समानता एहसास होता है । इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य मि.पंकज गुप्ता ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम बच्चों के विकास में सहायक होते है,साथ ही बच्चों के विकास हेतु ऐसे कई कार्यक्रम कराने का आश्वासन दिया । इस दौरान विद्यालय के अन्य शिक्षक विकास त्रिपाठी ,सत्यजीत त्रिपाठी, अक्षय,काली पांडे, विकास राव,अर्चना मेंम, गोल्डी मेम, नीतू मेम,चांदनी मेम,अनीता मेम,आदि लोग मौजूद रहे ।
18/10/2021
# competition price distribution # #
Congratulations to all my dear Students....
Keep it.....all the best👍👍👍👍
🙏🙏PLODDER FOR SCHOOL🙏🙏
(An English medium school)
For class nur to 8th-9th and 11th(Math's/bio)
हांटा में पहली बार ''स्क्रीन टच डिजिटल बोर्ड''की व्यवस्थाओं के साथ-साथ कंप्यूटर लैब,बेहतर साइंस लैब, और शिक्षित शिक्षकों के द्वारा उत्तम पढ़ाई की व्यवस्था, साथ ही साथ बच्चों के उचित मार्गदर्शन हेतु समय-समय पर मोटिवेशनल क्लासेज, एम डिसाइडेड क्लासेज, एवं बच्चियों हेतु सेल्फ डिफेंस क्लासेस एवं योगा क्लास की उत्तम व्यवस्थाएं.....
14/09/2021
प्रस्तावना- हिन्दी ने हमें विश्व में एक नई पहचान दिलाई है। हिन्दी दिवस भारत में हर वर्ष '14 सितंबर' को मनाया जाता है। हिन्दी विश्व में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में से एक है। विश्व की प्राचीन, समृद्ध और सरल भाषा होने के साथ-साथ हिन्दी हमारी 'राष्ट्रभाषा' भी है। वह दुनियाभर में हमें सम्मान भी दिलाती है। यह भाषा है हमारे सम्मान, स्वाभिमान और गर्व की। हम आपको बता दें कि हिन्दी भाषा विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरी भाषा है।
इतिहास- भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को 'हिन्दी दिवस' के रूप में मनाया जाएगा।
हिन्दी का महत्व- धीरे-धीरे हिन्दीभाषा का प्रचलन बढ़ा और इस भाषा ने राष्ट्रभाषा का रूप ले लिया। अब हमारी राष्ट्रभाषा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत पसंद की जाती है। इसका एक कारण यह है कि हमारी भाषा हमारे देश की संस्कृति और संस्कारों का प्रतिबिंब है। आज विश्व के कोने-कोने से विद्यार्थी हमारी भाषा और संस्कृति को जानने के लिए हमारे देश का रुख कर रहे हैं। एक हिंदुस्तानी को कम से कम अपनी भाषा यानी हिन्दी तो आनी ही चाहिए, साथ ही हमें हिन्दी का सम्मान भी करना सीखना होगा। अंग्रेजी बाजार में पिछड़ती हिंदी- आजकल अंग्रेजी बाजार के चलते दुनियाभर में हिंदी जानने और बोलने वाले को अनपढ़ या एक गंवार के रूप में देखा जाता है या यह कह सकते हैं कि हिन्दी बोलने वालों को लोग तुच्छ नजरिए से देखते हैं। यह कतई सही नहीं है।
हम हमारे ही देश में अंग्रेजी के गुलाम बन बैठे हैं और हम ही अपनी हिन्दी भाषा को वह मान-सम्मान नहीं दे पा रहे हैं, जो भारत और देश की भाषा के प्रति हर देशवासियों के नजर में होना चाहिए। हम या आप जब भी किसी बड़े होटल या बिजनेस क्लास के लोगों के बीच खड़े होकर गर्व से अपनी मातृभाषा का प्रयोग कर रहे होते हैं तो उनके दिमाग में आपकी छवि एक गंवार की बनती है। घर पर बच्चा अतिथियों को अंग्रेजी में कविता आदि सुना दे तो माता-पिता गर्व महसूस करने लगते हैं। इन्हीं कारणों से लोग हिन्दी बोलने से घबराते हैं।
उपसंहार- आज हर माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए अच्छे स्कूल में प्रवेश दिलाते हैं। इन स्कूलों में विदेशी भाषाओं पर तो बहुत ध्यान दिया जाता है लेकिन हिन्दी की तरफ कोई खास ध्यान नहीं दिया जाता।
लोगों को लगता है कि रोजगार के लिए इसमें कोई खास मौके नहीं मिलते। हिन्दी दिवस मनाने का अर्थ है गुम हो रही हिन्दी को बचाने के लिए एक प्रयास। कोई भी व्यक्ति अगर हिन्दी के अलावा अन्य भाषा में पारंगत है तो उसे दुनिया में ज्यादा ऊंचाई पर चढ़ने की बुलंदियां नजर आने लगती हैं चाहे वह कोई भी विदेशी भाषा हो, फ्रेंच या जर्मन या अन्य और ये कतई सही नहीं है।
30/08/2021
ये एक सरल चित्र है, लेकिन बहुत ही गहरे अर्थ के साथ।
आदमी को पता नहीं है कि नीचे सांप है और महिला को नहीं पता है कि
आदमी भी किसी पत्थर से दबा हुआ है।
महिला सोचती है: - ‘मैं गिरने वाली हूं और मैं नहीं चढ़ सकती क्योंकि
साँप मुझे काट रहा है।"
आदमी अधिक ताक़त का उपयोग करके मुझे ऊपर क्यों नहीं खींचता!
