15/09/2021
13 September 2021
सारागढ़ी की लड़ाई
इस वर्ष 12 सितंबर को ‘सारागढ़ी की लड़ाई’ (Battle of Saragarhi) को 124 वर्ष पूरे हो गए। इस लड़ाई से देश-विदेश की सेनाएं प्रेरणा लेती है, और इसके ऊपर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं और कई फिल्मे भी बन चुकी हैं।
‘सारागढ़ी का लड़ाई’ के बारे में:
सारागढ़ी का युद्ध 12 सितंबर 1897 को लड़ा गया था। इसे विश्व के सैन्य इतिहास में सबसे बेहतरीन अंतिम मोर्चों में से एक माना जाता है।
इस युद्ध में ब्रिटिश सेना के इक्कीस सैनिकों ने 8,000 से अधिक अफरीदी और ओरकजई कबायली लड़ाकों का मुकबला किया था, और उन्होंने सात घंटों तक किले पर कब्ज़ा नहीं होने दिया।
हालांकि, गिनती में काफी कम होने के बाबजूद, 36वीं सिख प्लाटून के सैनिकों ने हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्व में अपनी अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी, जिसमें 200 कबायली मारे गए और 600 से अधिक बुरी तरह से घायल हुए थे।
सारागढ़ी का महत्व:
सारागढ़ी का किला, ‘फोर्ट लॉकहार्ट’ और ‘फोर्ट गुलिस्तान’ के बीच स्थित संचार दुर्ग था।
ऊबड़ खाबड़ ‘उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत’ (NWFP) में स्थित इन दोनों किलों (जो अब पाकिस्तान में हैं) का निर्माण महाराजा रणजीत सिंह ने करवाया था, बाद में अंग्रेजों ने इनका नाम परिवर्तित कर दिया था।
इन दोनों महत्वपूर्ण किलों में, ‘उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत’ के बीहड़ इलाके में बड़ी संख्या में तैनात किए जाने वाले ब्रिटिश सैनिक रहते थे, सारागढ़ी का किला, इन दोनों किलों में संपर्क कायम रखने में सहायक था।
इस युद्ध की विरासत:
तत्कालीन ब्रिटेन में मरणोपरांत वीरता पदक नहीं देने की परंपरा थी। इस परंपरा को तोड़ते हुए महारानी विक्टोरिया ने 36वीं सिख प्लाटून के 21 शहीद सैनिकों – गैर-सैनिक कार्य करने वाले शहीद को छोड़कर – के लिए प्रत्येक को 500 रुपये, दो ‘मरबा’ (50 एकड़) जमीन और ‘इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट’ (विक्टोरिया क्रॉस के समान पदक) से सम्मानित किया।
कुछ दिनों के बाद, अंग्रेजों ने किले पर फिर से अधिकार कर लिया और सारागढ़ी की जली हुई ईंटों से शहीदों के लिए एक स्मारक स्तंभ का निर्माण करवाया।
अंग्रेजों ने इन शहीदों के सम्मान में अमृतसर और फिरोजपुर में गुरुद्वारों की स्थापना की।