30/06/2024
भारत की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था : सेवा या व्यापार
शिक्षा मनुष्य के जीवन का आधार है। जब एक नवजात शिशु का जन्म होता है तो सर्वप्रथम मां का उच्चारण करता है।फिर धीरे धीरे वह अपनी मां की छत्रछाया में वातावरण से अन्योन्यक्रिया करते हुए अपने आसपास के परिवेश से सामंजस्य बनाते हुए दिन प्रतिदिन वृद्धि करता है। लगभग एक साल के अंदर अन्दर वह अपने परिवार के लोगों को पहचानते हुए उनके साथ घुल मिल जाता है ।एक साल से तीन साल के बीच उसकी प्रारंभिक शिक्षा उसकी मां और उसके परिवार वालों के द्वारा दी जाती है। एक बालक के जीवन में असली संघर्ष की शुरुवात तीन साल के बाद विद्यालय में प्रवेश के साथ शुरू होती है । एक छोटे बालक की शिक्षा के लिए सबसे जरूरी है कि उसे अपने आस पास के परिवेश से परिचय कराया जाए इसके साथ साथ भाषा के पढ़ने ,बोलने और लिखने का अभ्यास रचनात्मक क्रियाकलापों के द्वारा कर जाए। 3 साल से 6 साल के बच्चों को आधारभूत शिक्षा जैसे पुस्तक पाठन,शब्दों का ठीक उच्चारण,लेखन कौशल तथा रचनात्मक क्रियाकलाप जैसे चित्रकारी,नृत्य,गायन आदि का प्रशिक्षण दिया जाए। 6 वर्ष अर्थात कक्षा 1 और 2 के बाच्चों को हिंदी,अंग्रेजी,गणित और रचनात्मक क्रिकलाप सिखाया जाए। कक्षा 3 से पांच के बच्चों को हिंदी,अंग्रेजी,गणित और पर्यावरण तथा विज्ञान की मूलभूत जानकारियों को सिखाया जाए ।कक्षा 6 से भाषा,गणित ,विज्ञान ,सामाजिक विज्ञान,कंप्यूटर की आधारभूत जानकारी दी जाए । अब प्रश्न यह उठता है कि क्या ऐसा आज के विद्यालयों में किया जाता है ? तो जवाब आता है नहीं अगर नहीं तो इसके पीछे की वजह क्या है? अगर मैं एक आम नागरिक के नाते इस देश के सभी विद्यालय संचालकों से पूंछू कि क्या वो सरकार द्वारा निर्धारित मापदंडों के आधार पर शिक्षा देते हैं तो शायद किसी विद्यालय द्वारा ऐसा नहीं किया जाता होगा ऐसा इसलिए क्योंकि भारत सरकार द्वारा संचालित केंद्रीय विद्यालयों में कक्षा 1 से 5 तक सिर्फ चार विषय हिन्दी,अंग्रेजी,गणित और E V S पढ़ाए जाते हैं।कक्षा 6 से 8 तक 6 विषय हिन्दी,अंग्रेजी,गणित,विज्ञान,सामाजिक विज्ञान और संस्कृत की शिक्षा दी जाती है। अब बात करते हैं अपने देश ,प्रदेश और जिले में संचालित अन्य विद्यालयों की जहां पर U K G के बच्चे को हिंदी,अंग्रेजी और गणित के अतिरिक्त E V S तथा GK भी पढ़ाया जाता है। कक्षा 1 और 2 के बच्चों को हिंदी,अंग्रेजी,गणित के अतिरिक्त विज्ञान,सामाजिक विज्ञान,कंप्यूटर,GK आदि विषय भी पढ़ाए जाते हैं। कक्षा 3 से 5 में भी हिन्दी अंग्रेजी,गणित के अतिरिक्त अन्य विषय पढ़ाए जाते हैं।कक्षा 6 से 8 के बीच भी GK आदि विषय पढ़ाए जाते हैं।अब मेरा प्रश्न सभी विद्वान अध्यापकों, अभिभावकों, विद्यालय संचालकों तथा सरकारी हुक्मरानों अर्थात सरकार से है कि U K G में पढ़ने वाला बच्चा जो अभी ठीक ढंग से मात्रा को नहीं पहचानता है अर्थात वह अभी पाठन और लेखन की प्रारंभिक अवस्था में है तो वह EVS और GK जैसे विषयों को कैसे तैयार करेगा । कक्षा 1 और 2 का बच्चा जो अभी शायद अभी ठीक ढंग से हिन्दी और अंग्रेजी की पुस्तकों का पाठन नहीं कर पाता हो वह बच्चा बाकी विषयों की पुस्तकों तथा उनके प्रश्नोत्तों को कैसे तैयार करे।