आदमी सोचता है:- "मैं बहुत दर्द में हूं फिर भी मैं आपको उतना ही
खींच रहा हूँ जितना मैं कर सकता हूँ!
आप खुद कोशिश क्यों नहीं करती और कठिन चढ़ाई को पार कर लेती ।
आदमी को ये नहीं पता है कि औरत को सांप काट रहा है ।
नैतिकताः- आप उस दबाव को देख नहीं सकते जो सामने वाला झेल रहा है, और ठीक उसी तरह सामने वाला भी उस दर्द को नहीं देख सकता जिसमें आप हैं।
यह जीवन है, भले ही यह काम, परिवार, भावनाओं, दोस्तों, के साथ हो, आपको एक-दूसरे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, अलग
अलग सोचना, एक-दूसरे के बारे में सोचना और बेहतर तालमेल
बिठाना चाहिए।
हर कोई अपने जीवन में अपनी लड़ाई लड़ रहा है और सबके अपने अपने दुख हैं। इसीलिए कम से कम जब हम अपनों से मिलते हैं तब एक दूसरे पर
आरोप प्रत्यारोप करने के बजाय एक दूसरे को प्यार, स्नेह और साथ
रहने की खुशी का एहसास दें, जीवन की इस यात्रा को लड़ने की बजाय
प्यार और भरोसे पर आसानी से पार किया जा सकता है।
25/08/2021
_एक यादव IAS अधिकारी जो इतिहासकार भी हैं, के द्वारा लिखा गया कटु सत्य,,,,,,,_
*_मै ब्राम्हणों का बहुत सम्मान करता हूँ, इसलिए इस सत्य को सभी से साझा करने से, अपने आप को रोक नहीं पाया।_*
*ब्राह्मणों ने समाज को तोड़ा नही अपितु जोडा है।*
ब्राम्हणों ने विवाह के समय समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े *दलित* को जोड़ते हुये अनिवार्य किया कि *दलित* स्त्री द्वारा बनाये गये चूल्हे पर ही सभी शुभाशुभ कार्य होगें।
इस तरह सबसे पहले *दलित* को जोडा गया।
*धोबन* के द्वारा दिये गये सुहाग से ही कन्या सुहागन रहेगी इस तरह धोबी को जोड़ा।
*कुम्हार* द्वारा दिये गये मिट्टी के कलश पर ही देवताओ के पुजन होगें यह कहते हुये कुम्हार को जोड़ा।
*मुसहर जाति* जो वृक्ष के पत्तों से पत्तल/दोनिया बनाते है यह कहते हुये जोड़ा कि इन्हीं के बनाए गये पत्तल/दोनीयों से देवताओं का पुजन सम्पन्न होगे।
*कहार* जो जल भरते थे यह कहते हुए जोड़ा कि इन्हीं के द्वारा दिये गये जल से देवताओं के पूजन होगा।
बिश्वकर्मा* जो लकड़ी के कार्य करते थे यह कहते हुये जोड़ा कि इनके द्वारा बनाये गये आसन/चौकी पर ही बैठकर वर-वधू देवताओं का पुजन करेंगे।
फिर वह *हिन्दु* जो किन्हीं कारणों से *मुसलमान*बन गये थे उन्हें जोड़ते हुये कहा गया कि इनके द्वारा सिले हुये वस्त्रों (जामे-जोड़े) को ही पहनकर विवाह सम्पन्न होगें।
फिर उस *हिन्दु से मुस्लिम बनीं औरतों* को यह कहते हुये जोड़ा गया कि इनके द्वारा पहनाई गयी चूडियां ही बधू को सौभाग्यवती बनायेगी।
