مکتب دینیات گونڈہ Maktab Deniyaat gonda

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03/06/2026

*मकतब तालीम गाह है और घर तरबियत गाह है*

बच्चे मकतब में आते हैं, नमाज़ सीखते हैं, असातिज़ा ( टीचर ) नमाज़ तो सिखा देंगे लेकिन वो आप के बच्चों को नमाज़ी नहीं बना सकते, नमाज़ी तो मां बाप बना सकते हैं, वो तो मां बाप के साथ घर में रहेगा।
ये असातिज़ा ( टीचर ) आदाब सिखा तो सकते हैं कि खाने का ये अदब है: हाथ धो कर खाओ, दाहिने हाथ से खाओ, बिस्मिल्लाह पढ़ कर खाओ, इस तरह लुक़्मा लो, इस तरह बैठो, खाने के बाद ये पढ़ो, दस्तरख़्वान बिछाओ।
ये सारी चीजें यहां मकतब में सिखाएंगे लेकिन इस पर अमल कहां होगा? यहां मकतब में?

नहीं, अमल तो घर में होगा, अमल तो आप को कराना है, अगर ये सिखा दिया गया तो बच्चे उस वक्त तक आदी नहीं बनेंगे, जब तक कि आप उस पर मेहनत नहीं करेंगे।

इसलिए आप से गुजारिश है कि छुट्टी के मौके पर बच्चों को घर पर अमल कराने की कोशिश करें
नमाज का जब वक्त हो जाए तो नमाज पढ़ने को कहें
अच्छे अखलाक सिखाएं, बुरे बच्चों के साथ रहने से मना करें ।

14/05/2026

कल मगरीब के बाद हवलदार पूर्वा में मकतब दीनियात का सालाना जलसा है
आप सब से शिरकत की दरख़्वास्त है।

09/05/2026

मकतब दीनियात खरगूपुर बाजार गोंडा का कल सालाना जलसा है
आप सब से शिरकत की दरख़्वास्त है।

05/05/2026

Aaiye mil kar ek ba haya nasal Tayyar karen .

02/05/2026

खुशखबरी! खुशखबरी! खुशखबरी!

तीन साला आल़मियत कोर्स

(दाखला शुरू)

"तलबुल इल्मी फ़रीदतुन अला कुल्ली मुस्लिम (अल-हदीस)"

हर मुसलमान मर्द और औरत पर इल्म-ए-दीन का हासिल करना फ़र्ज़ है।

इस्लाम ने लड़कों की तरह लड़कियों की तालीम और तरबियत को भी ज़रूरी क़रार दिया है। कोई समाज उसी वक़्त पाकीज़ा और तहज़ीब-याफ़्ता बन सकता है जब कि उस समाज की ख़वातीन इस्लामी तरबियत से आरास्ता हों। ख़ास तौर पर ऐसे माहौल में जब कि लोग इर्तिदाद की लहरों में बह रहे हैं, बच्चियों को भी सही इल्म से आरास्ता करना और सही मालूमात उन तक पहुँचाना और उनके अंदर सही फ़िक्र पैदा करना उम्मत की बुनियादी ज़रूरतों में दाख़िल है।
इसीलिए खुसूसी तौर पर लड़कियों को दीनी तालीम से आरास्ता करने के लिए **मक्तब दीनियात मोहम्मदपुर** में तीन साला आल़मियत का कोर्स चल रहा है और अल्हम्दुलिल्लाह दाख़ला भी शुरू हो चुका है। इसलिए अपनी बच्चियों का दाख़ला करवाकर उनके ईमान की हिफ़ाज़त करें।
मदरसा दारुल हुदा लिल-बनात की तालीम का इज्माली खाका

*क़ुरआन मजीद:* तजवीद के साथ मुकम्मल तालीम और तर्जुमा व तफ़सीर।

*फ़िक़्ह (मस़ाइल):* और इस्लामी अहकाम।

*अहादीस-ए-मुबारका की तालीम।*

*सीरत-उन-नबी (ﷺ) और इस्लामी तारीख़।*

*अरबी अदब और नह्व-ओ-सर्फ़ की बुनियादी तालीम।*

*विशेषताएं (ख़ुसूसियात)*

* अस्री तक़ाज़ों से हम-आहंग बेहतरीन इस्लामी निसाब-ए-तालीम।

* उम्दा और मेयारी तालीम के साथ बेहतरीन तरबियत।

* ताल़िबात के लिए पर्दे में रह कर तालीम हासिल करने का नज़्म।

* ताल़िबात की तरबियत और बेहतरीन किरदार-साज़ी और पुर-सुकून व साफ़ सुथरा माहौल।

* ताल़िबात की तरबियत के लिए वक़्तन-फ़वक़्तन उलमा-ए-किराम के बयानात।

*मक्तब दीनियात मोमिना कोर्स* मोहम्मदपुर, गोंडा

*मोबाइल नंबर:* 8858466368, 9889961754, 9026781434

30/04/2026

बच्चों और बच्चियों के लिए मकतब का माहौल क्यों ज़रूरी है?