एक छोटा बालक जब इन विषयों के मायाजाल में फंसता है तब हमारे देश के आधुनिक अध्यापक डरा धमका कर उसको अपना पाठ्यक्रम रटाने लगते हैं,जो सरासर गलत अवधारणा है।अगर हम भारत में आयोजित की जाने वाली विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम पर नजर डालें तो पाएंगे कि हिन्दी,अंग्रेजी,गणित,विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्न न्यूनतम कक्षा 6 के स्तर से प्रारंभ होते हैं न कि UKG और 1st तथा 2nd से तो फिर छोटी कक्षाओं में भारी भरकम बस्ते की आवश्यकता क्यों? तब इस प्रश्न का उत्तर शायद शिक्षा के नाम पर होने वाला व्यापार मिले क्योंकि पुस्तकों की संख्या ज्यादा होने पर विद्यालय को मिलने वाला कमीशन ज्यादा होगा। विद्यालय वो पवित्र स्थान हैं जहां पर एक अबोध बालक को विद्वान,सामर्थ्यवान, नागरिक बनाने का प्रयास किया जाता है।शिक्षा देना एक सेवाभाव है न कि व्यापार,शिक्षण एक जिम्मेदारी का कार्य है न कि धन कमाने का माध्यम । प्राचीन काल से अनेक महान शिक्षकों ने अपने ज्ञान के बल पल पर अनेक वीर योद्धाओं का मार्गदर्शन किया है परंतु शायद आज के विद्यालय संचालक इन बातों को भूल चुके हैं ।आज के दौर में भारत में अगर किसी क्षेत्र में महंगाई ने सबसे ज्यादा आम आदमी को परेशान किया है तो वह है भारत में निजी क्षेत्रों द्वारा संचालित विद्यालयों की महंगी शिक्षा व्यवस्था। एक मध्यम वर्गीय परिवार की जेब पर सबसे ज्यादा असर भारत के निजी संस्थानों की महंगी फीस ने डाला है। शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थानों के ज्यादा बढ़ने का मुख्य कारण हमारे देश की सरकारों की उदासीनता। आज हम भारत के कक्षा 12 तक के सरकारी विद्यालयों की हालात देखें तो पाएंगे कि उनमें साल दर साल नामांकन में कमी आ रही है। सरकार सरकारी विद्यालयों में स्थाई अध्यापकों की नियुक्तियां नहीं करती है संविदा शिक्षकों के सहारे काम चलने दिया जाता है।हमारे देश के प्रधानमंत्री महोदय देश को विकसित राष्ट्र बनाने का आह्वान करते हैं तो उन्हें सबसे पहले देश की शिक्षण पद्धति और बेलगाम निजी संस्थानों जो शिक्षा के नाम पर भोले भाले अभिभावकों को ठगने का काम करते हैं उन पर नियंत्रण लगाना होगा।आज के निजी संस्थान सरकारी पाठ्यक्रम को नजरंदाज करके अपने अनुसार विषयों का अध्यापन कराते हैं उन पर लगाम लगाने की आवश्यकता है।हमारे देश के राजनीतिक दल और नेता चुनाव के दौरान महंगाई का ढिंढोरा पीटते हैं परंतु शिक्षा के नाम पर होने वाले कमीशनबाजी पर कभी आंदोलन और चक्काजाम या प्रदर्शन नहीं करते क्योंकि तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं और मंत्रियों के खुद के विद्यालय,इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज चलते हैं।
सारांश रूप में में सरकार से यही गुजारिश करूंगा कि देश में शिक्षा के नाम मुनाफावसुली करने वाले निजी विद्यालयों पर सरकारी अंकुश स्थापित किया जाय ताकि माध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चों को भी आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने में परेशानी न हो।