*धारीकार* जो डाल और मौरी को दूल्हे के सर पर रख कर द्वारचार कराया जाता है,को यह कहते हुये जोड़ा गया कि इनके द्वारा बनाये गये उपहारों के बिना देवताओं का आशीर्वाद नहीं मिल सकता।
*डोम* जो गंदगी साफ और मैला ढोने का काम किया करते थे उन्हें यह कहकर जोड़ा गया कि *मरणोंपरांत* इनके द्वारा ही प्रथम मुखाग्नि दिया जायेगा।
इस तरह समाज के सभी वर्ग जब आते थे तो घर कि महिलायें मंगल गीत का गायन करते हुये उनका स्वागत करती है।और पुरस्कार सहित दक्षिणा देकर बिदा करती थी।
*ब्राह्मणों का दोष कहाँ है*?...हाँ *ब्राह्मणों* का दोष है कि इन्होंने अपने ऊपर लगाये गये निराधार आरोपों का कभी *खंडन* नहीं किया, जो *ब्राह्मणों* के अपमान का कारण बन गया। इस तरह जब समाज के हर वर्ग की उपस्थिति हो जाने के बाद ब्राह्मण *नाई* से पुछता था कि क्या सभी वर्गो कि उपस्थिति हो गयी है...?
*नाई* के हाँ कहने के बाद ही *ब्राह्मण* मंगल-पाठ प्रारम्भ किया करते हैं।
*ब्राह्मणों* द्वारा जोड़ने कि इस क्रिया को विदेशी मूल के लोगो ने अपभ्रंश किया।
देश में फैले हुये समाज विरोधी *साधुओं* और *ब्राह्मण विरोधी* ताकतों का विरोध करना होगा जो अपनी अज्ञानता को छिपाने के लिये *वेद और ब्राह्मण* की निन्दा करतेे हुये पूर्ण भौतिकता का आनन्द ले रहे हैं।
वस्तुतः हम यादव भी क्षत्रिय ही हैं और हमारा धर्म है ब्राह्मणों की रक्षा करना और मैं इससे सदा वचनबद्ध हूँ।
*अशोक कुमार यादव* (आई ए एस) *इतिहासकार*
कृपया ध्यान से सोचे वाकई ब्राम्हण ने हमेशा त्याग किया है समाज के सभी लोगों को जोड़ा है कभी तोड़ा नहीं है। यह भ्रम मन से, सोच से ,निकाल दीजिए।
इसके पास हमेशा राजा बनने की कुबत थी ।लेकिन मंत्री बन कर समाज का उद्धार किया है🙏🙏🙏🙏🙏
15/08/2021
🇮🇳💐 स्वतंत्रता सेनानियों को नमन💐🇮🇳
वतन की जो हालत बताने लगेंगे,
तो पत्थर भी आंसू बहाने लगेंगे||
कहीं भीड़ में खो गई आदमियत,
जिसको ढूंढने में जमाने लगेंगे||
सास का हर सुमन है वतन के लिए,
जिंदगी ही हवन है वतन के लिए,
कहां गई फांसियो में फंसी गर्दनें,
ये हमारा नमन है वतन के लिए||
प्यास बिन नीर पीने से क्या फायदा, शर्म नहीं तो पसीने से क्या फायदा,
चाहते जिसमें अपने वतन की ना हो,
जिंदगी ऐसी जीने से क्या फायदा ||
आप सभी क्षेत्रवासियों व देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं|🇮🇳💐💐🙏🙏
🌹 आपका अपना🌹
काली कुमार पांडेय( शिक्षक)
गोपालगंज, बिहार
09/08/2021
ओलंपिक और विश्वगुरू....