आज के दौर में जहाँ मोबाइल और इंटरनेट हर हाथ में है, वहाँ बच्चों के ईमान और अख़लाक़ को बचाना एक बहुत बड़ा चैलेंज बन गया है। अपने बच्चों और बच्चियों को कम-अज़-कम बारहवीं या मैट्रिक तक स्कूल के साथ-साथ मकतब के दीनी माहौल से जोड़े रखना इन वजूहात (Reasons) की बिना पर बहुत ही ज़रूरी है:

1. डिजिटल माहौल के नुक़सानात
सोशल मीडिया और इंटरनेट के इस्तेमाल के दौरान न चाहते हुए भी फुहश और बे-हयाई पर मबनी चीज़ें सामने आ जाती हैं। ये मनाज़िर बच्चों के मासूम ज़ेहनों को वक़्त से पहले गंदगी की तरफ़ माइल कर रहे हैं।

2. मुआशरती बिगाड़ का असर
शादी-ब्याह और दीगर तक़रीबात का माहौल अब इस्लामी नहीं रहा। वहाँ का आज़ादाना मेल-जोल और ग़ैर-इस्लामी तरीक़े बच्चों के अख़लाक़ को बुरी तरह मुतास्सिर करते हैं।

3. तालीमी इदारों की सूरतेहाल
आजकल बहुत से मुस्लिम स्कूलों में भी शरई परदे और हया का वह इंतिज़ाम नहीं है जो होना चाहिए। टीचर्स और स्टूडेंट के दर्मियान इस्लामी हुदूद का ख़्याल न रखने से हया और इज़्ज़त पर हमेशा ख़तरा मंडलाता रहता है।

4. नज़रियाती असरात
स्कूल की किताबों में अक्सर दूसरे मज़ाहिब के अक़ाइद और नज़रियात पढ़ाए जाते हैं। जब बच्चा बार-बार इन बातों को सुनता है, तो उसके ज़ेहन में अपने दीन और अक़ीदे के बारे में उलझनें पैदा हो सकती हैं।

नतीजा

जब हमारे बच्चे हर वक़्त ऐसे माहौल में रहें जहाँ क़दम-क़दम पर ईमान और हया के लिए ख़तरात हों, तो उनका मुतास्सिर होना यक़ीनी है। अब अगर इस "रूहानी मर्ज़" का बाक़ायदा "रूहानी इलाज" न किया गया तो वो बच्चे और बच्चियां इस बुरे माहौल से निकल नहीं सकेंगे।

❗ इसलिए ज़रूरी है कि उन्हें मकतब के नूरानी माहौल में रखा जाए। वहाँ जब वो इस्लामी लिबास में रहेंगे और क़ुरआन व हदीस, तौहीद व रिसालत और आख़िरत की बातें मुसलसल उनके कानों में पड़ेंगी, तो उनके दिलों की सफ़ाई होती रहेगी। यही वो बुनियाद है जो उन्हें इंशा-अल्लाह एक सच्चा और बा-हया मुसलमान बनने में मदद देगी।
☝️ मगर अफ़सोस इस बात पर है कि इस फ़ानी दुनिया की डिग्रियों के लिए हम अपना वक़्त, माल और मेहनत सब कुछ क़ुर्बान कर रहे हैं, मगर जहाँ बच्चों के दीन, ईमान और आख़िरत सँवरते हों, वहाँ पैसे की कमी, कभी वक़्त की तंगी और कभी असरी तालीम (Modern Education) में रुकावट समझ रहे हैं।
जज़ाकुमुल्लाह ख़ैरा

28/03/2026

زندگی مختصر، آخرت کا سفر طویل ہے
آخرت کا سفر طے کرنے اور جنت تک پہنچنے کیلئے علم دین سے جڑیں ۔
ان شاءالله بہتر تعلیم و تربیت کی کوشش ہوگی۔

جزاک اللہ خیرا

21/03/2026

تمام اہل اسلام کو عید کی پرخلوص مبارکباد

13/02/2026

अस्सलामू अलैकुम व रहमतुल्लाही व बरकातुह,
आप तमाम हज़रात को इत्तिला दी जाती है कि रमज़ानुल मुबारक के मुक़द्दस महीने की आमद के पेश-नज़र एक अहम दीनी प्रोग्राम (जल्सा) मुनअक़िद किया जा रहा है। इस प्रोग्राम का मक़सद हमें यह सिखाना है कि हम इस बरकत वाले महीने की एक-एक घड़ी का सही इस्तेमाल कैसे करें।
आप सभी हज़रात से गुज़ारिश है कि इस रूहानी महफ़िल में शिरकत फ़रमाकर सवाब-ए-दारैन हासिल करें।

प्रोग्राम की तफ़सीलात:
मौज़ू (विषय): रमज़ान कैसे गुज़ारें?
दिन: शुक्रवार (जुम्मा)
वक्त: बाद नमाज़-ए-मग़रिब
मकाम: दीनियात हॉल, मोहम्मदपुर

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