टोक्यो में चल रहे ओलंपिक खेलों की मेडल टैली में कल शामतक भारत अंडर 50 में भी नहीं था! फिर सूबेदार नीरज चोपड़ा ने पूरे दम के साथ भाला फेंका और हम 67वें पोजिशन से 20 अंकों की उछाल लेकर सीधे 47वें पोजिशन पर आ गए!
एक गोल्ड मैडल और 20 अंकों की उछाल!!!
138 करोड़ की आबादी वाला देश कल से सीना फुलाए घूम रहा है! क्रेडिट लेने देने की होड़ सी मची हुई है! हर किसी में सूबेदार साहब से जुड़ने की ललक दिखाई पड़ रही है! क्योंकि उन्होंने गोल्ड दिलाया है!
138 करोड़ की आबादी में मात्र एक स्वर्ण पदक!! क्या ये गर्व का विषय है?
पदक तालिका पर नजर डालेंगें तो आप पाएंगे कि हम कुल 7 ओलंपिक पदकों (स्वर्ण, रजत और कांस्य) के साथ 47वें स्थान पर हैं!
....और जो देश प्रथम (चीन-38 स्वर्ण पदक) द्वितीय (USA-36 स्वर्ण पदक व तृतीय स्थान (जापान-27 स्वर्ण पदक) पर हैं उनके सिर्फ स्वर्ण पदकों की संख्या हमारे कुल पदकों की संख्या से लगभग 4 गुनी या 5 गुनी है!
शीर्ष पर बढ़त बनाये हुए इन देशों के साथ ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ खेलों में ही अच्छा कर कर रहे हैं और बाकी क्षेत्रों में फिसड्डी हैं!
इनकी विकास दर, औद्यिगिक तकनीक, रेलवे, हाईवे, सैन्यशक्ति ....यहाँ तक कि शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं- कुछ भी उठा लीजिये! ये देश इन क्षेत्रों में भी हमसे कई गुना बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं!
दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय इन्ही के पास हैं! पूरी दुनिया को बेहतर फाइटर जेट, पनडुब्बी और हवाई जहाज से मेट्रोरेल तकनीक, कंप्यूटर तकनीक और स्पेस तकनीक यही लोग मुहैया करा रहे हैं!
..और खेलों में भी इनका कोई सानी नहीं है!
इसी को सर्वांगीण विकास कहते हैं!
हम तो इनके पासंग में भी नहीं हैं! सिर्फ जनसंख्या के मामले में बढ़त बनाये हुए हैं हम!
इतने बड़े फेल्योर का जिम्मेदार किसी एक को नहीं ठहराया जा सकता! हम सब इस हमाम में नँगे हैं!
हमने कभी इन मुद्दों पर बात ही नहीं की! हम नाली, खड़ंजा, PCC रोड, वृद्धावस्था पेंशन, बेरोजगारी भत्ता, आधार, पैन, जनधन, जातिप्रमाण पत्र, आय प्रमाणपत्र, मिड डे मील में मिलने वाला अंडा, आंगनवाड़ी, भोज, भण्डारा में उलझकर रह गए!
जिसका नतीजा है कि हमारी आजादी के महज दो साल पहले दो-दो परमाणु हमले झेल चुका देश आज न सिर्फ ओलंपिक की मेजबानी कर बल्कि अपनी सरजमीं पर पदक भी जीत रहा है!
..और आजादी के 74 साल बाद हमारे देश की 80 करोड़ जनता 5 किलो गेंहू के लिए लाइनों में खड़ी है! ...और ख़ुशी ख़ुशी खड़ी है!
क्योंकि हमने न खेलों को सिरियसली लिया और न ही पढाई लिखाई और तकनीक को! जिन्होंने सिरियसली लिया वे आज हर जगह अच्छा कर रहे हैं!
इस ओलंपिक समापन के बाद हमारे खिलाडी वापस आएंगे! हर राज्य अपनी (बेशर्मी की) क्षमता के मुताबिक उनको पुरस्कृत करेगा! माननीय लोग उनके साथ फोटो खिंचवायेंगे! कुछ मनगढ़ंत कहानियां रची जाएँगी! बैनर पोस्टर बनेगा....
लेकिन याद रखिए! खिलाड़ियों के प्रदर्शन के बदले में माननीयों द्वारा बांटे जाने वाले कैश, फ्लैट और नौकरी तथा देशवासियों द्वारा फील किया गया गर्व- ये सब दरअसल अपनी अपनी नाकामी छिपाने के तरीके हैं! इससे ज्यादा कुछ नहीं है!
..और जब तक ऐसा चलता रहेगा, विश्वगुरु सिर्फ ओलंपिक ही नहीं, हर प्रतिस्पर्धा में मेडल के लिए तरसते रहेंगे!
(ये माइकल हमारे यहाँ होता तो हमारे माननीय अबतक इसको राष्ट्रपति बना दिए होते)
07/08/2021
रिजल्ट तो हमारे जमाने में आते थे, जब पूरे बोर्ड का रिजल्ट 17 ℅ हो, और उसमें भी आप ने वैतरणी तर ली हो (डिवीजन मायने नहीं, परसेंटेज कौन पूँछे) तो पूरे कुनबे का सीना चौड़ा हो जाता था।
दसवीं का बोर्ड...बचपन से ही इसके नाम से ऐसा डराया जाता था कि आधे तो वहाँ पहुँचने तक ही पढ़ाई से सन्यास ले लेते थे। जो हिम्मत करके पहुँचते, उनकी हिम्मत गुरुजन और परिजन पूरे साल ये कहकर बढ़ाते,"अब पता चलेगा बेटा, कितने होशियार हो, नवीं तक तो गधे भी पास हो जाते हैं" !!
रही-सही कसर हाईस्कूल में पंचवर्षीय योजना बना चुके साथी पूरी कर देते..." भाई, खाली पढ़ने से कुछ नहीं होगा, इसे पास करना हर किसी के लक में नहीं होता, हमें ही देख लो...
और फिर , जब रिजल्ट का दिन आता। ऑनलाइन का जमाना तो था नहीं,सो एक दिन पहले ही शहर के दो- तीन हीरो (ये अक्सर दो पंच वर्षीय योजना वाले होते थे) अपनी हीरो स्प्लेंडर या यामहा में शहर चले जाते। फिर आधी रात को आवाज सुनाई देती..."रिजल्ट-रिजल्ट"
पूरा का पूरा मुहल्ला उन पर टूट पड़ता। रिजल्ट वाले #अखबार को कमर में खोंसकर उनमें से एक किसी ऊँची जगह पर चढ़ जाता। फिर वहीं से नम्बर पूछा जाता और रिजल्ट सुनाया जाता...पाँच हजार एक सौ तिरासी ...फेल, चौरासी..फेल, पिचासी..फेल, छियासी..सप्लीमेंट्री !!
कोई मुरव्वत नहीं..पूरे मुहल्ले के सामने बेइज्जती।
रिजल्ट दिखाने की फीस भी डिवीजन से तय होती थी,लेकिन फेल होने वालों के लिए ये सेवा पूर्णतया निशुल्क होती।
जो पास हो जाता, उसे ऊपर जाकर अपना नम्बर देखने की अनुमति होती। टोर्च की लाइट में प्रवेश-पत्र से मिलाकर नम्बर पक्का किया जाता, और फिर 10, 20 या 50 रुपये का पेमेंट कर पिता-पुत्र एवरेस्ट शिखर आरोहण करने के गर्व के साथ नीचे उतरते।
जिनका नम्बर अखबार में नहीं होता उनके परिजन अपने बच्चे को कुछ ऐसे ढाँढस बँधाते... अरे, कुम्भ का मेला जो क्या है, जो बारह साल में आएगा, अगले साल फिर दे देना एग्जाम...
पूरे मोहल्ले में रतजगा होता।चाय के दौर के साथ चर्चाएं चलती, अरे ... फलाने के लड़के ने तो पहली बार में ही ...
आजकल बच्चों के मार्क्स भी तो #फारेनहाइट में आते हैं।
99.2, 98.6, 98.8.......
और हमारे जमाने में मार्क्स #सेंटीग्रेड में आते थे....37.1, 38.5, 39
हाँ यदि किसी के मार्क्स 50 या उसके ऊपर आ जाते तो लोगों की खुसर -फुसर .....
नकल की होगी ,मेहनत से कहाँ इत्ते मार्क्स आते हैं।
वैसे भी इत्ता पढ़ते तो कभी देखा नहीं । (भले ही बच्चे ने रात रात जगकर आँखें फोड़ी हों)
सच में, रिजल्ट तो हमारे जमाने में ही आता था।
साभार - सोशल मीडिया
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